दो पत्रकारों ने लिखी निठारी की सच्ची कहानी...कोठी नंबर डी-5

सत्यकथा , पहली किस्त, मंगलवार , 01-08-2017


story-based-on-nithari-scandal-first-episode


(नोएडा का निठारी कांड एक बार फिर चर्चा में है। पूरे देश को झकझोर देने वाले 2006 के इस मामले में अदालत ने अभी 24 जुलाई को मुख्य आरोपी मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को पिंकी सरकार की हत्या में फांसी की सज़ा सुनाई है। 2006-07 में वरिष्ठ पत्रकार लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी ने मौके पर जाकर इस घटना को लेकर काफी जांच-पड़ताल की और आलेख लिखे। बाद में उन्होंने इस पूरी घटना को एक उपन्यास के रूप में पेश किया। और नाम रखा कोठी नंबर डी-5। यह वही कोठी है जो इस पूरे कांड में कुख्यात हुई। मोनिंदर सिंह की इस कोठी को खूनी कोठी कहा गया। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास को हम जनचौक पर धारावाहिक रूप में आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। आइए पढ़ते हैं इसकी पहली कड़ी। - संपादक)

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

कोठी नंबर डी-5

(लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए. चौधरी)

वह एक दौलतमंद की कोठी थी। जिसमें अक्सर दिन में वीरानी छाई रहती। एक मोटा ताजा नौकर दिखता, वह भी बेहद रहस्यमयी था। अक्सर कोठी के भारी-भरकम डरावने से गेट में ही उसे देखा जाता। वह बड़े से गेट के दोनों दरवाजों के बीच गर्दन बाहर निकाले उनसे चिपका सा रहता। उसका शरीर पूरा कोठी के अंदर होता और गर्दन कोठी के बाहर। उसकी बड़ी-बड़ी शातिर निगाहें गेट के बाहर इधर-उधर मुस्तैदी से देख रही होतीं। लगता था जैसे वह किसी को खोज रही हों। कोई नहीं जानता था कि दिन में उस कोठी के अंदर उस कभी-कभार दिखने वाले नौकर के अलावा और कौन रहता है? हां, रात में उस एकांत पड़ने वाली कोठी नंबर डी-5 में रोशनी जरूर दिखती। मगर रोशनी सिर्फ एक कमरे में दिखती, बाहर घुप्प अंधेरा छाया रहता।

राजधानी दिल्ली से सटे औद्योगिक नगर नोएडा के निठारी गांव से सटी वह कोठी बड़ी रहस्यमयी थी और उससे ज्यादा रहस्यमयी था उस कोठी का मालिक। जो गांव वालों को कभी-कभार दिखता। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, शिकारियों की माफिक मूंछें और पहलवानों के जैसा शरीर गांव वालों को काफी डरावना लगता। गांव के लोग उस कोठी के पास से गुजरते हुए जल्द से जल्द वहा से दूर होना चाहते। कुछ दिनों बाद निठारी गांव से रह-रहकर छोटी-छोटी लड़कियां और लड़के कुछ कुछ दिनों के बाद गायब होने लगे। तो न जाने क्यों गांव वालों को वह रहस्यमयी कोठी खौफनाक लगने लगी। गांव के लोगों को न जाने क्यों लगता कि उनके कलेजे के टुकड़ों के गायब होने से इस कोठी का कोई रिश्ता है। और एक दिन जब इस खौफनाक रहस्य से पर्दा उठा तो नोएडा ही नहीं पूरा देश दहल गया...

निठारी गांव

ऊंची  इमारतों  से  मकां  मेरा  घिर गया

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये

              -जावेद अख्तर

आसमान से हाथ मिलाती ऊंची-ऊंची इमारतें और उन्हीं के बराबर में आलीशान बंगले, लेकिन इनके पीछे एक और हिंदुस्तान-संकरी गलियां, एक-एक कमरे के दड़बानुमा मकान और उनमें रहने वाले रिक्शाचालक, मजदूर, धोबी, घरेलू नौकर-नौकरानी और ऐसे ही छोटे-छोटे पेशों में लगे हुए अनगिनत लोग। लोग जो देश के कोने-कोने से अपनी भुखमरी दूर करने के लिए, रोटी के लिए, रोज़ी के लिए, अपने बच्चों को तालीम देने के लिए...आंखों में बड़े-बड़े सपने लिए हुए...महानगर के साये में आकर बसे, लेकिन संपन्न समाज के गुलाम या सेवक बन कर रह गये।

