निठारी... यह रूह के ज़ख़्म हैं, न दिखायी देते हैं न भरते हैं

सत्यकथा , अंतिम किस्त, बृहस्पतिवार , 10-08-2017


story-based-on-nithari-scandal-final-episode

निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5

10वीं और अंतिम किस्त

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

निठारी रोड, नोएडा। फोटो साभार : गूगल 

निठारी बस्ती के लोग दोपहर में चबूतरे पर जमघट लगाये बैठे थे, एक दूसरे का गम और दर्द बांटने के लिए। उनके बच्चे गायब थे, तो उनके लौटने की उम्मीद थी, एक आस थी। अब नाले और डी-5 से अपने प्यारों की हड्डियां निकलता देख आशा ने मातम और गुस्से का रूप ले लिया था। उनके सामने उनके बच्चों के कातिल -मोनिंदर और सुरेन्द्र- थे। लेकिन कातिलों के मकसद को अब भी वे पूरी तरह से समझ नहीं पाये थे।

आखिर ये लोग कत्ल क्यों कर रहे थे?’ सुभाष पाल ने मालूम किया।

सेक्स मैनियक हैं,’ पप्पू लाल ने जवाब दिया।

नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता कि मोनिंदर और सुरेन्द्र सीरियल किलर, सायकोपैथ या सेक्स मैनियक हैं,’ झब्बू लाल बोला।

तू ऐसा कैसे कह सकता है, बच्चों को उठा रहे हैं, उनके साथ दुष्कर्म कर रहे हैं और फिर उनको टुकड़े-टुकड़े करके नाले में फेंक रहे हैं। यह सब एक सीरियल किलर या सायकोपैथ ही कर सकता है,’ पप्पू लाल ने समझाने की कोशिश की।

भई, जितना मैंने टीवी पर सुना है उससे एक बात साफ हो जाती है कि सीरियल किलर हमेशा एक ही किस्म का शिकार बनाता है। अभी पीछे मैं हिस्ट्री चैनल पर जैक द रिपर देख रहा था, वह सिर्फ जवान वेश्याओं को ही अपना शिकार बनाता था,’ झब्बू लाल बोला।

अबे इस मामले में भी तो बच्चों को ही ये दरिंदे अपना शिकार बना रहे थे,’ सुभाष पाल झब्बू लाल को बीच में टोकते हुए बोला।

चाचा पूरी बात तो सुन लिया करो,’ झब्बू लाल बोला।

तेरी बेटी ज्योति, अनिल हलधर की रिम्पा, पप्पू लाल की बेटी रचना, जेम्स की बेटी निशा और कितनी गिनवाऊं सारी नौ-दस साल की लड़कियां, उन्हें ही इन दरिंदों ने अपना शिकार बनाया। ये सीरियल किलर नहीं तो और क्या हैं?’ सुभाष पाल ने अपना तर्क रखा।

चाचा तुम एक ही तरफ की चीजों को देख रहे हो,’ झब्बू लाल बोला।

वो कैसे? तू ही समझा दे,’ इस बार अनिल हलधर बोला।

अब तुम मुझे बोलने दो जब ही तो बताऊं,’ झब्बू लाल ने अपनी बात पूरी करने की कोशिश की।

कौन रोक रहा है बोल भई बोल,’ सुभाष पाल बोला।

मोनिंदर और सुरेन्द्र ने हमारे बच्चों के साथ-साथ क्या तीन साल के हर्ष, बीस साल की मधु, 26 साल की पायल, 32 साल की नंदा देवी , 61 साल के चेचन मलिक वगैरह-वगैरह को नहीं कत्ल किया,’ झब्बू लाल बोला।

हां, ये बात तो तेरी सही है,’ सुभाष पाल ने सहमति व्यक्त की।

अपने पिता चेचन मलिक का नाम सुनकर अब तक खामोश बैठी हज़ारी ने सुभाष पाल की बात पूरी होने से पहले ही बोलना शुरू कर दिया, ‘मेरे पिता दो साल पहले नोएडा आये थे। वे नोएडा की सड़कों को खूब पहचानते थे लेकिन उन्हें तम्बाकू की लत थी और अनजान व्यक्तियों से भी तम्बाकू मांग बैठते थे। मेरी 11 साल की बेटी ज्योति ने उन्हें डी-5 के बाहर सुरेन्द्र से बात करते हुए देखा था। उसके बाद उन्हें नहीं देखा गया। मैंने रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने रिश्वत मांगी। लेकिन उस दिन जब सेक्टर-20 के पुलिस स्टेशन में डी-5 से मिले सामान की शिनाख्त हो रही थी तो मैंने अपने पिता का स्वेटर भी उसमें देखा। सुरेन्द्र तो मेरी बेटियों के पीछे भी पड़ा था। एक दिन जब मेरी दोनों बेटियां डी-5 के सामने से जा रही थीं तो उसने उनसे कहा कि कन्या पूजा है, घर में आ जाओ, अंदर एक बूढ़ी औरत भी है जो पूजा करेगी और तुम्हें खाने को भी देगी। लेकिन सुरेन्द्र जिस अंदाज़ से मेरी बेटियों को देख रहा था उन्हें वह अच्छा नहीं लगा और वे आगे बढ़ गयीं।

शायद उनकी किस्मत में बचना था। हां, तो मैं कहना यह चाह रहा हूं कि डी-5 में तीन साल से लेकर 61 साल के बुजुर्ग तक की हत्याएं हो रही थीं और न जाने उनके साथ क्या-क्या हो रहा था। इसका सीधा सा मतलब ये है कि यह साजिश के तहत हो रहा था न कि दिमाग खराब व्यक्ति सीरियल किलिंग कर रहा था,’ झब्बू लाल बोला।

साजिश? कैसी साजिश हो सकती है?’ पप्पू लाल ने पूछा।

नहीं, साजिश मैं गलत कह गया। ये कारोबार कर रहे थे,’ झब्बू लाल बोला।

कारोबार। अंगों का कारोबार,’ पप्पू लाल ने आश्चर्य व्यक्त किया।

जहां तक मैं समझा हूं, कारोबार बहुत लम्बा-चौड़ा है और अकेले निठारी तक सीमित नहीं है,’ झब्बू लाल बोला।

जो कुछ बातें छनकर आ रही हैं उनसे लगता ये है कि ये बहुत बड़ा कारोबार है,’ झब्बू लाल बोला।

वो तो ठीक है लेकिन कारोबार है क्या?’ सुभाष पाल ने फिर पूछा।

इतने में जेम्स थापा भी उधर आ गया और बस्ती के लोगों के वार्तालाप में वह भी शामिल हो गया।

मुझे लगता है कि बच्चों को अगवा करने के बाद पहले तो उनसे जिस्मफरोशी का धंधा कराया जाता होगा,’ झब्बू लाल बोला।

हां, ये हो सकता है बड़े-बड़े लोग डी-5 में रात के अंधेरे में अपनी गाड़ियों पर काला शीशा चढ़ाकर घुसते थे। वे देर रात तक वहां रहते थे। जाहिर है मौजमस्ती के लिए वहां रहते होंगे, शराब पीते होंगे और हमारे बच्चों से....जेम्स थापा बोलता हुआ फफक-फफककर रोने लगा।

साले, बच्चों की ब्लू फिल्में भी बनाते होंगे। आजकल इंटरनेट पर ये भी तो बहुत बड़ा धंधा है,’ पप्पू लाल बोला।

