“किसी की खुशी में इतना धुआं नहीं छोड़ना चाहिए कि सब खुशी हवा हो जाए”

विशेष साक्षात्कार , नई दिल्ली, मंगलवार , 10-10-2017


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प्रदीप सिंह

हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री अनामिका की कविता स्त्री अंतर्मन की संवेदना और स्त्री समस्याओं का दस्तावेज है। कविता के साथ ही कहानी, उपन्यास, संस्मरण, विमर्श, अनुवाद और अंग्रेजी साहित्य में भी उनका गहरा दखल है। अपनी कविताओं में वे स्त्री समस्याओं को लिपिबद्ध करती रही हैं। साहित्य और समाज के प्रमुख सवालों पर अनामिका से प्रदीप सिंह की बातचीत के संपादित अंश:  

हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री अनामिका। फोटो साभार  

 

  • "कविता जहां खत्म होती है वहीं से पाठकों के साथ एक मौन संबंध बनना शुरू होता है।"
  • "पिता की सीख का ही नतीजा है कि मैं जिससे भी मिलती हूं प्रेम और स्नेह से मिलती हूं।"

प्रश्नः आप अपने जन्म स्थान, घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बतायें।

अनामिकाः मुजफ्फरपुर सूफी परंपरा का शहर है। पुराने समय में वहां एक सूफी संत शाह मुजफ्फर हुआ करते थे। उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम मुजफ्फरपुर पड़ा। उसके बाद उनके शिष्य सूफी कंबलशाह हुए। उनके रहस्य और सिद्धि की कहानियां सुनते-सुनते हम लोग बड़े हुए। मेरे नाना और दादा दोनों दोस्त थे। सूफी की मजार पर दोनों लोग जाते और नातिया कलाम सुनते हुए घंटों बैठा करते थे। चूंकि नानाजी और दादाजी आपस में घनिष्ट मित्र थे तो दोनों परिवारों का एक दूसरे के घर आना-जाना था। मेरे पिता जी और मां बचपन से ही एक-दूसरे को जानते थे। बाद में दोनों की शादी हुई। 17 अगस्त 1961 को  मुजफ्फरपुर में मेरा जन्म हुआ। मां और पिता दोनों प्रोफेसर थे। घर में मैं छोटी थी मुझसे बड़े भाई साहब थे। ददिहाल और ननिहाल करीब थी। जिस परिवेश में मैं पली वहां किसी से ऊंची आवाज में बात करते हुए नहीं देखा। घर का माहौल साहित्यिक था। पिताजी प्रसिद्ध कवि थे तो साहित्यकारों का भी आना-जाना लगा रहता था। लगता था कि पूरा शहर ही परिवार है। ऐसा मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि रक्त संबंध ही परिवार होता है।आज मुजफ्फरपुर छोड़ने के इतने दिनों बाद आत्मा के रिश्तों और मानवीय रिश्तों के प्रति मेरी आस्था बनी हुई है।

प्रश्नः अपने पिताजी और मां की कोई याद बताएं। क्या पिताजी की कोई सीख याद आती है?

अनामिकाः मेरे पिता पद्श्री प्रो. श्याम नंदन किशोर और मां प्रो.आशा किशोर हिंदी के प्रोफेसर थे। दोनों बहुत ही उदार, हंसमुख और स्नेहिल थे। कविता-कहानी ही हमारे सहचर थे और कुछ हंसमुख सूक्तियां। उन्होंने बहुतेरी मर्म की बातें हंसते-खेलते समझा दी,जैसे कि एक बार हंसते हुए कहा - ‘‘ रोज सुबह उठते समय यह सोचो की हो सकता है कि हमारे लिए यह दिन आखिरी हो तो आज का काम कल पर कभी नहीं टलेगा,जितनी मेहनत कर सकती हो आज कर लोगी,जिससे भी मिलोगी प्यार से मिलोगी कि जीवन में उससे दोबारा मिलने का मौका मिले न मिले। यह बात इस शिद्दत से कही गयी थी कि मेरे मन में घर ही कर गयी।    

 

साक्षात्कार के दौरान पत्रकार प्रदीप सिह द्वारा ली गई सेल्फी।

                    साक्षात्कार के दौरान पत्रकार प्रदीप सिंह द्वारा ली गई सेल्फी।

प्रश्नः आपकी शिक्षा-दीक्षा कहां हुई?

