लेबर यूनियनों को दबाने में शिवसेना बनी थी कांग्रेस का दाहिना हाथ

नई किताब , , बृहस्पतिवार , 08-03-2018


sikhextreemist-goldentemple-indiragandhi-balthakre-jailsingh

जनचौक ब्यूरो

(वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘‘मैं बोनसाई अपने समया काः एक कथा आत्मभंजन की’’की अगली कड़ी) -संपादक

देश की राजनीति में नया आयाम जुड़ने लगा है। पंजाब में खालिस्तान का नारा गूंजने लगा है। पंजाब को शेष भारत से अलग करने और खालिस्तानके रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना की खबरें प्रेस में छपने लगी हैं। कहा जा रहा है कि इस मांग की जड़ें सीमा पार तक फैली हुई हैं। पाकिस्तान इसे गुप्त रूप से अपना समर्थन दे रहा है। पाकिस्तान की शक्तिशाली गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई. खालिस्तान आंदोलनको कामयाब बनाने के लिए बेताब है।

वास्तव में खालिस्तान आंदोलनके सूत्रधार संत भिंडरावाला को कांग्रेस की घिनौनी सियासत की पैदाइश माना जाता है। पंजाब के शक्तिशाली नेता प्रकाश सिंह बादल और उनके नेतृत्व में सक्रिय अकाली दल को सबक सिखाने के लिए भिंडरावाला को सभी प्रकार के संसाधनों से लैस किया गया। दूसरा सिलसिला तब शुरू हुआ था जब इंदिरा गांधी प्रतिपक्ष में थीं, और संघर्ष कर रही थीं (1977-1979) पंजाब के दो दिग्गज कांग्रेसी पहलवान दरबारा सिंह और ज्ञानी जैल सिंह ने अपनी अपनी चालें चली। शायद इंदिरा जी इन शातिर पहलवानों के दांव पेंच ठीक से समझ नहीं सकीं। जिसका परिणाम है संत भिंडरावाला का उदय और खालिस्तान आंदोलन। आज भिंडरावाला कांग्रेस के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए भस्मासुरबन चुका है। इंदिरा जी तात्कालिक राजनीति के पासे पीटते जा रही हैं।

कांग्रेस ऐसा ही खेल मुंबई में भी खेल चुकी थी। करीब दो दशक पहले इसने समाजवादी व साम्यवादी शक्तियों और श्रमिक संगठनों को मटियामेट करने के लिए शिवसेनाको जमकर गीजा खिलाई। बाल ठाकरे तूफानी रफ्तार से मुंबई मंच पर उभरे। आज शिवसेना कांग्रेस को सीधी चुनौती दे रही है। बाल ठाकरे दिल्ली को भी चिढ़ाते हैं।

कट्टर दक्षिणपंथी व कट्टरवादी शक्तियां इस महानगर के पारंपरिक बहुरंगी ताने-बाने को ध्वस्त करने पर आमादा हैं कांग्रेस का नेतृत्व शिवसेना के सामने बेबस है। यह उसकी विवशता बन चुका है। शिवाजी और मराठा अस्मिता के नाम पर उप राष्ट्रवादका उभार है। और पंजाब में भी इसी उप राष्ट्रवाद (सिखवाद या सिख केंद्रित राष्ट्र) का ज्वार उठ रहा है।

यदि ऐसा नहीं होता तो क्या बाल ठाकरे, भिंडरावाला जैसे उग्र कट्टरवादी नेता उभरते? कांग्रेस के लिए श्रेष्ठ मार्ग तो यही रहता कि वो अपने विरोधियों से निपटने के मामले में प्रोफेशनल राजनीतिक शक्तियों का सहारा लेती। लेकिन उसने शॉर्ट कटचुना और आज पूरे देश को बाल ठाकरे व भिंडरावाला के कोड़ों की मार झेलनी पड़ रही है, पंजाब में आतंकवादी घटनाएं शुरू हो चुकी हैं, गैर सिखों को बस से उतार कर मारा जा रहा है, स्वर्ण मंदिर में प्रवेश से दहशत होने लगी है, भिंडरावाला के खाड़कुओं ने मंदिर परिसर में डेरा डाल रखा है। नई दिल्ली और चंडीगढ़ के सत्ता प्रतिष्ठान मूकदर्शक बने हुए हैं।

