हम अफवाह को इतिहास बनाने में माहिर हैं: सींकिया भिडे

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 06-01-2018


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वीना

‘‘थांबा संभा थांबा’’ 

एक खूबसूरत बलिष्ठ नौजवान ने सींकिया शरीर पर चींटी जैसा मुंह और उस चींटी मुंह पर दो बड़ी-बड़ी सफेद बेतरतीब मूंछों का बोझ डाले जल्दी-जल्दी में कहीं दौड़ते 80 साल के बूढ़े को रोकते हुए कहा।

मूंछों पर हाथ फेरते हुए सींकिया बूढ़े ने रफ्तार को ब्रेक लगाया। घूरकर नौजवान को देखा और पूछा - ‘‘तुम कौन?’’

नौजवान मुस्कुराया- ‘‘काए भिड़ते तुम्ही भिडे..!

सींकिया भिडे, नौजवान की मुस्कान से चिड़कर चिल्लाए -“आपन टाईम खोटी करो नाई। रास्ता नापो।”

अबकी बार नौजवान के पास खड़े पके रंग की शानदार मूंछ और दाढ़ी वाले एक रौबदार व्यक्ति सींकिया भिडे के सामने आकर खड़े हो गए। और बोले –“तुमी काईं गुस्सा करते भिडे। मेरे बेटे का नाम लेके इतराते हो और उसे पहचानते भी नहीं।”

“सुना है तुम रोज़ हमारी प्रतिमा की आरती करते हो। और जब हम स्वयं प्रस्तुत हैं तो ये तेवर..!”

छत्रपति शिवाजी महाराज! सींकिया भिडे की आंखें फटी की फटी रह गईं। 

हां हम ही हैं सींकिया भिडे हम ही हैं। शिवाजी ने मुस्कुराते हुए कहा।

जाने क्यों भिडे खड़ा न रह सका। वहीं ज़मीन पर पसर गया।  

व्यंंग्य स्तंभ।

पर संभाजी और शिवाजी महाराज बड़े इत्मिनान से सींकिया भिडे के बदलते भावों को निहार रहे हैं। जब भिडे सामान्य नज़र आया तो शिवाजी बोले - 

“तुम्हारे पास आने से पहले हम पूरा भारत-भ्रमण कर आए हैं। देखकर मन प्रसन्न हुआ कि बिहार की राजधानी पटना के एक विद्यालय में मुसहर जाति के बच्चे आज की महान समझी जाने वाली भाषा अंग्रेज़ी में गिटर-पिटर कर रहे हैं। जिन्हें तुम शिक्षा तो क्या अनाज के दाने तक नहीं देते थे। और जो चूहे खाकर खुद को बचाए रहे। आज तुम्हें शिक्षा देने क़ाबिल हो रहे हैं। ब्राह्मणों का अहंकार संस्कृत ज्ञान तो अब किसी काम का नहीं। क्या तुम इस समय में भी संस्कृत पारंगत हो भिडे?

भिडे खामोश...

शिवाजी फिर बोले - भिडे सदमे से बाहर निकलो। हम दोनों बाप-बेटे सफर से बहुत थक गए हैं। चलो ज़रा हमें उस शानदार महल एंटीलिया में लेकर चलो जिसमें कोई मुकेश अंबानी नाम का सामंत रहता है। छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके वीर पुत्र संभाजी वहीं विश्राम करेंगे। 

इतना सुनकर सींकिया भिडे के पसीने छूटने लगे। बोला - “महाराज, आप महापुरुष वास्ते हमारी सरकार ने छत्रपति शिवाजी स्टेडियम, छत्रपति शिवाजी एयरपोर्ट, पार्क आदि-आदि बनवाए हैं। आप वहां विश्राम करें। खूब संतुष्टि और प्रसन्नता मिलेगी आपको। देखिये कितनी शिद्दत से हम आपको याद रखे हुए हैं।”  

ओ.. हो... गिव मी ए ब्रेक यू ओल्ड मैन!

“तुमी अंग्रेजी बोलते छत्रपति शिवाजी महाराज!’’ भिडे की आंखें एक बार फिर फटी की फटी रह गईं। 

“बताया ना, मुसहरों के बच्चों की गिटर-पिटर सुनकर आ रहे हैं। पटना के “शोषित समाधान केंद्र स्कूल” से सीखी है हमने ये अंग्रेजी। चलो अब जल्दी एंटीलिया चलो।”

भिडे रोने ही तो लगा। हाथ जोड़कर बोला - 

‘‘शिवाजी महाराज, मुझ पर रहम करो। अंबानी अपने दरवाज़े में भी नहीं घुसने देगा। वहां बहुत सिक्योरिटी रहती है। मेरे जैसे का वहां क्या काम?’’