अनामिकाः मेरे बड़े भाई साहब का जब नेतरहाट स्कूल में दाखिला हो गया तो मां ने कहा कि अब मैं बेटी को बाहर पढ़ने के लिए नहीं जाने दूंगी, यह मेरे साथ ही रहकर पढ़ेगी। स्नातक तक की मेरी शिक्षा मुजफ्फरपुर में ही हुई। बाद में भैया नेतरहाट से निकलकर दिल्ली आ गए और पिताजी बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए तो भैया ने कहा कि अब इसे यदि आप अपने विश्वविद्यालय में पढ़ायेंगे तो अपनी मेहनत से अच्छा करने पर भी लोग सवाल उठाएंगे, इसलिए इसे पढ़ने के लिए बाहर भेजिए। बाहर की दुनिया समझना इसके लेखकीय जीवन के लिए भी अच्छा होगा। उसी वर्ष उनका आईएएस में चयन हो गया। कुछ दिन उनकी बात विचाराधीन रही, और अंततः दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरा दाखिला हुआ और एमए अंग्रेजी करते हुए छात्रावास में रहने लगी। दिल्ली आने पर न केवल मां-पिताजी और शहर का विस्तारित परिवार छूटा बल्कि घर में पलने वाले तोता, खरगोश जैसे दोस्तों से भी दूरी बन गई। धीरे-धीरे नया परिवेश आत्मसात कर रही थी कि एक मर्मांतक घटना घटी... 

प्रश्नः क्या हुआ था उस समय 

अनामिकाः पचास की अल्पायु में पिताजी की मृत्यु। मेरे पिताजी का स्वभाव बहुत ही मृदुल था। जब दिल्ली में एडमिशन हो गया तो  वे प्रायः रोज मुझे चिट्ठी लिखते, हर महीने मिलने भी आते। मैं भी बार-बार घर भाग आती। परीक्षा के पहले जब मैं घर गई,आखिरी बार जब पिताजी स्टेशन पर मुझे छोड़ने आये। ट्रेन जब चल दी तो बाहर खिड़की से देख वे देर तक अपना हाथ हिला रहे थे। उसी समय मन में उनके द्वारा अक्सर दोहराये जाने वाले शब्द कौंध गए! कहीं ये मुलाकात आखिरी न हो! पूरे शरीर में सिहरन हो गयी। किसी तरह दिल्ली आयी और पढ़ाई में लग गयी। इस छुट्टी में एक घटना और घटी थी कि उन्होंने मुझसे अच्छे जीवन साथी की संकल्पना के बारे में पूछने की कोशिश की थी। और मैंने दुलार में कहा था कि उनका साथ छोड़कर  मुझे कहीं नहीं जाना,पढ़ाई पूरी कर उन्हीं के पास लौट आना है। और उनके साथ देश-विदेश घूमना है, तरह-तरह की किताबें पढ़नी हैं। पर वे हंसते हुए समझाते रहे कि गृहस्थी और मातृत्व भी जीवन की पूर्णता के लिए जरुरी है। हाॅस्टल पहुंची तो अचानक पिताजी ने मुझसे कहाकि बेटा ! तुम्हारा एमए भी इस साल पूरा हो रहा है, हमने तुम्हारे लिए लड़का देखा है। अच्छा है और एमबीबीएस कर रहा है। मना तभी करना जब तुम्हें कोई और लड़का पसंद हो। मैंने फिर कहा कि आप तो कहते थे कि पढ़ाई खत्म होने के बाद हम लोग खूब घूमेंगे देश-विदेश में। मैं शादी नहीं करूंगी आप के साथ घूमूंगी। लेकिन पिताजी को अभास हो गया था कि अब वे ज्यादा दिन नहीं रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं रहूं या न रहूं, गुड़िया की शादी तय तिथि आप लोग कर दीजिएगा। मेरी मृत्यु का शोक मनाया जाए, यह मैं नहीं चाहता। चूंकि यह उनकी अंतिम इच्छा थी इसलिए पिताजी द्वारा तय तिथि को मेरी शादी हुई। इस तरह पिताजी और मायके का साथ लगभग एक साथ ही छूटा। ससुराल में बहुत प्यार,स्नेह और सहयोग मिला। मेरे सास-ससुर दोनों अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे पर पिताजी का साथ छूटना मुझे आज भी काफी परेशान करता है। और मेरे अवचेतन मन पर अपना दस्तक देता रहता है।   

