मोनिंदर और सुरेंद्र अपराध की एक अंतहीन कथा

सत्यकथा , किस्त-9, बुधवार , 09-08-2017


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निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5 : किस्त-9

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

देवेन्दर कौर

मोनिंदर सिंह पंधेर की एक आलीशान कोठी चंडीगढ़ के सेक्टर-27 में भी है। कोठी नंबर 1012 में एक रोज़ देवेन्दर कौर बहुत उदास बैठी हुईं थी। उन्हें कई दिन से अपने पति मोनिंदर का इंतज़ार था। सब कुछ कितना बदल गया है, अब वे पहले जैसे नहीं रहे, देवेन्दर कौर ने सोचा। अब तो वे महीनों-महीनों घर नहीं पलटते, फोन भी किए हुए हफ्तों हो जाते हैं, आते हैं तो नशे में धुत, पहले तो शराब नहीं पीते थे, अब ये क्या लत पाल ली है सोच का सिलसिला जारी था, तभी नौकर ने आकर बताया कि साहब आये हैं।

लड़खड़ाते कदमों से मोनिंदर ने ड्राइंग रूम में प्रवेश किया। अपने पति को नशे में धुत देख देवेन्दर कौर के सब्र का बांध टूट गया, ‘अव्वल तो तुम घर आते ही नहीं हो और आते भी हो तो नशे में चूर। आखिर तुमने ये क्या रवैया अपना रखा है? तुम्हें किसी चीज का ख्याल है या नहीं?’

आते ही शुरू हो जाती हो, तभी तो आने को दिल नहीं करता,’ मोनिंदर ने अपने आपको संभालते हुए जवाब दिया।

आने का दिल भला क्यों करेगा तुम्हें उन चुड़ैलों से फुरसत ही कहां है।

बिलावजह आरोप लगाने से क्या फायदा?’

बिलावजह कहां, उस दिन जब मैंने तुम्हें फोन किया तो पीछे से लड़कियों की आवाजें आ रही थीं। आखिर वे कौन थीं?’

अब शक का तो कोई इलाज है नहीं। मीटिंग में था क्लायंट होंगे।

वो नीलम भी तुम्हारी क्लायंट ही है?’

कौन नीलम?’

मोहाली के सेक्टर-31 ब्लॉक-बी में जो धंधा करती है।

मैं उसे कहां जानता हूं? मेरा उससे क्या मतलब है?’

मतलब नहीं था तो उससे सम्बंध को लेकर मुकदमा क्यों दर्ज है?’

कंपनी के ग्राहकों को खुश करने के लिए कभी-कभी इंतजाम तो करना ही पड़ता है। मेरा उससे मतलब कहां है। लेकिन ये बात तुम कहां समझोगी।

नहीं...मैं तो कुछ समझती ही नहीं हूं। मैं अच्छी तरह से जानती हूं। जब से तुमने कौशाम्बी का फ्लैट छोड़ा है और नोएडा में कोठी ली है, तब से तुम मुझे दिल्ली लेकर कहां गये हो।

मेरा ही रुकना नोएडा में कहां होता है। ले भी गया तो तुम वहां अकेली रहोगी।

यहां अकेली नहीं हूं क्या? तुम आते नहीं, बेटे करनदीप को पढ़ने के लिए कनाडा भेज दिया है।

यहां चंडीगढ़ में रिश्तेदार हैं, अपने लोग हैं, वहां नोएडा में कौन है। तुम अकेली पड़ जाओगी।

यह क्यों नहीं कहते तुम्हारी अय्याशी में दखल पड़ेगा।

फिर वही बेकार की बात।

मैं अच्छी तरह समझती हूं तुमने नोएडा की कोठी क्यों ली है और वहां मुझे लेकर क्यों नहीं जाते?’