अरे मैंने सुना है कि मोनिंदर साल में दस बार तो बाहर मुल्कों में जाता है। इसी काम के लिए जाता होगा ब्लू फिल्में बेचने के लिए,’ अनिल हलधर बोला।

दरअसल, सड़क पर चलता हुआ गरीब का बच्चा तो इन दरिंदे व्यापारियों को 15 लाख रुपये नज़र आते होंगे,’ पप्पू लाल बोला।

अरे हर शहर में कोठी-बंगले ऐसे ही कोई बन जाते हैं। इतने शहरों में तो टाटा-बिड़ला के भी मकान नहीं हैं जितनों में इस पंधेर के हैं,’ अनिल हलधर बोला।

अब से चार साल पहले तक तो पंधेर कौशाम्बी में दो कमरों के फ्लैट में ही रहता था। इतना पैसा इन्हीं काले धंधों से आया होगा,’ जेम्स थापा बोला।

और जगह के मकान भी वेश्यावृत्ति और ब्लू फिल्में बनाने के काम में आते होंगे, वरना जिस आदमी के सिर्फ एक बेटा है और पत्नी से बनती नहीं उसे देश के हर शहर में मकान क्यों चाहिए,’ सुभाष पाल बोला।

अरे अवैध काम कराने को और काहे को,’ अनिल हलधर बोला।

देखो, ये लोग सिर्फ गरीब बच्चों और औरतों को अपना शिकार बना रहे थे। किसी रईस या असरदार व्यक्ति के बच्चे औरत पर इन्होंने हाथ नहीं डाला। इससे ज़ाहिर है कि ये मानसिक विकृति नहीं है बल्कि इंसानी लाशों पर ये मोटी कमाई कर रहे हैं,’ झब्बू लाल बोला।

इसी कमाई में से पुलिस को भी बराबर हिस्सा देते होंगे जब ही तो हम लोगों की रिपोर्टें लाख कोशिशों के बावजूद भी दर्ज नहीं की गयीं,’ जेम्स थापा बोला।

भाइयो, अब बात समझ में आ रही है। पंधेर और कोली ने जानबूझ कर गरीबों को ही अपना निशाना बनाया क्योंकि हम लोग न तो राजनीतिक दबाव डलवा सकते हैं और न ही अखबार और टीवी वाले हमारी तरफदारी कर सकते हैं। अब एडोब के मालिक का लौंडा गुम हुआ तो पांच दिन में ही पुलिस ने ढूंढ़ लिया क्योंकि वह पैसे से मजबूत था,’ सुभाष पाल बोला।

यही तो मैं तुमसे कहने की कोशिश कर रहा हूं कि पंधेर सीरियल किलर या मानसिक विकृत नहीं है बल्कि ऐसा कारोबारी है जो जानता है कि कहां से अपना माल उठाना है और कहां वह फंसेगा नहीं,’ झब्बू लाल ने अपनी पुरानी थ्योरी को बल देते हुए कहा।

तो इसका मतलब है कि दूसरे शहरों में भी ये हम जैसे गरीब व असहाय लोगों को निशाना बनाते होंगे?’ जेम्स थापा ने पूछा।

अरे, जहां जहां इस पंधेर की कोठी है वहीं से लोग गायब हैं और वह भी गरीब, असहाय बच्चे और औरतें,’ पप्पू लाल बोला।

हां, मैंने सुना है देहरादून में भी पिछले एक साल के दौरान 12 बच्चे गायब हैं,’ जेम्स थापा ने जानकारी दी।

अरे इसी पंधेर की हरकत होगी इसका दफ्तर भी तो है देहरादून में,’ अनिल हलधर बोला।

रसूखदारों को अय्याशी कराना और ब्लू फिल्में बनाकर बेचना तो समझ में आ रहा है। पंधेर के घर से वेबकैम, लैपटॉप, सीडी वगैरह के मिलने से ये साबित भी हो जाता है। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि मासूमों की हत्या क्यों की?’ जेम्स थापा ने मालूम किया।

पहली बात तो यह है कि इन लोगों की काली करतूतों का राज़ फाश न हो। फिर जिस्म के अंग भी बेचते होंगे,’ झब्बू लाल बोला।

लेकिन एम्स के डॉक्टरों ने पोस्टमार्टम के बाद कहा है कि अंगों का व्यापार नहीं प्रतीत होता,’ पप्पू लाल बोला।

लेकिन नोएडा के सिविल अस्पताल ने तो कहा था कि इतने बड़े पैमाने पर हत्याओं और जिस डॉक्टरी कौशल से हत्याएं की गयीं, उसका मकसद अंग व्यापार हो सकता है,’ झब्बू लाल बोला।

हो सकता है भई, कुछ भी हो सकता है। अभी पिछले दिनों मैंने अखबार में पढ़ा कि फरवरी 2005 में बनारस के लोहता कस्बे का बबलू उर्फ शकील नामक आठ साल के बच्चे का अपहरण किया गया था और नोएडा की डी-5 कोठी के आसपास से ही अपहर्ताओं ने पांच बार फोन करके कहा कि पांच लाख की फिरौती दे दो नहीं तो बच्चे की किडनी निकालकर बेच देंगे। फिर शकील अपहरण कांड की जांच नोएडा के तत्कालीन एसएसपी पीयूष मोडिया और तत्कालीन डीएसपी सेवकराम यादव के इशारे पर रोकी गयी,’ सुभाष पाल ने जानकारी दी।

साले अंग तो जरूर बेचते होंगे, सबके नहीं तो कम से कम उनके जिनके काम के होंगे,’ अनिल हलधर बोला।

और हां, जब से ये मामला खुला है तब से पंधेर का पड़ोसी डॉक्टर नवीन चौधरी भी तो गायब है,’ पप्पू लाल बोला।

वही डॉक्टर नवीन चौधरी जिसका कुछ समय पहले किडनी बचेने में नाम आया था?’ जेम्स थापा ने मालूम किया।

हां वही,’ पप्पू लाल ने सहमति व्यक्त की।

देखो बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। ये साले हमारे बच्चों का गोश्त अपने मेहमानों को खिलाते होंगे और विदेशों में सप्लाई भी करते होंगे,’ झब्बू लाल बोला।

हो सकता है। कुछ टाइम पहले नोएडा के एक होटल को मानव मांस परोसते हुए भी तो पकड़ा गया था,’ अनिल हलधर बोला।

यह तो मुझे याद नहीं लेकिन अखबारों में मैंने यह फोटो जरूर देखा था कि थाइलैंड के एक होटल में एक आदमी छुरी-कांटे से मानव भ्रूण खा रहा था,’ जेम्स थापा ने जानकारी दी।

ये भी साले जरूर मांस बेचते होंगे। ये दरिंदे पैसे कमाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं,’ अनिल हलधर बोला।

नाले में से जो हड्डियां मिलीं उन पर मांस था ही कहां। कब्र में भी मुर्दे का पूरा मांस समाप्त होने में तीन-चार साल लगते हैं। इससे तो लगता है कि मांस उतारकर बेचा या खाया गया है वरना नाले में खालिस हड्डियां नहीं मिलतीं,’ जेम्स थापा ने तर्क दिया।

नहीं, ये भी हो सकता है कि मांस किसी केमिकल के जरिए जला दिया गया हो, दबा दिया गया हो ताकि बदबू न फैले,’ पप्पू लाल बोला।