"आज साहित्य और समाज के दो महाप्रमेय ढह गए हैं। पहला, भक्तिकालीन ईश्वर मर चुका है और दूसरा, मार्क्सवाद कोई असर नहीं दिखा पाया।" 

"मैंने दोनों अतिवादों के बीच समस्याओं को समस्या के रूप में रखने की कोशिश की है।"

प्रश्नः आपका जन्म हिंदी के प्रोफेसर और विद्वान के घर हुआ। लेकिन अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। आज आप हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री हैं। अंग्रेजी पढ़ने का क्या कारण था। घर-परिवार का दबाव या अंग्रेजी का आकर्षण?

अनामिकाः अंग्रेजी सूत्रधार भाषा तो है ही जिसमें प्रायः सारा विश्व साहित्य उपलब्ध है। मैंने अंग्रेजी के आकर्षण के कारण नहीं बल्कि विश्व साहित्य में रुचि के कारण अंग्रेजी में एमए करने का निर्णय किया। उस समय लगभग हर बड़े शहर में पीपुल्स पब्लिकेशन हाउस (पीपीएच) की किताबें बिकने के लिए आती थीं। उन्हें पढ़ने के बाद मेरे मन में विश्व साहित्य के प्रति प्रेम जगा, उसी समय यह विचार मन में आया कि अंग्रेजी पढ़ने से विश्व के उम्दा साहित्य का अध्ययन आसान हो जाएगा। शादी के बाद पटना विश्वविद्यालय से पीएचडी की। बड़ा बेटा उत्कर्ष गोद में था जब हम दिल्ली आए। पति ने बत्रा अस्पताल का कार्डियोलाॅजी विभाग ज्वाइन किया और मुझे सत्यवती काॅलेज में नौकरी मिली, तब से वहीं अध्यापन कर रही हूं। इसके पहले कई काॅलेजों में अस्थायी तौर पर अध्यापन किया। 1992 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रो. मीनाक्षी मुखर्जी के निर्देशन में पोस्ट डाॅक्टरल किया। 

हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री अनामिका। फोटो साभार

प्रश्नः हिंदी साहित्य में कब और कैसे रुचि उत्पन्न हुई?

अनामिकाः चूंकि घर में हिंदी का माहौल था,मां और पिताजी जी दोनों साहित्यकार थे,इसलिए  कविता, कहानी और नाटक मेरे बचपन से संगी-साथी थे। जब मैं आठवीं में पढ़ती थी, उस समय मेरी पहली कविता ‘चांदनी’ पटना से निकलने वाली ‘किशोर’ प़ित्रका में प्रकाशित हुई। अगले साल एक कविता कादम्बिनी में प्रकाशित हुई। जब मैं इंटरमीडिएट में थी तो जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखी सारिका में मेरी कहानी ‘इमारत की पायेदारी’ छपी। एमए में जब थी तो ‘पर कौन सुनेगा’ नामक उपन्यास वाणी प्रकाशन से छपा और ‘‘मन कृष्णः मन अर्जुन’’ नामक दूसरा उपन्यास साहित्य रत्नालय कानपुर से। पिताजी के साहित्यकार होने के कारण प्रकाशक घर आते-जाते रहते थे तो छात्र जीवन में ही अनुरागपूर्वक उन्होंने मेरे कुछ कविता संकलन भी छापे,जिनकी अच्छी समीक्षाएं भी छपी। 

