नन्ही पूजा को इंसाफ दिलाने आगे आई नन्ही मेहनाज़

सत्यकथा , किस्त-5, शनिवार , 05-08-2017


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निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5 : किस्त 5

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

मेहनाज़ आलम-2

मेहनाज़ आलम को तीन बार उठाने की कोशिश के चंद माह बाद निठारी कांड प्रकाश में आ गया था। हर न्यूज़ चैनल आरोपियों की तस्वीरों के साथ इस सिलसिले में विस्तृत रिपोर्टें प्रसारित कर रहा था।

14 जनवरी 2007 की दोपहर मेहनाज़ के घर पर सभी लोग बैठे हुए इतवार के कार्यक्रम टीवी पर देख रहे थे। सभी के चेहरों पर हंसी थी क्योंकि फिल्मी चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम मेरी भैंस को अंडा क्यों मारा?’ में फिल्म हेराफेरी का एक दिलचस्प दृश्य दिखाया गया था। कार्यक्रम में जैसे ही ब्रेक लिया गया, तो मुनव्वर आलम ने रिमोट हाथ में लेकर चैनल बदल दिया और ताजा खबरों के लिए एक न्यूज़ चैनल लगा दिया। निठारी कांड की समीक्षा के साथ जैसे ही स्क्रीन पर सुरेन्द्र कोली का चेहरा दिखाया गया, तो कुछ पहचानते हुए मेहनाज़ की चीख निकल गयी।

क्या हुआ? बेटी मेहनाज़ क्या हुआ?’ शमशाद बेगम ने अपनी बेटी को बाहों में भरते हुए पूछा।

अम्मी...अम्मी...ये वही आदमी है जो मुझे हैंडपम्प के पास मिला था।

कौन?’

जिसे टीवी पर दिखाया जा रहा है।

यह तो निठारी के बच्चों का कातिल सुरेन्द्र कोली है।

हां, यही है जो मुझे हैंडपम्प के पास मिला था और फिर एक बार यह स्कूल में भी मुझे लेने आया था।

बिटिया की बातें सुनकर पूरा घर सकते में आ गया। इस बार शमशाद बेगम को यकीन था कि उनकी बेटी कोई कहानी नहीं गढ़ रही है बल्कि सच बोल रही है। अब घर के किसी सदस्य में इतनी हिम्मत न थी कि न्यूज़ चैनल को बदलकर वापस मेरी भैंस को अंडा क्यों मारादेखता।

न्यूज़ चैनल पर मोनिंदर सिंह पंधेर की नौकरानी माया सरकार की तस्वीर भी दिखायी गयी और खूनी कोठी डी-5 की भी। मेहनाज़ उन दोनों को पहचानते हुए बोली, ‘अम्मी, जिस दिन स्कूल से लौटते में मेरी भइया से लड़ाई हो गयी थी, उस दिन यही आंटी मुझे उस सफेद घर की ओर ले जा रही थी। भइया...भइया...तुझे याद है जब तू लौटा था अपने दोस्तों के साथ तो इसी आंटी ने तो मेरा हाथ पकड़ रखा था?’

हां, अम्मी, यही औरत थी जो जबरदस्ती मेहनाज़ को उसका बैग उठाकर उस घर की तरफ खींच रही थी,’ भाई ने अपनी याद्दाश्त को ताज़ा करते हुए सहमति व्यक्त की। 

शमशाद बेगम खबर की पुष्टि होते ही दहल गयीं। उन्हें न्यूज़ चैनल पर दिखायी जा रही हड्डियों में अपनी बेटी की हड्डियां दिखायी देने लगीं। उनका ब्लडप्रेशर बढ़ गया और सख्त सर्दी के आलम में भी माथे पर पसीने की बूंदें नज़र आने लगीं। मुनव्वर आलम असमंजस में थे। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। क्या करें? -बीवी को संभालें, बेटी को संभालें या खुद को संभालें या सीबीआई को जाकर सब कुछ बतायें। अब निठारी पुलिस की जगह सीबीआई इस कांड की जांच कर रही थी।

टीवी स्क्रीन पर कुछ और हड्डियां दिखायी गयीं। मेहनाज़ स्क्रीन से नज़रें नहीं हटा पा रही थी। कुछ और हड्डियां स्क्रीन पर आयीं तो मेहनाज़ बोली, ‘अम्मी..अम्मी, क्या ये पूजा का कंकाल है?’

