‘ओह निशा! तुझे भी इन दरिंदों ने नहीं छोड़ा’

सत्यकथा , किस्त-8, मंगलवार , 08-08-2017


story-based-on-nithari-scandal-part-eight

निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5

किस्त : 8

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

यादें

सेक्टर-49 पुलिस स्टेशन में और भी मां-बाप थे जो फटे पुराने गंदे कपड़ों, जूते-चप्पलों, बैग आदि के ढेर में अपने बच्चों की आकृति देखने का प्रयास कर रहे थे। सभी भावुक थे और कुछ कपड़ों को इधर से उठाकर उधर को फेंकते, तो इसी उम्मीद के साथ कि काश! उनके बच्चे के कपड़े इस ढेर में न हों, कम से कम एक आस एक उम्मीद तो बाकी रहेगी कि बच्चा मरा नहीं गायब है। लेकिन अपने जिगर का टुकड़ा जब गायब होता है तो उसकी यादें, उसके कपड़े, उसकी चीज़ें मन में ऐसे बस जाती हैं जैसे पत्थर पर लकीर। दर्द मिटता ही नहीं। तभी 24 वर्षीय जेम्स थापा ने एक कपड़ा उठाया, ‘अरे, यह तो मेरी बेटी निशा का नहीं है।

निठारी कांड से जुड़ी तस्वीर। साभार : गूगल

लेकिन तभी जेम्स थापा के हाथ में एक नीला धारीदार टॉप आ गया। उसे देखते ही वह फूट-फूटकर रोने लगा, ‘ओह निशा! तुझे भी इन दरिंदों ने नहीं छोड़ा।

जेम्स थापा का अपना कोई बच्चा नहीं था इसलिए उसने अपनी बहन की लड़की निशा को गोद ले लिया था। निशा 11 बरस की हो गयी थी और अक्सर जेम्स के साथ उसके फास्टफूड के ठेले पर चली जाती थी। लेकिन 21 मई 2006 को जेम्स थापा जल्दी ही ठेले के लिए चल दिया यह कहता हुआ, ‘बेटी, नाश्ता करके तू जल्दी आ जाना।

लेकिन निशा नहीं आयी। और आज यह नीला टॉप उसके हाथ में वह पूरी दास्तान कह रहा था जो निशा के साथ गुजरी थी। हालांकि 17 दिसम्बर 2006 को थापा की पत्नी ने आखिरकार एक लड़के को जन्म दिया, लेकिन अपनी गोद ली हुई बेटी निशा को खोने का दर्द दूर करने के लिए वह काफी न था।

दूसरी तरफ 32 वर्षीय सोनिया असलम एक लाल अंडरवीयर को घूरे जा रही थी, ‘मेरे बेटे ने यही अंडरवीयर उस दिन पहन रखा था। हाय! मेरा नौ साल का लाल....शैख राजा...शनिवार था, स्कूल की छुट्टी थी...दोस्तों के साथ खेलने गया....और फिर नहीं लौटा।

कुछ माता-पिता को ढेर में अपने बच्चों की कोई चीज़ नज़र नहीं आयी। रीटा हलधर के हाथ में एक जोड़ी चप्पल थे, ‘नहीं...नहीं...ये दीपाली के नहीं हो सकते। दीपाली...मेरी बारह साल की बेटी...नहीं नहीं...ये चप्पल दीपाली के नहीं हैं। दीपाली नहीं मर सकती...।

लेकिन रीटा हलधर गलत थी।

18 जुलाई 2006 को दीपाली के गायब होने के बाद रीटा हलधर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए गयी थी। इंस्पेक्टर के पैरों में गिरते हुए उसने कहा था, ‘साहब मेरी बेटी को ढूंढ़ने में मेरी मदद कीजिए, साहब मेरी बारह साल की बेटी...मेरी प्यारी बेटी...उसे ढूंढ़िए।

 

पाल नहीं सकते तो बच्चे पैदा क्यों करते हो?’ इंस्पेक्टर ने रीटा को पैर से धक्का देते हुए कहा था।

