आजकल वो नंगा दिखता है लाखों के लिबास में...!

आड़ा-तिरछा , कटाक्ष, शनिवार , 09-12-2017


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वीना

उसे लगता था वो एक ऐसा जादूगर है जिसका जादू कभी फेल नहीं होगा। वो जिसको चाहे जो बना दे। खुद चाहे जो बन जाए। लोग उसका वही चेहरा देख पाएंगे जो वो दिखाना चाहता है। 

उसने चाहा कि आदम-हव्वा की 21वीं सदी की औलादें उससे भय खाएं। क्योंकि वो अब भी वही हज़ारों साल पुराना आदमजात है जो मांस से अपनी भूख मिटाता है। इंसान उससे घबराए भी। कभी उसे दिललगी सूझती कि लोग समझें कि वो इतना दयालु है कि रास्ते की घास-धूल, ईंट-पत्थरों को दुख न पहुंचे इसलिए अपने पैर सिर पर रखकर चलता है। तब भी लोगों ने कहा - ‘‘जी साहब।’’

जनचौक स्तंभ।

माना वो ज़रा चापलूसी के मरज का मारा है। पर वो उस बेवकूफ राजा की हरकत बिल्कुल नहीं दोहराएगा, जिसनें अपनी तारीफ़ सुनने के लिए अदृश्य लिबास पहनने के चक्कर में खुद को भरे दरबार में नंगा कर लिया था। बल्कि वो इसके उलट तारीफ़ पाने के लिए एक से एक लिबास पहनेगा। और सिर्फ अपने दरबार में लोगों को बुलाकर तारीफ़ सुनने की बादशाहत नहीं झाड़ेगा। वो इतना विनम्र बनेगा कि देश-विदेश, शहर-गांव घूम-घूमकर, गले मिलकर यहां तक कि गले पड़ने में भी अपनी हेटी नहीं समझेगा और अपना फैशन कलेक्शन दिखाएगा। वो गंवार लोगों की तरह किसी से मुंह फाड़कर ये भी नहीं पूछेगा कि ‘‘मैं कैसा लग रहा हूं?’’ बल्कि 21वीं सदी के अविष्कारों का भरपूर फायदा उठाएगा। बूढ़े शरीर में जवान उमंगों वाला ‘‘सैल्फी विथ हैंडसम’’ कहलाएगा। इतनी सफाई से अपने जूते, चश्में, बाल, कुर्ता-सूट, टोपी-पगड़ी, पैंट-चूड़ीदार का सैल्फी लेगा कि सारी प्रजा वाह! राजा जी...वाह राजा जी...गाएगी।

 

जाने क्या बात है कि सारे जुगाड़ के बावजूद वो आजकल हर क्लिक में सबको नंगा नज़र आ रहा है। वाह! वाह! जा-जा में कब बदल गया उसे पता ही नहीं चला। 

 

प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : मज़दूर बिगुल

बहुत दिन तक तो वो जा-जा को आ..आ...समझकर दिल बहलाता रहा। वो कहते हैं न सब्र की भी सीमा होती है। जिधर जाता है उधर से ही...ही...हू....हू...हा...हा...की आवाज़े उसके मुंह पर थप्पड़ों की तरह पड़ती हैं। झल्लाए न तो क्या करे। वो समझ नहीं पा रहा है कि एक से एक महंगे लिबास, विदेशी साजो-सामान के बावजूद नंगा-फटीचर, अनपढ़ की तरह क्यों गलियाया जा रहा है। महंगी-सुरक्षित गाड़ियों, प्राइवेट जेट, सुरक्षा गार्डों पर धन लुटाकर उसने खुद को अहमियत देने की खूब मशक्कत की। शुरुआत में रिजल्ट भी अच्छा मिला। 


कितना खुश था वो इस मंत्र का अविष्कार करके कि समझदार राजा खुद नंगा नहीं होता बल्कि प्रजा को नंगा करता है। अपने को लिबास-लबादों से लादने की फिराक़ में उसने कब मुल्क के दुधमुहे बच्चों के लंगोट तक छीन लिए उसे पता ही नहीं चला। 


