पृथ्वीलोक के ‘यमों’ ने यमराज की नौकरी छीनी!

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 03-02-2018


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वीना

पृथ्वीलोक के यमों ने मेरी रोज़ी-रोटी छीन ली है। कोई मेरी मदद करो। आजकल धरती पर गुहार लगाते फिर रहे हैं यमलोक के यम।

गौ माता के गुंडों ने यम की सवारी काला तंदरुस्त भैंसा और प्राण खींचने वाला हंटर तो छीना ही छीना, चमकीले काले मुंह पर डराने के लिए रखी भयानक मरोड़दार काली मूंछों का भी सफाया कर दिया। 

आज यम को उन्हें काला रंग देने वालों पर बड़ा गुस्सा आ रहा है। जिस काले रंग को लेकर कभी यम इतराते फिरते थे। आज वही उनका बैरी है। 

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

 

युग बीत गए धरती-देवलोक के चक्कर लगाते-लगाते। ऐसा अंधेर अब तक न हुआ था। जिस यम को सपने में भी देख कर लोगों का पेशाब निकल जाता था आज वो साक्षात धर-पकड़ कर लूट लिए गए... कूट दिए गए..! 

क्यों? क्योंकि उनके शरीर का रंग काला है..! पृथ्वीलोक के मनुराज में काला रंग शूद्र-अतिशूद्रों की पहचान है। जिन्हें मूंछ रखने की इजाज़त नहीं। उनका सर उठाकर चलना, अच्छा कमाना, खाना-पहनना वर्जित है। मनुष्य जाति के सबसे 'नीच' कर्म शूद्र-अतिशूद्रों से करवाए जाते हैं। इसीलिए उनका कोई मान-सम्मान नहीं। 

यम सोचने लगे कि क्या उनका प्राण हरण रोज़गार भी नीच कर्मों में गिना जाता है? इसीलिए उन्हें काला रंग दिया गया। एक पल के लिए यम घबराए फिर ख़ुद से बोले- ‘‘नहीं...नहीं... ऐसा संभव नहीं। क्योंकि पृथ्वी लोक के यम जिन्होंने मेरी नौकरी छीनी है, कमोबेश मुझसे ही लगते हैं। उनका तो बड़ा रुतबा है। लोग भय खाते हैं उनसे। 

 

पृथ्वी वासी यमों के लिए किसी के प्राण लेने का कोई धर्म-समय निश्चित नहीं है। जो उनकी बात नहीं मानता या जिसके प्राणों की उन्हें आवश्यकता होती है वे कहीं भी, कभी भी उसके प्राण हर लेते हैं। यमलोक के यम की तरह ये यम स्वयं जाते भी नहीं। बस आदेश देते हैं। आम लोगों की तो बात क्या, समय से पहले प्राण गंवाने वाले अच्छे-अच्छे न्याय-धर्माधिकारियों, विद्वानों की उनके आगे एक न चली।

जब भी यम उत्तर प्रदेश के कासगंज का नज़ारा याद करते हैं तो उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। हुआ यूं कि हमेशा की तरह नौकरी बजाते हुए इस साल यम को उत्तर प्रदेश के एक साधू-संन्यासी के प्राण साथ लाने थे। सो यम बाबू कासगंज इलाके से निकले जा रहे थे।  

अचानक उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया। यमराज लपक कर उस चौराहे पर पहुंचे, जहां से हो-हल्ला की आवाजें आ रही थीं। भीड़ में कोई कह रहा था भगवा ही फहरेगा कोई कहता हम तिरंगा लहराएंगे। और देखते-देखते ईंट-पत्थर बरसने लगे, जूतम-पतरम होने लगी। फिर कुछ खाकी वर्दी धारी आए और दोनों गुट अपने-अपने रास्ते चलते बने।

आख़ि़र एक झंडे के लिए इतनी मारा-मारी क्यों? यमराज को पूरी बात जानने की खुजली उठी। पर वो तय नहीं कर पा रहे थे कि किस गुट का पीछा करें। 

तभी यम की नज़र भगवा वस्त्र धारियों पर पड़ी। यम ने सोचा हो न हो ये हनुमान के अनुयायी हैं। इन्हीं में शामिल होकर पता लगाया जाए। सो ड्यूटी भूल यम ने अपना भैंसा भगवा झुंड के लोहे के भैंसो के साथ दौड़ा दिया।

कुछ दूर ही चले होंगे कि उनके बराबर में चलते हुए किसी ने कानाफ़ूसी की- ‘‘मासूम चेहरे वाले चंदनधारी नौजवान के प्राणों की आहुति सत्ता यज्ञ के लिए आवश्यक है।” और तुरंत किसी लौह यंत्र से निकलती अग्नि नौजवान के प्राण बांध कर ले गई। कासगंज के इस चंदन तिलकधारी नौजवान की मृत्यु का समय अभी नहीं था।

 

विधान विरुद्ध कार्य होता देख यम चिल्लाए - अरे...! उसकी मृत्यु अभी नहीं थी। प्राण लेने का अधिकार क्षेत्र मेरा है। मेरे रहते ये गुस्ताख़़ी क्यों हुई?

