...और फिर उस नाले से जो निकला उससे पूरा देश हिल गया

सत्यकथा , किस्त-4, शुक्रवार , 04-08-2017


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निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5 : किस्त-4

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी) 

नंदलाल

शाम सात बजे तक भी जब पायल घर नहीं लौटी तो नंदलाल ने उसके मोबाइल पर कई बार फोन मिलाया। लेकिन हर बार यही संदेश आता-जिस मोबाइल से आप संपर्क करना चाह रहे हैं उसका स्विच ऑफ है, कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें।

मोबाइल स्विच ऑफ की वजह नंदलाल की समझ में न आयी। आखिर थक-हारकर वे बेटी की तलाश में डी-5 पहुंचे। कॉलबेल दबायी, अंदर से सुरेन्द्र निकलकर आया।

पायल कहां है?’ नंदलाल ने मालूम किया।

मुझे क्या पता?’

उसका तुम्हारे मालिक मोनिंदर सिंह जी से अप्वाइंटमेंट था।

तो उन्हें पता होगा।

वे कहां हैं?’

चंडीगढ़ गये हैं।

क्याऽऽ?’

कहा न, चंडीगढ़ गये हैं।

क्यों?’

मुझे क्या पता। मैं नौकर हूं कि साहब हूं। खुद ही मालूम कर लो।

उनका मोबाइल नंबर क्या है?’

सुरेन्द्र ने नंदलाल को मोनिंदर सिंह पंधेर का मोबाइल नंबर दे दिया। नंदलाल ने तुरत ही फोन मिलाया। कुछ देर घंटी बजने के बाद पंधेर ने फोन ऑन करके कहा, ‘हैलो।

सर, मैं नंदलाल बोल रहा हूं पायल का पिता।

कौन पायल?’

जी जिसका आपके साथ आज अप्वाइंटमेंट था।

मैं तो कई दिन से यहां चंडीगढ़ में हूं। मेरे पिता बीमार थे अब उनका निधन हो गया है। मेरे साथ तो किसी का कोई अप्वाइंटमेंट नहीं था।

सर कल आपका फोन आया था उसके पास। आपने आज चार बजे अपनी नोएडा की कोठी पर उसे बुलाया था, इंटरव्यू के लिए।

भई, मैंने नहीं बुलाया। मैं तो पिछली दो तारीख से चंडीगढ़ में हूं। आपको कुछ गलतफहमी हुई है।

नहीं सर, आप ही के यहां से उसे फोन गया था।

मैं यहां अपने बाप के मरने में हूं और तुम बेकार की बातें किए जा रहे हो।

सर मेरी जवान बेटी की बात है....

तो मुझे क्या पता।

सर, कुछ तो बताएं, उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ आ रहा है।

मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं लेकिन मैं हेल्पलेस हूं। मुझे कुछ पता नहीं है। और फिर मैं अपने पिता के शोक में हूं।

सर आप मेरी स्थिति भी तो समझिए।

फिलहाल मैं कुछ नहीं कर सकता। जब दो-चार दिन में नोएडा आऊंगा तो बात करेंगे,’ यह कहकर पंधेर ने फोन स्विच ऑफ कर दिया।

नंदलाल ने हताशा में कई बार पंधेर का फिर फोन घुमाया लेकिन हर बार नंबर देखकर पंधेर उनका फोन काटता रहा।

कई दिन तक नंदलाल डी-5 के चक्कर काटता रहा और पंधेर को फोन मिलाता रहा। पंधेर उसका नंबर देखते ही फोन काट देता। नंदलाल ने जब दूसरे नंबर से फोन मिलाया तो पंधेर ने फिर कहा, ‘मुझे आपकी बेटी के बारे में कुछ नहीं मालूम। मैं चंडीगढ़ में हूं।

सर, आप कुछ तो ख्याल करो। मेरी जवान लड़की का मामला है।

मुझे उसके बारे में कुछ नहीं मालूम मैं पहले भी कह चुका हूं।

सर प्लीज़....