कपड़े, जूते-चप्पलों के ढेर को देखकर कुछ मां-बाप इतने भावुक हो उठे थे कि यादें भी उन्हें धोखा दे रही थीं। जतिन सरकार ने ऑरेंज रंग का सूट उठाया और अपनी बेटी पिंकी को याद करके रोने लगा। वह अपनी बेटी की याद में इतना गुम हो चुका था कि उसे ये याद ही नहीं था कि गायब होने के दिन पिंकी ने ऑरेंज नहीं पीला और सफेद सूट पहन रखा था। जतिन सरकार तो बस रोता ही जा रहा था, इस बात से बेखबर कि पीला और सफेद सूट उसके पैरों के बिल्कुल बराबर में पड़ा था।

निठारी कांड का गुनाहगार मोनिंदर सिंह पंधेर । फोटो साभार : गूगल

गोल्डी

रोसियाना जिला लुधियाना में एक छोटा सा गांव है। यह इस जिले के उन 32 गांवों में से एक है जिनमें पंजाब की शक्तिशाली पंधेर जाति रहती है। सूचना के इस तेज़ रफ्तार दौर में नोएडा के सेक्टर-31 की कोठी नंबर डी-5 के वीभत्स कारनामों की खबर यहां तक पहुंच चुकी है। सभी पंधेर चिंतित हैं कि अपनी बिरादरी को इस बदनामी से कैसे दूर रखा जाए? इसलिए पंधेर संघ की बैठक बुलायी गयी है।

पंधेरों को गर्व है कि वे महाभारत के कर्ण के वंशज हैं। पंधेर मूलरूप से किसान हैं और शांतिप्रिय नागरिक। पंजाब के आतंक युग में भी पंधेरों ने शांति और देशभक्ति के अपने चरित्र को कायम रखा था। अपनी बहादुरी और मेहनत से पंधेरों ने अपने आर्थिक व शैक्षिक स्तर में बहुत कम अरसे में जबरदस्त उन्नति की है।

पंधेर मूलतः बाबा सिद्ध पंधेर के अनुयायी हैं। किसी भी खुशी के अवसर पर बाबा का आशीर्वाद आवश्यक है। घर में बच्चे का जन्म हो या किसी जवान की शादी, उसे तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक बाबा की समाधि पर जाकर उनका आशीर्वाद न ले लिया जाए। बाबा के दरबार पर हर साल एक जबरदस्त मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले के ज़रिए जो पैसा एकत्र हुआ, उससे पंधेर समुदाय ने एक हाईस्कूल का भी निर्माण किया है।

लेकिन प्रगतिशील नजरिये का पंधेर संघ आज उदास है। लटके हुए चेहरों की खामोशी को तोड़ते हुए संघ के अध्यक्ष जसविंदर सिंह पंधेर उठे और बोले, ‘नोएडा के पास निठारी गांव में बच्चों के कंकाल बरामद हुए हैं। पुलिस और मीडिया का कहना है कि बच्चों को मारने से पहले उनके साथ यौन दुष्कर्म किया गया, उनकी अश्लील फिल्में बनायी गयीं, उनके गुर्दे, जिगर, आंखों आदि को निकालकर बेचा गया और उनके मांस को जानवरी के गोश्त की तरह भूनकर खाया गया। इस निंदनीय व अमानवीय हरकत में डॉक्टर, पुलिस और बड़े-बड़े नेता शामिल हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल इस घिनौनी हरकत के लिए मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेन्द्र को दोषी ठहराया गया है। पंधेर समाज के लिए यह बहुत शर्म की बात है। आज हम एक आपात बैठक के तहत अपने समाज के पूर्वजों के गांव रोसियाना में इकट्ठा हुए हैं ताकि तय कर सकें कि मोनिंदर सिंह का क्या किया जाए?’

अध्यक्षीय भाषण के उपरांत रोसियाना गांव के सरपंच अमर सिंह पंधेर उठे और बोले, ‘मैं जब भी किसी से मिलता हूं तो पहला सवाल होता है क्या मैं मोनिंदर का रिश्तेदार हूं? सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है, लेकिन क्या करूं इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि मोनिंदर हमारी ही बिरादरी का है।

सरपंच जी, आप यह कैसे कह सकते हैं कि मोनिंदर, पंधेर है? उसका गांव लोहत बड्डी तो पंधेर संघ में शामिल 32 गांवों में से नहीं है,’ संघ के एक सदस्य ने सरपंच को बीच में ही टोकते हुए कहा।