इतना कहना था कि किसी ने झटके से यम का हंटर छीन लिया और उनके भैंसे की पूंछ ऐंठ दी। भैंसे का बैलेंस बिगडा़ और यम सीधे सड़क पर लोट-पोट। 

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

अचानक हुए इस हमले से यम का सिर चकराने लगा। कुछ पल तक उन्हें समझ ही नहीं आया कि आख़ि़र हुआ क्या? अभी अपनी हालत का मुआयना कर ही रहे थे कि गले के सोने के हार को किसी ने झटक कर अपने कब्ज़े में ले लिया और बोला -‘‘क्यों बे अम्बेडकरिये! कौन सी नौटंकी से आ रहा बे... हार तो तेरा बड़ा मस्त है... एकदम असली लग रहा है..!’’ और फिर यम के बाक़ी गहने भी नोंच लिए गए।

अब यम को समझ आया कि वो इस भीड़ के समक्ष साक्षात हैं। आमतौर पर वो उसी को दिखाई देते थे जिसके प्राण हरण करने पहुंचते थे। बाक़ी को कैसे नज़र आने लगे समझ न पाए।

घेरे के बीचो-बीच पड़े खुद पर हा...हा...ही...ही...हो..हो...करते खड़े लोगों को पर यम को बड़ा गुस्सा आया। यम झटके से खड़े हुए और अपनी आपातकाल शक्ति का प्रयोग करते हुए हथेली से प्राण घाती किरणों को हार खींचने वाले पर छोड़ा। पर ये क्या..! हार खींचने वाले व्यक्ति को राज्य-केंद्र सुरक्षा नामक घेरे ने घेर लिया है। यम की शक्ति बेअसर..! 

यम अभी इस राज्य-केंद्र घेरे की अद्भुत शक्ति को हैरान-परेशान देख ही रहे थे कि भीड़ से आवाज़ आई - ‘‘लगता है ये कलूटा शूद्र जादू-टोना भी जानता है। इसकी इतनी हिम्मत की हम सवर्ण मनुवादियों के इलाके़ में अपना ज़ोर आज़माए!” 

किसी ने कहा - ‘‘अरे इसकी मूंछें तो देखो, असली हैं या नकली..!’’ इतना सुनते ही भीड़ यम पर टूट पड़ी। कुछ ने हाथ पकड़े, कुछ ने पैर। कोई लगा यम की घुमावदार, मूंछों को नोंचने। यम इतनी ज़ोर से चीखे कि आसमान हिल गया। पर न जाने क्यों यम की आर्त पुकार सुनकर भी ऊपर से कोई मदद को न उतरा..! यम चिल्लाते रहे... यम हैं हम... लोग ठहाके लगाते रहे और उनकी मूंछों को नोंचने का मज़ा लेते रहे... 

यम दहाड़े - ‘‘आखिर हमारी मूंछों से क्या बैर है?’’ यम के जवाब में एक उस्तरा आया और बेरहमी से उनकी मूंछें खरोंच ले गया। ‘‘मेरी प्रिय मूंछें क्यों काटी दुष्टों..!’’ इस बार रोने ही तो लगे थे यम। 

कोई गरजा। ‘‘हमसे ज़बान लड़ाता है... नीच... मूंछ लेकर चलता है... हमारे यम आका पर शक़ करता है... मनु धर्म का अपमान... ले चख मज़ा।’’ और... यम पर ताबड़-तोड़ लात-घूंसों की बरसात होने लगी। 

यम जैसे-तैसे भीड़ को धकेल कर उठे और भागे। धोती संभाले यम आगे-आगे, भीड़ पीछे-पीछे। भागते-भागते जैसे-तैसे यम देवलोक पहुंचे। जहां धर्मराज यम का सस्पेंशन लैटर लिए तैयार बैठे थे। 

 

अब जबकि पृथ्वीलोक से तुरंत फ्री डिजिटल डिलवरी करने वाले यम मिल रहे थे। तो देवताओं को अपना यम पुराना, लेट-लतीफ़ मालूम होने लगा। सो इस बेकार यम की मूंछों के रख-रखाव में लगने वाले एक किलो सरसों के तेल का खर्चा देव नहीं उठाना चाहते। फिर भैंसे का, खान-पान और फैंसी ड्रेस-गहने आदि का खर्च भी कम न था। 

अब जबकि सभी सोने-चांदी, हीरे-पन्नों की खदानों पर अंबानी-अडानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि का कब्ज़ा है। पुराना लुक मैंटेन करना, गहने जुटाना क्या आसान बात है! ऐसे वक़्त यम महाराज सभी गहने लुटा आए।

नतीजा... यमराज की नौकरी छीन ली गई।

देवलोक ने प्राण हरने का ठेका अब धरती के यमों को दे दिया है। जो बिना मेहनताने थोक मे प्राण भेजने को तैयार हैं। 

यमलोक के बेरोज़गार यम ने ‘जनचौक’ से गुहार लगाई है कि उनकी मदद की जाए। उनकी युगों-युगों की नौकरी जिस तरह छीनी गई है ये अन्याय है। यम चाहते हैं कि जबरन यम बने पृथ्वीवासी यमों को पहचानकर जनता उनकी सहायता करे। और वक़्त से पहले खींचे जाने वाले स्वयं के प्राणों की भी  रक्षा करे।  

इसके अतिरिक्त यम ने ऐलान किया है कि - “पृथ्वी पर उपस्थित सभी काले-भूरे-गोरे मानव समान हैं। मैं नीच-ऊंच, शूद्र-सवर्ण के भेद और मनुराज का विरोध करता हूं।” 

बाक़ी रवीश कुमार आजकल बेरोज़गारी पर प्राइम टाइम कर रहे हैं। उनका पता भी यम को दे दिया गया है। 

(व्यंग्य लेखिका एक पत्रकार होने के साथ फिल्मकार भी हैं।)










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