अनिल हलधर, पश्चिम बंगाल के नादिया जिले से आया और रिक्शा चलाने लगा।

जेम्स थापा, दार्जिलिंग से आया और फास्टफूड का ठेला लगाने लगा।

झब्बू लाल, बिहार से आया और धोबी का काम करने लगा।

पप्पू लाल, झारखंड से आया और एक फैक्ट्री में नौकर हो गया।

मुहम्मद हसीब, आंध्रप्रदेश से आया और दर्जी का काम करने लगा।

गर्ज़ यह कि एक लम्बी फेहरिस्त है हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बल्कि गरीबों की जो पिछले 15-20 वर्षों के दौरान देश के हर प्रांत से आये और नोएडा के सेक्टर 31 के पीछे निठारी गांव के बाहरी हिस्से पर एक मिनी हिंदुस्तान बना बैठे। यही इनकी दुनिया हो गयी। दिन भर मेहनत मजदूरी करके किसी सूरत से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते, लेकिन खुश थे अपनी दुनिया में, अपने बच्चों में।

फिर अचानक कुछ अजीब होने लगा...

सुंदर, लम्बी और इकहरे बदन की बीना हलधर ने अभी जीवन के तेरह बसंत ही देखे थे। उसके मां-बाप 15 वर्ष पहले बेहतर जीवन के लिए मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल से निठारी आये थे। बीना का जन्म यहीं हुआ था। लेकिन घर की तंगी गोपाल हलधर व अलोकी हलधर के काम करने से भी दूर न हो सकी। इसलिए जिस उम्र में बीना को लिखना-पढ़ना था वह नोएडा की कोठियों में झाड़ू-बर्तन कर रही थी। एक रोज़ वह काम पर गयी, तो फिर कभी लौटी नहीं। यह 15 मार्च 2005 की बात है। ...निठारी गांव के बच्चे गायब होने लगे। बस्ती की जिंदगी पहले जैसी न रही।

निठारी से गायब होने वाली बीना पहली बच्ची न थी। उससे पहले भी कई बच्चे गायब हो चुके थे। 2004 के आखिरी महीनों से बच्चे गायब होने का सिलसिला शुरू हुआ था। अब बीना के गायब हुए भी कई माह गुजर चुके थे। इस दौरान भी कई और बच्चे गायब हुए, लेकिन किसी का कोई सुराग न मिल सका।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

कटा हाथ

बस्ती में उदासी के बावजूद जन-जीवन चल रहा था। लोग अपने काम पर जाते और बच्चे स्कूल या अपने काम से लौटकर पानी की टंकी के पास बने चबूतरे पर खेलते। एक रोज़, बीना की गुमशुदगी के तकरीबन तीन माह बाद, कुछ बच्चे दोपहर में चबूतरे पर क्रिकेट खेल रहे थे। अचानक एक शॉट पर गेंद दीवार पार करते हुए सेक्टर-31 के नाले में जा गिरी। रामशरण का बेटा मनोज गेंद उठाने के लिए दीवार फांदकर नाले में उतरा। उसने जैसे ही गेंद पर हाथ बढ़ाया, तो प्लास्टिक की गेंद पानी में आगे को बढ़ गयी और उसके हाथ में कुछ और आ गया- हाथ, किसी बच्चे का कटा हुआ हाथ। मनोज के मुंह से ज़ोर की चीख निकली, उसने कटे हुए हाथ को वहीं फेंका और दीवार कूदता हुआ बस्ती की ओर भागा।

मनोज बहुत घबरा गया था। उसके माथे से बेतहाशा पसीना बह रहा था। उसके साथी उससे वजह जानने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उसके मुंह से कोई शब्द ही नहीं फूट रहा था। अब साथियों को भी चिंता होने लगी। उनमें से एक भागकर पीने के लिए पानी लाया, तो दूसरा रामशरण को बुला लाया।

हां, क्या हो गया? मेरे बेटे को क्या हो गया?’ रामशरण ने आते ही मालूम किया।

हाथ...हाथ...,’ मनोज पानी पीते हुए बोला।

हाथ? क्या हो गया तेरे हाथ को?’