अच्छा तुम मेरी फैक्ट्री के मैनेजर मनोज कुमार शर्मा से संपर्क कर लो। शायद उसने ही कोई इंटरव्यू के लिए अप्वाइंटमेंट दिया हो।

थैंक यू सर।

मैनेजर शर्मा का किसी सूरत फोन नंबर हासिल करके नंद लाल ने जब भी उसे मिलाया, तो वह स्विच ऑफ ही आता रहा।

दूसरी ओर मोनिंदर ने जेब से अपना मोबाइल फोन निकाला और निठारी पुलिस चौकी की इंचार्ज सब-इंस्पेक्टर सिमरनजीत सिंह कौर को फोन मिलाया। तीन-चार रिंग के बाद सिमरनजीत अपना मोबाइल ऑन करते हुए बोली, ‘सत श्री अकाल! सरदार जी।

हां, हैलो!

क्या बात हो गयी? बहुत घबराये नज़र आ रहे हैं?’

अरे वही पायल का बाप नंदलाल...बार-बार फोन किए जा रहा है, साले ने तंग करके रख दिया है।

इसमें चिंता की ऐसी क्या बात है?’

नहीं कुछ खास नहीं...लेकिन जब देखो फोन खटका देता है।

क्या कह रहा है वह?’

वही, पायल के बारे में पूछ रहा था, मुझे क्या पता। मैं तो अपने बाप के मरने में पंजाब था।

आप फिक्र न करो जी। उसे समझा दिया जायेगा। उसके लड़के और बहू को बुलाया है, लिखवा लेंगे कि पायल कॉलगर्ल थी और मुंबई अपने यार के साथ भाग गयी।

ठीक है, यही ठीक रहेगा। लेकिन उसकी जुबान बंद करो, बहुत बोल रहा है।

बंद हो जायेगी, बस आप हमारा ख्याल रखिएगा।

तुम लोगों तक तीन लाख रुपये तो अब तक पहुंच चुके हैं। और पहुंचा दूंगा...बस तुम इस पायल वाले मामले को रफा-दफा करो।

ठीक है, अच्छा सत श्री अकाल,’ कहते हुए सिमरनजीत कौर ने फोन ऑफ कर दिया।

26 वर्षीय पायल उर्फ दीपिका को गुमशुदा हुए तीन माह गुजर गये थे। नंदलाल ने हर मुमकिन जगह पायल को खोजने की कोशिश की लेकिन कोई कामयाबी हासिल न हुई। अब पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के अलावा नंदलाल के पास कोई और चारा न था। उसने निठारी पुलिस चौकी से लेकर एसएसपी नोएडा तक अपनी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी, बल्कि कई जगह तो उसे बेइज्जत होना पड़ा।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

एसओ आर.एन.यादव के पास पहुंचने पर नंदलाल ने कहा, ‘सर, मेरी बेटी पायल 7 मई से गायब है। उसके मोबाइल पर सेक्टर-31 के स्थानीय फोन बूथ से 6 मई को फोन आया था कि 7 मई को शाम चार बजे उसका जेसीबी के डायरेक्टर मोनिंदर सिंह पंधेर के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू है, उनके निवास स्थान डी-5 सेक्टर-31 पर। अमर हलधर के रिक्शे में बैठकर पायल डी-5 गयी थी लेकिन उसका अब तक कोई पता नहीं है। मुझे शक है कि मोनिंदर सिंह पंधेर और उनके नौकर सुरेन्द्र ने उसे अगवा कर लिया है।

अबे शरीफ लोगों पर झूठे इल्जाम लगा रहा है? तेरे पास इसका क्या सबूत है?’ यादव ने आंखें तरेरते हुए कहा।

सर, जाने से पहले मेरी बेटी का मेरे पास फोन आया था।

कहीं और चली गयी होगी अपने यार के साथ।

सर मैंने पता लगाया है कि फोन सुरेन्द्र ने ही किया था और अब वह रिक्शेवाला भी गायब है जो पायल को लेकर डी-5 गया था।

अबे साले, बेटी से धंधा कराता है उसकी कमाई खाता है और फिर शरीफों पर उंगली उठाता है, चल दफा हो।