अरे दबाना ही होता तो हड्डियां भी दबा दी जातीं,’ अनिल हलधर बोला।

दबाना तो संभव नहीं था। इतनी सारी कब्रें ये कैसे बनाते और कहां बनाते,’ सुभाष पाल बोला।

लेकिन अजीब बात तो यह है कि हड्डियां महीनों बल्कि सालों नाले में पड़ी रहीं और आसपड़ोस के लोगों को ज़रा भी बदबू नहीं आयी, न ही कुत्तों ने हड्डियों को नाले से बाहर खींचा। हद तो यह है कि पंधेर का पड़ोसी सुरेन्द्र सिंह चैहान जिसकी कोठी, डी-5 के पिछवाड़े बनी चारदीवारी से बिल्कुल सटी हुई है, उसने या उसके परिवार वालों ने कभी भी मोनिंदर की कोठी में न तो किसी तरह की आवाज सुनी और न ही कभी कोई बदबू ही आयी जिससे उन्हें किसी तरह का कोई शक होता,’ जेम्स थापा ने सवाल किया।

अरे, अपना झब्बू लाल भी तो वहीं पास में ठेला लगाता है। उसने भी कभी कुछ महसूस नहीं किया, हालांकि सुरेन्द्र अक्सर उसके पास कपड़े प्रेस कराने आता था, हफ्ते में कम से कम एक बार तो जरूर आता था,’ पप्पू लाल बोला।

मुझे क्या किसी को भी कुछ पता नहीं था। हां, शक जरूर था। अब डी-5 से थोड़ी दूरी पर धरमेन्दर की परचून की दुकान है, नीचे उसकी दुकान है और ऊपर रहता है। सुरेन्दर वहां से भी दूध और अंडे लाता था लेकिन उसकी बातचीत से धरमेन्दर को भी कभी कोई शक नहीं हुआ, जबकि उसके घर से मोनिंदर का टेरेस साफ-साफ नज़र आता है। सुरेन्दर तो धरमेन्दर की पांच साल की बेटी को भी पहचानता था, लेकिन साले ने मेरी बेटी ज्योति को मार दिया,’ झब्बू लाल ने रोते हुए कहा।

भई, शक होता भी कैसे? तीन-तीन पॉलीबैग में कंकाल बांधकर अगर फेंके जाएंगे तो बदबू कहां से आयेगी। फिर पंधेर ने तकरीबन नाले के ऊपर ही तो अपना शेफ्ट बना डाला तो आवारा कुत्ते नाले में जाते किधर से,’ पप्पू लाल ने तर्क दिया।

भई, ये बातें तो सारी समझ में आ गयीं लेकिन हमें इंसाफ मिलेगा कैसे?’ सुभाष पाल ने बात को नया रुख देते हुए सवाल रखा।

न्याय के नाम पर पांच लाख रुपये और 26 गज़ का प्लॉट तो दे दिया है,’ जेम्स थापा बोला।

यह इंसाफ नहीं हमारा मुंह बंद करने की कोशिश है। हमें तो अपने बच्चों को इंसाफ दिलाना है वरना परलोक में हम उन्हें क्या मुंह दिखायेंगे कि हमने उनकी मौतों का सौदा कर लिया? नहीं, हमें पैसा और प्लाट नहीं अपने बच्चों के लिए इंसाफ चाहिए,’ झब्बू लाल बोला।

बिल्कुल ठीक।

बिल्कुल ठीक, इंसाफ चाहिए,’ सबने एक स्वर में कहना शुरू कर दिया।

नारको एनलिसिस

लेकिन इंसाफ मिलेगा कैसे? पुलिस ने तो नारको टेस्ट में भी लीपापोती की है और पंधेर को बचाने की कोशिश की है जबकि असल मुजरिम वही है,’ जेम्स थापा ने कहा।

नारको टेस्ट तो सीबीआई फिर करा देगी और पंधेर व सुरेन्द्र के अलावा जो हमारे बच्चों की हत्याओं के लिए बाकी लोग जिम्मेदार हैं वे भी गिरफ्त में आ जाएंगे,’ झब्बू लाल बोला।

भई मुझे तो बहुत मुश्किल लग रहा है,’ सुभाष पाल बोला।

वह क्यों?’ अनिल हलधर ने मालूम किया।

पहले तो पुलिस ने पंधेर को इस कांड से साफ निकालने की कोशिश की ताकि सारा इल्जाम सुरेन्द्र पर आ जाए और बाकी सारे सफेदपोश व पुलिस वाले बच निकलें। फिर गाजियाबाद की अदालत में पंधेर को मारने की कोशिश की गयी ताकि बाकी लोगों के राज़ ही न खुल सकें,’ सुभाष पाल बोला।

उसका तो साले का मर जाना ही ठीक था। कम से कम पापी का कलेश तो कट जाता,’ अनिल हलधर बोला।

नहीं, अगर हमें अपने दिवंगत बच्चों से प्यार है और उनकी यादें हमारे दिलों में अब भी मौजूद है तो हमारी कोशिश होनी चाहिए कि इस मामले की तह और सच्चाई तक पहुंचा जाए ताकि हमारे बच्चों को पूरा इंसाफ मिले आधा-अधूरा नहीं,’ झब्बू लाल बोला।

हां, ये बात तो ठीक है, सारे चेहरे बेनकाब होने चाहिएं,’ पप्पू लाल ने अपनी बात रखी।

लेकिन होगा कैसे? नोएडा की पुलिस ने सबूतों से छेड़छाड़ की और अब सीबीआई ऐसी भूमिका बना रही है कि जैसे सुरेन्द्र पागल हो और उसने पागलपन में ही ये सब कुछ किया हो और पंधेर का इसमें कोई रोल ही न हो,’ जेम्स थापा बोला।

भई, हमें ऊपर वाले पर भी भरोसा रखना चाहिए। वह ऐसे ऐसे मामलों में भी इंसाफ दिला देता है जहां उम्मीद की एक किरण भी मौजूद नहीं रहती,’ सुभाष पाल ने उदास होते चेहरों को आश्वस्त करने का प्रयास किया।

यह बात तो है। 1970 में अमरीका के कोलेरेडो शहर में इसी किस्म का केस सामने आया था जिसमें लोकल पुलिस फेल हो गयी थी। लेकिन एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी लाप्स फीडोफीलिया ने इसे तीन माह में सुलझाया। इस मामले में तो हड्डियों की जगह उनका पाउडर ही बरामद हो पाया था,’ झब्बू लाल ने अपनी जानकारी पर ज़ोर देते हुए कहा।

तभी दिवंगत बच्चों व महिलाओं के लिए सर्वधर्म प्रार्थना से सम्बंधित कार्यक्रम के आयोजन के उद्देश्य को लेकर समाजसेवी उषा ठाकुर वहां पहुंचीं। बस्ती के लोगों को उदास व चिंतित देखकर वे बोलीं, ‘घबराने की जरूरत नहीं है। सीबीआई की टीम ब्रिटेन की स्पेशल इनवेस्टीगेशन एजेंसी सहित नाइजीरिया के एडिशनल कमिश्नर एम.ए. बॉथम और अमरीका की लाप्स फीडोफीलिया से मदद ले रही है ताकि निठारी मामले की तह तक पहुंचा जा सके। मुझे ऐसा भी मालूम हुआ है कि मोनिंदर व सुरेन्द्र के अहमदाबाद में जो नारको टेस्ट हुए थे, उनसे सीबीआई सहमत नहीं है और दोबारा उनका नारको टेस्ट कराया जायेगा।