  • "स्त्री लेखन और विमर्श से न केवल महिलाओं की समस्या कम हई है बल्कि पुरुष व्यवहार में भी अंतर आया है।"
  • "आज प्रेम और मृत्यु सहज नहीं रह गए हैं। अब पहले जैसा प्रेम ढूंढना और प्रेम कविता रचना मुश्किल है।"

प्रश्नः आपने कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, अलोचना, विमर्श और अनुवाद जैसी हर विधा में अपनी लेखनी चलाई है। लेकिन आपकी सबसे प्रिय विधा क्या है

अनामिकाः कविता मुझे ज्यादा प्रिय है, कविता सहज  फूटती है।

प्रश्नः आपकी अधिकांश कविताएं स्त्री समस्याओं पर केंद्रित हैं। इसके साथ ही आपकी कविताओं में स्त्री समस्याओं को उभारा तो गया है लेकिन उसमें कोई समाधान नहीं दिखता है?

अनामिकाः घर-परिवार,मुहल्ले और छात्रावास में भी स्त्रियों से अंतरंग बातचीत का मौका ज्यादा मिला इसलिए अपने लेखन में उन्हीं की बात ज्यादा कर पायी। पुरुषों के साथ एक मध्यवर्गीय लड़की कहां और कितना रह पाती है। यह बात सही है कि देश और समाज में बहुत समस्याएं हैं, लेंस से देखने पर युद्ध,सांप्रदायिक तनाव,विस्थापन,पर्यावरण,जाति और नस्ल भेद जैसी उभयनिष्ठ समस्याएं भी एक अतिरिक्त आयाम पा जाती हैं। 

कविताओं या साहित्य से समाधान कितना होगा, इस पर मैं इतना कहूंगी कि,पौघे लगाए चलिए,बीज छिड़कते चलिए तो कभी-न-कभी शहर की फिजां बदलकर रहेगी, पर बीज मौन भाव से ही छिड़का जाता है! पौधा लगाते समय आदमी पौधे और मिट्टी में भी लीन रहता है।कविता जहां खत्म होती है, वहीं से पाठकों के साथ एक मौन संबंध बनना शुरू होता है। लेखन शुरुआत तो कर देता है लेकिन समाज उसे आगे बढ़ाता है। आज साहित्य और समाज के दो महाप्रमेय ढह गए हैं। भक्तिकालीन ईश्वर मर चुका है और मार्क्सवाद कोई असर नहीं दिखा पाया। भक्ति साहित्य के समय ईश्वर जीवित था इसलिए उस समय उद्बोधन भर कर देने के बाद मान लिया जाता था कि अब न्याय मिलेगा। साहित्य में एक समय मार्क्सवाद का वर्ग संघर्ष आया। यह माना गया कि वर्ग संघर्ष से सब समस्याएं समाप्त हो जायेंगी। लेकिन अतिवादी सरलीकरणों से बचते हुए संवादधर्मी जनतांत्रिक मूल्यों के साथ स्त्रीवाद सबको एक चटाई पर बिठाने की कोशिश कर तो रहा है,पर इशारतन।     

प्रश्नः क्या स्त्री विमर्श और लेखन की वजह से महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन हुआ है