मेरे हाथ को नहीं...

फिर?’

वहां...हाथ...कटा हुआ हाथ...

अरे कुछ बोल भी। सही से बोल। क्या हुआ? कहां है कटा हुआ हाथ?’

वहां नाले में...

कोठी डी-5 के पीछे जो नाला है।

हां, उसमें एक हाथ पड़ा हुआ है। कटा हुआ हाथ।

क्या?’

हां, एक कटा हुआ हाथ।

किसका?’

शायद किसी बच्चे का है।

सुनते ही सब स्तब्ध रह गये। अब तक वहां बस्ती के और लोग भी इकट्ठा हो चुके थे। सबने एक-एक करके दीवार पर चढ़कर देखा। नाले में जो कूड़ा पड़ा हुआ था उस पर एक बच्चे का कटा हुआ हाथ पड़ा था।

अब क्या किया जाए?’ रामशरण ने वहां जमा हुए बस्ती के अन्य लोगों से सवाल किया।

पुलिस में जाना चाहिए,’ किसी ने मशविरा दिया।

वह तो ठीक है, लेकिन पुलिस हम गरीबों की सुनती कहां है। अपनी बस्ती के इतने बच्चे गायब हुए पुलिस ने एक-दो को छोड़कर किसी की रिपोर्ट लिखी।

बल्कि पुलिस की गालियां सुननी पड़ीं।

तो, क्या यह इसमें से किसी के गायब बच्चे का हाथ हो सकता है?’

क्या पता? हो भी।

अरे, इन बातों से क्या फायदा। यह सोचो कि क्या किया जाए?’

बहनजी के पास चलते हैं,’ झब्बूलाल धोबी ने सुझाव दिया।

कौन बहन जी?’

उषा ठाकुर, वही तो हम गरीबों की मदद करती हैं,’ इस बार पप्पू लाल ने जवाब दिया।

हां, यही ठीक रहेगा। कम से कम पुलिस की गालियां तो नहीं पड़ेंगी।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

झब्बू लाल, पप्पू लाल, रामशरण आदि समाजसेविका उषा ठाकुर के पास पहुंचे और उन्हें नाले में पड़े हुए कटे हुए हाथ की पूरी दास्तान सुनायी। उन्होंने इन लोगों को थाना सेक्टर 20 जाने की सलाह दी। थाने से इन लोगों को सेक्टर 26 की पुलिस चौकी भेज दिया गया। पुलिस चौकी में इतने सारे लोगों को आता देख मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने पूछा, ‘टोली बनाकर क्यों घुसे आ रहे हो, क्या बात है?’

सरकार, नाले में कटा हुआ हाथ पड़ा है।

क्या?’

जी, नाले में कटा हुआ हाथ पड़ा है।

कौन से नाले में?’

सेक्टर 31 के पीछे जो नाला है।

किस जगह पड़ा है?’

जी, कोठी डी-5 के पीछे।

यह किसकी कोठी है।

कोई सरदार मोनिंदर सिंह पंधेर हैं, उसकी कोठी है।

अच्छा, चलो चलकर दिखाओ।

बस्ती के लोगों के साथ दो पुलिस वाले डंडा उठाकर चल दिये। कटा हुआ हाथ अब भी वहीं पड़ा था। पुलिस वालों ने बस्ती के ही एक आदमी से हाथ उठवाया, वहीं पास में एक गहरा गड्ढा खुदवाया और उसे दफनवा कर मामले को रफा-दफा कर दिया। आगे कोई खोजबीन नहीं हुई।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

मैगी का पैकेट

दीदी, भूख लग रही है,’ भारती ने अपनी बड़ी बहन ज्योति से कहा।

रोटी रखी है, खा ले।

नहीं रोटी खाने को मन नहीं कर रहा।

तो और क्या खायेगी?’

ऐसा करें मैगी बना लें।

लेकिन मैगी बनाने के लिए पैसे कहां हैं?’