नंग-धडंग जनता उसके लबादों को टकटकी लगाए ताक रही है। बस ताक रही है। कुछ कहती नहीं। इन नज़रों में न उसे ख़ौफ़ की झलक मिलती है। न तारीफ़ ही नज़र आती है। और न ही कोई शिकायत।

उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वो, जो अपनी इंसानी मांस की भूख शांत करने के लिए पैदा की गई हज़ारों-लाखों चीखों, दया याचनाओं,  बम- बारूद गिराने, चाकू-तलवार, त्रिशूल चलाने से नहीं घबराया, वो इन खाली आंखों के सैलाब से दहशत खा जाएगा! 

उससे ये करोड़ों खाली-खामोश आंखें बर्दाश्त नहीं हो रही हैं। बेतहाशा चीखता-चिल्लाता लिबास पर लिबास बदलता जाता है। पर फिर भी न जाने क्यों उन खाली आंखों में नंगा का नंगा खड़ा रह जाता है! 

गिली-गिली छू कर इन खाली आंखों में मायूसी की जगह ख़्वाहिशों के रंग भरने वाली उसकी लयदार आवाज़़ अब यहां-वहां अपनी मधुरता के टुकड़े तलाश करती फिरती है। 

धत्त् तेरे की... लाख कोशिशों के बावजूद, वो पुराना सुर लगता ही नहीं! ओह! वो शेर की मानिंद हुंकारने वाला आजकल गीदड़ों सा रो रहा है!

वो उन दुश्मनों को छोड़ेगा नहीं। जिन्होंने उसकी जनता के वो कान काट लिए हैं जो उसके झूठ सुनते थे। वो दिल निकाल लिए हैं जो उसकी क्रूरता को विनम्रता समझते थे। वो आंखे बदल दी हैं जो उसके खून सने लिबास की क़ायल थीं। 

आखि़र उसके कदमों पर सजदा करने वाले सर तने हुए क्यों है? 

यक़ीनन दुश्मन ने उसकी मुखालफत करने वाला सॉफ्टवेयर लोड कर दिया है उसके मुरीदों में। 

उसे श्राप देने को उठने वाले हाथ क्या जानते नहीं कि वो कट भी सकते हैं?

वो छोड़ेगा नहीं। किसी को नहीं छोड़ेगा। बस एक बार कोई उसे इन खाली आंखों में नंगा दिखने से बचा ले। उसे खाली कुर्सियों में खाली आंखें नज़र आती हैं आजकल। वो गुर्राता हैं...मिमियाता है...समझाता है...हाथ जोड़ता है। पर खाली आंखें हैं कि लिबास लौटाने को तैयार ही नहीं। 

कुछ ने कहा इन करोड़ों खाली आंखों के नीचे खाली पेट भी हैं। तुम्हें वो नज़र क्यों नहीं आते? इनके आईने में अब सिर्फ इंसानियत का लिबास नज़र आएगा। है हिम्मत तो अपने कुकर्मों का लिबास उतार। 

और फिर उसके लिबास का बजट बांटने की बकवास सलाह देने वाले, उसके कुकर्मों की लिस्ट का हिस्सा बनते चले गए। 

और वो निकल पड़ा... खाली आंखों के खाली पेटों में आग लगाने। न ये पेट रहेंगे और न उसे नंगा दिखाने की हिमाकत करने वाली टुकुर-टुकुर ताकती आंखें। 

(लेखिका एक पत्रकार के साथ फिल्मकार भी हैं।)










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Joy rajput (kiran patil) :: - 12-12-2017
जादुगर ने बहुत छु छा कर लिया बंद मुठ्ठी से ना कबुतर ऊडा ना हीरा मोती नीकला मुठ्ठी से मुठ्ठीभर अनाज भी ना नीकला। नीकला तो रोज नया जुमला। अब तो लगने लगा जीसे गुंगा कहके ठहाको मे ऊडा दिया ओ कीसी परवरदीगार से ना कम था ना जादा। जादुगर अपनी छु छा मे ऐसा ऊलझा की झुठ को सच समजके अपनीही झूठी कहानीयो का खुदावंद बन बैठा।