तुमसे तो बात करना ही बेकार है।

देखो, तुम अपनी यह आदत छोड़ दो।

क्या छोड़ दूं? दिन-रात काम में लगा रहता हूं। थका-हारा घर आऊं तो उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिलती हैं।

घर तुम आते ही कहां हो? चुड़ैलों से फुर्सत मिले तो पत्नी की सुध भी लो।

ये कारोबार तो सब ऐसे ही चल रहा है।

जैसा चल रहा है मुझे मालूम है। तुम्हें तो हर दम नई-नई जगहों पर रंगरेलियां ही मनानी हैं।

अब मैं तुम्हें क्या समझाऊं। तुम्हें कोई बात समझ में तो आती नहीं।

मुझे समझाने की जरूरत ही क्या है? मैं खूब समझती हूं। कह दो ये तस्वीरें भी सब झूठी हैं,’ इतना कहकर देवेन्दर कौर ने मोनिंदर के सामने उसकी काली करतूतों की तस्वीरें फेंक दीं। ये तस्वीरें लॉस एंजिल्स में खींची गयी थीं। एक तस्वीर में मोनिंदर दो विदेशी युवतियों के साथ था। दूसरी अन्य तस्वीरों में वह खुद नंगा होकर छोटे-छोटे बच्चों का न्यूड डांस देख रहा है। मोनिंदर अपना वहशियाना शौक पूरा करने के लिए अमरीका, स्विट्जरलैंड, दुबई, कनाडा, चीन आदि देशों में भी जाता था। इस काम के लिए उसने मोनिंदर व मोहिंदर के नाम पर चंडीगढ़ और लुधियाना के अलग-अलग पतों से पासपोर्ट बनवा रखे थे।

तस्वीरों को देखते ही मोनिंदर सकते में आ गया। शराब का नशा जो बीवी के झगड़े से कुछ हल्का हुआ था, तस्वीरों को देखते ही पूरी तरह से उतर गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। बड़ी मुश्किल से अपने आपको संभालता हुआ वह बोला, ‘ये तुम्हारे पास कहां से आयीं?’

कहीं से भी आयी हों, यह बताओ ये है क्या?’

कंपनी के विदेशी ग्राहक थे। अपने साथ क्लब में ले गये। मैं क्या करता?’

लेकिन तुम्हें नंगा होने की क्या जरूरत थी?’

मुझे क्या पता था, न्यूड क्लब था, कपड़ों के साथ कोई अंदर जा ही नहीं सकता था।

यह क्यों नहीं कहते तुम इसी काम के लिए बाहर जाते हो।

कंपनी के क्लायंटों को नाराज नहीं किया जाता।

और नोएडा में जो तुम अपने दोस्तों के साथ कोठी पर रंगरेलियां मनाते हो, वह सब भी क्लायंट ही होंगे?’

तुम्हें ये बेकार की बातें कौन बताता है?’

ये बेकार की बातें हैं? मेरे पास फोटो हैं।

देखो, कोई हमारे अच्छे-भले घर में आग लगाना चाह रहा है। ऐसी बातों पर ध्यान मत दो।

घर है ही कहां? आग कौन लगा रहा है तुम्हीं लगा रहे हो। कभी पत्नी की सुध लेते हो। बस अय्याशी में ही लगे रहते हो। चाहे नोएडा हो या मुंबई।

अब ये मुंबई बीच में कहां से आ गया?’

क्यों? वहां कृपा निवास में यही गुलछर्रे नहीं उड़ाये जाते?’

औरतों के तो बस एक बात दिमाग में आनी चाहिए। कारोबार इतना लम्बा-चौड़ा फैला हुआ है उसके लिए इधर-उधर जाना पड़ता है। और तुम यहां बैठी यही सोचती रहती हो कि मैं अय्याशी कर रहा हूं।

मैं नहीं सोच रही। तुम्हारी करतूतें, ये फोटो सब यही कह रहे हैं। तुमने तो मुझसे भी कहा था कि एक कॉलगर्ल बुला लेते हैं और फिर तीनों एक साथ....उफ! कितने गंदे हो तुम, तभी तो मैं नोएडा नहीं जाती।

तुमसे तो बात करनी ही बेकार है। सतपाल, सतपाल, गाड़ी निकालो यहां रुकना एक मुसीबत है,’ मोनिंदर अपने ड्राइवर को आवाज़ दी और मुड़कर ड्राइंग रूम से बाहर निकलने लगा।