लोहत बड्डी गांव पंधेर संघ में नहीं है लेकिन मोनिंदर अपने बाप-दादाओं के ज़माने से पंधेर समाज का सदस्य है। इसलिए हम यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते कि मोनिंदर का गांव पंधेर संघ में नहीं है इसलिए वह पंधेर नहीं है,’ अमर सिंह पंधेर ने जवाब दिया।

आप सही कहते हैं। हमें इस बात में नहीं उलझना चाहिए कि मोनिंदर पंधेर है या नहीं, बरसों से हम उसे पंधेर स्वीकार करते आ रहे हैं इसलिए अब मुद्दा यह है कि उसने हमारी पूरी बिरादरी पर जो बदनामी का दाग लगाया है, उसकी रौशनी में मोनिंदर का क्या किया जाए?’ संघ के सलाहकार रघबीर सिंह पंधेर ने कहा।

साले को जान से मार दो।

बोटी-बोटी करके कौओं को खिला दो।

यह दरिंदा तो हमारी बिरादरी का ही नहीं पूरी इंसानियत का दुश्मन है। इसे इतनी कड़ी सजा दी जाए कि इसकी आगे आने वाली नस्लें भी कांप जाएं।

बैठक में हर तरफ से ऐसे ही सुझावों का शोर-शराबा था। स्थिति हाथ से निकलते देख जसविंदर सिंह पंधेर चिल्लाये, ‘सुनो...सुनो...शांति रखो। जज़्बात में आने की जरूरत नहीं है। जो काम हमारा नहीं है, पुलिस व अदालत का है, वह हम कैसे कर सकते हैं। हमें तो अपने अधिकारों के दायरे में ही रहकर सोचना होगा।

तो इसका एक ही इलाज है-मोनिंदर और उसके परिवार का बिरादरी में हुक्का-पानी बंद कर दिया जाए,’ रघबीर सिंह पंधेर ने सुझाव दिया।

हां...हां...यही सही है। यही ठीक रहेगा। उसके पूरे खानदान का आज से हुक्का-पानी बंद कर दो,’ चारों से एक स्वर में यही आवाजें आने लगीं।

तब आखिर में संघ के अध्यक्ष जसविंदर सिंह पंधेर उठे और बोले, ‘सब सदस्यों की भावनाओं और सुझावों को मद्देनजर रखते हुए पंधेर समाज की यह पंचायत सर्वसम्मति से इस नतीजे पर पहुंची है कि मोनिंदर सिंह और उसके परिवार का बिरादरी से हुक्का-पानी बंद किया जाता है। यह आदेश आजीवन लागू रहेगा, हां अगर अदालत ने मोनिंदर को निर्दोष पाया, जैसा कि उसका पुत्र करनदीप सिंह कहता है, तो यह हुक्म वापस ले लिया जायेगा। अब संघ के सलाहकार रघबीर सिंह पंधेर आपको बतायेंगे कि मोनिंदर व उसके परिवार को बिरादरी से निष्कासित करने का जो सर्वसम्मति से फैसला लिया गया है, उसका विस्तृत अर्थ क्या है।

रघबीर सिंह पंधेर ने उठते हुए कहा, ‘बिरादरी से हुक्का-पानी बंद करने के मायने हैं कि मोनिंदर व उसका परिवार पंधेरों के 32 गांवों में से किसी एक में भी कोई जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकते हैं, इन गांवों में वे किसी के यहां न पानी पी सकते हैं न दूध और न ही कुछ खा सकते हैं। उनमें से कोई भी पंचायत की जमीन पर चल भी नहीं सकता। पंधेर समाज का कोई सदस्य उनसे बात तक नहीं करेगा और बिरादरी का कोई व्यक्ति उसके परिवार में अपनी बेटी नहीं ब्याहेगा।

उधर मोनिंदर के पैतृक गांव लोहत बड्डी में बच्चों के नरसंहार की खबर सुनकर पहले तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि गोल्डी भी ऐसा कर सकता है। मोनिंदर को गांव में सब गोल्डी के नाम से ही पुकारते हैं। खबर पर यकीन न करने की वजह साफ थी। ग्रामवासियों ने गोल्डी का जो रूप देखा था वह नोएडा के दानव से बिल्कुल भिन्न था।