मुझे क्या पता? चुप कर। और तुमने ये क्या डरावनी खबर लगा दी है,’ शमशाद बेगम ने मेहनाज़ और अपने पति से कहा।

मेहनाज़ की दोस्त थी पूजा

पूजा निठारी गांव की बस्ती में रहती थी। वह मेहनाज़ के साथ डीपीएस नोएडा में ही पढ़ती थी। दोनों में गहरी दोस्ती थी। वापस स्कूल से भी दोनों साथ ही लौटती थीं। मुख्य मार्ग से मेहनाज़ सेक्टर 36 की ओर मुड़ जाती थी और पूजा निठारी गांव में जाने के लिए सेक्टर-31 की वह सड़क पकड़ लेती थी जो डी-5 के सामने से होकर निकलती है।

एक रोज स्कूल से लौटते हुए जब मोड़ पर अलग होने का समय आया तो मेहनाज़ ने हाथ हिलाते हुए कहा, ‘बाय पूजा। कल मिलते हैं स्कूल में। होमवर्क जरूर करके आना नहीं तो आज की तरह मैम तुझे फिर डांटेंगी।

ओके बाय। होमवर्क कर लाऊंगी, ज़रूर। ओके कल मिलेंगे,’ पूजा ने भी हाथ हिलाते हुए अलविदा कहा और सेक्टर-31 की तरफ मुड़ गयी।

ओके बाय बाय,’ मेहनाज़ ने फिर अलविदा किया। उसे क्या मालूम था कि वह आखिरी बार अपनी प्यारी सहेली को देख रही है। 

पूजा का शिकार!

स्कूल में डांट की वजह से पूजा उदास थी और भारी मन से आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखते हुए घर की ओर बढ़ रही थी। डी-5 के गेट पर सुरेन्द्र खड़ा था। उसकी पूजा पर बहुत दिनों से नज़र थी। आज सड़क पर दूर दूर तक कोई नहीं था। पूजा भी अकेली थी। उसे शिकार के लिए यह मौका बिल्कुल उपयुक्त लगा। पूजा जब डी-5 के ज्यादा करीब आ गयी तो वह बोला, ‘अरे इतने सुंदर चेहरे पर उदासी के बादल? क्या हो गया बेटा?’

कुछ नहीं अंकल,’ पूजा ने जवाब दिया।

कुछ तो बात है वरना मेरा बेटा इतना उदास तो कभी नहीं होता। स्कूल में कोई बात हो गयी क्या?’