पापा से ले आओ।

चल कोशिश करके देखती हूं,’ कहते हुए ज्योति बाहर निकली और अपने पापा के ठेले की तरफ दौड़ पड़ी।

झब्बू लाल नोएडा के सेक्टर-31 के पास कपड़े प्रेस करने का ठेला लगाता है। वह तकरीबन 15 बरस पहले रोजी-रोटी की तलाश में बिहार के एक गांव से नोएडा आया था। निठारी गांव की बस्ती में उसने एक छोटी सी खोली किराये पर ले ली और धोबी का अपना पुश्तैनी काम शुरू कर दिया। निठारी में रहते हुए ही वह छह बच्चों का पिता बना जिनमें पांच लड़कियां और एक लड़का राकेश है। 10 साल की ज्योति उसी की बेटी थी। गरीब घराने में पैदा होने के बावजूद ज्योति के नाक-नक्श देखने-दिखाने लायक थे।

पापा, पापा, 15 रुपये दे दो,’ ज्योति ने झब्बू लाल के पास आते हुए फरमाइश की।

क्यों क्या करना है?’

भारती और मुझे मैगी खानी है।

बेटी, रोटी खा लो, रोटी तो मां बनाकर गयी होगी।

रोटी तो है, लेकिन मैगी खाने को जी कर रहा है।

मेरे पास इतने पैसे कहां हैं?’

पापा, इतने दिनों बाद तो मांग रही हूं।

अच्छा, एक काम कर।

क्या?’

तू थोड़ी देर ठेला देख, मैं यह प्रेस हुए कपड़े देकर आता हूं। वहां से पैसे मिल गये, तो तुझे दे दूंगा,’ इतना कहकर झब्बू लाल ने कपड़े उठाये और उन्हें देने के लिए चल दिया।

पापा, जल्दी आ जाना।

अच्छा। और तू ध्यान से बैठना। कोई कपड़े लेकर आये, तो लेकर रख लेना,’ कहते हुए झब्बू लाल ज्योति की आंखों से ओझल हो गया।

आधा घंटे बाद जब झब्बू लाल अपने ठेले पर लौटा, तो ज्योति वहां नहीं थी। अरे, पैसे लिए बिना ही घर चली गयी। अजीब लड़की है। कभी एक जगह नहीं टिकती। ठेले को अकेला छोड़कर चली गयी- झब्बू लाल ने सोचा और अपने काम में लग गया।

थोड़ी देर बाद उसे अपनी बच्चियों की फरमाइश का ख्याल आया। चलो, मैं ही चलकर मैगी उन्हें घर दे आता हूं- अपने आप से यह कहता हुआ झब्बू लाल अपने घर की तरफ चल दिया। रास्ते में उसने मैगी का पैकेट खरीदा और घर के दरवाज़े पर पहुंचकर ज़रा ज़ोर से बोला, ‘ज्योति...ज्योति...ले मैगी, और तू ठेला अकेला छोड़कर क्यों चली गयी?’

लेकिन पापा, ज्योति तो अभी आयी नहीं,’ अंदर से बाहर निकलते हुए भारती बोली।

क्या?’

हां, वह आपके पास मैगी के लिए पैसे लेने गयी थी, जब से यहां तो आयी नहीं।

मैं तो उसे ठेले पर छोड़कर गया था, जब लौटा तो वह नहीं थी। मैंने सोचा घर आ गयी होगी।

यहां तो नहीं आयी।

फिर कहां गयी होगी?’

मुझे क्या पता।

अच्छा तू उसे बुलाकर ला। यहीं कहीं सहेलियों में खेल रही होगी। और ले यह मैगी रख ले, दोनों बहनें खा लेना। मैं ठेले पर जा रहा हूं। वहां कोई नहीं है।

अच्छा।

झब्बू लाल ठेले पर वापस आ गया। तकरीबन एक घंटा बाद भारती हांफते हुए उसके पास आयी, ‘पापा, पापा, ज्योति का कहीं पता नहीं है।

क्या?’

हां, मैंने सब जगह देखा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

कहां गयी होगी?’

