सबसे पहले सावित्रीबाई फुले ने फैलायी दबी कुचली महिलाओं के जीवन में शिक्षा की ज्योति

जयंती पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 03-01-2019


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चरण सिंह

जब पाखंड चरम पर था। बेटियों को पेट में ही मार दिया जाता था। महिलाओं को घर से निकलने की अनुमति नहीं थी। समाज को अंधविश्वास और कुरीतियों ने जकड़ रखा था। ऐसे दौर में सावित्री बाई फुले दबे कुचले समाज की महिलाओं को जगाने के लिए एक शिक्षिका के रूप में उनके बीच आ गईं थीं। यह काम उनके लिए इतना कठिन था कि जिस समाज के लिए वह अथक प्रयास कर रही थीं वही समाज उनका दुश्मन बन गया था। लोगों का कहना था कि वह उनकी महिलाओं को बिगाड़ रही हैं। उनका विरोध इस स्तर का था कि जब वह घर से निकलतीं तो एक साड़ी साथ में ले जातीं क्योंकि लोग उन पर कीचड़ फेंकते थे, जिससे उनकी साड़ी खराब हो जाती थी।

जिस तरह से वीरता के मामले में लक्ष्मीबाई का नाम हम सर्वोपरि रखते हैं ऐसे ही समाजसेविका के क्षेत्र में सावित्री बाई फुले को अग्रणी भूमिका निभाने वाली महिला मानते हैं। सावित्री बाई फुले उन्नीसवीं शताब्दी की वह क्रांतिकारी वीरांगना थी, जिन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला बल्कि समाज को खोखला कर रहे अंधविश्वास, पाखंड, ढोंग धार्मिक कर्मकांडों का विरोध करते हुए दबे कुचले लोगों तक ज्ञान की ज्योति को पहुंचाया। जिस समाज को बड़े स्तर पर आज भी शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है उस समाज की महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्होंने लंबा अभियान छेड़ा।

सावित्री बाई फुले महिलाओं के लिए एक नायिका के रूप में उभर कर सामने आईं। अपनी कुशाग्र बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व और समाज के लिए काम करने के उनके जज्बे ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। सीवित्रीबाई फुले ने दकियानूसी समाज को बदलने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया।

यही वजह रही कि हम उन्हें देश की प्रथम प्रशिक्षित शिक्षिका के रूप में सम्मानित करते हैं। यह उनका हौसला और जज्बा ही था कि जिस दौर में महिलाओं को पैरों की जूती समझा जाता था। समाज ने उनको बस चूल्हे-चौके और बच्चे पैदा करने करने तक सीमित कर रखा था। उनके लिए बस पति ही परमेश्वर था। आलम ये था कि विधवा महिलाओं के साथ जानवर जैसा व्यवहार होता था। उनकी इच्छा, राय सहमति, मान सम्मान और अधिकार का कोई मतलब नहीं था। ऐसा नहीं है कि बस यह स्थिति किसी विशेष वर्ग में थी। लगभग हर स्त्री के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था। उच्च जाति में तो स्त्रियों की स्थिति चिंतनीय थी ही साथ ही दलित व पिछड़े वर्ग की महिलाएं भी इससे अछूती नहीं थीं। बल्कि उनकी हालत और खराब थी। उन पर उच्च जातियों का शिकंजा था। उनका शारिरिक और मानसिक शोषण किया जाता था। इन सब परिस्थितियों में सावित्री बाई फुले ने महिलाओं के मान सम्मान और अधिकार की लड़ाई लड़ी।

इन सबके बीच यह समझने की जरूरत है कि अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेजी शिक्षा पर भो जोर दिया जाने लगा था।  हालांकि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने वालों में भी उच्च जातियों में भी राजे रजवाड़े और जमीदार वर्ग के बच्चे ही थे। इस वजह से इन लोगों का प्रभुत्व बढ़ गया था। हां यह जरूर कहा जा सकता है कि देश में अंग्रेजी शिक्षा के भी रास्ते खुल गए थे। यह वह समय था जब समाज सुधारकों ने समाज को बदलने के प्रयास शुरू कर दिए थे। इन प्रयासों का असर स्त्रियों तक भी पहुंचा था।

उस समय महिला समाज सुधारकों में सावित्री बाई फुले, ताराबाई शिंदे व पंडिता रमाबाई का नाम प्रमुख रूप से याद किया जाता है। भारतीय स्त्री आंदोलन को समझने के लिए सावित्री बाई फुले के जीवन को समझना बहुत जरूरी है।

यदि सावित्री बाई फुले के अपने समाज की बात की जाए तो वह दबे-पिछड़े समाज माली जाति में पैदा हुई थीं। जिनका पेशा सब्जियां लगाना व बेचना था। क्योंकि उस दौर में बहुत कम उम्र में शादी हो जाया करती थी। तो सावित्री बाई फुले की शादी भी नौ वर्ष की अल्पायु में हो गई थी। विवाह के बाद वह न केवल स्वयं पढ़ीं बल्कि उन्होंने गांव-गांव जाकर कमजोर दुखी दलित महिलाओं के लिए पाठशालाएं खोलना शुरू किया।

सावित्री बाई फुले शायद इसलिए भी बड़ी समाजसेविका और क्रांतिकारी बनीं क्योंकि उनका विवाह महान क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले से हुआ था। उनके पति ज्योतिबा फुले उनको शिक्षित करने के लिए उनके शिक्षक भूमिका में आ गए। पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी भी नारी शिक्षा पर बहुत ध्यान दे रही थीं। इन सबके चलते सावित्री बाई फुले को अध्यापिका प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने अंग्रेजी ज्ञान भी अर्जित किया। अनुभव बढ़ाने के लिए उन्होंने टामसन क्लार्क्सन की जीवनी पढ़ी। दरअसल टामसन क्लार्क्सन ने नीग्रो लोगों पर हुए जुल्मों के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी थी।

 








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