हमारे अस्तित्व की पहली शर्त है धर्मनिरपेक्षता

धर्म-समाज , , शुक्रवार , 27-07-2018


secular-state-religion-communal-india-multi

डॉ. राजू पांडेय

अकादमिक क्षेत्र में अल्पकाल में ही बहुत प्रतिष्ठा अर्जित करने वाली अमेरिका से 2015 के प्रारंभ से प्रकाशित ओपन एक्सेस ऑनलाइन अंतर-अनुशासनात्मक वैज्ञानिक शोध पत्रिका साइंस एडवांसेज ने धर्म निरपेक्षता पर एक महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रकाशित किया है। इंग्लैंड के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय तथा अमेरिका के टेनेसी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं डेमियन जे रुक, आर अलेक्जेंडर बेंटले तथा डेनियल जे लॉसन ने सम्पूर्ण 20 वीं शताब्दी में (1900-2000) 109 देशों में एक ही कालावधि में जन्म लेने वाले अनेक व्यक्ति समूहों का अध्ययन किया। अपने अध्ययन हेतु इन्होंने वर्ल्ड वैल्यूज सर्वे के आंकड़ों का उपयोग किया।

यह एक सुस्थापित तथ्य रहा है कि आर्थिक रूप से विकसित और सम्पन्न देश धर्मनिरपेक्ष होते हैं जबकि गरीब देशों में धर्म के प्रति आकर्षण अधिक होता है। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह था कि वे इस बात की पड़ताल करें कि क्या आर्थिक विकास और समृद्धि समाज में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की स्थापना में सहायक होते हैं अथवा धर्मनिरपेक्ष समाज और राष्ट्र ही तीव्र गति से आर्थिक प्रगति कर सकते हैं।

इन शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि वे इस शाश्वत दार्शनिक विवाद को एक वैज्ञानिक परिणति तक पहुंचाना चाहते हैं। फ्रेंच समाजशास्त्री दुर्खीम ने यह स्थापना दी थी कि आर्थिक विकास के साथ जैसे जैसे लोगों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती जाती है वैसे वैसे धर्म का प्रभाव कम होता जाता है। जबकि जर्मन समाज शास्त्री मैक्स वेबर ने यह सिद्ध किया कि धार्मिक व्यवहार में होने वाला परिवर्तन आर्थिक विकास को प्रभावित करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार उन्होंने इन दार्शनिक निष्पत्तियों को वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसने की कोशिश की है।

शोधकर्तागण जिन निष्कर्षों पर पहुंचे हैं वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि धार्मिक कट्टरता, धर्मान्धता, असहिष्णुता तथा बहुसंख्यक वर्ग की तानाशाही के खतरों से आगाह करने वाले भी हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार समाज और राष्ट्र में पहले धर्म निरपेक्ष मूल्यों की स्थापना होती है इसके बाद ही आर्थिक विकास का पथ प्रशस्त होता है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि धर्म निरपेक्षता ही एकमात्र रूप से आर्थिक विकास हेतु उत्तरदायी है किंतु यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास के कारण धर्म निरपेक्ष मूल्यों की स्थापना नहीं होती। शोधकर्ताओं ने यह भी सिद्ध किया है कि जिन देशों में धर्म निरपेक्ष मूल्यों के साथ ही वैयक्तिक अधिकारों का सम्मान किया जाता है और उनकी रक्षा की जाती है वे देश तीव्र गति से आर्थिक विकास करते हैं। जिन देशों में समलैंगिकता, तलाक और गर्भपात आदि के विषय में प्रगतिशील रवैया अपनाया जाता है वे देश आर्थिक तरक्की की राह पर तेजी से चल निकलते हैं। शोधकर्तागण कहते हैं कि धर्म निरपेक्षता और आर्थिक विकास में स्पष्ट कार्य कारण संबंध न होते हुए भी यह देखा गया है कि धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की बढ़ती शक्ति किसी देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी में 10 वर्षों में 1000 डॉलर, 20 वर्षों में 2800 डॉलर एवं 30 वर्षों में 5000 डॉलर की वृद्धि कराने में सहायक सिद्ध होती है।

ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के डेमियन रुक कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि धार्मिक देशों के लिए आर्थिक विकास के द्वार बंद हो गए हैं किंतु उन्हें अपने नागरिकों को निजी अधिकार प्रदान कर उनका सम्मान करने की अपनी विधियां ढूंढनी होंगी। जबकि टेनेसी विश्वविद्यालय के बेंटले के अनुसार पूरी बीसवीं सदी में किसी देश के धार्मिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों ने उस देश की जीडीपी में होने वाले बदलाव की भविष्यवाणी की है। 

आज जब हमारे देश में यह सिद्ध करने की कोशिश हो रही है कि धर्मनिरपेक्षता एक आरोपित और आयातित अवधारणा है जिसका हमारी वैचारिक परंपरा में कोई स्थान नहीं है तो इसका पुरजोर खंडन किये जाने की आवश्यकता है। निश्चित ही सेकुलरिज्म अपने पारिभाषिक अर्थ में पश्चिम में जन्मा और एक दार्शनिक विचार के रूप में चर्चित होकर धीरे-धीरे परिपक्व भी हुआ। किन्तु भारत जैसे बहुधार्मिक, बहुभाषीय, बहुजातीय, बहु सांस्कृतिक देश में धर्म निरपेक्षता जैसी उदार और समावेशी अवधारणाएं इसके अस्तित्व की पहली शर्त हैं।

दरअसल हमारा वजूद ही धर्म निरपेक्षता पर टिका हुआ है। धर्म निरपेक्षता हमारा मूल स्वभाव है। धर्म निरपेक्षता हमारी आदत है। सेकुलरिज्म शब्द को गढ़ने वाले पश्चिम या हमारे देश के औपनिवेशिक शासकों ने भारत में धर्म निरपेक्षता की बुनियाद नहीं रखी। बल्कि वे तो बाँटो और राज करो की नीति का आश्रय लेकर हमारी स्वाभाविक धर्म निरपेक्ष संरचना को खंडित करने का प्रयास करते रहे। धर्म निरपेक्षता तो भारत के स्वाधीनता आंदोलन के पुरोधाओं का एक स्वाभाविक हथियार रही। इन नेताओं ने निश्चित ही इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति और फ्रांस की राज्य क्रांति से प्रेरणा प्राप्त की तथा स्वतन्त्र भारत को आर्थिक रूप से समुन्नत तथा उदार प्रजातांत्रिक राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया। धर्मनिरपेक्षता उनके सपनों को साकार करने की पहली शर्त थी। इसी स्वातंत्र्य पूर्व कालखंड में स्वामी विवेकानंद और मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा अन्य धार्मिक सुधारकों ने उदार धार्मिक सिद्धांतों पर बल दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन में जिस राष्ट्रवाद ने पूरे देश को एक सूत्र में बांधा वह धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर आधारित था। भारत की धर्म निरपेक्षता की वर्तमान संकल्पना धार्मिक सुधारों और पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान दोनों से शक्ति प्राप्त करती है किंतु इसका अस्तित्व हमारी गंगा-जमुनी तहजीब और संत परंपरा में बहुत पहले से उपस्थित था। पश्चिम का सेकुलरिज्म धर्म से सीधे टकराव और संघर्ष का नतीजा था। किंतु भारत का सेकुलरिज्म हमारे धर्म में ही उपस्थित उदार और कट्टर, प्रगतिशील और पश्चगामी तथा परिवर्तनकामी और यथास्थितिवादी शक्तियों के मध्य संघर्ष के द्वारा विकसित हुआ है। हमारीधर्म निरपेक्षता को हम मनुवादी शक्तियों की कट्टरता और भक्ति आंदोलन की उदारता के बीच टकराव से विकसित होते देखते हैं। पी सी जोशी के अनुसार ब्राह्मणवाद तथा बौद्ध धर्म के मध्य का संघर्ष धार्मिक ढांचे के भीतर धर्म निरपेक्षता हेतु संघर्ष को दर्शाता है।