बाकी और लोगों ने भी उसे ढूंढ़ा लेकिन उसका कहीं पता नहीं चल रहा है।

झब्बू लाल सन्न रह गया। एकदम बुरे ख्याल आना स्वाभाविक था, आखिर निठारी से बच्चे गायब हो रहे थे। कहीं उसकी बेटी भी तो नहीं....यह सोचते ही उसका चेहरा उतर गया। यह 21 जून 2006 की बात है।

शाम तक ज्योति को हरसंभव जगह तलाशा गया। उसका कहीं पता न चला। दोपहर को उसे झब्बू लाल के ठेले की तरफ जाते हुए तो कई लोगों ने देखा था लेकिन उसके बाद उसे किसी ने भी नहीं देखा था। ज्योति गायब हो चुकी थी, हमेशा के लिए।

बस्ती के लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने का फैसला किया। लेकिन जब वे लोग निठारी पुलिस चौकी पर रिपोर्ट दर्ज कराने गये, तो ज्योति की रिपोर्ट गुमशुदगी तक में नहीं लिखी गयी। हद तो यह है कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने झब्बू लाल को बेइज्ज़त करते हुए कहा, ‘अबे अपने किसी यार के साथ आइसक्रीम खाने चली गयी होगी। जब जी भर जायेगा लौट आयेगी। चलो दफा हो।

मेहनाज़ आलम-1

मेहनाज़, बेटी मेहनाज़ जाओ ज़रा पास की नल से पानी भर लाओ,’ शमशाद बेगम ने अपनी छह साल की बेटी से कहा।

अम्मी, भइया को भेज दो न, शाम हो रही है,’ मेहनाज़ ने अपनी जान बचाते हुए बहाना किया।

जा बेटा, ज़िद नहीं करते ले आ। आज वैसे भी पानी नहीं आया है, तू बाहर के नल से भर ला।

अच्छा,’ बेमन से मेहनाज़ ने कहा और प्लास्टिक की बाल्टी उठाकर बाहर निकल गयी।

मेहनाज़ का घर ई-226 सेक्टर-36 नोएडा में है और वहां से सरकारी हैंडपम्प ज्यादा फासले पर नहीं है, लेकिन गर्मियों के हिसाब से भी एक बच्ची के लिए शाम के साढ़े सात बजे काफी देर होती है। टैप में पानी न आ रहा हो और टंकी खाली हो गयी हो तो गर्मियों में पानी के बिना रहना मुश्किल हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है लेकिन इस किस्म की मजबूरियों के चलते नन्हे हाथों को भी पढ़ाई के साथ साथ यह काम करना पड़ता है।

खैर, दिल्ली पब्लिक स्कूल नोएडा की छात्रा मेहनाज़ ने बाल्टी को नल के नीचे रखा और आहिस्ता-आहिस्ता हत्थी खींचने लगी। बाल्टी तकरीबन आधी भर गयी थी, तभी दरम्याने कद, होठों पर हल्की-हल्की मूंछें, इकहरे बदन और सांवले रंग का एक व्यक्ति वहां आया। उसने आते ही कहा, ‘बेटी थक गयी होगी, ला मैं बाल्टी भर देता हूं।

नहीं अंकल, थैंक्यू, मैं भर लूंगी,’ मेहनाज़ ने जवाब दिया और हैंडपम्प चलाने लगी।

नहीं बेटा तू थक गयी होगी, ला मैं ही भर देता हूं।

नो अंकल, मैं कर लूंगी,’ और मेहनाज़ ने हैंडपम्प चलाना जारी रखा। इतनी देर में बाल्टी भर गयी और मेहनाज़ उसे उठाकर अपने घर की ओर चलने लगी। वह आदमी भी उसके साथ साथ चलने लगा।

अच्छा ला, बाल्टी मैं उठा लेता हूं।

नहीं अंकल, मेरा तो तकरीबन रोज का ही काम है मैं ले जाऊंगी।

नहीं बेटा, तू थक जायेगी। चल मैं तुझे घर तक छोड़ देता हूं।

उसी समय मोहल्ले की एक औरत वहां आ गयी, वह मेहनाज़ को जानती थी और एक अजनबी को उसके साथ देखकर उसने कहा, ‘बेटी ये कौन है?’

मैं तो नहीं जानती।

फिर ये तेरे साथ क्यों है?’

मुझसे कह रहे हैं मैं घर छोड़ आऊंगा।

क्यों भई किसलिए, कौन हैं आप?’ महिला ने उस अजनबी व्यक्ति से मालूम किया।

बस छोटी सी बच्ची को इतना बोझ उठाते देखा न गया, मैंने बाल्टी उठाकर घर तक पहुंचाने की बात कही,’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया।

क्यों, किसलिए? आप समाजसेवी हैं? क्या हैं?’