“क्यों वो हिंदू नहीं है?” शिवाजी ने सवाल किया।

सींकिया भिडे - “है भी और नहीं भी महाराज..!”

शिवाजी - “मतलब?”

सींकिया भिडे - “दरअसल, वो पूंजीपति है। पूंजीपतियों की कोई जात-धर्म नहीं होती। बस इतना समझ लीजिये आप जैसे छत्रपति थे वो पूंजीपति है। एंटिलिया उसका किला है। आज उसका ही राज सारे हिंदुस्तान पर है।” 

शिवाजी - “तो तुम अपने दोस्त मल एकबोटे के गौरक्षा गुंडों का इस्तेमाल करो। बुलाओ उन्हें कहो कुछ समय के लिए ग़रीब-मज़लूम मुसलमान, दलितों पर हमला बंद करो और छत्रपति शिवाजी के लिए एंटिलिया पर मोर्चा संभालो। अब तो किसी भी क़ीमत पर हमें एंटीलिया चाहिये”। 

सींकिया भिडे ने फोन लगाया घबराहट के मारे आवाज़ न निकले। बेचारी मूंछें ही जैसे-तैसे फड़की - “हैलो एकबोटे...”

मल एकबोटे उधर से गरजा - “जय शिवाजी! जय मराठा! बोलिये सींकिया जी भिडे, आज किधर बिजली गिरानी है।”

सींकिया भिडे ने मिमियाकर शिवाजी महाराज की इच्छा बताई। उधर से खुसर-पुसर होती रही। भिडे ने शिवाजी, सांभाजी की तरफ देखा और फ़ोन काट दिया।  

जवाब सुनने को उतावले शिवाजी बोले - “क्या हुआ? पहुंच रहा है मल एकबोटे?”

सींकिया भिडे थूक निगलते हुए बोला - “महाराज एकबोटे और उसके गौ रक्षक दल को दस्त लग गए हैं। अंबानी-अडानी की कृपा से आजकल जलवायु, धरती, खान-पान सब दूषित जो हो गए हैं।” 

शिवाजी महाराज ने अपनी हंसी रोकी और जबरन गंभीर होते हुए  बोले-  ओहो..! हमारी उनसे सहानुभूति है। अच्छा उसे छोड़ो, वो जो तुम्हारा शिष्य है न... जो आजकल देश का प्रधान सेवक बना घूमता है। क्या नाम है उसका?

सींकिया भिडे - नमो विदेशी।

शिवाजी - हां वही। उसे कहो थल सेना, वायु सेना के कुछ नौजवानों को बुलाकर एंटीलिया हमारे लिए खाली करवाए।

बुरे फंसे। नमो विदेशी को फोन लगाया। उधर से जाने क्या सुनने को मिला कि सर्दी के समय सींकिया जी के पसीने गंगा-जमुना की तरह बह रहे हैं। 

शिवाजी ने ये देखकर चुटकी ली। 

“अरे सींकिया जी तुम्हारा मूसलाधार पसीना तो यहां व्यर्थ हो रहा है। हम बनारस के घाट पर होते तो सूखी गंगा को जीवन दान मिल जाता। विदर्भ यहां से नज़दीक है पर तुम्हारा खारा पसीना सूखे खेतों के लिए किसी काम का नहीं। 

तो बोलो क्या कहा नमो विदेशी ने?” 

सींकिया भिडे - “शिवाजी छत्रपति महाराज... नमो विदेशी बोले, 2019 में चुनाव है। इलेक्शन में एक फूटी कौड़ी नहीं देंगे अगर हमने एंटीलिया की तरफ आंख उठा कर भी देखा।

इससे इतर शिवाजी महाराज आपके लिए ऐसा ज़ोरदर ऑफर है नमो विदेशी जी की तरफ से कि आप एंटीलिया भूल जाएंगे। नमो विदेशी अपनी अगली विदेश यात्रा आप दोनों महानुभावों के साथ करेंगे। किस देश में कितने दिन और कितनी रातें बितानी हैं। ये भी आप लोगों की मर्ज़ी पर होगा। मेरी माने तो बिना सोचे हां कर दीजिये। एंटीलिया में विश्राम के बदले इससे बेहतर डील आपको नहीं मिल सकती। 

बस इसके बदले आपको आने वाले चुनाव प्रचार में जनता को अपनी शाही-सुखद विदेशी यात्रा का वर्णन सुनाना होगा। जो कि आपको बीजेपी के सौजन्य से और ख़ासकर नमो विदेशी जी की मेहरबानी से प्राप्त हुई।

शिवाजी को गुस्सा आ गया - ‘‘महाराष्ट्र अंबानी का है कि छत्रपति शिवाजी महाराज का!’’ तुम क्या हमें दल-बदलू नेता समझते हो। जिन्हें होटलों की ऐश करवाकर तुम समर्थन हासिल कर लेते हो।”

सींकिया भिडे - “माफी शिवाजी महाराज...माफी! आप इतिहास हैं। वर्तमान समय में केवल महाराष्ट्र ही नहीं पूरे भारतवर्ष का महाराजा अंबानी है।” 

अरे धूर्त! तो फिर तू हमारे नाम पर हिंदू राष्ट्र की तूती क्यों बजाता घूमता है?