सर मुझे पूरा यकीन है पंधेर और सुरेन्द्र ने ही मेरी बेटी को अगवा किया है।

मुझे अच्छी तरह मालूम है तेरी बेटी कॉलगर्ल है। कहीं गयी होगी अपने किसी यार के साथ, तू खामख्वाह परेशान मत कर चल दफा हो जा बस।

सर आप रिपोर्ट तो लिख लीजिए।

अबे जाता है या जूते उतारूं। चल दफा हो जा।

निठारी चौकी से लेकर पुलिस के आला अफसरों तक नंदलाल बार-बार पंधेर और उसके नौकर सुरेन्द्र कोली को नामजद कर अपनी बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार करता रहा साथ ही मांग करता रहा कि डी-5 कोठी की इस सिलसिले में तलाशी ली जाए।

लगभग दो माह की भरसक कोशिशों के बाद पुलिस ने पायल की गुमशुदगी की जानकारी दर्ज कर ली। इसी सिलसिले में मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके मैनेजर शर्मा को ससम्मान एसएसपी कार्यालय में बुलाया गया और मामूली पूछताछ करने के बाद उन्हें क्लीनचिट देकर छोड़ दिया गया। बाद में यह खुलासा हुआ कि एक सब-इंस्पेक्टर के हस्तक्षेप पर तत्कालीन सीओ को मामला दबाने के लिए ढाई लाख रुपये की रिश्वत दी गयी और साथ ही उन पर असरदार नेताओं का भी दबाव पड़ा।

लेकिन नंदलाल ने हिम्मत नहीं हारी। 24 अगस्त 2006 को सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत नंदलाल ने सीजेएम शमशेर अली खान की कोर्ट में याचिका दाखिल कर आग्रह किया कि पुलिस को पायल के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश दिया जाए।

जवाब में पुलिस ने अदालत में कहा, ‘पायल कॉलगर्ल थी और वह अपने किसी प्रेमी के साथ मुंबई भाग गयी है। उसका बाप नंदलाल अकारण मोनिंदर और सुरेन्द्र को झूठे मामले में फंसाकर पैसे ऐंठने का प्रयास कर रहा है। उसकी याचिका फर्जी, मनगढ़ंत और काल्पनिक है और इसमें कोई दम नहीं है।

लेकिन पुलिस के जवाब से असंतुष्ट सीजेएम ने 7 अक्टूबर 2006 को मोनिंदर और सुरेन्द्र के खिलाफ एसओ सेवक राम यादव को अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करने और विवेचना कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दे दिया। आरोपियों ने इस आदेश के खिलाफ जिला जज एस.एन.एच. जै़दी की अदालत में अपील की। आरोपियों ने वहां भी पुलिस की रिपोर्ट का ही सहारा लिया। लेकिन जिला जज भी पुलिसिया तर्क से संतुष्ट न हुए और उन्होंने अधीनस्थ अदालत का फैसला बरकरार रखा। नतीजतन पुलिस थाना सेक्टर-20, नोएडा में मोनिंदर व सुरेन्द्र के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366 के तहत एफआईआर 838/06 दर्ज कर ली गयी। अपने को फंसता देख मोनिंदर और सुरेन्द्र ने अपहरण की एफआईआर खारिज कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में दस्तक दी। लेकिन हाईकोर्ट में जस्टिस आर.सी. दीपक और जस्टिस बी.ए. जै़दी की खंडपीठ ने आरोपियों को कोई राहत नहीं दी।

बावजूद इसके पुलिस पंधेर व सुरेन्द्र की मदद करती रही और नंदलाल पर रिपोर्ट वापस करने का दबाव बनाती रही। पुलिस के जुल्म से बचने के लिए नंदलाल ऊधमपुर में अपने पैतृक गांव पिपलिया चले गये। लेकिन जेसीबी कंपनी की जीप में मैनेजर शर्मा के साथ सीओ सिटी दिनेश यादव और निठारी चौकी की प्रभारी सिमरनजीत सिंह कौर नंदलाल को धमकाने और रिपोर्ट वापिस लेने के लिए नंदलाल के गांव तक पहुंच गये।