पंडित नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक-आर्थिक विकास के पारस्परिक सम्बन्ध को बहुत पहले ही बहुत स्पष्टता से समझ लिया था। वे कहते हैं- हम अपने राज्य को सेक्युलर कहते हैं। सेक्युलर कोई बहुत अच्छा शब्द नहीं है। किंतु बेहतर शब्द के अभाव में हमने इसका प्रयोग किया है। इसका वास्तविक अर्थ क्या है? निश्चित ही इसका अर्थ ऐसा राज्य नहीं है जहां धर्म और धार्मिक व्यवहार को हतोत्साहित किया जाता है। बल्कि इसका अर्थ सबके लिए धार्मिक स्वतंत्रता है, इसमें उनकी भी स्वतन्त्रता सम्मिलित है जिनका कोई धर्म नहीं है। इस स्वतंत्रता की इतनी ही शर्त है कि यह लोगों के मध्य पारस्परिक संघर्ष का कारण न बने और हमारे राज्य की मूलभूत अवधारणाओं को खंडित करने वाली न हो। …………सेक्युलर शब्द मेरे लिए बहुत व्यापक अर्थ रखता है और यह अर्थ उसके शब्दकोशीय अर्थ से कहीं भिन्न है। यह सामाजिक और राजनीतिक समानता को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार जातिवाद से ग्रस्त समाज कभी भी सेक्युलर नहीं बन सकता।

पंडित नेहरू ने इस बात को बड़ी स्पष्टता से रेखांकित किया है कि आर्थिक और सामाजिक विषमता तथा शोषण को यथावत बनाए रखते हुए केवल धार्मिक सहिष्णुता की बात करना सेक्युलरवाद नहीं है। नेहरू के अनुसार असमानता से संघर्ष के लिए आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करना आवश्यक है। इस प्रकार धर्म निरपेक्षता और आर्थिक विकास साथ साथ चलते हैं।

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के कुछ मूलभूत लक्षण हैं- राज्य का किसी धर्म विशेष द्वारा संचालित न होना, सर्वधर्म समभाव, धार्मिक सहिष्णुता, कट्टरता का निषेध, सरकार द्वारा किसी धर्म विशेष की शिक्षा प्रदान न करना,  धार्मिक रूढ़ियों को विधि विरुद्ध मानना, राज्य के कानून से धर्म के आधार पर किसी को छूट न देना तथा अधिकारों की बराबरी और राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक समानता। हमारे संविधान में अनुच्छेद 25 और 26 में प्रदत्त अधिकार इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 15,16,27,32, 325 और 330 भी हमारे देश के धर्म निरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने वाले संवैधानिक प्रावधान हैं। विभाजन के त्रासदायक अनुभव से पीड़ित और उसके बाद उत्पन्न कटुता से चिंतित संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता में ही राष्ट्र के एकीकरण का मार्ग ढूंढा।

भले ही सेक्युलर शब्द 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में 1976 में जोड़ा गया हो किंतु यह कहना कि संविधान अपनी आत्मा में धर्मनिरपेक्ष नहीं था, मिथ्या और शरारतपूर्ण है। संविधान की व्यापक स्वीकार्यता और परिपूर्णता के कारण कट्टरपंथी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाते तो इसके कतिपय प्रावधानों की भ्रामक व्याख्या द्वारा इसे अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। यद्यपि प्रारम्भ से ही ये संविधान के मूल स्वरूप को पाश्चात्य विचारों के ऐसे संग्रह की संज्ञा देते रहे हैं जिसमें मनुस्मृति जैसे पारंपरिक विधि ग्रंथों का समावेश नहीं किया गया है। इनका मानना है कि संविधान में हमारी धर्म परंपरा को उपेक्षित किया गया है। 

संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बावजूद वोटों की राजनीति ने धार्मिक कट्टरता और धर्म विशेष के अनुयायियों के तुष्टिकरण की आत्मघाती प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के अनुकूल व्यवहार कर उन्हें प्रसन्न करने की दलों और राजनेताओं की रणनीति अचर्चित बनी रहती है क्योंकि इसे बहुसंख्यक वर्ग सहज व्यवहार और आस्था की अभिव्यक्ति की संज्ञा देता है किंतु जब अल्पसंख्यकों को अपनी ओर करने के लिए धर्म का प्रयोग किया जाता है तो यह तुष्टीकरण का दर्जा पाकर विवादित हो जाता है। सरकार और सरकार के नुमाइंदों की किसी भी धर्म और धर्मावलंबियों के साथ गैर वाजिब नजदीकी की निंदा होनी चाहिए।

भारत समेत अनेक देशों में कथित इस्लामिक आतंकवाद के खतरे का मुकाबला करने के लिए स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली धार्मिक कट्टरपंथी शक्तियों का उदय हुआ है। इस्लामिक आतंकवाद का यह खतरा अमूर्त नहीं है। कुछ खास देश इस तरह के आतंकवाद को फैला रहे हैं और कुछ खास देश इस आतंकवाद से पीड़ित हैं। आतंकवाद के प्रसार के कुछ निश्चित कारण हैं। आतंकवादी संगठनों की पहचान और उनकी कार्य प्रणाली किसी से छिपी नहीं है। इस इस्लामिक आतंकवाद से मुकाबला करने की एक विशिष्ट रणनीति बनाई जा सकती है जो सम्बन्धित देशों की भौगोलिक-सामरिक स्थिति के आधार पर तैयार होगी। किंतु जिस इस्लामिक खतरे का मुकाबला करने के लिए विश्व के विभिन्न धर्मावलंबियों को हिंसक और कट्टर बनाया जा रहा है वह अमूर्त और वायवीय है। यह इस परसेप्शन पर आधारित है कि किसी धर्म के सारे अनुयायी संदिग्ध, हिंसक और आतंक पसंद हैं। इस नैरेटिव में इस्लामिक आतंकवाद के वस्तुनिष्ठ आकलन हेतु कोई स्थान नहीं है।

हम अतीत और वर्तमान पर नजर डालें तो पूरी दुनिया ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है जो यह दर्शाते हैं कि जब-जब राज्य का संचालन धर्म के आधार पर होता है तब-तब उसके विनाशकारी परिणाम सामने आते हैं। ऐसे देशों में हिंसा और अस्थिरता बढ़ती है, आतंकवाद पनपता है, प्रजातांत्रिक व्यवस्था अस्थिर होती है, सेना का महत्व बढ़ता है, गृह युद्ध के हालात बनते हैं, मानवाधिकारों का हनन होता है और तानाशाही आती है। इन अराजक परिस्थितियों में आर्थिक विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज यदि भारत विश्व की सर्वाधिक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था और भावी महाशक्ति बनने के दावे कर रहा है तो इसके पीछे धर्म निरपेक्ष मूल्यों की पुख्ता बुनियाद है जिस पर विकास की इमारत खड़ी की जा सकती है। तात्कालिक और तुच्छ राजनीतिक हितों की सिद्धि के लिए देश के धर्म निरपेक्ष ढांचे के साथ खिलवाड़ कहीं आत्मघाती न बन जाए।

(डॉ राजू पाण्डेय तमाम सामाजिक-राजनीतिक विषयों की गहरी समझ रखते हैं और उन पर लेख लिखते रहते हैं।) 

 








Tagsecular state religion communal india

Leave your comment