खिचड़ी खाईये, देश के विकास में हाथ बटाईये!

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, चयन करें , 04-11-2017


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वीना

“चाहता हूं

मेरी बेटी कहे

चांद को चांद

अपनी तो उम्र बीती

चांद को रोटी समझते” - मुकुल सरल


मुकुल सरल अब आपकी बेटी चांद को चांद कहने के सिवा कुछ और नहीं कह सकेगी। आपकी कविता हमारे प्रधानसेवक को अंदर तक चीर गई। उनकी लाख कोशिशों के बावजूद वो दाल-रोटी, रोटी कपड़ा और मकान जैसी सुनने में साधारण, पर जनता की महंगी मांगों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। क्या  करें? किसानों से गेहूं-दाल खरीदने के सब रुपये-पैसे अंबानियों-अडानियों के बट्टे खाते चुकाने में घुस गए। व्यापारियों को भी क्या दोष दें। व्यापार है, रिस्क तो लेना ही पड़ता है। गृह विकास न सही दुनिया के सामने अपने व्यक्तिगत विकास के झंडे तो गाड़ ही दिए हमारे अंबानी ने। इससे ज़्यादा की उम्मीद करना भी नाइंसाफी होगी। उनके अपने भी तो बाल-बच्चे हैं।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

खैर! जो भी हो, प्रधान सेवक को इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए रोटी, चांद और आम बालकों के बीच का समीकरण बिगाड़ने के सिवा और कोई सूरत नज़र नहीं आई।

क्या करें? क्या न करें। क्या चांद को चादर से ढकवा दें? न बच्चा चांद देखेगा न उसे रोटी समझेगा। या रोटी जैसी बला का नामो-निशान ही मिटा दिया जाए? 

अब जैसा कि आप जान-समझ सकते हैं कि पहली योजना बहुत खर्चीली है। उस पर ज़्यादा माथापच्ची करने का फायदा नहीं। रोटी का खात्मा ही नायाब और कामयाब जुगाड़ है। ‘‘दाल-रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ’’ बहुत महंगा सौदा है ये रोटी, अपने साथ 200 रुपये की दाल लगाए घूमती है! 

रोटी से पिंड छुड़ाने और दाल की बरबादी रोकने का चैलेंज छोटा तो नहीं। पर जैसा कि आप जानते हैं- मैं कमाल का क्रिएटिव प्रधान हूं। ज़रा ध्यान लगाया, एक क्रिएटिव चुटकी बजाई और ‘‘खिचड़ी’’ - ‘मुझसे बेहतर ऑप्शन कोई नहीं...’ गाती-बजाती, इतराती सामने मौजूद। जब खिचड़ी ने अपनी यूएसपी (युनीक सेलिंग पॉइंट) साबित की तो मैं ना कर ही नहीं सकता था। सुनकर आप जनता जनार्दन भी मुझे दोबारा प्रधानसेवक बनाने के लिए उतावले हो जाएंगे।

इसे अपनाते ही आप देखेंगे कि हमारे देश की विकास गति को पर लग जाएंगे। और हमारे बच्चों के मासूम दिमाग पर से चांद और रोटी की कशमकश का भार हमेशा के लिए गायब!

खिचड़ी।

 

क्या है कि खिचड़ी एक अदभुत व्यजंन है। इसे कितना ही शाही बना लो कितना ही आम। इसीलिए मैं इसे राष्ट्रीय व्यंजन बनाने पर तुला हूं। दलित, गरीब, पिछड़े, आदिवासियों को चाहिये 8 दाने चावल दो दाने दाल और जितना जी चाहे ठेलो पानी। पूरे परिवार के लिए स्वादिष्ट-स्वास्थ्य वर्धक खिचड़ी तैयार! समय की बचत सो अलग। 

अगर हमें देश का विकास करना है तो आने वाले दिनों में कम तनख्वाह पर 16-18-20 घंटे काम करना पड़ेगा। इसकी  भरपाई रोटी-सब्जी, सलाद बनाने-काटने में लगने वाला समय और पैसा बचाकर ही की जा सकती है। फिर, ज़्यादा आईटम बनेगें तो ज़्यादा गैस भी खर्च होगी और फिर गैस के दाम बढ़ने का रोना। आपकी ज़्यादा तनख्वाह की मांग, पूंजीपतियों को घाटा। 

मेरे सवा सौ करोड़ मुंह के ढाई सौ करोड़ हाथ मुझे चाहिये। मैं 20 घंटे दे सकता हूं तो आप क्यों नहीं। हमें भारत का विकास करना है। जब तक सिर्फ खिचड़ी से काम चला कर रात दिन हाड़ तोड़ मेहनत नहीं करेंगे, माल्या और अडानी आदि भाईयों के धन की भरपाई कर उन्हें रोज़गार पैदा करने के लिए कैसे मनाएंगे?  मेरी आपसे अपील है  8 दाने चावल 2 दाने दाल  की खिचड़ी में काम चलाईये। रोज़गार पैदा करने की लक्ष्य प्राप्ति और देश विकास में मेरा हाथ बटाइये। खिचड़ी...खिचड़ी...खिचड़ी सिर्फ खिचड़ी खाईये।

और ये कवि टाइप के लोग खबरदार! अब ये मत लिख देना कि अपनी तो उम्र गुज़र गई तारों से भरे आसमान को खिचड़ी समझ कर। देशद्रोह के इल्जाम में कालकोठरी में सड़ोगे।

अच्छा तो चलता हूं। खिचड़ी ऐम्बेसडर बनकर खिचड़ी चखते-चखते मुंह का ज़ायका बिगड़ गया। जबान और सेहत दोनों काजू की रोटी और पिस्ते का हलवा  खाने के लिए मरी जा रही हैं।

(वीना एक पत्रकार के साथ फिल्मकार भी हैं और नियमित व्यंग्य लेखन भी करती हैं।)










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