कुछ नहीं। आपको बुरा लगता है मैं चला जाता हूं,’ इतना कहकर वह व्यक्ति तेज कदम रखता हुआ वहां से चला गया।

और हां, मेहनाज़ बेटी रास्ते में अजनबी लोगों से बात नहीं करते, जमाना बहुत खराब है। अपना काम करके सीधे घर जाते हैं। अब एकदम सीधे घर चली जाओ,’ उस महिला ने समझाया।

अच्छा आंटी,’ कहते हुए मेहनाज़ अपने घर की ओर चली।

घर पहुंचने पर मेहनाज़ ने रास्ते की घटना अपनी अम्मी को सुनायी। उन्हें यकीन नहीं आया। वे जानती थीं कि उनकी नटखट बिटिया कहानियां गढ़ने में उस्ताद है। उन्हें यह घटना भी एक कहानी लगी और डांटते हुए मेहनाज़ से बोलीं, ‘चुप कर। ऐसे ही मनगढ़ंत किस्से सुनाती रहती है ताकि काम न करना पड़े।

नहीं, अम्मी, मैं बिल्कुल सच बोल रही हूं। वह आदमी मेरे पीछे ही पड़ गया था और अगर पड़ोस वाली आंटी न आतीं तो वह शायद घर तक ही आ जाता।

चल चल ज्यादा बातें मत बना। पढ़ने बैठ। हर दम बहाने ही खोजती रहती है काम न करने के लिए।

लेकिन वह अजनबी कौन था?

बात आयी-गयी हो गयी, लेकिन इसके कुछ माह बाद एक और अजीब घटना हुई। मेहनाज़ अपने भाई और अन्य बच्चों के साथ स्कूल से लौट रही थी। उस दिन मेहनाज़ की क्लास में किसी बच्ची का जन्मदिन था और कक्षा की सभी छात्राओं को उसकी तरफ से चॉकलेट मिली थी। मेहनाज़ ने अपनी चॉकलेट खायी नहीं थी और स्कूल से लौटते वक्त उसने चिढ़ाते हुए अपने भाई को चॉकलेट दिखायी।

आधी मुझे भी दे दे न,’ भाई ने मेहनाज़ से चॉकलेट में हिस्सा मांगते हुए कहा।

मैं क्यों दे दूं।

तू मेरी बहन नहीं है....?

तू भी अपनी चीज में से हिस्सा देता है?

आइंदा से मिल-बांटकर खाया करेंगे।

चल झूठे, तू तो अपने खिलौनों तक को नहीं छूने देता।

तू मेरे खिलौनों से खेल लेना। सारे खिलौनों से खेल लेना।

अभी कह रहा है, चॉकलेट मिलते ही सब भूल जायेगा।

नहीं भूलूंगा, तेरी कसम।

झूठी कसम मत खा।

नहीं, सच्ची।

अच्छा तू जो भी कर ले मैं तुझे अपनी चॉकलेट में से हिस्सा नहीं दे रही।

फिर मेरे साथ चलने की भी जरूरत नहीं है।

तू क्या समझता है मैं अपने आप घर वापस नहीं जा सकती?’

तो आ जा न, मेरे पीछे क्यों पड़ी है।

आ जाऊंगी। तू जा, मैं आ जाऊंगी अपने आप।

इसी लड़ाई-झगड़े में दोनों बहन-भाई आगे-पीछे हो गये। भाई अन्य बच्चों के साथ आगे निकल गया और मेहनाज़ अपना बैग संभालते हुए पीछे रह गयी। दोनों के बीच फासला जब ज्यादा हो गया, तो मेहनाज़ का चेहरा उतर गया। उसे अपने भाई का ख्याल आया। उसे चॉकलेट का एक पीस दे देती तो क्या बिगड़ जाता मेरा, उसने सोचा। इस किस्म का ख्याल आते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। तभी पीछे से एक 35-37 साल की महिला आयी। शक्ल-सूरत और अपनी पुरानी साड़ी से वह घरों में काम करने वाली नौकरानी लग रही थी। उसने मेहनाज़ को रोते हुए देखा तो बोली, ‘बिटिया, रो क्यों रही हो?’