नो अंकल।

कुछ तो हुआ है। बताओ न।

अंकल होमवर्क नहीं किया था डांट पड़ी मैम से।

कोई बात नहीं। कल पूरा करके चली जाना। लो, अब चॉकलेट खा लो।

नो अंकल, थैंक यू।

ले लो, देखो अंकल कितने प्यार से तुम्हारे लिए चॉकलेट लाये हैं।

नो अंकल, थैंक यू।

अंकल भी कह रही हो फिर अंकल से चॉकलेट भी नहीं ले रही।

नहीं, मम्मी ने मना किया है। किसी से कोई चीज नहीं लेना।

दूसरे लोगों के लिए ही तो मना किया होगा अंकल से तो नहीं।

नो अंकल, मुझे देर हो रही है मैं जा रही हूं।

मैं तुम्हें कहां रोक रहा हूं। लो, चॉकलेट लो और जाओ।

पूजा को चॉकलेट का लालच आ गया। वह आधा गेट खोलकर खड़े हुए सुरेन्द्र के पास चॉकलेट लेने के लिए बढ़ी। सुरेन्द्र ने तेजी से चारों तरफ नज़र दौड़ाई। दूर तक उसे कोई दिखायी नहीं दिया। पूजा जैसे ही उसके पास आयी उसने अपने हाथ की चॉकलेट उसे दी और दूसरे हाथ से उसके मुंह पर झपट्टा मारा। सुरेन्द्र का हाथ सीधा पूजा के होठों पर पहुंचा और उसने एक झटके में ही पूजा को कोठी के अंदर खींच लिया। पूजा के मुंह से चीख निकलने की भी गुंजाइश न थी और वह जबरन डी-5 के अंदर खींच ली गयी जहां से बाहर उसे फिर कभी नहीं देखा गया।

अब क्या किया जाए...?

उधर मेहनाज़ के घर में कशमकश का आलम था। शमशाद बेगम व मुनव्वर आलम को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? शमशाद बेगम ने तो वुजू किया और दो रक्अत शुक्राने की नमाज़ अदा की कि उनकी बेटी तीन कोशिशों के बाद भी जालिमों के हाथ नहीं लगी। यह शायद कुदरत का ही कोई करिश्मा था कि मेहनाज़ डी-5 में प्रवेश न कर सकी और उसकी जान महफूज़ रही।

नमाज़ पूरी करने के बाद शमशाद बेगम ने सलाम फेरा और अपने पति से बोलीं, ‘अब क्या किया जाए?’

करना क्या है, चुपचाप बात को पी जाओ। इस बात का किसी से जिक्र भी मत करना।

लेकिन बच्चों को कैसे समझाएंगे?’

समझाना तो पड़ेगा वरना मुसीबत में आ सकते हैं।

मुसीबत में क्यों? अब तो कातिल जेल में है। जेल से बाहर कोई निकलेंगे कि हमें परेशान करेंगे।

इस मामले को छोटा-मोटा मत समझो। इसमें बहुत बड़े-बड़े लोग शामिल हैं। मोनिंदर और सुरेन्दर तो सिर्फ दो ही मोहरे हैं।

और कौन लोग इसमें शामिल हो सकते हैं?’

देख, यह सिर्फ बच्चों को उठाकर उनके साथ बदफेली करके उन्हें मारने तक का ही किस्सा नहीं है। इसमें मुझे लगता है बहुत बड़ा धंधा किया जा रहा है।

धंधा कैसा?’

अब कुछ भी हो सकता है। हो सकता है बच्चों के अंग निकालकर बेच रहे हों या उनकी ब्लू फिल्में बनाकर बेच रहे हों या कहीं उनका गोश्त सप्लाई कर रहे हों...

गोश्त....इंसान का गोश्त....भला इंसान का गोश्त भी कोई खाता होगा?’

सुरेन्दर ने अहमदाबाद में हुए अपने नारको एनलिसिस में कुबूल किया है कि वह कबाब की तरह भूनकर बच्चों का मांस खाता था।

वह तो शकल से ही दरिंदा नज़र आता है। जरूर खाता होगा। लेकिन तुम तो कह रहे थे गोश्त सप्लाई...?’

हो सकता है जिस तरह से बच्चों के ज्यादातर धड़ नहीं मिले हैं। फिर हड्डियों पर भी तो मांस नहीं मिला है।

वह तो सड़-गल गया होगा।

कब्र में भी मुर्दे को सड़ने में कई साल का वक्त लगता है। नाले में से जितनी साफ हड्डियां मिली हैं उनसे यही लगता है कि चाकू से उनका मांस उतारा गया है।

इस हरामी ने अपने खाने के लिए ही उतारा होगा।

खुद इतना कोई खा लेगा या तो और लोग भी दावत उड़ाते होंगे या कहीं सप्लाई करते होंगे।

सप्लाई...?’