हां, अब भला तुम मेरे पास क्यों रुकोगे? बाहर कोई इंतजार कर रही होगी।

अब तुमसे क्या कहा जाए? अच्छा-खासा मूड खराब करके रख देती हो,’ यह कहते हुए मोनिंदर ड्राइंग रूम से बाहर निकल गया और देवेन्दर कौर पीछे बड़बड़ाती रह गयीं।

गाड़ी में बैठकर मोनिंदर ने स्वीटी को फोन मिलाया। चंडीगढ़ की रहने वाली स्वीटी पिछले बीस साल से मोनिंदर की गहरी दोस्त है। दोनों में फोन पर ही घंटों-घंटों बातें होती रहती हैं। अपने सेलफोन पर मोनिंदर का नंबर देखते ही स्वीटी ने लपककर कहा, ‘हैलो गोल्डी, क्या हाल है?’

ठीक हूं।

कुछ उखड़े-उखड़े से लग रहे हो।

अरे, वही पुराने झमेले।

क्यों, क्या बीवी से फिर झगड़ा हो गया?’

कोई नई बात थोड़ी है। वो समझती ही नहीं।

मेरी समझ में आज तक यह नहीं आया कि आखिर तुम जैसे सभ्य और दिलचस्प व्यक्ति से किसी को कोई परेशानी कैसे हो सकती है?’

काश! इस बात को मेरी बीवी भी समझती। खैर, क्या कर रही हो?’

कुछ नहीं। बैठी हुई थी।

मेरी यादों में...?’

याद तो उन्हें किया जाता है जिन्हें भूल गये होते हैं। तुम, तुम्हारी बातें तो हमेशा ही मेरे दिलोदिमाग में रहती हैं। कभी कभी तो मैं सोचती हूं कि तुम मुझे न मिले होते, तो मेरा क्या होता?’

मैं नहीं कोई और मुझसे बेहतर मिलता...।

तुमसे बेहतर भी कहां इंसान होते हैं।

छोड़ो इन बातों को, और सुनाओ।

कहां, गाड़ी में हो?’

हां, नोएडा जा रहा हूं।

और तुम्हारे उस नौकर का क्या हाल है?’

अरे, वो बहुत मजे में है। बहुत ही वफादार है और मैंने इतना अच्छा नौकर कभी नहीं पाया। खाना तो बहुत ही अच्छा बनाता है।

तुमने कभी खिलाया नहीं।

तुम कभी नोएडा आयी ही नहीं।

बनवाकर ही ले आओ।

अच्छा, ऐसा करते हैं किसी दिन उसे फार्महाउस पर लाते हैं तभी वहीं दावत रहेगी।

यही बेहतर रहेगा। नोएडा का सफर करना तो बड़ा मुश्किल है।

अच्छा, मैं तुम्हें बाद में फोन करता हूं कोई दूसरी कॉल आ रही है,’ कहते हुए मोनिंदर ने फोन ऑफ कर दिया।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

शैतान

8 फरवरी 2005 की शाम को कोठी नंबर डी-5 के एक कमरे में मोनिंदर सिंह अपने बेड पर लेटा हुआ मेनी लाइव्स, मेनी मास्टर्सपुस्तक पढ़ रहा था। डॉ. ब्रायन विइस की यह किताब एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे बार बार डरावने सपने आते हैं। वैसे खाली समय में मोनिंदर को गोल्फ खेलने का भी शौक है। बहरहाल, पुस्तक को पास में रखे लैपटाप और वेब कैमरे के नजदीक रखने के बाद मोनिंदर ने आवाज़ लगायी, ‘सुरेन्दर...सुरेन्दर..