बलि

26 दिसंबर 2006, मगरूखाल (अल्मोड़ा)। सुरेन्द्र सुबह ही अपने गांव पहुंचा था। गांव में काली माता का वार्षिक मेला लगा हुआ था। वह प्रसिद्ध काली मंदिर में भैंस व बकरी की बलि देने के लिए आया था। कुछ समय अपने परिवार के साथ घर पर बिताने के बाद वह अपनी मां कुंती देवी, पत्नी शांति, बेटी सिमरन और भाई आनंद के साथ काली माता के मंदिर पहुंचा। साथ में एक काली भैंस और काली बकरी भी थी। मंदिर में पूजा करने के बाद उसने गंडासा उठाया और एक ही वार में भैंस की गर्दन धड़ से अलग कर दी। इसके बाद उसने दूसरा वार बकरी पर किया और उसकी भी गर्दन धड़ से अलग हो गयी। फिर उसने कटे हुए सिरों को अपने सिर पर उठाया, खून उसके चेहरे व कपड़ों पर रिस रहा था, वह हल्के हल्के कदमों से काली माता की मूर्ति की ओर बढ़ने लगा। इस तरह भैंस और बकरी के सिरों को काली माता के चरणों में अर्पित कर दिया गया।

घर लौटते वक्त शांति ने सुरेन्द्र से मालूम किया, ‘तुमने बलि देते समय काली माई से क्या मांगा?’

सिमरन का एक भाई आ जाए, तो अच्छा रहे। यही मांगा,’ सुरेन्द्र ने जवाब दिया।

लड़का हुआ तो था, मगर दस माह में ही राम को प्यारा हो गया,’ शांति बोली। बेटे की याद आते ही उसकी आंखें गीली हो गयीं।

उदास क्यों हो रही है, देवी की कृपा रही तो फिर बेटा हो जायेगा,’ कुंती देवी कुमांऊनी में अपनी बहू को दिलासा देती हुई बोली।

अब देखो भगवान की क्या मर्जी हो,’ भरे गले से शांति बोली।

लड़का ही होगा, उस दिन जब दाई तेरा पेट देखने आयी थी उसे लड़के की ही उम्मीद लग रही थी,’ कुंती बोली।

यह तो अच्छी खबर है। तेरे दिन पूरे कब होंगे?’ सुरेन्द्र ने मालूम किया।

अगले महीने...जनवरी के आखिर में शायद दाई कह रही थी,’ शांति कुछ शर्माते हुए बोली।

लेकिन जनवरी तक तो मैं रुक नहीं पाऊंगा,’ सुरेन्द्र बोला।

क्यों?’ कुंती ने पूछा।

काम है कोठी पर, लेकिन फिर लौट आऊंगा। अभी तो 20-25 दिन हैं बच्चा होने में,’ सुरेन्द्र बोला।

आ जरूर जाना,’ शांति बोली।

कोशिश तो आने की रहेगी। न भी आ सका तो पैसे भिजवा दूंगा,’ सुरेन्द्र बोला।

आने की ही कोशिश करना,’ कुंती ने कहा।

अच्छा,’ कहकर सुरेन्द्र कुछ सोचने लगा।

(18 जनवरी 2007 को शांति ने एक लड़के को जन्म दिया)।

बहरहाल, अगले दिन यानी 27 दिसंबर 2006 को नोएडा से सुरेन्द्र के पास एक आदमी आया और वह नोएडा वापस जाने की तैयारी करने लगा। वह अपना सामान बांध ही रहा था कि कुंती देवी ने कहा, ‘सद्दा, तुझे तो 31 को वापस जाना था, अभी से क्यों जा रहा है?’

अम्मा, कुछ जरूरी काम है। फौरन ही जाना पड़ेगा।

आखिर यह आदमी कौन है जो तुझे इतनी जल्दी लग रही है?’