अब से 55 बरस पहले गोल्डी का जन्म लोहत बड्डी में संपूरन सिंह पंधेर के घर हुआ था। उसके परिवार के पास गांव में साठ एकड़ जमीन है जिसमें से आधी मोनिंदर की है। इस लिहाज से गोल्डी संपन्न किसान परिवार में पैदा हुआ और उसकी अच्छी शिक्षा के लिए उसे बिशप कॉटन शिमला में दाखिल कर दिया गया। जहां से उसने 1973 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। 1974 में गोल्डी ने सेंट स्टीफेंस दिल्ली में इतिहास (ऑनर्स) से एम.ए. किया और 1977 में आईएएस की परीक्षा में सफलता हासिल की। लेकिन घर के बढ़ते कारोबार को मद्देनज़र रखते हुए गोल्डी ने आईएएस ज्वाइन नहीं की।

मोनिंदर सिंह पंधेर का बिजनेस देश के अनेक शहरों में फैला हुआ है। नोएडा के अलावा अम्बाला, हल्द्वानी, देहरादून व चंडीगढ़ में भी उसका कारोबार है। इस समय मोनिंदर की करोड़ों रुपये की संपत्ति अकेले अम्बाला में ही है। अम्बाला के सपाटू रोड पर उसका पैतृक घर है जिसे उसने 2002 में बेच दिया था लेकिन बाद में वापस भी खरीद लिया। इसके अलावा अम्बाला के मोटर मार्केट में पंधेर ट्रांसपोर्ट है। इस ट्रांसपोर्ट में 14 ट्राले 10 टायर के और 18 ट्राले (घोड़े) 16 टायर वाले शामिल हैं। पंधेर के नाम से मंडौर गांव में अंबुजा सीमेंट का डम्प है। यह सब मोनिंदर को पैतृक संपत्ति के रूप में मिला है इसके अलावा उसका धूलकोट के समीप पंधेर पेट्रोल पम्प भी था, जिसे तकरीबन दस वर्ष पहले बंद कर दिया गया। पंधेर के ऑफिस व घर नोएडा व चंडीगढ़ के अलावा हल्द्वानी, देहरादून, हरिद्वार, बागपत, अम्बाला और मोहाली में भी हैं।

गोल्डी जब आठ वर्ष का था तो उसकी मां का पारिवारिक कलह के चलते निधन हो गया। लेकिन इसके बावजूद उसके स्कूल के साथियों का कहना है कि वह मृदुभाषी, दूसरों की मदद करने वाला और खुशमिजाज लड़का था। पढ़ाई में वह ठीक था, सभी विषयों में औसत अंक आते थे लेकिन अंग्रेजी में वह बहुत अच्छा था।

मोनिंदर शिक्षित भी था और सम्मानित भी। इसी बात से प्रभावित होकर मेसर्स क्लासीफाइड ऑटो डिस्ट्रीब्यूटर्स, नोएडा सेक्टर-2 ने उसे अपने यहां बतौर निदेशक नियुक्त किया। यह कंपनी जमीन की खुदाई से संबंधित मशीनें बनाती है। इसे सन् 2000 में पंचशील पार्क, दिल्ली के आशीष आनंद और अमरप्रीत आनंद ने दिल्ली के अशोक कुमार बजाज से खरीदा था। तभी से मोनिंदर इसका निदेशक है। आशीष आनंद का कहना है, ‘मोनिंदर की नियुक्ति पारिवारिक सम्बंध, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा को देखकर की गयी थी।

मोनिंदर पहले दिल्ली के पास गाजियाबाद की पॉश कालोनी कौशाम्बी में रहता था। आनंद विहार बस अड्डे के ठीक बगल में बने गोवर्धन टावर में उसका अपना एमआईजी फ्लैट था जिसका नंबर था-206। इस फ्लैट में मोनिंदर ने नोएडा से पहले की अपनी जिंदगी गुजारी। फ्लैट एकदम सामान्य था और उसमें आम फ्लैटों की तरह वुडन वर्क तक नहीं था। इसमें मोनिंदर बहुत ही सामान्य जीवन गुजार रहा था, जिसे देखकर उसके बहुत ऊंचे होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था।

कौशाम्बी में मोनिंदर को जानने वालों के मुताबिक वह बढ़िया इंसान था, सबसे मिलने-जुलने व बातचीत करने की आदत की वजह से सभी उसकी तारीफ करते थे। वह बिल्कुल सामान्य व्यक्ति प्रतीत होता था, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि पिछली रात डिनर में उसने किसी बच्चे का जिगर खाया था।