बहन जी, यह नारको टेस्ट होता क्या है?’ अनिल हलधर ने मासूमियत भरे लहजे में सवाल किया।

नारको एनलिसिस सच्चाई उगलवाने के लिए एक तरह का मनोवैज्ञानिक परीक्षण है जिसके ज़रिए आरोपी जिन बातों को छिपाना चाहता है वे निकलकर सामने आ जाती हैं। नारको एनलिसिस कोई नई चीज़ नहीं है, इसकी शुरुआत 1922 में डलास (अमरीका) के जेल में हुई थी। लेकिन इसे अब तक अदालत में स्वीकार्य सबूत नहीं माना जाता है क्योंकि इसमें प्रयोग होने वाली दवाओं के प्रभाव में आरोपी अपनी दबी कल्पनाओं को भी सच्चाई में शामिल कर देता है। बावजूद इसके नारको एनलिसिस को कानून में जांच के हिस्से के तौर पर मान्यताप्राप्त है क्योंकि इस प्रयोग से काफी हद तक आरोपी से सच उगलवाया जा सकता है और उसका झूठ पकड़ा जा सकता है, साथ ही उसे शारीरिक क्षति भी नहीं पहुंचती। वैसे अब सत्य तक पहुंचने के लिए पॉलीग्राफ टेस्ट और ब्रेन फिंगर प्रिंटिंग/मैपिंग भी किए जाते हैं।

प्राचीन समय से ही सच उगलवाने के लिए मानव विभिन्न प्रयोग करता आया है। एक ज़माने में आदमी को शराब पिलाकर नशे में इतना चूर कर दिया जाता था कि वह अपने दिलोदिमाग पर नियंत्रण न रखने की वजह से सच उगलने लगता था। यह काम निजी तौर पर आज भी बहुत जगह होता है। इसी से प्रेरित होकर शराब की जगह कुछ ड्रग्स का इस्तेमाल होने लगा जिसे नारको एनलिसिस कहते हैं। नारको यूनानी भाषा के नारके शब्द से बना है जिसका अर्थ है चेतनाशून्य। इसका प्रयोग मनोवैज्ञानिक उपचार और तफ्तीश करने की तकनीक के तौर पर किया जाता है। इस तकनीक के तहत व्यक्ति को बार्बीट्यूरेट्स ड्रग्स या ट्रुथ सीरम दे दिया जाता है जिससे वह चेतनाशून्य की अवस्था में आ जाता है। ट्रुथ सीरम का असर उस पर 12 से 14 घंटे तक रहता है और इस दौरान उसे इस बात पर नियंत्रण पर नहीं रहता कि वह क्या कह रहा है, नतीजतन सच और जिन बातों को वह राज रखना चाहता है वह सामने आने लगती हैं।

जिस शख्स का नारको एनलिसिस हो रहा होता है उसे जब ट्रुथ सीरम दे दिया जाता है, तो उसमें फैसला लेने और चालाकी करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। लातिन भाषा में एक कहावत है इन वीनो वेरीटासजिसका अर्थ है शराब में सच। जैसा कि ऊपर कहा गया है पहले शराब या अल्कोहल के ज़रिए सच उगलवाया जाता था। लेकिन आज ट्रुथ सीरम के तौर पर सोडियम थायोपैंटाल या सोडियम पेंटोथाल और स्कोपोलामीन का प्रयोग किया जाता है। इस ड्रग से दिमाग का जो उच्च बाहरी (कोर्टिकल) हिस्सा है उसके काम करने की क्षमता कम हो जाती है। इसके पीछे सिद्धांत यह है कि झूठ बोलना सच बोलने से अधिक जटिल प्रक्रिया है। इसलिए जब दिमाग के उच्च बाहरी हिस्से की कार्यक्षमता मध्यम पड़ जायेगी, तो दिमाग की निचली कोर्टिकल गतिविधि व्यक्ति के लिए झूठ बोलना कठिन कर देगी।

यहां यह प्रश्न स्वाभाविक है कि ट्रुथ सीरम कितना प्रभावी है और क्या इसके नतीजे सबूत के तौर पर अदालत में स्वीकार्य हैं? तथ्य यह है कि ट्रुथ सीरम पर विश्वव्यापी बहस जारी है। कोई इसे सही मानता है तो किसी के नजदीक यह सही नहीं है। इसी विवाद के चलते भारत में इसके नतीजे कानून के तहत सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किए जाते। लेकिन जांच एजेंसियां इसके आधार पर अपने तफ्तीश की दिशा तय कर सकती हैं और इसके सहारे मामले की गहराई तक पहुंच सकती हैं।

आदमी जब झूठ बोलता है तो उसकी (घबराहट) नर्वसनेस बढ़ जाती है। इसी अनुमान पर आधारित है पॉलीग्राफ टेस्ट या झूठ पकड़ने की तकनीक। इसके तहत होता यह है कि जब आरोपी से बहुत सारे संबंधित प्रश्न मालूम किए जाते हैं, तो साथ ही उसका ब्लडप्रेशर, दिल की धड़कनें, सांस और त्वचा का स्पंदन मापा जाता है। इनमें सामान्य से अधिक परिवर्तनों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि आरोपी कितना झूठ बोल रहा है।

पॉलीग्राफ टेस्ट की विश्वसनीयता भी विवादित है। दरअसल, पॉलीग्राफ टेस्ट मुख्य रूप से एंग्जायटी के उन संकेतों को मापता है जो झूठ बोलने के दौरान उभरते हैं। लेकिन अगर आरोपी किन्हीं अन्य कारणों से एंग्जायटी दर्शा रहा है या एंग्जायटी के स्तर को उसने जानबूझ कर नियंत्रित कर रखा है, तो निष्कर्ष विश्वसनीय नहीं निकल सकते। सन् 2003 में अमरीका की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ ने कहा था ज्यादातर पॉलीग्राफ शोधों की गुणवत्ता निम्नस्तर की है। अपने देश में अदालतें पॉलीग्राफ टेस्ट के नतीजों को सबूत के तौर पर नहीं स्वीकारतीं।

अमरीका के वैज्ञानिक लॉरेंस फारवेल ने ब्रेन मैपिंग या ब्रेन फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी को विकसित किया था। यह ईईजी/पी300 आधारित टेक्नोलॉजी है जो यह तय करती है कि कोई खास जानकारी व्यक्ति की याद्दाश्त में जमा है या नहीं? यह परीक्षण व्यक्ति के दिमाग की तरंगों को प्रासंगिक शब्दों, तस्वीरों या ध्वनियों की प्रतिक्रियाओं के तौर पर मापता है। प्रासंगिक शब्द, तस्वीरें या ध्वनियां कंप्यूटर के ज़रिए प्रस्तुत की जाती हैं। गौरतलब है कि हमारा दिमाग घटनाओं को यादों के तौर पर स्टोर करता है। इस तकनीक में दिमाग की इस क्रिया को अपराधी और मासूम व्यक्ति के दिमागों में फर्क करने के लिए किया जाता है। अपराधी का दिमाग मौका-ए-वारदात पर हुई घटनाओं को क्रमवार स्टोर कर लेता है जबकि मासूम व्यक्ति के दिमाग में ऐसी कोई यादें नहीं होंगी।