इस परिदृश्य में पत्रकार की सक्रियता बढ़ जाती है। चूंकि मैं मूलतः ब्यूरो यानी रिपोर्टर हूं इसलिए मेरा पंजाब आना-जाना शुरू हो गया है। पंजाब की पिंड संस्कृति से मेरा पहला साक्षात्कार है। मैं गांवों में घूमता हूं, कवरेज के लिए चंडीगढ़, अमृतसर, जालंधर, पटियाला, फिरोजपुर, गुरदासपुर जैसे शहरों में जाता हूं। स्वर्ण मंदिर में ही मैं भिंडरावाला, संत लोगोवाल जैसे नेताओं के इंटरव्यू कर चुका हूं।

राजनीति की तात्कालिकताएं अक्सर त्रासदी पूर्ण हैं। तात्कालिक समाधान आत्मघाती भी निकल जाते हैं। अब पंजाब के साथ-साथ असम भी अशांत हो चुका है। 18 फरवरी 1983 को नेल्ली क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगों के कारण कई हजार (2 से 5 हजार) मानुष हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। यह दंगा या हिंसा नहीं है, बल्कि मुसलमानों का नरसंहार है। मैं दिल्ली से गुवाहाटी के लिए भागता हूं। गुवाहाटी में सर्किट हाउस में असगर अली इंजीनियर मिल जाते हैं। हम दोनों टैक्सी में नेल्ली के हिंसाग्रस्त गांव में जाते हैं। पीड़ितों से मिलते हैं। नरसंहार के असली कारण को कुरेद-कुरेद कर पूछते हैं, भूमि समस्या, कर्जग्रस्तता, स्थानीय व बाहरी मुसलमान, मुस्लिम-हिंदू संबंध, घुसपैठ वोटों की राजनीति के कारण प्रमुखता से सामने आते हैं।

हम दोनों दारांग जिले में भी जाते हैं। यह जिला भी अशांत है। वैसे मैं इस इलाके से अपरिचित नहीं हूं।1978 में दारांग के पेनरीकस्बा में बंधक श्रमिक शिविर लगा चुका हूं। दर्जनों श्रमिकों को मुक्त कराया था। तब बंधकों की पहचान के सिलसिले में मैंने तेजपुर भूटान सीमा क्षेत्र, कई चाय बागानों की यात्राएं की थी। 1983 की इस यात्रा में सभी पीड़ित चेहरे गुलामी की गाथाएं याद आ रहे हैं। असम की तीसरी यात्रा है। 1971 में पहली यात्रा में मैं रिपोर्टर था। 1978 की यात्रा में हस्तक्षेपवादी शोधकर्ता और अब फिर से पूर्णकालिक रिपोर्टर के रूप में नरसंहार को कवर करने आया हुआ हूं। बड़ा अटपटा लग रहा है यह यात्रा मार्ग!

1983-84 का समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। उनका नेतृत्व अग्नि परीक्षा से गुजर रहा है। हालांकि वे अपनी निजी त्रासदी से उबर चुकी हैं, और निर्णायक प्रदर्शन की ओर लौट रही हैं। इस काल में जहां भीषण नरसंहार हुआ, वहीं अगले महीने मार्च के पहले सप्ताह में गुटनिरपेक्षता आंदोलन भी आयोजित करना पड़ा। फिदेल कास्त्रो, यासर अराफात जैसे महान जुझारू नेताओं ने भी इस शिखर सम्मेलन में शिरकत की। देखने लायक था यह ऐतिहासिक दृश्य इंदिरा गांधी ने एक बार फिर अपने नेतृत्व कौशल की छाप तीसरी दुनिया के नेताओं पर जमाई। महान क्रांतिकारी कास्त्रो ने जहां इंदिरा जी का स्निधतापूर्ण आलिंगन किया, वहीं अराफत उन्हें बड़ी बहन ... प्रिय बहनसे संबोधित करते रहे।

