एक बुरी औरत की कहानी

विशेष , , बृहस्पतिवार , 08-03-2018


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महिला दिवस पर विशेष

मुकुल सरल की कविताएं...

 

एक बुरी औरत की कहानी


वो बुरी है

बहुत बुरी


इतनी बुरी 

कि उसकी सोहबत में

अच्छे-अच्छे 

हुए जा रहे हैं बुरे

रच रहे हैं कविता

कह रहे हैं कहानी

गा रहे हैं गीत


लड़ रहे हैं कि लड़ाई ख़त्म हो

और उसके होठों पर हँसी आए

छान रहे हैं समंदर

ताकि उसे मीठा जल पिला सकें

काट रहे हैं पहाड़/ पाट रहे हैं खाइयां

कि वो आसानी से आ-जा सके

साफ कर रहे हैं रास्ते 

कि कहीं कांटा न चुभ जाए


रात को धकेल रहे हैं

दोनों हाथों से

कि जल्दी सुबह हो

और मुलाक़ात हो


औरतें उसकी नाप की 

सिल रही हैं सुंदर पोशाकें

आदमी पका रहे हैं

तरह-तरह के पकवान


बच्चे चुन रहे हैं फूल

उसके बालों में सजाने के लिए


फिर भी...

वो इतनी बुरी है 

कि उसकी परछाई से ही 

डरते हैं ‘अच्छे लोग’


‘अच्छी औरतें’

अपने मर्दों को 

खींच रही हैं उससे दूर

‘अच्छे मरद’ भी नहीं चाहते

उनकी औरतों पर पड़े 

उसकी छाया 


वो औरतों को सिखाती है  लड़ना

आदमियों को सिखाती है   प्रेम

रोते बच्चे चुप हो जाते हैं 

उसकी गोद में आकर


उसे कैसे अच्छा कहा जा सकता है?


उसका अपना जीवन ही

भरा है दुखों से

दरहम-बरहम

ख़ानाबदोश...

फिर भी गाती है 

ख़ुशी के गीत


उसके मरद ने छोड़ दिया है उसे

फिर भी खड़ी है डटकर


नहीं मानती ज़माने का दस्तूर


पढ़ती है कुफ़्र

जाती है जुलूसों में

करती है नारेबाज़ी


रचती है प्रेम कविता


उसकी सूरत है 

बिल्कुल अपने जैसी


कितनी बुरी है वो

सोचती है

सबके अच्छे के बारे में


इतनी बुरी 

कि मैं भी चाहता हूं

कि हो जाऊं

उसके जैसा बुरा


प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार

 

क़द


पांच फुट चार इंच

पांच फुट छह इंच

नहीं... नहीं...

उसका क़द तो 

मुझसे भी ऊंचा है


अब आप कहेंगे 

एक औरत का क़द

आदमी से ऊंचा 

कैसे हो सकता है?


मुझे लगता है

वो ऊंची एड़ी की सैंडिल पहनती है!

पर.... 

 

पर मैंने तो हमेशा उसे 

सपाट चप्पल ही दिलवाई हैं

ज़मीन से लगती हुई

बेहद हल्की

(अलबत्ता मेरे जूते 

काफी ऊंचे और भारी हैं)

 

नहीं...नहीं

वो कोई जादू भी नहीं जानती

न ही भगवान को मानती है

जो उसे कोई वरदान मिला हो


हां, वो घर और बाहर 

हर मोर्चे पर 

मुझसे आगे है

पर इससे क्या फर्क पड़ता है...?

क्यों…?


नहीं...नहीं...!

वो पंजों के बल भी खड़ी नहीं होती

हां..., वो मेरे आगे कभी

घुटनों के बल भी नहीं झुकी

शायद


शायद यही वजह...


प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

 

हिलने लगी हैं दीवारें


बड़की ने 

आंसू पोंछे

और खोल दिया तोते का पिंजरा


मंझली

छटपटाकर उठी

और भाई के हाथ से तोड़ दी

पतंग की डोर


छुटकी ने

कमर सीधी की

और पहली बार नापी

बाप से लंबाई

...

 

गांव में पहली बार 

किसी दुल्हन ने 

लौटाई है बारात


पहली बार गिरी है

ज़मींदार के खेत पर बिजली


पहली बार चितकबरी ने 

मारा है ग्वाले को सींग

...

 

गांव में है सनसनी

हुई है अनहोनी

बैठ गई है पंचायत

चौधरी भी कर रहे हैं स्यापा


हर तरफ है चर्चा

बड़की-मंझली-छुटकी का

 

कैसी निर्लज्ज!

मां की मौत पर भी 

न निकले दो आंसू


काना तांत्रिक

साध रहा है बुरी आत्माएं

यज्ञवेदी पर बैठाई गईं हैं 

तीनों लड़कियां

 

काने को चाहिए

उनका रक्त, बाल और नाख़ून


लंगड़ा पहलवान

ख़म ठोंक रहा है

तीनों बहनों से ब्याह का

...

 

यज्ञ ज्वाला भड़क रही है

आहुतियों के साथ

तेज़ होता जा रहा है 

मंत्रों का स्वर

 

जिस्मों के बोझ तले 

दब गई हैं

बड़की

मंझली

छुटकी की चीख़ें


अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई है

मां की अंत्येष्टि

...

 

...खोजी जा रही हैं 

खिड़कियां/ रौशनदान

बंद कर दिए गए हैं दरवाज़े

लेकिन हिलने लगी हैं दीवारें


(कविता संग्रह “उजाले का अंधेरा” से)






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