कौशाम्बी में मोनिंदर के फ्लैट के करीब दूसरे फ्लैट में बतौर ड्राइवर काम कर रहे कमलेश राय के अनुसार, ‘मोनिंदर के व्यवहार पर मुझे कभी भी शक नहीं हुआ। मैंने जब पहली बार अखबारों में उसकी तस्वीर देखी, तो एक लम्हा यह यकीन करना मुश्किल हो गया कि क्या वही मोनिंदर सिंह पंधेर है जो हमारे पड़ोस में रहता था। यहां पर तो उनका व्यवहार एकदम सामान्य था और किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। मैंने तो कभी उन्हें शराब पीते हुए या नशे में देखा नहीं। हां, एक बार ऐसा हुआ था कि पार्किंग में कार का दरवाजा खुला रह गया था। ड्यूटी पर तैनात गार्ड ने शीशे चढ़ाकर गाड़ी का दरवाजा लॉक कर दिया। लेकिन इस बात पर मोनिंदर नाराज हो गया। उसने गार्ड पर 1000 रुपये का जुर्माना लगा दिया। इस हंगामे से निपटने के लिए सोसायटी की मीटिंग बुलायी गयी लेकिन मोनिंदर गार्ड से पैसे लेकर ही माना।

बहरहाल, तकरीबन तीन साल पहले मोनिंदर ने कौशाम्बी का अपना फ्लैट 17-18 लाख में बेच दिया। उसने अपना यह फ्लैट कौशाम्बी के एक प्रापर्टी डीलर विनोद गर्ग की मार्फत एक निजी कंपनी में काम करने वाले जी.एस. सक्सेना बेचा था। फ्लैट में सीवेज की भी शिकायत थी। इस बारे में जी.एस. सक्सेना की पत्नी ने श्रीमती मोनिंदर से बातचीत की थी। तब देवेन्दर कौर यानी मोनिंदर की पत्नी ने श्रीमती सक्सेना से कहा था कि ऐसी शिकायत थी जरूर लेकिन उसे दूर किया जा चुका है। गोवर्धन टावर की जिंदगी के दौरान मोनिंदर के पास एक साधारण सी कार थी और वह मीडिल क्लास जिंदगी बसर कर रहा था।

फ्लैट बिकने के बाद मोनिंदर का कौशाम्बी से रिश्ता टूट गया और उसने नोएडा के सेक्टर-31 में निठारी गांव के पास कोठी नंबर डी-5 खरीद ली।

लोहत बड्डी के निवासियों को मोनिंदर एक दयालु व्यक्ति के रूप में याद है जो अपने नौकरों और गरीब लोगों पर विशेष रूप से मेहरबान रहता था। उसके चाचा सुखदेव सिंह पंधेर कहते हैं, ‘मेरे भाई सम्पूरन सिंह अपने बेटे गोल्डी को अक्सर डांटा करते थे कि वह नौकरों पर बिलावजह जरूरत से ज्यादा मेहरबान रहता है। मई 2006 में जब गोल्डी अपने पिता के निधन के अवसर पर गांव आया था, तब भी मैंने उससे कहा था कि नौकरों को ज्यादा मुंह नहीं लगाया करते। अब देखो, नौकरों को मुंह लगाने का नतीजा कैसा सामने आया है। मेरा तो शर्म से सिर नहीं उठता।

सुखदेव सिंह की हां में हां मिलाते हुए लोहत बड्डी के सरपंच मंजीत सिंह बोले, ‘गोल्डी ने तो अपने खानदान और हमारे गांव का नाम मिट्टी में मिला दिया। उसे इतनी सख्त सजा मिलनी चाहिए कि कोई दूसरा उस जैसा करने की हिमाकत न कर सके।

लेकिन लोहत बड्डी के लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही है कि उनका गोल्डी जो बच्चों से प्यार करता था और गरीब बच्चों की मदद भी करता था, ताकि वे शिक्षित हो सकें, ऐसी घिनौनी हरकत कैसे कर सकता है। गोल्डी ने अपने बेटे करनदीप से एमबीए के लिए कनाडा भेजते हुए कहा था, ‘आदमी पैसे से नहीं शिक्षा से तरक्की करता है।’ 

जारी......










Leave your comment