मुल्ला की दाढ़ी, भारत मां की साड़ी और अपनी सवारी !

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 30-12-2017


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वीना

अदालतें

मंत्री, महामंत्री, मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, महासचिव आदि-आदि पर निषेधाज्ञा का अपराध साबित...

टकलू मंत्री दंगे भड़काकर हज़ारों लोगों के क़त्ल के लिए कड़ी सज़ा के हक़दार...

तोंदू अध्यक्ष हत्या, बलात्कार, घूसखोरी, कालाबाज़ारी के जुर्म में फैसला सुरक्षित... 

अलाने नेता, फलाने मंत्री ढिमकाने मुख्यमंत्री दर्जनों अपराधों में दोषी करार...

सरकार बहादुर

अबे, अपराध साबित, कड़ी सज़ा के हक़दार, फैसला सुरक्षित, दोषी करार जैसे शब्द और इन पर अमल संविधान-कानून विधाताओं पर लागू होते हैं क्या..? दो अंतरी-संतरी हमने बगल में खड़े कर दिए तो माथा फिर गया है इन काले लबादों का?

न्यायाधीश

सर हम तो बस कानून की किताब का पालन कर रहे हैं।

सरकार बहादुर

अबे, बड़ी खुजली हो रही है कानून का पालन करने की। ज़रा रुको... थम जाओ...कानून बना तो लेने दो जिसका पालन करना है।

कानून-ए-ख़ास

क्योंकि सभी राजनीतिक सत्ताधारी नेताओं, मंत्रियों, मुख्य-प्रधानमंत्रियों आदि-आदि द्वारा कानून के मंदिर संसद और उसकी पवित्र किताब संविधान पर कब्जे़ के लिए अपराध किए जाते हैं। इसलिए ऐसे अपराध जो आम जनों के द्वारा किए जाएं तो जघन्य अपराध माने जाते हैं लेकिन राजनीतिक लठैतों के लिए वो मौलिक अधिकार का हिस्सा होंगे।

अर्थात हर सत्ताधारी राजनीतिक व्यक्ति के लिए ये विषेाधिकार कानून पास किया जाता है कि कोई भी राजनीतिक व्यक्ति खुद और उसका हित साधने वाले अन्य धन्नासेठ, अफसरान आदि-आदि काजल की कोठरी से भले ही श्याम निकले फिर भी उन्हें सफेद में गिना-देखा-समझा जाएगा। 

अदालतें - 

रहीम खान, दगडू सफाई कर्मी, हरि राम किसान, कानों आदिवासी, बाबू कश्मीरी, चंद्रशेखर आज़ाद आदि-आदि ने कोई ग़ै़रकानूनी काम नहीं किया। लिहाज़ा, सबको बाइज़्ज़त बरी किया जाता है।

सरकार बहादुर

ओ...अति उत्साहित अंधी-बहरी अदालतों... उकोका, मकोका, टाडा, आफ्स्पा तुम्हारे आकाओं संविधान-कानून निर्माताओं ने, यानि हम भद्र लोकसेवकों ने गोटी खेलने के लिए बनाए हैं क्या!

ये जनता जो हर पांच साल में एक बार हमें उंगली दिखाती, डराती है। इसे काबू में करने के लिए ज़रूरी है कि हम भी इसे रोज़ इसकी औक़ात बताएं। 

इनके पास आखि़र है क्या? केवल एक अकेला वोट। और हमारे पास, पुलिस-प्रशासन, अदालतें, जेल, सेना, खुफिया एजेंसी, संसद-संविधान, पूरे तंत्र पर कब्ज़ा। प्राइवेट गुंडे बाहुबली आदि। पनामा, पैराडाइज़, टैक्स चोरों की जेबें। गुलाम मीडिया। 

फिर भी जनता को ये गुमान कि वो बलवान..! ऐसी की तैसी जनता की। ठोको सब पर उकोका, मकोका, टोका, फोका, रोका जो भी हम गढ़ते रहें। तुम इनपे मड़ते चलो। 

ग़ुलाम कहीं के। फसल का दाम मांगते हैं! खदान का हिसाब चाहिये! ज़मीन नहीं देंगे! जंगल काटने से रोकते हैं! रोटी-कपड़ा-मकान, दवा-अस्पताल, शिक्षा-रोज़गार, स्वच्छ वातावरण! ग़ुलामगीरी में ये सब डिमांड किसने बताई? रूखी-सूखी खाओ। नए गुलाम पैदा करते जाओ। पुराने जल्दी-जल्दी मरते जाओ। जो हम बताएं लोकतंत्र की वही परिभाषा गटक जाओ। अपनी अक़्ल चलाओ तो जेल जाओ। फांसी-गोली खाओ।

जय भ्रष्टाचार, जय अत्याचार, जय राष्ट्र का अचार, जय देशभक्ति का बुखार, जय गौ माता की बोटी। जय मुल्ला की दाढ़ी, भारत मां की साड़ी और इन सबके ऊपर अपनी सवारी। 

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)










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