अनामिकाः बिना मांगे स्पेस मिलता कहां है- लगातार बोला-लिखा गया,तभी महिलाओं के लिए दिनोंदिन स्पेस बढ़ रहा है। मन की पीर पहले आपस में ही बतियायी जाती थी। स्त्री-विमर्श ने वैयक्तिक यात्राओं का सामाजिक संदर्भन शुरू किया तो सारा कहा-सुना-सोचा हुआ कागज पर दर्ज हुआ और तब शुरू हुए उस पर व्यापक विचार-विमर्श। संवेदनशील पुरुषों ने आत्म -परिष्कार भी किया,रूढ़ियां टूटीं,कानून बदले। सती प्रथा समाप्त हुई तो बाल विवाह कम हुआ है, आज सिर्फ स्त्री ही स्त्री लेखन नहीं कर रही ? बल्कि कई पुरुषों का लेखन और दूसरे स्तरों पर समर्थन मिल रहा है।बहुत सारे लड़के-लड़कियां फेसबुक पर स्त्री चेतना वाली कविताएं लिख रहे हैं। यह स्त्री लेखन और विमर्श का ही परिणाम है कि आज ढेर सारे लोग अपने नाम में मां-पत्नी का नाम जोड़ रहे हैं।   

  • "हम सहकारिता मूलक समाज से प्रतिस्पर्धामूलक समाज बन गए हैं।"
  • "हर पुरस्कार चयन समिति की प्रक्रिया की वीडियोग्राफी होना जरूरी।"

प्रश्नः पहले जब साहित्य में कम महिलाएं थीं तो एक से एक कालजयी रचनाएं आईं। आज जब साहित्य में महिलाओं की संख्या बढ़ी है तो वैसी  रचनाएं नहीं आ रहीं हैं। इसका क्या कारण मानती हैं?

अनामिकाः विरेचन का समाजशास़्त्रीय महत्व तो है,पर हर विरेचन साहित्य नहीं बनता। आज साहित्य का जनतांत्रीकरण हुआ है, हर तरह का लेखन आ रहा है। पर जो श्रेष्ठ है वह विश्वस्तरीय भी है। विश्व-साहित्य अंतर्जाल पर उपलब्ध होने के कारण अंतःपाठीय गपशप की परम्परा भी बढ़ी है। 

प्रश्नः साहित्य में तो महिलाओं का स्वतंत्र हस्तक्षेप बढ़ा है। लेकिन राजनीति में उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं देखने को मिलता है। आप इसका क्या कारण मानती हैं?

अनामिकाः सिर्फ राजनीति ही नहीं सिनेमा, खेल, व्यापार और कॉरपोरेट में आज भी पुरुष प्रभुत्व ही है। आज भी उद्दंडअहंकारी और सामंती मानसिकता वाले पुरुष स्त्रियों को सिर्फ गुड़िया समझते हैं और पेप्सीकोला की एक बोतल! आज भी ‘कास्टिंग काउच’ की शर्तें रखी जाती है,देह का इस्तेमाल सीढ़ी के रूप में करने का  मशविरा दिया जाता है। देह की रिश्वत मांगी जाती है तो क्यो? इसी पूर्वग्रह के चलते तो कि तुम और किस लायक हो,अंकशायिनी बनोगी तो कृपापूर्वक एक अवसर देंगे। जैसे दुम हिलाने पर कुत्ते को रोटी फेंकी जाती है वैसे ही सहज मानवीय अधिकार कृपापूर्वक बरसाने की हिमायत की जाती है।       

प्रश्नः स्त्री विमर्श दूसरे विमर्शों मसलन दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्यकों के विमर्श और आंदोलनों से क्यों नहीं जुड़ पाया? 

अनामिकाः ऐसा नहीं है। स्त्री विमर्श हमेशा दूसरे भगिनी आंदोलनों के साथ चला है।  

 प्रश्नः हिंदी समाज में पुरस्कार और प्रोत्साहन हमेशा से विवादों में घिरा रहा है। अभी हाल ही में आपको भी इसका सामना करना पड़ा। ऐसा क्यों होता है?