ब्रेन फिंगर प्रिंटिंग तकनीक में वैज्ञानिक आधार पर यह मालूम किया जाता है कि विशेष किस्म की यादें दिमाग में हैं या नहीं। कंप्यूटर के ज़रिए आरोपी के समक्ष अपराध से सम्बंधित शब्द, तस्वीरें, कोड और ध्वनियां प्रस्तुत की जाती हैं। इन प्रेरकों पर दिमाग तरंगों की प्रतिक्रियाएं ईईजी सेंसरयुक्त हेडबैंड के ज़रिए मापी जाती हैं। इस तरह जो डाटा उपलब्ध होता है उससे यह समीक्षा की जाती है कि संबंधित जानकारी याद्दाश्त में मौजूद है या नहीं।

इस तकनीक का पेटेंट डॉ. फारवेल्स ब्रेन फिंगर प्रिंटिंग लेबोरेटरीज़ के पास है और इसका दावा है कि इसका सफलता प्रतिशत बहुत अधिक है। गौरतलब है कि मार्च 2001 में अमरीका की आयोवा जिला अदालत ने अपने एक फैसले में कहा कि ब्रेन फिंगर प्रिंटिंग तकनीक लीगल डाबर्ट स्टैंडर्ड के पैमानों पर खरी उतरती है और इसलिए वैज्ञानिक सबूत के तौर पर इसे अदालत में स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन यह तकनीक अपने देश की अदालतों में फिलहाल स्वीकार्य नहीं हैं।

हालांकि पंधेर और कोली का सिर्फ नारको एनलिसिस, पॉलीग्राफ टेस्ट और ब्रेन मैपिंग ही कराया गया है लेकिन पूछताछ की एक और वैज्ञानिक तकनीक है जिसे फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग या एफएमआरआई कहते हैं। दुनिया भर में यह तकनीक आजकल शोधकर्ताओं की दिलचस्पी का केन्द्र बनी हुई है। बहुत से शोधकर्ताओं का कहना है कि जब आदमी झूठ बोल रहा होता है, तो उसके दिमाग का फ्रंटल लोब एरिया अधिक सक्रिय हो जाता है। एफएमआरआई के ज़रिए दिमाग को स्कैन किया जाता है यह जानने के लिए कि विशेष स्थितियों में उसके कौन कौन से क्षेत्र सक्रिय हुए और इस तरह यह मालूम हो जाता है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है या सच।

जैसे ही उषा ठाकुर ने नारको एनलिसिस व अन्य टेस्टों के बारे में अपनी बात पूरी की, तो सुभाष पाल ने सवाल किया, ‘बहन जी, क्या मोनिंदर व सुरेन्द्र का फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग टेस्ट नहीं कराया जायेगा?’

इसके बारे में तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मृतकों की शिनाख्त के लिए बाकी आधुनिक टेस्ट जैसे डीएनए, स्कल फेस, सुपर इम्पोजिशन टेक्नीक....।

उषा ठाकुर ने अपनी बात पूरी भी न की थी कि पप्पू लाल बोला, ‘बहन जी, ये टेस्ट क्या होता है?’

इस तकनीक के तहत गुमशुदा व्यक्ति का फोटो ले लिया जाता है और जो खोपड़ी मिली होती है उस पर सुपरइम्पोज़ या कंप्यूटर के ज़रिए चढ़ाया जाता है ताकि मृतक की शिनाख्त हो जाए। जिन मृतकों के स्कल या खोपड़ी बरामद नहीं हुई हैं, उनके जबड़े से उनकी पहचान की जायेगी, इसे ओडोंटोलॉजी कहते हैं,’ उषा ठाकुर ने समझाया।

बहन जी, क्या इसके अलावा भी कोई और टेस्ट होंगे?’ जेम्स थापा ने मालूम किया।

हां, कोरपस डीलेक्टि एक टेस्ट है जिसमें कंकाल के अवशेषों से मृतक की पहचान की जाती है। फिर सीरोलॉजिकल टेस्ट है जिसमें शरीर के तरल पदार्थों, टिश्यू, वीर्य, थूक आदि से सेक्स एंगल के सबूत जुटाये जाते हैं। और फोरेंसिक विशेषज्ञों ने डी-5 में मिले चाकू, कुल्हाड़ी व अन्य हथियारों पर से जो उंगलियों के निशान लिये हैं उनसे भी कातिलों के खिलाफ सबूत एकत्र कर लिये जाएंगे,’ उषा ठाकुर बोलीं।

हां, मामला तो बड़ा विचित्र है, कातिल तो सामने है लेकिन सबूत नहीं है। अब शायद ऐसे ही सबूत मिल जाएं,’ सुभाष पाल बोला।

लेकिन बहन जी, प्रशासन ने हमें जो मुआवजा दिया है, उसे पुलिस कह रही है कि हम बैंक से बहुत कमी के साथ उसे निकालें। इसका क्या मतलब है? क्या जो कंकाल मिले हैं, उन पर होने वाले टेस्टों से हमारे बच्चों की गुमशुदगी या हत्या साबित नहीं हुई, तो ये पैसे हमसे वापस ले लिये जाएंगे?’ झब्बू लाल ने बेचैन होकर मालूम किया।

देखो, मामले इतने पुराने हो गये हैं कि सभी मृतक बच्चों व महिलाओं के अवशेष मिलना संभव नहीं है। एक बात को प्रशासन और सीबीआई समझती है और अदालत भी समझेगी। इसलिए मेरी कोशिश रहेगी कि निठारी में जिनके भी अजीज़ गायब हुए हैं उन सबको पर्याप्त मुआवजा मिले चाहे उनके परिजनों के अवशेष सीबीआई के 50 पॉलीबैग, 70 हड्डियों और 20 कंकालों में हों या न हों,’ उषा ठाकुर ने आश्वस्त किया।

बहन जी, बस एक आपका ही सहारा रहा है, उम्मीद है आगे भी आप हम गरीबों की ऐसे ही मदद करती रहेंगी,’ सुभाष पाल ने सबकी ओर से कहा।

अच्छा, तो मैं यह कहने आयी थी कि आप सभी लोग सर्वधर्म सभा में पहुंचें ताकि आपके दिवंगत परिजनों की आत्मा को शांति मिले,’ उषा ठाकुर ने सबसे निवेदन किया।

जी, जरूर। हम सब पहुंचेंगे,’ सुभाष पाल और झब्बू लाल एक ही स्वर में बोले।

निठारी कांड का एक गुनाहगार सुरेंद्र कोली। फोटो साभार : गूगल

'मुझे इंसानी गोश्त चाहिए'

सीबीआई मुख्यालय की पांचवीं मंजिल। सुरेन्द्र कोली को जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी जंजीरों से बांध रखा है। तफ्तीश कर रहे एक अधिकारी ने उससे मालूम किया, ‘बच्चों को तू कैसे उठाता था?’

लालच देकर। कभी चॉकलेट का तो कभी खिलौनों का।

किसलिए उठाता था?’

शव साधना के लिए। उनका मांस खाने के लिए।

क्या...?’

मुझे गोश्त चाहिए। मुझे इंसानी गोश्त चाहिए। मैं गोश्त खाना चाहता हूं...

तुझे गोश्त क्यों चाहिए?’