मार्च के इस ऐतिहासिक आयोजन के पश्चात इसी वर्ष नवंबर में राष्ट्रमंडल अध्यक्षों (चोगम) का पांच दिवसीय जमावड़ा लगा कर इंदिरा जी ने पुनः विश्व से अपने नेतृत्व की धाक मनवा ली है। ब्रिटेन की आयरन लेडी या शॉपकीपर पी.एम. मारग्रेट थैचर भी शासनाध्यक्षों के इस जमावड़े में मौजूद थीं। दोनों महिला प्रधानमंत्री अपने-अपने फन की निष्णात थीं। पूर्व औपनिवेशिक देशों के नेताओं ने इन दोनों महिला शासन प्रमुखों के जौहर देखे।

हम पत्रकारों के लिए ऐसे आयोजनों का कवरेज भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होता है। वर्ष भर मेरी व्यस्तता रही। नेल्ली से लौटकर मैं आईएनएस दक्षिण ब्लॉक और विज्ञान भवन के बीच स्कूटर दौड़ाता रहा, इंदौर को खबरें भेजता रहा।

1984 का वर्ष तो हम पत्रकारों के लिए घटनाओं का ज्वालामुखीसाबित हुआ। एक, कांग्रेस का अधिवेशन दो, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार  तीन, मंदिर में सेना का प्रवेश, खालिस्तानी आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई चार, आतंकवादी सफाई अभियान में भिंडरावाला और उनके सैंकड़ों अनुयायी मारे गए, 80 से अधिक सैनिकों की भी जाने गईं, पांच अकाल तख्त साहिब को काफी क्षति पहुंची और मुख्य पूजा स्थल हरमंदर साहब भी फौज-खाड़कू टकराव की मारों से बच नहीं सका, इसका जिस्म भी जख्मी हुआ है, हिंदू सिख संबंध जगह-जगह से तिड़के, सात, पाकिस्तान को कुछ तसल्ली हुई और पाकिस्तान विभाजन (दिसंबर 1971) का सांकेतिक प्रतिशोध ले लिया। और इस तरह ज्वालामुखीकी पटकथा के पहले भाग का अंत होता है।

जहां इंदिरा गांधी ने अपनी निर्णय शक्तिका प्रचंड प्रदर्शन किया, वहीं देश के जुझारु सिख समुदाय के एक खासा हिस्से को अपना दुश्मन भी बना लिया। मेरे पंजाब के दौरे बढ़ गए। उत्तेजित सिख समुदाय को शांत करने के लिए सरकार सक्रिय हो गई, लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और ज्ञानी जैल सिंह के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। इसका बड़ा कारण यह था कि-

इंदिरा जी ने अमृतसर में सैन्य कार्रवाई के मामले में राष्ट्रपति जैल सिंह को विश्वास में नहीं लिया था। उन्हें सूचित तक नहीं किया गया। प्रधानमंत्री के इस रवैये से सिख राष्ट्रपति बेहद आहत हैं। राजनीतिक व प्रशासनिक गलियारों की गुफ्तगू पर यकीन करें तो इंदिरा जी को आशंका थी कि अगर इस अभियान की भनक भी ज्ञानी जी को लग गई तो भिंडरावाला और उनके हजारों खाड़कू स्वर्ण मंदिर से सुरक्षित फरार हो जाएंगे। माना यह भी जा रहा है कि यदि-

इंदिरा गांधी यह कदम नहीं उठाती तो भिंडरवाला स्वर्ण मंदिर में ही स्वतंत्र खालिस्तान राष्ट्रकी घोषणा कर डालता। पाकिस्तान और कुछ देश इस नए राष्ट्र को तत्काल मान्यता भी दे देते। पंजाब फिर पंजाब नहीं रहता। विश्व भर के सिखों का एक स्वतंत्र व संप्रभुता संपन्न राष्ट्र बन जाता। इसके अन्य दूरगामी परिणाम निकलते। देश में मौजूद उपराष्ट्रीयताओं की महत्वाकांक्षाएं बलवती होने लगती। प्रधानमंत्री ने अपनी संकल्पबद्धता के साथ इस भावना का अंत कर दिया।