सींकिया भिडे - “क्या करूं महाराज आज के इस पूंजीवादी युग में फूट डालो शासन करो के अलावा कोई और राजनीति काम नहीं करती। पूंजीवाद में धन-संपत्ति काले धन के रूप में देश से बाहर जा सकती है। पर आपके राज्य की तरह सफेद होकर गरीब के घर का चूल्हा जलाने की इजाज़त किसी को नहीं है।”

शिवाजी महाराज - “और इसलिए तू औरंगज़ेब और हमारे बीच के सत्ता संघर्ष को हिंदू-मुसलमान लड़ाई बताकर फायदा उठाना चाहता है। गोविंद महार गायकवाड़ की समाधि तोड़ने की हिमाकत कर दलित मराठों को भिड़ाने की जुगत लगाता है। स्थापित इतिहास को झुठलाता है। तो बता मेरे बेटे की समाधि गोविंद गायकवाड़ ने नहीं तो किसने बनाई थी? कब कैसे, कहां बनाई थी।” 

सींकिया भिडे - “महाराज देश भर में हमारी बहुत सी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटीज़ हैं। वहीं नया इतिहास गढ़ा जाता है। अभी केवल नाम की रिसर्च पूरी हुई है। कोई शिरके-शिवले नाम का व्यक्ति होगा जिसकी जाति मराठा बताई जाएगी। कब कहां कैसे वो संभाजी का अंतिम संस्कार करेगा वो स्टोरी डेवलप होनी अभी बाकी है। आप यक़ीन रखिये हम अफवाह को इतिहास बनाने में माहिर हैं।

जैसे ही कोई यक़़ीन के आस-पास पहुंचने वाली कहानी गढ़ ली जाएगी मैं आपको भी सूचित कर दूंगा। और संभाजी महाराज की समाधि की बगल में उसकी समाधि भी बनवा दूंगा।” 

शिवाजी - “तुम्हें क्या लगता है, कि मराठा इतना मूर्ख है कि तुम्हारी मूंछ-चोटी की चाल-चपेट में फंस जाएगा?” 

सींकिया भिडे  (मुस्कुराते हुए) - “अक्सर फंस जाता है महाराज!”

शिवाजी - “क्या तू नहीं समझता कि अब तुम्हारी चालों का वक़्त बीत गया। चंद्रशेखर रावण, जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल, ठाकोर जैसे नौजवान अब अपने गले की हांडी तुम्हारी मूंछों में लटकाने को तैयार हैं। अब तुम्हारी चोटियों में झाडू टांकने की उनकी बारी है।” 

सींकिया भिडे - “जानता हूं महाराज और मानता भी हूं। इसीलिए तो अपनी चालों के जाल बिछाकर भिड़ते-भिड़ाते फिरते हैं हम।”

अब तक खामोश खड़े संभाजी राजे छत्रपति ने सींकिया भिडे का गला पकड़ लिया। और गुस्से में चीखते हुए बोले - 

“बड़ा भिड़ने-भिड़ाने वाला बनता है। मेरा नाम ओढ़कर घूमता है। उस मसखरे लेखक गडकरी से क्यों नहीं भिड़ा जाकर। जिसने अपनी कपोल कल्पना ‘‘ राजसन्यास’’ नाटक में चटखारे भरने के लिए मुझे रंगीला, दुष्चरित्र और न जाने क्या-क्या बताया है।” 

सींकिया भिडे - “महाराज, जैसा कि आप हम लोगों की दोगली नीति-नीयत को जानते हैं। मैंने गडकरी का विरोध इसलिए नहीं किया कि क्या पता कब उसकी कल्पना हमारे काम आ जावे।”  

ये बामण की पूंछ है संभाजी बेटा। चल, साथी गोविंद महार गायकवाड़ की समाधि दुरुस्त कर आवें। जिसे ये धूर्त नष्ट करने पहुंचा था। हमें सम्मान भी वहीं मिलेगा और आराम भी।”

(लेखिका एक पत्रकार और फिल्मकार हैं।)






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