मैं बच्चों के बिना नहीं रह सकता....मुझे अपने इर्दगिर्द बच्चे चाहिए। मैं उनसे सेक्स करना चाहता हूं। मैं उनका मांस खाना चाहता हूं। मुझे बच्चा चाहिए...अभी।

होश में रहकर बात कर।

मुझे बच्चे चाहिए...मैं उनका कत्ल करूंगा...अभी कुल्हाड़ी से काट दूंगा। उनका खून पिऊंगा...गोश्त खाऊंगा...कच्चा...। हां..हां पकाकर भी खाऊंगा...मुझे बच्चा चाहिए।

अबे यहां बच्चे कहां हैं?’

कोई भी लाओ...लड़की लाओ...औरत लाओ...मैं खून करना चाहता हूं...मुझे गोश्त चाहिए...

तभी एक दूसरे अधिकारी की आवाज़ आयी, ‘इससे दूर रहो...यह बेचैन हो रहा है...यह कुछ भी कर सकता है...

नहीं, साला नाटक कर रहा है ताकि हम इसे पागल घोषित कर दें। बिल्कुल ठीकठाक है। हिंसात्मक अपराधी इस किस्म की हरकत करते ही हैं ताकि कानून से अपने आपको बचा सकें। उनको लगता है कि बचाव का यही एक तरीका है,’ पूछताछ करने वाले अधिकारी ने जवाब दिया।

लेकिन हमारे कहने से ये पागल कोई हो जायेगा, डॉक्टरों का बोर्ड ही कोली या पंधेर को पागल घोषित कर सकते हैं।दूसरे अधिकारी ने समझाया।

साभार : गूगल

अय्याशी का अड्डा

सीबीआई अधिकारियों ने डी-5 के बारे में सुरेन्द्र से मालूम किया। डी-5 नोएडा के सेक्टर-31 में मोनिंदर सिंह पंधेर की कोठी है। इसके आसपास सात बहुमंजिला इमारतें हैं। डी-2, डी-3 और डी-6 भी डी-5 की ही लेन में हैं। डी-2 एक व्यापारी की कोठी है और डी-3 में हमेशा दो चैकीदार तैनात रहते हैं जबकि डी-4 एक वकील का आलीशान बंगला है। इन सभी कोठियों और बंगलों में कुत्ते भी मौजूद हैं लेकिन ताज्जुब की बात है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान डी-5 में जो कुछ घटित हो रहा था, उसके बारे में किसी को कानोंकान खबर तक नहीं थी। मोनिंदर ज्यादातर नोएडा में नहीं रहता था इसी का फायदा उठाकर सुरेन्द्र ने कॉलगर्ल सप्लायर नीलम से सांठगांठ कर ली और मोनिंदर की गैर-मौजूदगी में कोठी को नीलम के ग्राहकों को किराये पर देने लगा। आगे उसने सीबीआई को जो कुछ बताया, वह इस तरह से है-

हैलो!

हैलो, हां मैं नीलम बोल रही हूं।

क्या बात है?’ सुरेन्द्र ने मालूम किया।

एक लड़की के साथ एक ग्राहक भेज रही थी, रात आठ बजे तक पहुंच जाएंगे।

नहीं, आज नहीं।

क्यों, क्या बात हो गयी? हजार रुपये की जगह कमरे के पन्द्रह सौ रुपये दिलवा देंगे।

नहीं, आज हो ही नहीं पायेगा।

क्यों, पन्द्रह सौ रुपये भी कम पड़ रहे हैं क्या?’

नहीं, ऐसी बात नहीं है।

फिर क्या मोनिंदर घर पर है?’

नहीं, साहब तो चंडीगढ़ गये हैं।

तो फिर भाव क्यों खा रहा है? ग्राहक इज्जतदार है। होटल में नहीं जा सकता। इसलिए तो तेरे पास भेज रही हूं और पांच सौ रुपये ऊपर दिलवा रही हूं।

नीलम, तुम तो बिलावजह भड़क रही हो। यह बात नहीं है। मैंने तुम्हें कभी मना किया है? जब भी ग्राहक भेजा फौरन साहब का कमरा खोल दिया।

तो फिर आज क्या बात है?’

साहब का फोन आया था।

तो फिर?’

किसी पुलिस अधिकारी को आना है लड़की लेकर, साहब का कमरा उसी के लिए खुला है।

पुलिस वाला तो अब आ रहा होगा, मैं रात की बात कर रही हूं।

आये तो अभी लेकिन इन पुलिस वालों का कुछ पता है कब तक रुकें।

अच्छा, जल्दी चला जाये तो मुझे फोन कर देना।

ठीक है, लेकिन तू दूसरा इंतज़ाम भी करके रख।

वो तो मैं देख लूंगी लेकिन तू मुझे फोन कर दीजियो।

कर दूंगा। अच्छा फोन रख रहा हूं बाहर दरवाजे पर कोई घंटी बजा रहा है। शायद वही अधिकारी दिखे।

अच्छा ठीक है। मतलब ध्यान रखना,’ इतना कहकर नीलम ने फोन स्विच ऑफ कर दिया और सुरेन्द्र पुलिस अधिकारी के लिए दरवाजा खोलने बाहर चला गया।

निठारी कांड के गुनाहगार सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर । फोटो साभार : गूगल

पिटाई

जेआरडी टाटा की बायोग्राफी एक तरफ रखने के बाद मोनिंदर सिंह पंधेर ने शराब का आखिरी घूंट भी गले में उतारा और अपने बिस्तर पर पहलू बदलते हुए आवाज़ दी, ‘सुरेन्द्र....सुरेन्द्र।

उधर से कोई जवाब नहीं आया।

सुरेन्द्र...अबे ओ सुरेन्द्र...कहां मर गया।

जी साहब, आया,’ कमरे का दरवाजा खोलते हुए सुरेन्द्र ने अंदर प्रवेश किया।

अबे कहां था? कितनी देर से आवाज़ लगा रहा हूं।

साहब आवाज़ नहीं आयी, ड्राइंग रूम में टीवी चल रहा है।

काम के वक्त टीवी कम ही देखा कर।

जी, मैं देख नहीं रहा था मैं तो किचन में काम कर रहा था।

ठीक है, अच्छा पैग बनाकर ला।

शराब तो है नहीं।

क्या?’

उस दिन जो आपने पुलिस अधिकारी भेजे थे उनके साथ और भी कई मेहमान और लड़कियां थीं...

तो क्या हुआ?’

जी, उन्होंने सारी शराब खत्म कर दी।

अबे हरामज़ादे, अब मैं क्या पियूंगा। तुझे एक बोतल तो बचाकर रखनी चाहिए थी।

साहब वे लोग अपने आप ही बार में घुस रहे थे। मेरे कहने पर उनमें से कौन रुकता।

लेकिन हरामखोर, तुझे तो ख्याल रखना चाहिए था। पहले ही उनसे एक बोतल छिपाकर रख देता।

साहब, गलती हो गयी, आइंदा ख्याल रखूंगा।

हरामज़ादे, तूने तो मेरी शाम खराब कर दी और अब कह रहा है गलती हो गयी।

अब हो गयी तो हो गयी, अब मैं क्या करूं?’

