भाईयों और बहनों... आपकी ख़ातिर... सब आपकी ख़ातिर

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 16-12-2017


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वीना

“हूं गुजरात छूं। हूं विकास छूं। मेरी बेइज़्ज़ती गुजरात का अपमान है। क्या मुझे हारने दोगे गुजरात वासियों?”

ख़ुद को गुजराती अस्मिता का सर्वे-सर्वा बताने वाला, वो ख़ास आदमी आज मामूली नागरिक की तरह लाइन में लग कर, अपने हक़ में मतदान कर बाहर निकला है।

चेहरे पर अंजाम से घबराई-खिसियाई हंसी चिपकी हुई है।

यूं तो वो 29 राज्यों के लोकतंत्र का प्रधान सेवक है। पर आज वो चाहता है कि हिंदुस्तानी सरकारी गाड़ी में लटका हुआ अपने हक़ में वोट की उंगली दिखाता, वो किसी गुजरात नाम की आज़ाद रियासत का मालिक समझा जाए।  

व्यंग्य स्तंभ।

आज उसकी आवाज़ बंद है, मगर खुले मुंह, आंखों और शरीर की भाव-भंगिमाओं से चीख-चीख कर अपील कर रहा है- 

‘‘मेरे हमवतनों तुम्हारे भले के लिए विदेस में पड़ा हूं। वहां ऐशो-आराम तो है। पर मन को चैन नहीं। हर वक़्त ये डर सताता है कि एक-डेढ़ साल बाद ये शाही ठाट  मुझसे छीन लिए जाएंगे। सैल्फी विथ वर्ल्ड से वंचित कर दिया जाऊंगा। क्या तुम अपने गुजराती भाई को यूं लुटते देख सकते हो? 

हम गुजराती देश-दुनिया में सदियों से अपना झंडा गाड़ते आए हैं। हमारे विदेश में रहने वाले गुजराती उद्योगपति भाई हों या देश में रहने वाले। कोई अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं। मैंने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं रखी उन्हें उस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए। 

मेरा सवाल ये है कि क्या मेरा गुजरात, मुझे केवल पांच साल में हिंदुस्तान की सत्ता की कुर्सी से बेदखल करने की साज़िश को कामयाब होने देगा?  मैं भी गुजराती, आप भी गुजराती। अपने गुजरात में खड़ा होकर आपसे विनती करता हूं। मेरे गुजराती किसान भाईयों, अपनी बर्बाद खेती को कुछ समय के लिए भूल जाओ। यक़ीन मानिये, आपके ख़ुदक़ुशी के फंदे को पूरी इज़्ज़त से मैं अपनी कुर्सी को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करूंगा।

नौजवानों, रोज़गार नहीं मिलेगा तो भूख़ से मर जाओगे। तुम्हारी भूख़ से मौत गुजरात के लिए शहादत कहलाएगी। जिसे हिन्दुस्तान सदियों तक याद रखेगा। याद रखेगा कि तुमने अपनी जान दे दी पर दुश्मनों के भड़काने पर अपने वोट नहीं दिए। और अपने गुजराती भाई की गद्दी को आंच नहीं आने दी। 

क्या ऐसा पहली बार है कि आपकी बहन-बेटियों की शादी नहीं हो पा रही। याद कीजिये आज़ादी के पहले के वो दिन, जब हिंदुस्तान की माताओं-बहनों ने अपने ज़ेवर तक आज़ादी की आग में झोंक दिए थे। तो क्या मेरे गुजरात कि बच्चियां-मां-बहनें हिंदुस्तान की वीरांगनाओं से कुछ कम हैं। जो अपने विवाहित जीवन का त्याग कर मेरी कुर्सी की लाज बचाने मे अपना योगदान न देंगी।

ज़मीन का क्या है। वो तो मिट्टी है। ले जाने दो उसे अगर अंबानी-अडानी ले जाते हैं। मैं आपको हीरे-जवाहरात से जड़े, नोटों की माला पहने वादों का उपहार दूंगा। 

ये जीवन क्या है? मिथ्या है। याद करो महाभारत में कृष्ण का कुरुक्षेत्र ज्ञान। शरीर नश्वर है। आत्मा अमर है। इस नश्वर शरीर को अपने प्रधान सेवक भाई की इज़्ज़त बचाने के लिए अर्पित कर दो। तुम्हारी आत्मा को सीधे स्वर्ग में एंट्री दिलवाऊंगा ये मेरा, एक गुजराती का, अपने गुजराती भाईयों से वादा है। भाईयों-बहनों, अगर मैं ऐसा न करूं, तो मुझे भी नरक में खींच लेना। 

हम करोड़ों गुजराती भोजन, रोज़गार, दवा, शिक्षा न पा सके तो क्या हुआ? अपने बड़बोले गुजराती भाई के ऐशो-आराम में खलल नहीं पड़ने दिया। हमारी परेशानियां वैसे भी देश-दुनिया को दिखाई नहीं जाती। पर हमारे गुजराती भाई की शान तो पूरी दुनिया देखती है। हम इतने में ही संतोष कर लेंगे। भाई को न गुजरात की सत्ता से और जहां तक कोशिश होगी न दिल्ली की सत्ता से ही टस से मस होने देंगे। ऐसी शपथ लो मेरे गुजरातियों,  शपथ लो।

तुम मेरे हो, मैं तुम्हारा हूं। पराय मुल्क का क्या भरोसा? कभी भी पराई जनता कान पकड़ कर निकाल बाहर करे। एक-डेढ़ साल बाद अगर ठेंगा दिया दिया तो मैं कहां जाऊंगा? अपने देश गुजरात, मेरे गुजरातियों, आप के पास ही आऊंगा न। आपकी कृपा से कुर्सी का इतना आदि हो गया हूं कि सामने के सोफे रास नहीं आएंगे। प्रधान सेवक की न सही डेढ़ साल बाद मुख्यमंत्री की सही। कुर्सी तो आपको मुझे देनी ही होगी। वरना कसम आप सबकी ज़िन्दा न रह पाऊंगा। 

अब यहां मुझे जीवन-मरण का इतना महत्वपूर्ण संदेश अपने सगों को देना था और दुश्मनों को चुनाव आचार संहिता भंग होने की पड़ी है। देख लो मेरे गुजराती कद्रदानों, इन विदेशी असंवेदनशील भारतीय लोगों में कैसे दिन काट रहा हूं। आपकी ख़ातिर... सब आपकी ख़ातिर। 

सी प्लेन दिखाया, आपको मज़ा आया कि नहीं...आया कि नहीं..! वीडियो-फोटो में देखा आपने, सी प्लेन के दरवाज़े पर ख़ड़ा हुआ, हाथ हिला-हिला कर लहरों से बात करता हुआ चोखो स्टाइलबाज़ लग रहा था तुम्हारा भाई! लग रहा था कि नहीं लग रहा था...बोलो..! ये हिंदुस्तानी तुम्हारे गुजराती भाई से चिढ़ते हैं। इनके ख़ुद के पास तो ऐसे शानदार-दिलदार स्टंट करने की अक़्ल-गुर्दा है नहीं। अब मेरे पास 56 इंच का सीना है तो इसमें मेरा क्या क़ुसूर!!”

(वीना एक पत्रकार के साथ एक फिल्मकार भी हैं।)









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?????? ???? :: - 12-16-2017
बेहतरीन व्यंग्य