तुझे याद है कोई आठ-दस महीने पहले अखबार में एक खबर थी कि एक होटल में इंसान का मांस परोसा जा रहा है। किसी की प्लेट में एक बच्चे की उंगली आयी थी।

हाय-हाय मुए कितने जालिम हैं। अल्लाह करे इनके कीड़े पड़ जाएं।

ऐसे जालिमों को तो कोसने से भी कोई फायदा नहीं है। अब आ जायेगी अपने आप ही सामने।

लेकिन हम क्या करें? ये मेहनाज़ तो चुप रहने से रही। कहीं न कहीं बक ही देगी। वैसे भी ये बहुत बातूनी है। फिर इसकी बातें अगर पुलिस तक पहुंच गयीं तो हमसे कहा जायेगा जब जानते थे तो आकर बतलाया क्यों नहीं?’

ये बात तो है।

तो फिर कुछ करो..

क्या करूं? किसके पास जाऊं? किससे कहूं?’

मुझे क्या पता? मैं इतनी पढ़ी-लिखी थोड़े हूं।

बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी करती है।

ऐसा करो सीबीआई वालों के पास चले जाओ।

नहीं, पहले मैं कुछ सोच लूं। ऐसा करता हूं बहनजी से जाकर सलाह लेता हूं।

कौन बहन जी?’

वही अपनी उषा ठाकुर। वही तो बेचारी गरीबों की मदद करती आ रही हैं।

हां, यही ठीक रहेगा।

जैसा बहन जी कहेंगी, वैसा ही करूंगा।’ 

उषा ठाकुर से मुलाकात

अगले दिन काम पर जाने की बजाय मुनव्वर आलम सीधे उषा ठाकुर के घर पहुंचे। बहन जी यानी उषा ठाकुर अपने बेटे की शादी की तैयारी में लगी हुई थीं। लेकिन इस व्यस्तता के बावजूद उनके लिए निठारी से जुड़ी हुई हर बात प्राथमिकता लिए हुए है। उन्होंने मुनव्वर आलम को बिठाते हुए आने की वजह मालूम की।

बहन जी, मेरी एक सात साल की लड़की है मेहनाज़ आलम। वह दिल्ली पब्लिक स्कूल नोएडा में पढ़ती है। उसकी एक सहेली पूजा भी स्कूल से वापस अपने घर निठारी लौटते हुए गायब हो गयी थी। मुमकिन है वह भी इन दरिंदों का शिकार हो गयी हो।

यह बात तो डीएनए टेस्ट से मालूम होगी। पूजा के मां-बाप को चाहिए कि वे सीबीआई को अपने खून के नमूने दे दें,’ उषा ठाकुर ने मुनव्वर की बात को बीच में ही काटते हुए कहा।

जी, मैं इस सिलसिले में नहीं आया।

फिर...?’

दरअसल, मेरी बेटी मेहनाज़ ने सुरेन्दर और मोनिंदर की नौकरानी माया सरकार का पहचान लिया है। उसका कहना है कि इन दोनों ने उसे भी तीन बार अगवा करने की कोशिश की थी।

अगवा की बात वह अब कह रही है?’

नहीं, उसने जब-जब ये कोशिशें हुईं, तब भी अपनी अम्मी से ये बातें बतायी थीं।

लेकिन तुमने उसी वक्त ही पुलिस को इत्तिला क्यों नहीं दी?’

दरअसल मेहनाज़ बहुत बातूनी है। उसकी अम्मी ने समझा कि वह ऐसे ही कहानियां गढ़ रही है। फिर वह यह भी नहीं जानती थी कि उसको फुसलाने की कोशिश करने वाले कौन लोग थे।

तो फिर अब उसे कैसे मालूम हुआ?’

कल टीवी पर न्यूज़ देखते हुए उसने सुरेन्दर, माया सरकार और खूनी कोठी को पहचान लिया।

मुझे तो पहले से ही शक था कि इसमें माया सरकार भी शामिल है। यह तो बड़ा पक्का सबूत है। हमें तुरंत सीबीआई को इत्तिला करनी चाहिए।

लेकिन ऐसा करने से मुझ पर और मेरे परिवार पर तो कोई परेशानी नहीं आयेगी?’