मेरा भाई मुझे छोड़कर चला गया।

कोई बात नहीं, रोना बंद करो।

लेकिन अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’

मैं हूं न, मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ दूंगी, आओ।

थैंक यू आंटी, आप कितनी अच्छी हैं।

उस महिला ने मेहनाज़ का बैग उठा लिया और दूसरे हाथ से उसका हाथ पकड़ते हुए उसे अपने साथ ले जाने लगी सेक्टर-31 कोठी नंबर डी-5 की तरफ। थोड़ी दूर चलने के बाद मेहनाज को लगा कि यह वह रास्ता नहीं है जिधर से वह रोज अपने घर की ओर जाती है। उसने मालूम किया, ‘आंटी, आप मुझे किधर ले जा रही हैं?’

तुम्हारे घर की तरफ।

लेकिन मेरा घर तो इस तरफ नहीं है।

ओ हां, मुझे सामने जो सफेद कोठी दिखायी दे रही है, उसमें थोड़ा सा काम है। बस एक मिनट का, उसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दूंगी।

लेकिन मुझे तो उधर नहीं जाना है। आप मेरा बैग मुझे दो और मेरा हाथ छोड़ो, मैं अपने आप चली जाऊंगी।

मैं छोड़ दूंगी न, बस जरा सी देर की तो बात है।

नहीं, मैं अपने आप चली जाऊंगी।

मेहनाज़ ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। वह एक जगह जमकर खड़ी हो गयी और ज़ोर-ज़ोर से रोते व चिल्लाते हुए कहने लगी, ‘आप मेरा बैग मुझे वापस कर दो मैं अपने आप चली जाऊंगी। मैं आपके साथ नहीं जा रही।

दूसरी तरफ जब मेहनाज़ के भाई ने मुड़कर देखा तो उसे अपनी बहन दूर तक दिखायी नहीं दी। उसे लगा कि अगर अकेला घर लौटेगा तो अम्मी डांटेंगी। इसलिए वह अपने साथियों के साथ पीछे की ओर चल दिया अपनी बहन को लेने के लिए। कुछ दूर वापस लौटने पर उसे अपनी बहन के रोने की आवाज़ सुनाई दी। वे और उसके साथी तेजी से उसकी तरफ भागे। उसके पास पहुंचने के बाद भाई महिला माया सरकार से बोला, ‘आप मेरी बहन को क्यों पीट रही हैं?’

मैं कहां पीट रही हूं। मैं तो इसे इसके घर छोड़ने जा रही थी।

नहीं, तुम मुझे उस तरफ ले जा रही थीं,’ मेहनाज़ ने उसकी बात काटते हुए कहा।

इधर तो मैं एक मिनट के लिए अपने काम से जा रही थी,’ उस महिला ने सफाई दी।

अच्छा बहस छोड़ो, मेरी बहन का बैग वापस दो मैं इसे अपने साथ ले जा रहा हूं।

ले जा, किसने रोका है। एक तो मदद करो और फिर उल्टी-सीधी बातें सुनो,’ वह भुनभुनाते हुए बोली।

वह नौकरानीनुमा या शायद नौकरानी कौन थी?

लेकिन मेहनाज़ के साथ इस किस्म की यह आखिरी घटना न थी। एक दिन उसका भाई बीमार था और उसे उसके पिता मुनव्वर आलम स्कूल छोड़ गये थे। स्कूल की छुट्टी के बाद वह अपने पिता का इंतजार कर रही थी कि तभी उसके पास एक व्यक्ति आया और बोला, ‘तुम्हारे पापा नहीं आ सकेंगे, उन्हें कुछ जरूरी काम पड़ गया है, उन्होंने मुझे तुम्हें वापस लेने के लिए भेजा है।

अंकल, आप तो वही हैं न जो उस दिन हैंडपम्प के पास मुझे मिले थे,’ मेहनाज ने व्यक्ति को पहचानते हुए कहा।

हां, बिल्कुल सही पहचाना।

आप मेरे पापा को जानते हैं?’