है अपना ही जानकार। मैं जल्द लौट आऊंगा फिर तुझे पूरी बात बताऊंगा,’ यह कहते हुए सुरेन्द्र ने अपनी बेटी सिमरन को प्यार किया और नोएडा के लिए रवाना हो गया।

ऐसे खुला राज़

29 दिसंबर 2006, नोएडा। सुरेन्द्र सुबह तकरीबन आठ बजे डी-5 से बाहर निकला और आहिस्ता-आहिस्ता टहलते हुए निठारी गांव की ओर मुड़ गया। वह दो दिन पहले ही अपने गांव मगरूखाल से भैंस व बकरी की बलि देकर और बलि दिये हुए जानवरों का खून पीकर लौटा था। वह वाटर टैंक के चबूतरे के पास ही पहुंचा था कि पीछे से झब्बू लाल और पप्पू लाल ने उसे धर दबोचा, जैसे उन्हें सुरेन्द्र का ही इंतजार था। उन्होंने सुरेन्द्र को टंकी के नीचे खींच लिया और उसे पीटने लगे।

क्यों बे, पायल कहां है?’ झब्बू ने उसका कॉलर पकड़कर दो तमाचे मारते हुए पूछा।

मुझे क्या पता।

यह ऐसे नहीं मानेगा, साले की दई तोड़नी पड़ेगी,’ पप्पू लाल ने झब्बू लाल से कहा।

दोनों ने सुरेन्द्र को फिर पीटना शुरू कर दिया।

हां तो साले, अब बताता है या और ठुकेगा?’

पीटने से क्या होगा जब मुझे पता ही नहीं है।

तो तुझे कुछ नहीं मालूम...

कह दिया न, नहीं। क्या लिखकर दूं?’

अबे पता तो तुझे है और तू बतायेगा भी। लेकिन इतनी आसानी से नहीं बताने का। स्साले तेरी आंत-ओझड़ी बाहर निकालनी पड़ेंगी।

तुम्हारा पायल से मतलब क्या है?’

उससे तो कुछ मतलब नहीं है लेकिन उसका पता चल गया तो हमें अपनी बेटियों का भी पता चल जायेगा।

तुम्हारी बेटियों से मेरा क्या लेनादेना।

पायल से तो था...

वो तो साली रंडी थी।

जो भी हो, है कहां वो?’

मुझे क्या पता।

ये ऐसे नहीं बतायेगा। पप्पू चाकू निकाल...इसकी अंतड़ियां निकालेंगे।

पप्पू ने चाकू निकाल लिया और सुरेन्द्र की गर्दन पर टिका दिया। मार के आगे तो भूत भी नाचते हैं, सुरेन्द्र तो फिर भी आदमी था। वह टूट गया और बोला, ‘पायल को तो मैंने उसी दिन ही खत्म कर दिया था।

तूने उसे मारकर कहां डाला?’

कोठी के पीछे वाले नाले में।

चल, हमें दिखा।

सुरेन्द्र की कॉलर पकड़े हुए झब्बू लाल और पप्पू लाल उसे नाले की ओर ले गये। नाले में झांकते ही दोनों के होश उड़ गये। नाले में एक नहीं कई नरकंकाल, मानव हड्डियां, खोपड़ियां, चप्पल, जूते, कपड़े आदि पड़े थे। झब्बू लाल को अचानक नाले में अपनी बेटी ज्योति की आकृति नजर आयी और पप्पू लाल की आंखों के सामने रचना की तस्वीर तैर गयी।

दोनों ने अपने आपको संभाला और सुरेन्द्र को घसीटते हुए थाने ले गये। पुलिस के दो थप्पड़ लगते ही सुरेन्द्र ने उगल दिया, ‘पायल, साहब को परेशान कर रही थी। उन्होंने मुझसे कहा इंतजाम करो और मैंने उसे ठिकाने लगा दिया।’ 

ऐसे हुई पायल गायब

पायल को गेट खोलने की जरूरत नहीं पड़ी। डी-5 के दरवाजे उसके लिए पहले से ही खुले थे, जैसे कोई इंतजार में हो। उसने ड्राइंग रूम के दरवाजे को हल्के से धकेला और अंदर प्रवेश कर गयी। सामने सुरेन्द्र खड़ा था।

हां, क्यों बुलाया है?’ पायल ने मालूम किया।

एक ग्राहक है,’ सुरेन्द्र ने जवाब दिया।

मोनिंदर सिंह पंधेर तो नज़र नहीं आ रहे।

वे चंडीगढ़ गये हुए हैं। साहब के पिता की तबीयत बहुत खराब है।

फिर ग्राहक कहां है?’

