"डार्विन साहब हकीकत से निहायत दूर थे, हम न मानेगें के पुरखे आपके लंगूर थे"

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 10-03-2018


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संदीप जोशी

अपन विज्ञान से उभरी सूचना प्रौद्योगिकी के सबसे अभूतपूर्व समय में जी रहे हैं। आज सर्वोत्तम सूचना सर्वव्यापी है। बहुत सारी सूचना के समय में जानकारी का सही इस्तेमाल जरूरी हो जाता है। सूचना का इस्तेमाल विवेक से ही सही होता है। विज्ञान का तो इतिहास है मगर क्या इतिहास का भी कोई विज्ञान हो सकता है। विज्ञान का इतिहास तो समझ में आता है लेकिन क्या इतिहास का विज्ञान कोई कभी समझ पाया है? जहां विज्ञान को रचने के लिए तर्क चाहिए वहीं इतिहास को रचने के लिए सत्ता चाहिए। अगर विज्ञान का विकास सिद्धांतों पर शोध है तो सत्ता इतिहास का विज्ञान गढ़ने में लगती है।

केन्द्रीय राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने चार्ल्स डार्विन के उत्पत्ति के विकासवाद को वैज्ञानिक स्तर पर ललकारा है। उनने कहा कि हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं माना कि किसी ने वानर को मानव होते देखा हो। जब से मानव ने पृथ्वी को देखा है उसमें मानव ही देखे गए हैं। हमारे किसी साहित्यकार ने न कहीं लिखा, और न किसी संस्कारशास्त्री ने कभी ऐसा कहा। मंत्री ने यह भी कहा कि न तो पौराणिक ग्रंथों में और न ही दादी-नानी की कहानियों में इसका कभी कोई जिक्र आया है। सत्यपाल सिंह अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में भाग लेने औरंगाबाद में थे जब उनने डार्विन के सिद्धांत को गलत ठहराया। जनता के नुमाइंदे होने के नाते अपने को उनके सद् विचार का आदर करना होगा। सत्यपाल सिंह ने सार्थक सवाल छेड़ा है।

लेकिन सत्यपाल सिंह के मूल सद् विचार से दशकों पहले अकबर इलाहाबादी ने तो यहां तक कह दिया था।

डार्विन साहब हकीकत से निहायत दूर थे

हम न मानेगें के पुरखे आपके लंगूर थे।

मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने यह भी कहा की डार्विन के उत्पत्ति के सिद्धांत को विद्यालय और उच्च विद्यालयों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। जहां उनके द्वारा उठाए गए सवाल को सराहा जाए वहीं उनकी संकुचित मानसिकता का भी बहिष्कार होना चाहिए। क्योंकि जिज्ञासा को ही वैज्ञानिक खोज की जननी कहा गया है। अगर जिज्ञासा दबाई जाए तो समाज नई वैज्ञानिक खोज से वंचित रहता है। अपन वानर के वंशज नहीं हैं लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर स्थापित करने का उत्तरदायित्व विज्ञान पर आता है। अगर अपन राम के वंशज हैं तो वह रघुकुल रीति अपनी कथनी और करनी में क्यों नहीं झलकनी चाहिए?

सुदूर अमेरिका में भी पिछले दिनों व्यंगकार बिल माहेर ने अपने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर औरंगटून, - वानर प्रजाति के वंशज - होने का व्यंग कसा। अमेरिका को व्यंगप्रिय देश मानने वाले बिल माहेर ने ट्रंप के बालों, व हावभाव को देखते हुए यह व्यंग कसा था।

इसका वीडियो सोशल मीडिया में अति-लोकप्रिय हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप भी माहेर के चाल में पड़ गए। बतकही का व्यंग्य विवाद में बदल गया और दोनों ने छीटाकसी के आरोप लगाए। माहेर अभिव्यक्ति की आजादी का आसरा लेते रहे और राष्ट्रपति ट्रंप सत्ता का। बात जब ट्रंप की उत्पत्ति तक पहुंच गयी तो उनके वकीलों ने जन्मप्रमाण पत्र की एक प्रति माहेर को भिजवाते हुए अदालत में घसीटने की धमकी दे डाली। वहीं माहेर ने ट्रंप को - ठिठोली करने और ठेका देने - के अंतर को समझने का ज्ञान दे डाला।

आज समाज हाशिए पर है। अकबर इलाहाबादी ने तब की सत्ता के सत्यपालों के बारे में भी तंज कसा था। और कहा था ......

कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ

रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।

सत्ता के सत्यपाल जनता की जिज्ञासा को कतई हताहत नहीं कर सकते हैं। विज्ञान का दर्ज हुआ इतिहास भी बे-इतिहास नहीं कर सकते हैं। सत्ता के अहाते से जनता को भरमा भी नहीं सकते हैं। लेकिन हां .... जनता की सेवा के लिए सत्ता के अहम को सार्थक दिशा देकर समाज का सहयोग जरूर कर सकते हैं। लेकिन फरमान के तौर पर कतई नहीं।

इसलिए फिर अकबर इलाहाबादी का सहारा लेना आज के शेखों के लिए जरूरी और मजबूरी है.....

शेख जी निकले न घर से, और यह फरमा दिया

आप बीए पास हैं तो बंदा बीवी पास है।

जनता अपनी सांस्कृतिक सभ्यता तो भली-भांति जानती तो है ही मगर अपनी राजनीति को भी अच्छे से समझती है। और सत्ता के शेख चिल्लियों के चक्कर में हर समय नहीं पड़ती। सत्यपाल सिंह को पहले अपने सत्य और अपने सत्ता सिंहत्व की सही खोज करनी होगी। पहले सेवा का सत्तापाठ पढ़ना होगा। तभी जनता सत्ता को नया इतिहास रचने दे सकती है।

लेकिन सत्ता में मदमायी सरकार जनता पर कथनी और करनी का कहर ढाने का कोई अवसर नहीं छोड़ रही है। जनता को अच्छे दिनों का सपना देखते रहना होगा। और वोट के लिए सत्ता फिर नए सपने गढ़ती रहेगी। इसीलिए अकबर इलाहाबादी ने जनता को याद दिलाया .......

चार दिन की जिंदगी है, कोफ्त से क्या फायदा

कर क्लर्की, खा डबल रोटी, खुशी से फूल जा।

जैसा अकबर इलाहाबादी ने समझाया था वैसा ही करने को जनता मजबूर है। सत्यपाल सिंह का सवाल वाजिब है लेकिन इतिहास का कोई विज्ञान नहीं होता।

 






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