विसंगतियों से पैदा होता है व्यंग्य

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य लेख, शुक्रवार , 13-04-2018


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मदन कोथुनियां

विसंगतियों से व्यंग्य पैदा होता है और विसंगतियों की जानकारी के लिए थोड़ी बहुत समझ, तर्क, विवेक,वैज्ञानिक ज्ञान की जरूरत होती है। व्यंग्य एक कला है और अनुभव से लगातार प्रशिक्षण मिलता जाता है। 

व्यंग्यकार का ध्यान हर जगह हो रही विसंगतियों पर ही रहता है और उसी में से व्यंग्य की पंक्तियां पैदा करके गुदगुदाते हुए उस ओर ध्यान दिलाने का काम करता है। 

यह देश प्राचीनकाल से विसंगतियों में जी रहा है व व्यंग्यकारों के लिए एक उर्वरा शक्ति के रूप काम करता रहा है। पहले ज्ञान की कमी थी तो सच्चाई सामने नहीं आ पाती और लोगों को विसंगति का पता नहीं चलता इसलिए व्यंग्य रचनाएं कम होती थी। थोड़ी बहुत जागरूकता बढ़ी तो व्यंग्य की कसीदाकारी खेत की मेड़ से निकलकर रायसीना हिल तक पहुंचने लग गई।

 

मैं तो कहता हूँ कि आईपीएल जैसी प्रतियोगिता व्यंग्यकारों के लिए होने लगती तो इस देश मे खुफिया एजेंसियों की जरूरत ही नहीं रहती! वैसे आईपीएल के देर रात तक होने वाले खेलों से मुझे लग रहा है कि गर्भ निरोधक के बाद जनसंख्या नियंत्रण का सबसे बड़ा उपाय माना जाना चाहिए! आप में से ज्यादातर लोग समझदार हो इसलिए बता रहा हूँ कि पहले खीर से, श्राप से, मटके से, मेल से, मुंह से, बांहों से, पेट से, जांघों से आदि जगहों से भावी पीढ़ी तैयार हो जाती थी लेकिन जब से विज्ञान ने यह सिद्ध किया कि बिना शुक्राणु व अंडाणु के संयोजन से कोई पैदा नहीं हो सकता तब से शुक्राचार्य जी वनवास चले गए है! जब विज्ञान ने हमारे दिमाग में ज्ञान की बत्ती जलाई तब से पुष्पक विमान व तमाम वानर उड़ना भूलकर पेड़ों की शाखाओं पर उछलकूद कर रहे हैं!

देखो! व्यंग्य तो विसंगतियों से पैदा होते है लेकिन व्यंग्यकार पैदा करने की पहली शर्त आपका पीड़ित होना जरूरी है जैसे एक दार्शनिक बनने के लिए समाज की ठोक जरूरी है, शायर बनने के लिए आशिकी की बीमारी से ग्रसित होना जरूरी है उसी प्रकार जिनसे उम्मीदें की जाती हैं वो इंसान उम्मीदों, अरमानों पर खरा नहीं उतरता है तो अपने गमों को खुलकर तो कह नहीं सकता इसलिए भारतीय परंपराओं का ख्याल रखते हुए अपनी पीड़ा को व्यंग्य के रूप में व्यक्त करने के लिए भारत मे व्यंग्यकार पैदा होता है।

सत्ता व व्यवस्था से पीड़ितों की संख्याओं में लगातार इजाफा होता जाए तो समझना चाहिए कि व्यंग्यकारों की फसलों के उत्पादन के लिए मौसम  सुहावना है। आज पूरे उत्तर भारत में मौसम किसानों के लिए गला घोंट रहा है लेकिन व्यंग्यकारों की कला के प्रदर्शन का बेहतरीन मौसम है! वर्तमान सत्ता के मुख्य किरदार ने भी तो सत्ता की कुर्सी पर कब्जा वर्षों के छुटपुट व्यंग्यों को हराकर बड़े बड़े व्यंग्य फेंककर की थी! 

 

आप सोचिए "अच्छे दिन आने वाले हैं" का क्या मतलब होता है? यह एक व्यंग्य ही तो था और इस व्यंग्य से बड़ा व्यंग्य पैदा करने के लिए हम चार सालों से प्रयासरत हैं।

 

जब पिछले व्यंग्य से बड़ा और नया व्यंग्य पैदा करने वाला कोई दिख जाएगा तो हम व्यंग्य के कलाकारों को सम्मान देते हुए उनके पीछे चल लेंगे! 

व्यवस्था परिवर्तन, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षा, चिकित्सा जैसे अति महत्वपूर्ण मुद्दे जब गौण होने लगें और हर जगह व्यंग्यकारों का जमावड़ा नजर आने लगे तो समझिए सत्ता-व्यवस्था ज्ञान के चरम पर है और जनता मूर्खता की पराकाष्ठा को लांघ रही है! 

 

वर्तमान मानव सभ्यता में सबसे जागरूक नागरिक माने जाने चाहिए क्योंकि यही एकमात्र एजेंसी है जो बिना आकाओं, सीमाओं, दलालों, न्यायालयों के परे आपको हर सच्चाई से रूबरू करवाती है।

 

जो लोग दिमाग में ज्ञान की बत्ती गुल करके बैठे हैं और कहीं व्यंग्यों में पक्ष-विपक्ष को ढूंढकर चिड़चिड़े हो रहे हैं तो उनके लिए अगले जन्म में अंधभक्ति रूपी आरक्षण की व्यवस्था जरूर की जानी चाहिए! वैसे भी आज अंधभक्ति के लिए किसी ने आरक्षण की मांग उठाते हुए आंदोलन की शुरआत कर दी तो 99% भारत सड़कों पर उतर जाएगा! वो वाले भी जिन्होंने कल-परसों भारत बंद के दौरान भी अपना धंधा बंद नहीं किया था।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)

 








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