मैं हूं न।

तू..?’

हां, मैं।

तीन हजार रुपये दे पायेगा?’

नहीं, इतने पैसे तो नहीं हैं मेरे पास।

तो फिर मेरा वक्त क्यों खराब कर रहा है? मैं जा रही हूं।

मेरे पास पांच-छह सौ रुपये हैं।

इतने में मैं कोई धंधा नहीं करती।

अरे, पुराने चाहने वालों को तो कुछ छूट दे दिया कर।

बेकार की बात मत कर। मैं जा रही हूं।

तो हमारा कोई हक नहीं है..?’

नहीं। मुझसे बेकार की बातें करने की जरूरत नहीं है।

अच्छा, कुछ देर बैठ तो जा।

नहीं, मैं जा रही हूं।

एक कप चाय तो पी ले। मैं बस अभी बनाकर लाया।

ठीक है, जल्दी बना के ला,’ इतना कहते हुए पायल ने अपना हैंडबैग एक तरफ रख दिया और सोफे पर बैठ गयी।

सुरेन्द्र ने टीवी ऑन कर दिया और रिमोट पायल के हाथ में पकड़ाते हुए बोला, ‘तुम बस टीवी देखो, मैं अभी चाय बनाकर लाता हूं।

सुरेन्द्र कमरे से बाहर निकल गया और पायल रिमोट से चैनल बदलने लगी। टीवी पर कोई खास कार्यक्रम नहीं आ रहा था, उसने स्थानीय चैनल पर टीवी सेट कर दिया और उस पर आ रहे गानों को सुनने लगी।

पायल गाने सुनने में मस्त थी कि पीछे से सुरेन्द्र दबे पांव आया, उसने ड्राइंग रूम का दरवाजा अंदर से बंद किया और सोफे के पीछे खड़ा हो गया। पायल को जरा भी अहसास न था कि कोई उसके पीछे खड़ा है। सुरेन्द्र ने बहुत फुर्ती से अपने दोनों हाथ पायल के दुपट्टे पर डाले और उसे पायल की गर्दन में लपेटकर जोर से खींचने लगा। दबे गले में से हल्की सी चीख की आवाज ही निकल पायी और वह भी टीवी के शोर में दबकर रह गयी। जैसे-जैसे गले पर दबाव ज्यादा बढ़ता जा रहा था, पायल का हाथ-पैर पटकना भी कम होता जा रहा था। फिर एक मिनट से भी कम संघर्ष के बाद पायल की गर्दन एक तरफ को लुढ़क गयी और उसके हाथ-पांवों ने हरकत करनी बंद कर दी। लेकिन सुरेन्द्र उसकी गर्दन पर जोर बढ़ाता ही गया।

तकरीबन पांच मिनट के बाद जब सुरेन्द्र को पूरा यकीन हो गया कि पायल खत्म हो चुकी है तो उसने दुपट्टे को ढीला छोड़ दिया। उसने पायल को हिला-डुलाकर देखा, वह बेजान पड़ी थी। उसने उसकी नाक के पास हाथ लगाया और सांस अंदर लेने या बाहर छोड़ने का कोई अहसास उसे नहीं हुआ। पायल मर चुकी थी।

तभी एक दम से पायल का मोबाइल बज उठा। सुरेन्द्र ने उसके पर्स में से मोबाइल निकाला, उसे स्विच ऑफ किया और पीछे से खोलकर सिमकार्ड निकाल लिया। सिमकार्ड उसने वापस पायल के पर्स में डाल दिया और मोबाइल को अपनी जींस की पिछली पॉकेट में रख लिया।