क्यों आयेगी? आखिर आप अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

बहन जी, आप तो जानती हैं बड़े-बड़े लोग इसमें शामिल हैं। मैं छोटा सा आदमी हूं मेरे लिए तो मुसीबत खड़ी हो जायेगी।

देखो, डरने की जरूरत नहीं है। अब मुझे ही देखो, मेरे बेटे की शादी होने वाली है, पांच-छह दिन ही रह गये हैं, फिर भी मैं अपने फर्ज से मुंह नहीं मोड़ रही।

बहन जी, आप की बात और है।

मैं भी तुम लोगों से अलग थोड़े हूं।

फिर भी बहन जी...

देखो, मुझे मालूम है कि डी-5 में जो कुछ हुआ वह एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा है। तुम्हें तो मालूम ही है कि मैं बहुत दिनों से इस मामले में लगी हुई हूं। पुलिस से जब कुछ मदद न मिली तो मोनिंदर और सुरेन्दर की जासूसी करने के लिए मैंने दो लोगों को उनके पीछे लगाया था। अब जब ये केस खुल गया है तो हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम पीड़ितों को इंसाफ और दोषियों को सजा दिलायें।

बहन जी, यह तो ठीक है मगर इन जालिमों की बहुत ऊंची पहुंच है। ये लोग तो जेल में रहकर भी मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ कुछ भी करा सकते हैं। हमारी हत्या भी करा सकते हैं।

भई डरकर चुप कोई बैठा जाता है। आखिर अपनी बेटी की सहेली पूजा के बारे में भी तो कुछ सोचो। क्या उसे इंसाफ नहीं मिलना चाहिए?’

वो तो ठीक है बहन जी, लेकिन ये लोग कुछ भी करा सकते हैं।

तुम क्या समझते हो, क्या इन्होंने मुझे चुप करने की कोशिश नहीं की?’

आपको भी?’

हां, मुझे भी। पहले तो मेरे पास धमकी भरे फोन आते रहे कि मेरा कत्ल कर दिया जायेगा। मैंने उन पर खास तवज्जो नहीं दी।

फिर...?’

कुछ लोगों ने मेरा पीछा किया। हाल ही में मेरी कार को पीछे से टक्कर मारने की कोशिश की गयी और मेरे पास फोन आया कि मुझे अगर जान प्यारी है तो इस मामले से किनारा कर लूं।

तो फिर अब आप क्या करेंगी?’

अरे मैं इन चीजों से डरने वाली नहीं हूं। अभी दिसंबर में तो एक बंदूकधारी मेरे घर में कूद आया था। उसने मेरी मां के सिर पर पिस्तौल रख दी। इस बीच मैंने कहा कि उषा ठाकुर तो मैं हूं। उसने कहा कि उसे मुझे मारने के लिए सुपारी दी गयी है। मैंने यह सुनते ही शोर मचाया और घर के नौकर और पड़ोसी फौरन दौड़े चले आये। वह भाड़े का हत्यारा फौरन भाग खड़ा हुआ।

आप की जान को तो बहुत खतरा है।

सच के लिए लड़ते हुए सामने खतरा तो आता ही है। मोनिंदर और सुरेन्द्र की जासूसी करने के लिए मैंने अपना पैसा देकर एक आदमी को उनके पीछे लगाया था।

उसने आपको कुछ बतलाया?’

उसने कुछ खास जानकारियां एकत्र की थीं और उन्हें मुझे देने ही वाला था कि अचानक वह गायब हो गया।

आप ने उसे तलाशने की कोशिश नहीं की?’

की, लेकिन पिछले 3 दिसंबर से मुझे उसका कोई पता नहीं है।

उसने आपको कुछ तो बताया होगा?’

