‘हिंदुस्तान में किसी को भगवान का फील लेना हो तो वो पुलिस में भर्ती हो जाए’

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 11-11-2017


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वीना

वो करोड़ों साधारण हिंदुस्तानी आदमियों में से एक था। साधारण मतलब, जो सरकारी स्कूलों में थोड़ा-बहुत पढ़ लेते हैं। या नहीं भी पढ़ते। जिनके बारे में ये समझा जाता है कि वो शक्ल-अक्ल, जात-औकात से कुछ लोगों का हुक्म बजा लाने के लिए ही पैदा हुए हैं। 

पता नहीं ये उनके लिए अफसोस की बात है कि खुशी की कि उनका भी एक परिवार होता है। बीवी होती है बच्चे होते हैं। जिन्हें भूख लगती है। और तन ढकने को कपड़े-लत्ते भी चाहिये। भले ही आंखों को न जंचते हों पर जिस्म तो ढकते हों।

ये अपनी गरीबी से झुलसी शक्ल, जी हुजूरी में झुकी गर्दन लिए महलों में दाखि़ल होते हैं। समझते हैं कि ये इन महलों के मालिकों की गुलामी के लिए ही पैदा हुए हैं। और जिनकी हर ऐश इन बदबूदार लोगों के कंधों पर लदी फिरती है उन मालिकों को इनके वजूद से कोफ्त होती है।   

करोड़ों काबिले-कोफ्त जिस्मों में से एक आज इसी कोफ्त की सज़ा भुगतेगा। इसका कुसूर? किसी साहब के घायल बच्चे को सीने से लगाकर अस्पताल पहुंचाना और फिर उस बच्चे की गंभीर हालत देखकर अपने दिल को ताबड़-तोड़ धड़कने देना। इस दिल के धड़कने का मकसद अब थाने में तय किया जाएगा।

व्यंग्य।

क्यों बे हराम के.....कमीज़ पे खून कैसे लगा?

साब, बच्चे को अस्पताल पहुंचाया।

कमीज पानी से गीली कैसे थी? खून धोया?

नहीं जनाब, पानी पी रहा था कमीज़ गीली हो गई।

बच्चों के बाथरूम में क्या करने गया था?

बताया तो जनाब, परेसर जादा था हल्का होने गया था।

कौन सा परेसर बे? सुना है तेरी लुगाई तुझे लात मारकर भगा देती है...

हा...हा...हा...भई हवलदार साहब, बालक सरमा जावैगा ऐसी बात मतना करो।

क्यों आलोक बाबू? ऐसी ही बात है ना? थानेदार अपना सोट्टा आलोक की ठोड़ी मे ठोकते हुए चहका।

जनाब घर तक मत पहुंचों। क्यों गरीब आदमी की इज्जत उतार रहे हो?

तड़ाक से एक उल्टा हाथ उसके गाल से टकराया। 

थानेदार साब आलोक बाबू से परमीसन लेके मुंह खोलिये। नई तो आलोक बाबूजी नाराज हो जांएगे। 

हा...हा...हा...कानूनी वर्दियों ने ठहाका लगाया।

बेटा अभी तो तू देखता जा, तेरा क्या-क्या उतरेगा....तड़ाक....तड़ाक...तड़ाक थप्पड़ों की बौछार सी होने लगी आलोक पर।

जनाब मेरी ग़लती क्या है? घबराये आलोक ने रोते हुए पूछा।

दूसरे गाल पर तड़ाक! 

आलोक बाबू...आलोक बाबू कहां गए थे...बच्चे पे मर्दानगी निकाल रहे थे...फिर थप्पड़।

जनाब मैं मूतने गया था बस। आप कैमरे मे देख लो... जब मैं गया था अंदर कोई बच्चा नहीं था वहां। अपने दोनों गालों को हाथों से ढकते हुए आलोक मिमियाया।

अबकी बार मोटे सोट्टे से कमर की सिकाई की गई। रीढ़ की हड्डी से जैसे ही डंडा टकराया, आलोक अपनी चीख रोक नहीं पाया।

उसके दर्द से कराहते मुंह को बंद करने में थानेदार के डंडे ने मदद की। 

आलोक के होंठ से खून की धार बहने लगी।

बहुत मजा आता है ना तुझे खून-खून खेलने में... ले मजे...ले मजे....चीखता हुआ थानेदार आलोक पर पिल पड़ा। बोल बच्चे को तूने मारा है....बोल....