पायल की लाश को उठाकर वह ऊपर की मंजिल के बाथरूम में ले गया। बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद करने के बाद वह पायल के बदन से कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा। इसमें उसे दिक्कत हुई, तो उसने कपड़ों को फाड़ना शुरू कर दिया।

अब पायल की लाश एकदम नंगी उसके सामने पड़ी थी। स्साली, मुझे मना कर रही थी, अब मना कर। देखता हूं कौन आता है तुझे बचाने,’ सुरेन्द्र बड़बड़ाया।

कुछ देर वह पायल के बेजान पड़े नंगे बदन को निहारता रहा। फिर उसने एक एक करके अपने कपड़े उतारने शुरू किए। स्साली को पैसे की कितनी हवस थी। हर दम पैसा। साहब पूरा खर्चा उठा रहे थे, हर बार आने पर तीन हजार रुपये देते थे। लेकिन जब देखो अपनी फरमाइशें बढ़ाती रहती थी। आखिर साहब भी कितना देते। आदेश दिया कि निपटा दो, सो निपटा दिया। अब पड़ी है, मांग पैसे मांग, तीन हजार मांग, तुझे मिलेगा ठेंगा...,’ सुरेन्द्र बड़बड़ाता रहा और उस बेजान जिस्म को अपनी हवस का शिकार बनाता रहा।

तकरीबन आधे घंटे बाद सुरेन्द्र पसीने में सराबोर हो चुका था, लेकिन उसका जुनून ठंडा नहीं हुआ था। उसने वहीं बाथरूम में पहले से रखी एक नई छुरी उठायी और पायल का एक वक्ष काट कर अलग कर दिया।

छुरी एक तरफ रखकर उसने कटे वक्ष को दोनों हाथों में पकड़ा और कच्चे इंसानी मांस को ही खाने लगा। उन्माद में उसकी आंखें लाल हो गयी थीं लेकिन उसका मुंह चलता जा रहा था। वह दांतों से वक्ष की एक बोटी नोचता और उसे उल्टा-सीधा चबाकर सटक जाता। फिर बोटी काटता, चबाता और सटक जाता। यह सिलसिला चल रहा था....

सुरेन्द्र कोली अब एन्द्रेई चिकाटीलो, अल्बर्ट फिश, जैफ्री डेहमर और एडवर्ड गीन के साथ दुनिया के उन नरपिशाचों में शामिल हो गया था जो कैनेबलिज़्म यानी इंसानी गोश्त खाकर अपनी सेक्सुअल इच्छाओं को शांत किया करते थे।

मेस्कलीन एक ऐसा एल्क्लॉयड (वनस्पतियों का मूल तत्व, क्षाराभ) है जिसे लेने के बाद ऑर्गेज़्म (सेक्सुअल चरमसुख) होने की भ्रांति पैदा होती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानव मांस खाने पर जैसी भ्रांति मेस्कलीन पैदा करता है वैसी ही भ्रांति होती है। मानव मांस खाने पर खून और दिमाग में एमीनो एसिड्स और विटामिन-ए का स्तर बढ़ जाता है और शायद इसी वजह से आर्गेज़्म होने की भ्रांति उत्पन्न होती है।

ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं कि फीडोफीलिया (बच्चों से दुष्कर्म) और नैक्रोफीलिया (लाश के साथ यौन दुराचार) जैसे सेक्सुअल डिसॉर्डर नैक्रोफेजी या कैनेबलिज़्म (मानव मांस खाने) का भी रूप धारण कर लेते हैं। फोरेंसिक साइकेट्री में यह स्वीकृत तथ्य है कि सेक्सुअल विकृत व्यक्ति अपने मानव शिकार का मांस इसलिए खाता है कि उसे आर्गेज़्म के साथ-साथ अपने शिकार से एकाकार होने का अहसास होता है।

हालांकि अपने देश में तांत्रिक शक्तियां हासिल करने की गर्ज से मानव अंग खाने की मिसालें मिलती हैं, लेकिन ईस्टर्न एलिनॉयस यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक स्टीवन सेचर ने 2002 में सेक्स एंड कैनेबलिज़्मका अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि विकृत व्यक्ति जिसके प्रति सेक्सुअली आकर्षित होता है, उसका मांस खाने को वह प्राथमिकता देता है।