अनामिकाः हिंदी भाषा,साहित्य और समाज ने बहुत अनादर झेला है। सबके भीतर कामना होती है कि मुझ पर ध्यान दिया जाये। यह स्वाभाविक है पर इसमें एक गलत बात यह हुई है कि हर व्यक्ति खुद को घुड़दौड़ का घोड़ा समझने लगा है। कुछ बाजार का भी असर है। हम सहकारितामूलक समाज से प्रतिस्पर्धामूलक समाज बन गए हैं। अब हमारा समाज दूसरे की खुशी से खुश नहीं होता। एक को पुरस्कार मिलने का मतलब पचास को नहीं मिलना भी है। छूटे हुए लोग आनी-बानी बोलेंगे ही और सोशल मीडिया पर राग द्वेष-पीड़ित टिप्पणियां भी आएंगी। इस विवाद से बचने का सुगम उपाय यह है कि हर स्तर पर चयन समिति में घटित मत-विमत की वीडियोग्राफी हो। किसने क्या कहा, क्या तर्क दिए - सब सार्वजनिक हो। चयन प्रक्रिया इतनी गुप्त रखने की जरुरत क्या है? और एक बात अभ्यर्थियों के लिए भी समझनी जरूरी है कि ‘स्व’ का घेरा इतना तंग रखने की जरुरत क्या! किसी की खुशी में इतना धुआं नहीं छोड़ना चाहिए कि सब खुशी हवा हो जाये।    

प्रश्नः आज अखबारों से साहित्य सिमटता जा रहा है। आप इसका क्या कारण मानती हैं

अनामिकाः आज हिंसा और प्रतिस्पर्धा में लोगों की रुचि बहुत बढ़ गयी है। साहित्य मानवीय पक्ष उभारता है। साहित्य ‘तुमुल कोलाहल-कलह में हृदय की बात’ कहने का विकट उपक्रम है। अखबारों में विश्व साहित्य की चुनी हुई छोटी रचनाएं रोज आनी चाहिए।

प्रश्नः  प्रेम को आप किस रूप में देखती हैं?

अनामिकाः प्रेम और मृत्यु विराट अनुभव हैं। दोनों में किसी का मनुष्य नजदीक से अनुभव कर ले तो उसकी सारी संकीर्णताएं और दीवारें टूट जायेगी। आज का नवयुवक अनिश्चितताओं के बीच से गुजर रहा है। आज संबंध और नौकरी -दोनों अस्थायी अनुबंध हो गए हैं। पानी की लहरों पर जैसे दो दीप या दो कदली -स्तंभ कुछ देर सटकर साथ बह लेते हैं,वैसे ही युवक-युवतियां भी कुछ देर साथ बहकर हवा के थपेड़ों से इधर-उधर हो जाते हैं। हां, एक बात अच्छी यह हुई है कि प्रेम टूटने पर भी कइयों में दोस्ती बनी रहती है- ‘पार्ट ऐन फे्रण्ड्ज’ एक नया मुहावरा है। पहले संबंध टूटते थे तो गहरी दीवार उभर आती थी या अजब-सी तिक्तता! मेरी  अपनी एक छात्रा के शब्दों में- ‘‘वी हैव लंर्ट  टु टेक थिंग्ज इन आॅवर स्टाइड’। शहर सिखाने कोतवाली!   

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Debojyoti Lahiri :: - 04-27-2018
I am stunned and impressed to read.the entire conversation. अति सुंदर मनोभाव साहित्य के स्तभो से निकली एक सुनहरा हितकारी विचार। मोहित हो उठा मेरा मन पढ कर।मै तो अनायास ही लेखिका कै शब्दो के जाल मे जैसे खो गया ।

Debojyoti Lahiri :: - 04-27-2018
I am stunned and impressed to read.the entire conversation. अति सुंदर मनोभाव साहित्य के स्तभो से निकली एक सुनहरा हितकारी विचार। मोहित हो उठा मेरा मन पढ कर।मै तो अनायास ही लेखिका कै शब्दो के जाल मे जैसे खो गया ।

Ajit Kumar Verma :: - 10-10-2017
Anamika Ji you are fondly remembered by my father Dr. S.N.Prasad.He rates you as of his best students.