हां, जानता हूं। मेरे दोस्त हैं और इसलिए ही तो उन्होंने मुझे तुम्हें लेने के लिए भेजा है।

अच्छा, चलिए,’ कहते हुए मेहनाज़ उस व्यक्ति के साथ चलने के लिए तैयार हो गयी।

तभी पीछे से दिल्ली पब्लिक स्कूल नोएडा की एक टीचर ने आवाज दी, ‘मेहनाज़...ये कौन है जिसके साथ तुम जा रही हो?’

मेरे पापा के दोस्त हैं।

जी, उन्होंने ही मुझे इसे लाने के लिए भेजा है,’ उस व्यक्ति ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा।

आप इसके पापा को जानते हैं?’ टीचर ने मालूम किया।

जी, मेरे दोस्त हैं।

क्या नाम है उनका?’

मुनव्वर आलम।

कहां रहते हैं?’

जी, सेक्टर-36 में। आप तो मुझसे ऐसे मालूम कर रही हैं जैसे मैं बच्ची को जबरदस्ती ले जा रहा हूं। अरे, इसके पापा को जरूरी काम पड़ गया, उन्होंने मुझे भेज दिया।

लेकिन हम किसी अजनबी के साथ बच्ची को नहीं भेज सकते। आखिर स्कूल की भी तो कोई जिम्मेदारी है।

तभी तो मुनव्वर भाई ने मुझे भेजा है।

मेहनाज़, तुमने इन अंकल को कभी अपने घर देखा है?’

नो मैम।

तुम इन्हें जानती हो?’

नहीं, एक बार हैंडपम्प के पास मिले थे।

अच्छा मिस्टर, तुम्हारा नाम क्या है?’ टीचर ने उस व्यक्ति से मालूम किया।

जी, सदाराम।

तुम इसके पापा को कैसे जानते हो?’

मेरे दोस्त हैं। साथ साथ काम करते हैं।

उनका फोन नंबर क्या है?’

वो तो मुझे याद नहीं।

टीचर को कुछ शक हुआ और वे बोलीं, ‘देखिए, आप जो कोई भी हों। हम बच्ची को आपके साथ नहीं भेज सकते। स्कूल का नियम है कि अभिभावक या तो खुद बच्चों को लेने आएंगे या उन्होंने इस काम के लिए जिन लोगों को निर्धारित कर रखा है और स्कूल में भी उसकी पूरी सूचना दे रखी है, उनके अलावा किसी और के साथ हम बच्चे को नहीं भेज सकते।

जी, आप मेरी बात समझने की कोशिश तो करें।

नहीं। कह दिया न, आपके साथ बच्ची को नहीं भेजा जा सकता।

मुनव्वर भाई को काम पड़ गया, मुझे आना पड़ा....

प्लीज़, अब ज्यादा बहस न करें। बच्ची आपके साथ नहीं जायेगी। आप जाएं और इसके घर से किसी को ले आएं तो हम बच्ची को भेज देंगे।

उस अजनबी व्यक्ति के पास अब वापस जाने के अलावा कोई चारा न था। वह मुड़ा और वहां से चला गया। तभी दूसरी तरफ से मुनव्वर आलम अपनी बेटी को लेने वहां पहुंच गये।

अरी बेटी मेहनाज़, मुझे आने में थोड़ी देर हो गयी।

आपने क्या अपने किसी दोस्त सदाराम को मेहनाज को लेने के लिए भेजा था?’ टीचर ने मेहनाज के पापा से मालूम किया।

नहीं तो, सदाराम...मैं तो इस नाम के किसी व्यक्ति को जानता भी नहीं,’ मुनव्वर आलम ने जवाब दिया।

देखिए, आप अपनी जिम्मेदारी को ढंग से समझें। बाद में आप लोग स्कूल पर इल्जाम लगाने लगते हैं। ज़माना खराब है। बच्चों को स्कूल सुरक्षा के साथ लायें और ले जाएं। टाइम का भी ख्याल रखा करें।

सॉरी मैडम! आज ट्रैफिक की वजह से देर हो गयी। मैं आइंदा ख्याल रखूंगा।

ठीक है। अब आप जा सकते हैं।

चलो मेहनाज़,’ कहते हुए मुनव्वर आलम ने अपनी बेटी का बैग उठाया और अपने घर की ओर रवाना हो गये। 

फिर वही अजनबी। मगर वह कौन था?

जारी..........










Leave your comment