साभार : गूगल

भयानक मंज़र

लेकिन जब पायल की लाश की तलाश में नाले की खुदाई की गयी तो ऐसा भयानक मंजर सामने आया जिसकी कल्पना करना कठिन है। नाले में दस बच्चियों, दो बच्चों और पांच महिलाओं के कंकाल मौजूद थे। यानी डी-5 में सेक्स, हत्या और आदमखोरी का नंगा नाच हो रहा था, पिछले कई सालों से। बाद में सीबीआई को नरकंकालों से भरे 42 पॉलीबैग और मिले डी-5 में से और उसके पास के नाले में से।

शाम को नोएडा के एसएसपी आरकेएस राठौर ने प्रेस से जो कहा उसका सार कुछ इस तरह से है।

पायल के गायब होने के वक्त से ही उसे खोजने के लिए प्रयास किए जा रहे थे। पायल के नोकिया हैंडसेट के आईएमईआई नंबर को निगरानी में रख दिया गया। एक खास नंबर डायल करने पर आईएमईआई से संबंधित फोन की लोकेशन को मालूम किया जा सकता है। मोबाइल कंपनी ने इसे सर्विलेंस पर लगा रखा था। पायल के फोन का सिम बदलकर उसका कोई इस्तेमाल कर रहा था। जैसे ही उस व्यक्ति ने फोन मिलाया तो मोबाइल कंपनी के स्क्रीन पर आईएमईआई नंबर चमक गया और फोन के सही लोकेशन मालूम हो गयी। कंपनी ने तुरंत एसएसपी आरकेएस राठौर को इत्तिला कर दी।

पायल का फोन एक रिक्शा चालक इस्तेमाल कर रहा था। उसे पकड़कर सेक्टर-20 के पुलिस थाने ले जाया गया और पूछताछ की गयी।

यह फोन तेरे पास कहां से आया?’

जी, सवारी रिक्शे में भूल गयी थी।

कौन सवारी?’

जी मैं जानता नहीं।

अबे तो उसे छोड़ा कहां था यह तो जानता होगा।

जी कुछ दिन पहले सेक्टर-31 में जो कोठी नंबर डी-5 है सफेद रंग की, वहां से एक सवारी को लेकर बस अड्डे छोड़ा था। वह सवारी अपना मोबाइल रिक्शे में भूल गयी और मैं इस्तेमाल करने लगा। मेरी कोई गलती नहीं है जी।

पुलिस ने मोबाइल अपने पास रख लिया और मोनिंदर सिंह पंधेर को थाने तलब किया।

पंधेर साहब, यह पायल का मोबाइल है।

अच्छा।

जिस रिक्शे वाले के पास से यह बरामद हुआ है उसका कहना है कि डी-5 जोकि आपकी कोठी है, की सवारी के पास से उसे यह मिला।

मेरे पास तो गाड़ी है मैं तो रिक्शे का इस्तेमाल करता नहीं। मेरे बीवी-बच्चे चंडीगढ़ में रहते हैं।

ध्यान करें आपका नौकर सुरेन्द्र कहीं गया हो...।

वह तो अपने गांव गया हुआ है कई दिनों से, काली मेले में।

पायल का मामला बहुत गंभीर होता जा रहा है, उसका पता-ठिकाना कुछ नहीं मिल रहा है। सुरेन्द्र से पूछताछ करनी होगी।

जब वह लौटेगा तो कर लीजिएगा।

नहीं उसे बुलाएं।

उसके पास फोन तो है नहीं।

कुछ भी करें मगर उसे हर हालत में कल थाने पेश करें।

मैं किसी को भेजकर उसे बुलवाता हूं। फिर आप पूछताछ कर लीजिएगा।’ 

हालांकि 27 दिसंबर 2006 को सुरेन्द्र वापस नोएडा आ गया था लेकिन पुलिस ने उससे फौरन पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा।

जारी....... 










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