हिंसक सुबह और त्रासदियों की पटकथा

31 अक्टूबर की सुबह मेरे पत्रकारीय जीवन का एक ऐसा हिस्सा बन गई है जो कि कभी सुप्त नहीं होगी और न ही मुझसे जुदा होगा। सुबह के साढ़े नौ बज रहे हैं। मैं तीन मूर्ति लेन जा रहा हूं। कर्नाटक के राज्यसभा सांसद खान ने कतिपय पत्रकारों को नाश्ते पर बुलाया है। मैं स्कूटर से औरंगजेब रोड से तीन मूर्ति लेन जा रहा हूं। इसी मार्ग पर प्रधानमंत्री का सरकारी निवास है। तीन मूर्ति चाणक्यपुरी, पालम हवाई अड्डा सरदार पटेल मार्ग जाने के लिए प्रधानमंत्री निवास के सटे मार्गों (अकबर रोड, औरंगजेब रोड) से गुजरना पड़ता है। मुझे देर हो गई है इसलिए स्कूटर तेज चला रहा हूं। सांसद खान आज कुछ सनसनीखेज खुलासा करने वाले है। इसलिए मैं उतावला हूं।

अरे यह क्या! मैं देख रहा हूं प्रधानमंत्री के निवास क्षेत्र में पुलिस का भारी बंदोबस्त है। यातायात को रोक दिया गया है। इसे डाइवर्टकिया जा रहा है। मैं स्कूटर को फुटपाथ पर चढ़ा कर पार्क कर देता हूं। मैं पास खड़े सिपाही को अपना प्रेस कार्ड दिखाता हूं। वह मुझसे कह रहा है, ‘सर गजब हो गया है।

क्या हुआ? इतनी पुलिस क्यों हैं?‘

आप एम्स दौड़िए! पी.एम. को गोलियां लगी हैं। उन्हें वहीं ले जाया गया है। उनके साथ सोनिया जी गई हैं।

गोलियां किसने चलाई है?‘

यह मैं ठीक से नहीं जानता। इतना ही सुना है कि उनके दो बॉडीगार्ड ने दनादन गोलियां चलाई। आप न्यूज के लिए वही दौड़ जाइए।

मैं इस घटना के लिए तैयार नहीं था। इंदिरा जी जैसी लोकप्रिय नेता ऐसी नियति का सामना करेंगी, मेरे लिए सब अप्रत्याशित लग रहा था। पिछले वर्ष दो-दो सफल आयोजनों के बाद से ही विश्व में उनकी फिर से धाक जमने लगी थी स्वर्ण मंदिर त्रासदी से वे जरूर विवादास्पद बनने लगी थीं। लेकिन उनके ही अंगरक्षक उन पर गोलियां दागेंगे, यह हम प्रेसवालों के लिए अविश्वसनीय था। खैर! मैं एम्स जाने के बजाय पहले रफी मार्ग स्थित दफ्तर पहुंचता हूं। इंदौर मुख्यालय में अभय जी को ताजा घटनाक्रम की जानकारी देता हूं। उन्हें भी सुनकर धक्का लगता है। रेडियो पर भी खबर प्रसारित हो जाती है। अंगरक्षकों की पहचान को अभी गुप्त रखा जा रहा है। मैं खबर भेजने की व्यवस्था में जुट जाता हूं। मैं रफी मार्ग से एम्स पहुंच गया हूं। अब तक राजधानी दिल्ली सदमे की गिरफ्त में आ चुकी है। एम्स के बाहर जबरदस्त भीड़ जमा हो चुकी है।

सड़कों पर अव्यवस्था फैलने लगी है। उन वाहनों और स्कूटर को रोका जा रहा है जिनमें सिख सवार हैं, क्योंकि अब तक लोगों को बॉडीगार्ड की असली पहचान का पता चल चुका है। इसलिए हर जगह सिखों को रोका जा रहा है। उन्हें पीटा जा रहा है। उनके वाहनों को आग लगाई जा रही है।

आई.एन.ए मार्केट से लेकर एम्स तक गुंडागर्दी का राज फैल चुका है। ग्रीन पार्क और साउथ एक्सटेंशन से भी स्थिति बिगड़ने लगी है। सरदार लोग अपनी दुकानों स्कूटर टैक्सियों को लावारिस छोड़ अपनी सुरक्षा के लिए इधर उधर भाग रहे हैं। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और सांसद पुत्र राजीव गांधी, दोनों ही दिल्ली से बाहर हैं। दोनों अविलंब लौट रहे हैं।

                                              (समाप्त)

 






Leave your comment