ज़बान लड़ाता है,’ पंधेर अब गुस्से में आपे से बाहर हो गया था। शराब के बिना उसके लिए शाम गुजारना नामुमकिन था। उस पर सुरेन्द्र की ज़बानज़ोरी ने उसे पागल करके रख दिया। वह एक झटके में बेड से उठा और सुरेन्द्र पर ताबड़तोड़ लात-घूंसों से वार करने लगा। सुरेन्द्र बुरी तरह से पिटता जा रहा था और कह रहा था, ‘साहब ग़लती हो गयी, माफ कर दो। आइंदा से ख्याल रखूंगा।

नहीं, तू तो मेरा घर लुटायेगा, अबे उन अधिकारियों के सामने एक बोतल रख देता काफी थी, पूरा बार लुटा दिया।

साहब गलती हो गयी, आइंदा नहीं करूंगा।

मोनिंदर अब सुरेन्द्र को पीट-पीटकर थक चुका था, उसका नशा भी उतर गया था। वह वापस बेड पर बैठ गया और अपने तेल लगे बालों को उंगलियों से संवारने लगा। एक फरमाबरदार और आज्ञाकारी गुलाम की तरह पिटाई के बावजूद भी सुरेन्द्र वहीं हाथ बांधे हुए खड़ा था। कमरे में थोड़ी देर खामोशी छायी रही फिर सन्नाटे को तोड़ता हुआ मोनिंदर बोला, ‘अबे अब बेवकूफों की तरह खड़ा क्यों है? जा जाकर शराब का इंतजाम कर और नीलम को फोन लगाकर मालूम कर कि उससे जो लड़की को कहा था वो कितनी देर में आयेगी।

जी साहब।

और हां...

जी।

खाना तैयार किया?’

जी, वही कर रहा था किचन में।

अच्छा ठीक है, जा पहले दो बोतल टीचर्स व्हिस्की की ले आ।

अच्छा साहब,’ कहते हुए सुरेन्द्र कमरे से बाहर निकल गया।

साले ने मूड खराब कर दिया,’ कमरे में मोनिंदर बड़बड़ाता रह गया।

कंचन

अलमारी में से पैसे निकालकर सुरेन्द्र ड्राइंग रूम से बाहर निकला शराब लाने के लिए। उसने जैसे ही ड्राइंग रूम का दरवाजा बाहर से बंद किया तो ठीक उसी समय डी-5 का मुख्य गेट खुला और और एक सत्रह साल की खूबसूरत लड़की, आंखें बड़ी-बड़ी, रंग गोरा, औसत से ज़रा लम्बा निकलता हुआ कद, इकहरा बदन और चाल में अजीब किस्म की शोखी लिए हुए अंदर की तरफ बढ़ने लगी। यह कंचन थी, उसे नीलम उर्फ रितिका ठाकुर ने भेजा था।

कंचन डी-5 में पहले भी कई बार आ चुकी थी। उसका यही पेशा था, वह कॉलगर्ल थी। लेकिन सुरेन्द्र को न जाने क्यों कंचन का डी-5 में अपने साहब के पास आना और रंगरेलियां मनाना अच्छा नहीं लगता था। वह कई बार कंचन से कह चुका था कि वह मोनिंदर के पास न आया करे। लेकिन हर बार कंचन उसे झिड़क देती। आज फिर कंचन को आता देख सुरेन्द्र को बहुत बुरा लगा। कंचन जैसे ही ड्राइंग रूम में प्रवेश करने के लिए उसके पास से गुजरी तो वह बोला, ‘तुझसे मना किया था न कि तू यहां मत आया कर, तू फिर आ गयी?’

तुझसे मतलब, तू मेरे मुंह मत लगा कर, अपने काम से काम रख,’ यह कहते हुए कंचन ने एक हिकारतभरी नज़र सुरेन्द्र पर डाली और ड्राइंग रूम में प्रवेश कर गयी।

सुरेन्द्र ने जेब से मोबाइल निकाला और एक नम्बर डायल किया। उधर से आवाज़ आयी, ‘हैलो!

नीलम, मैं सुरेन्द्र बोल रहा हूं।

हां बोल, क्या बात है?’

तूने कंचन को फिर भेज दिया?’

क्या करूं, धंधा बंद कर दूं..

किसी और लड़की को भी तो भेज सकती थी। मैंने तुझसे कितनी बार कहा कि कंचन को साहब के पास मत भेजा कर।

मैं क्या करूं, मोनिंदर मांग ही कंचन की करता है। मेरे पास चारा ही क्या है?’

किसी और को भेज देती।

मैंने कहा न, मोनिंदर ने खासतौर से कंचन के लिए कहा था।

तो बहाना भी कर कर सकती थी कि कंचन नहीं है।

ठीक है, आइंदा ध्यान रखूंगी।

बस देख ले, कंचन आनी नहीं चाहिए अब। हां, मैं बुलाऊं तो अलग बात है,’ इतना कहकर सुरेन्द्र ने फोन बंद कर दिया और शराब लेने के लिए दुकान की ओर बढ़ने लगा।

तकरीबन आधा घंटे बाद सुरेन्द्र टीचर्स व्हिस्की की दो बोतल लेकर डी-5 में लौटा। जैसे ही ड्राइंग रूम का दरवाजा खोलकर उसने अंदर प्रवेश किया उसके कानों में मोनिंदर की आवाज़ आयी, ‘सुरेन्द्र...सुरेन्द्र।

जी साहब,’ कहता हुआ सुरेन्द्र मोनिंदर के कमरे में दाखिल हुआ। कंचन बेड के बराबर वाली कुर्सी पर बैठी हुई थी।

सुरेन्द्र, मेरा अचानक जरूरी फोन आ गया है मुझे अभी चंडीगढ़ जाना होगा।

जी साहब, आपका खाना लगा दूं।

नहीं, मैं रास्ते में खा लूंगा। और हां...कंचन को खाना खिलाकर भेज देना। लेकिन पहले मेरे कपड़े निकाल दो।

जी साहब।

मोनिंदर फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चला गया और सुरेन्द्र अलमारी से उसके कपड़े निकालने लगा। कपड़े बदलने के बाद मोनिंदर ने कंचन से कहा, ‘सॉरी डार्लिंग, जाना बहुत ज़रूरी है फिर किसी दिन मुलाकात होगी। लो अपने आज के पैसे तो ले ही लो।

मोनिंदर ने अपने पर्स से पांच हजार रुपये निकाले और कंचन को पकड़ाते हुए बोला, ‘खाना खाकर चली जाना। सुरेन्द्र ने बहुत अच्छी चिकन-करी बनायी है।

ओके, थैंक्यू, हैव अ नाइस जर्नी,’ कहते हुए कंचन ने पैसे अपने पर्स में रखे और कुर्सी पर पीछे कमर लगाकर खाने के इंतज़ार में बैठ गयी।

मोनिंदर कोठी से बाहर निकल आया और पीछे-पीछे सुरेन्द्र उसे छोड़ने के लिए आया। ड्राइवर पान सिंह की उस दिन छुट्टी थी क्योंकि मोनिंदर का कहीं जाने का प्रोग्राम नहीं था। इसलिए मोनिंदर खुद ही ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और गाड़ी को बैक करते हुए डी-5 के बाहर निकल गया। सुरेन्द्र ने कोठी का गेट बंद किया और वापस मोनिंदर के कमरे में आ गया कंचन के पास।

सुरेन्द्र, खाना लगा दो जल्दी से, मैं फिर चलती हूं,’ कंचन बोली।

तुझसे मैंने कितनी बार कहा है तू मेरे साहब के पास मत आया कर। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता जब तू उनके साथ रंगरेलियां मनाती है।

भाषण मत दे, खाना लगा मुझे जाना है।

तू समझती क्यों नहीं है, मैं तुझसे प्यार करता हूं।

बेकार की बातें रहने दे। खाना लगाना हो तो लगा वरना मैं जा रही हूं।

तू समझती क्यों नहीं है,’ सुरेन्द्र चिल्लाया।

तू खाना ला रहा है या नहीं,’ कंचन भी उतनी ही तेजी से बोली।

तू समझ ले मैं तुझे प्यार करता हूं, तुझे पसंद करता हूं, मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता जब तू साहब के सामने अपने कपड़े उतारती है।

तुझे इन बातों से क्या मतलब? तू अपने काम से काम रख। मेरा जो काम है मैं अपना काम करूंगी।

देख, ज़िद मत कर, अच्छा नहीं होने का।

तुझसे मेरा मतलब क्या है?’