हां, उसे निठारी की एक औरत पर शक था। वह बच्चों को बहला-फुसलाकर डी-5 में ले जाती थी। वह बच्चों से कहती कि डी-5 में पूजा-अर्चना चल रही है, प्रसाद मिलेगा, चलो मेरे साथ।

वह औरत जरूर माया सरकार होगी। उसने ही मेरी बेटी मेहनाज़ को खूनी कोठी में ले जाने की कोशिश की थी। मेहनाज़ ने उसे पहचान लिया है।

यह बात तुम्हें सीबीआई से कहनी चाहिए। फिलहाल मुझे लगता है कि सुरेन्द्र और माया सरकार की काली करतूतों की वही एक चश्मदीद गवाह है।

वह तो ठीक है, लेकिन इसके बाद मेरा और मेरे परिवार का क्या होगा?’

मुझे भी तो देखो, मैं इस 54 बरस की उम्र में भी इंसाफ के लिए संघर्ष कर रही हूं।

बहन जी, आपकी बात और है। आप को तो पुलिस प्रोटेक्शन मिल जायेगा। मेरी कौन सुनेगा?’

भई, सीबीआई तुम्हारी भी सुरक्षा करेगी।

बहन जी, हम गरीबों की कौन सुन रहा है। आपकी बातें सुनकर तो मुझे और डर लग रहा है। मेरे लिए तो चुप रहना ही ठीक रहेगा।

घबराने की बात नहीं है। ज़रा पूजा के बारे में सोचो। वह तुम्हारी बेटी की सहेली थी। क्या तुम नहीं चाहोगे कि उसके कातिलों को सख्त से सख्त सजा मिले?’

वो तो मैं चाहता हूं, लेकिन खालिस सीबीआई या अदालत के सामने गवाही देने की बात थोड़ी है। जैसे ही बात खुलेगी अखबार वाले और टीवी वाले भी मुझे और मेरी बेटी को आकर घेर लेंगे। हमारा तो घर से निकलना मुश्किल हो जायेगा।

नहीं। सब लोग तुम्हारा साथ देंगे, तुम्हारी बेटी की हिम्मत की दाद देंगे कि वह इतनी कम उम्र में भी अपनी सहेली को इंसाफ दिलाने के लिए आरोपियों के खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार है।

बात तो आप ठीक कह रही हैं लेकिन एक बार मैं अपने घर पर मशविरा और कर लूं।

मैं चलती हूं तुम्हारे साथ तुम्हारी पत्नी और बच्चों को समझाने के लिए।

नहीं बहन जी, पहले एक बार मैं ही बात कर लूं उनसे,’ यह कहते हुए मुनव्वर आलम ने सलाम किया और अपने घर लौट आया।

'खतरा तो बहुत है लेकिन...'

उषा ठाकुर से हुई बातचीत को उसने अपनी पत्नी से दोहराया। वह भी डर गयी और बोली, ‘जब उषा ठाकुर को मारने की कोशिश की जा रही है तो हम लोगों की बिसात ही क्या है? हमें इस मामले में कुछ नहीं बोलना चाहिए।

खतरा तो बहुत है लेकिन फर्ज से मुंह मोड़ना भी अच्छी बात नहीं है। फिर कुरआन में भी कहा गया है कि जुल्म बर्दाश्त करना भी जुल्म करने के बराबर है।

जब तुम्हें दीन का इतना ही ख्याल आ रहा है तो फिर डर किस बात का? जो होगा देखा जायेगा, अल्लाह मालिक है। हमें मेहनाज़ की बात सीबीआई तक पहुंचानी चाहिए।

हां, यही ठीक रहेगा। इस तरह मेहनाज़ के दिल से भी खौफ निकल जायेगा।

अब तो वह सुरेन्द्र की तस्वीर देखते ही डर के मारे कांपने लगती है। उसे लगता है कि पूजा की तरह वह भी इस दरिंदे का शिकार हो सकती थी।

मेरा मानना है कि सुरेन्द्र का खौफ उसके दिल से गवाही देने पर ही निकलेगा।’ 

और हां, इस तरह उसकी सहेली पूजा को भी इंसाफ मिल जायेगा।’ 










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