सरकार मर जाऊंगा...मैंने कुछ नहीं किया...दया करो...छोड़ दो...बाल-बच्चे वाला आदमी हूं। अपने को बचाने की नाकाम कोशिश करते हुए आलोक ने गुहार लगाई।

तभी थानेदार का बॉस भीतर आया - ‘‘क्या सिंह?  क्या बच्चों की तरह गेम खेल रहे हो? हिंदुस्तानी पुलिस अपराधी पैदा करने में इतना वक़्त लेने लगी तो हो गया फिर।

जनाब ये गरीब आदमी है। मेहनत मज़दूरी कर-कर के साले का शरीर पक्का हो गया है। इतनी जल्दी नहीं टूटेगा। साहब लोगों के उस मेमने को धर लेते... तो अब तक काम हो गया...

सिंह, दिमाग नहीं हाथ चला हाथ...बॉस ने आंख दिखाते हुए कहा।

जी जनाब। और फिर शुरू हुई, थानेदार के डंडे और आलोक की चीखों की जुगलबंदी।

साब मैंने आज तक अपने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाया। रहम करो...

आलोक बाबू की बड़ों की तरह ख़ातिर करो  थानेदार। पब्लिक, मीडिया, सरकार, मां-बाप हत्यारे की डिमांड कर रहे हैं, और आप यहां मजे ले रहे हैं। हीटर पे मुतवाओ सा...ले को। बेलन फेरो, आगा-पीच्छा सुजा दो। ये तो क्या इसका भूत भी कबूलेगा।

सर... कल... अदालत जाना है।

हां, तो?

सर, जज साहब...

हां तो... और रिमांड मांग लेंगे। ये हिंदुस्तान है प्यारे! यहां... 

सर... सी सी टी वी...

अरे यार, इस कबाड़ की किसको पड़ी है। कुछ नहीं, चेपो सा...ले के नाम मर्डर चार्ज... बहुत मज़ाक हो गया... जल्दी श्रृंगार पूरा करो इसका।

और फिर आलोक की चीखों का अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ...बोल कबूल है...बोल...कबूल है...और आखि़रकार आलोक के मुंह से निकल ही गया कबूल है... 

सर... मेकअप कम्पलीट

गुड..! वैरी गुड!

दिखाओ आलोक बाबू अपनी मोरनी सी चाल...चकुंदर जैसे गाल...अरे...अरे...पिछवाड़ा तो देखो...ओए...होए...बेबी को बेस पसंद है!

जैसे ही थानेदार ने छोड़ा आलोक खड़ा न रह सका। धड़ाम! ज़मीन पर।

सुन बे...अदालत में सीधा खड़ा रहियो...कभी वहां अपने नखरीले अंदाज़ दिखाकर जज साहब का मन मोह ले... हम आशिकों का ख़्याल रखना मेरे रश्के कमर...

जनाब अब ये वही करेगा जो हम कहेंगे।

हिंदुस्तान में किसी को भगवान का फील लेना हो तो पुलिस में भर्ती हो जाए। भगवान थोड़ा कम भगवान है हम थोड़े ज़्यादा। 

भगवान पापी को पाप करने के लिए पूरा एक जनम देता है। सज़ा का एलान अगले जनम में। हम डिजिटल इंडिया से पहले फास्ट गुनाह ट्रांजेक्शन का मज़ा ले रहे हैं। जिसको जितने दिन में गुनाहगार पकड़वाना है उतने दिनों में हाज़िर। गुनाह करवाना, न करो तब भी कबूलवाना। अदालत का इंसाफ बाद में, अपना पहले। यहां रोकने वाला, टोकने वाला कौन? कभी पकड़े भी गए तो सॉरी बोलने का झंझट भी नहीं।

भगवान को कभी सॉरी बोलते देखा है जनाब!

हा...हा...हा...सभी वर्दीधारियों ने एक साथ ठहाका लगाया। 

(वीना पत्रकार और फिल्मकार होने के साथ व्यंग्यकार भी हैं। )

 






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