मैं तुझे फिर समझा रहा हूं तू यहां साहब के पास मत आया कर, मुझे अच्छा नहीं लगता।

मैं तो आऊंगी, तू क्या कर लेगा,’ यह कहते हुए कंचन ने अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर जाने लगी।

सुरेन्द्र के लिए अब बातें बर्दाश्त के बाहर हो गयी थीं। उसने तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने दोनों हाथों में कंचन के दुपट्टे के दोनों सिरे पकड़ लिये और दुपट्टे को उसके गले पर लपेटकर जोर से खींचने लगा। कंचन के मुंह से हल्की-सी चीख निकली और उसकी गर्दन एक तरफ को लटक गयी। सुरेन्द्र ने कंचन के जिस्म को बाहों में उठाया और ऊपरी मंज़िल के बाथरूम में ले गया। वहां उसने कंचन के जिस्म से एक-एक कपड़े को फाड़कर उतार दिया। अब कंचन उसके सामने बेजान और निर्वस्त्र पड़ी थी। सुरेन्द्र उसके शरीर को देखता रहा और रोता रहा। पांच घंटे तक वह कंचन की लाश को देखता रहा। फिर उसने कुल्हाड़ी उठायी और कंचन के टुकड़े करने शुरू कर दिये। डी-5 में यह आखिरी कत्ल था। यह नवम्बर 2006 की बात है।

सुरक्षित

गाजियाबाद की कचहरी में पिटाई और फिर कुछ वक्त अस्पताल में गुजारने के बाद मोनिंदर सिंह पंधेर को वापस सीबीआई के पास लाया गया। उसे देखते ही एक अधिकारी ने कहा, ‘बड़ा बालों में तेल और मूंछों पर ताव देकर गया था, गाजियाबाद में क्या हुआ?’

मुझे मार देंगे। मैं यहीं तुम लोगों के पास सुरक्षित हूं।

लेकिन तूने जो चुप्पी साध रखी है, चेहरे पर कोई भाव नहीं लाता और हर बात से इनकार करता रहता है, उससे तेरी मुश्किल आसान कोई होगी।

मेरे पास अब आगे बतलाने के लिए कुछ नहीं है।

तुझे डी-5 में जो कुछ हो रहा था, उसकी खबर थी या नहीं?’

मुझे मालूम था लेकिन मैंने किसी बच्चे का कत्ल नहीं किया।

बच्चे और लड़कियां आतीं तो तेरे ही इशारे पर थीं?’

मैं सिर्फ कॉलगर्ल्स को ही बुलाता था।

किसके ज़रिए?’

नीलम....और भी कई हैं।

लेकिन सुरेन्द्र तो कह रहा है कि बच्चों के साथ तू भी रंगरेलियां करता था और तेरे दोस्त भी।

मैं किसी बच्चे को नहीं लाया।

फिर बच्चों को कोठी में कौन लाता था?’

सुरेन्द्र और माया सरकार।

माया सरकार भी...?’

हां, वह भी।

तू उसे पैसे देता था?’

नहीं। सुरेन्द्र देता था। मुझे नहीं मालूम।

तूने और तेरे दोस्तों ने बच्चों के साथ दुष्कर्म किया कि नहीं?’

मैंने किसी बच्चे की हत्या नहीं की।

पायल को तेरे कहने पर मारा गया?’

कौन पायल...?’

नंदलाल की बेटी पायल..

हां।

क्यों?’

वह मुझे ब्लैकमेल कर रही थी।

उसने तेरी क्या बात देख ली थी?’

कुछ नहीं, बस उसकी फरमाइशें बढ़ती जा रही थीं।

सुरेन्द्र ने तेरे कहने पर उसे क्यों मारा?’

सुरेन्द्र वफादार नौकर है, हुक्म का गुलाम।

वह तेरे कहने पर कुछ भी कर सकता है?’

उसने कभी बात टाली नहीं।

तेरे पास कौन-कौन लोग आते थे?’

वे सब इज्जतदार लोग हैं। उनका इस बात से कोई लेनादेना नहीं है। उनका नाम लेने से कोई फायदा नहीं।

तू अब भी पूरी बात नहीं बता रहा।

मुझे इतना ही मालूम है।

ये खेल कब से चल रहा है?’

मुझे नहीं मालूम, मैं तो बहुत कम नोएडा में रहता था।

इसका मतलब तू अब भी सच नहीं उगलने का?’

मेरी ब्लड शुगर बढ़ती जा रही है....

अच्छा, दवा खा। बाद में बात करते हैं।

दहशत और ख़ौफ़

निठारी गांव में जीवन सामान्य होता जा रहा है। लेकिन ऐसा ऊपर से ही प्रतीत हो रहा है। खोए बच्चों का इंतजार खत्म हो चुका है और नाले से निकले अपने अजीजों के कंकालों ने दिलोदिमाग में ऐसे घाव कर दिये हैं जो ऊपर से दिखायी नहीं देते, लेकिन अंदर ही अंदर इंसान को खोखला कर देते हैं। कुल मिलाकर निठारी के लोगों में डर भी है और दहशत भी।

राम प्रवेश रिक्शा खींच रहा है। उसके रिक्शे में बच्चे बैठे हुए हैं। वह उन्हें स्कूल छोड़ने जा रहा है। रिक्शा डी-5 के सामने से गुजर रहा है। राम प्रवेश बच्चों को समझाता है, ‘कभी अजनबियों से बात मत करना। उनसे टॉफी या चॉकलेट मत लेना। समझ गये न?’

इतना कहकर वह पीछे मुड़कर देखता है, उसे रिक्शे की सीट पर सिर कटी लाशें दिखायी देती हैं।

रूहों के ज़ख़्म

वाटर टैंक के बराबर वाले झोपड़े में 100 वाट का बल्ब भी बेवा के बुढ़ापे की तरह बस टिमटिमा रहा है। यह मोहसिन अहमद का झोपड़ा है। 55 साल के मोहसिन अहमद अपने झोपड़े से बाहर झांकते हैं। उन्हें एक लड़की की आवाज़ आती है, ‘बचाओ...बचाओ...वे झोपड़े से बाहर निकलते हैं। वाटर टैंक की सीढ़ियों पर एक लड़की रोते हुए बचाओ...बचाओ...कह रही है। वे उस तरफ को बढ़ते हैं। सीढ़ियों पर कोई लड़की नहीं है।

यह रूह के ज़ख़्म हैं, न दिखायी देते हैं न भरते हैं।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

समाप्त

पहली किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-first-episode/695

दूसरी किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-first-episode/695

तीसरी किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-three/712

चौथी किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-four/716

पांचवी किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-five/728

छठी किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-six/737

सातवीं किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-seven/741

आठवीं किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-eight/755

नवीं किस्त

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/story-based-on-nithari-scandal-part-nine/763

 

 










Leave your comment