जी साहब,’ कहता हुआ सुरेन्द्र कमरे में दाखिल हुआ। इस कमरे में बिना इजाज़त आने की अनुमति सिर्फ सुरेन्द्र और नौकरानी माया सरकार को ही थी।

जरा एक पैग बनाकर लाओ।

जी साहब,’ कहते हुए सुरेन्द्र कमरे के बाहर निकला और ड्राइंग रूम के निकट बने बार से टीचर्सकी बोतल उठायी और पैग बनाने लगा। बार में विभिन्न किस्म की व महंगी-महंगी शराब की बोतलें रखी हुई थीं। पास ही पांच गोल्फ क्लब रखे हुए थे। पैग को एक ट्रे में रखकर सुरेन्द्र कमरे में ले गया।

पैग हाथ में लेते हुए मोनिंदर बोला, ‘और हां, मेरे मोबाइल से जरा नीलम को फोन मिला। उससे कह कि किसी लड़की को भेज दे।

मोनिंदर का फोन उठाकर सुरेन्द्र ने नीलम का नंबर निकाला और उसे कई बार डायल किया। हर बार एक ही जवाब आता-द नंबर यू हैव डायल्ड इज़ आउट ऑफ रेंज। प्लीज़ डायल आफ्टर सम टाइम।

साहब उसका नंबर नहीं मिल रहा।

अबे तो फिर शाम कैसे कटेगी?’

साहब एक इंतजाम है। आज ही दोपहर को लाया था।

अबे तो उसे जल्दी ला। अंदर क्यों बंद करके रखा हुआ है?’

अभी लाया साहब।

थोड़ी देर बाद सुरेन्द्र हाथ पकड़े हुए एक 13-14 साल की लड़की को लेकर मोनिंदर के कमरे में घुसा। लड़की सहमी और डरी हुई थी। खौफ के मारे या नशीले पदार्थ मिलाकर उसे जो कोल्ड ड्रिंक दी गयी थी इस वजह से, उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी। लेकिन उसकी आंखों से आंसू ऐसे बह रहे थे जैसे कभी रुकेंगे ही नहीं। यह रिम्पा हलधर थी।

रिम्पा हलधर को मोनिंदर के कमरे में छोड़कर सुरेन्द्र कमरे से बाहर निकला और दरवाजे को ठीक से बंद करके ड्राइंग रूम के बाहर आकर बैठ गया।

तकरीबन तीन घंटे बाद कमरे से सुरेन्दर...सुरेन्दरकी आवाज आयी। सुरेन्द्र उठा और जी साहबकहता हुआ कमरे में घुसा। रिम्पा हलधर तकरीबन बेहोश थी, उसके जिस्म पर कोई कपड़ा न था और जांघों पर खून के छींटे नजर आ रहे थे।

इसे ले जाओ,’ मोनिंदर ने हुक्म दिया।

बिना कुछ बोले सुरेन्द्र ने रिम्पा और उसके कपड़ों को उठाया और दूसरे माले पर अपने बाथरूम में ले गया। बाथरूम में रिम्पा को नीचे लिटाते हुए उसने रिम्पा के कपड़ों से ही उसका गला घोंट दिया। रिम्पा की गर्दन एक ओर को लटक गयी, सांस उसके गायब हो चुके थे।

सुरेन्द्र बाथरूम से निकलकर नीचे गया, बार से फिर एक पैग बनाया और कमरे में ले जाकर मोनिंदर को दे दिया। कमरे से बाहर निकलने के बाद सुरेन्द्र किचन में गया और खाना गर्म करने लगा। जब चिकन व अन्य चीजें गर्म हो गयीं तो थाली में लगाकर अपने साहब के पास ले गया। खाना खाने के बाद मोनिंदर बोला, ‘अब तू भी खाना खा ले। और देख, आज ही ठिकाने लगा देना। बहुत सावधानी के साथ, कोई गलती न हो।

जी साहब।

सिंक में बर्तन रखने के बाद सुरेन्द्र ने अपने लिए चिकन निकाला और उसे जल्दी जल्दी खाने लगा। चिकन खाने का उसका अजीब अंदाज़ है, वह हड्डियों तक को चबाकर खा जाता है। अपना पेट भरने के बाद वह वापस उसी बाथरूम में गया जिसमें रिम्पा की लाश पड़ी थी। वह खड़ा हुआ लाश को निहारता रहा और फिर एक-एक करके अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिये। कुछ ही पलों में उसका अपने ऊपर नियंत्रण न था और उसने रिम्पा की लाश से दुष्कर्म शुरू कर दिया। 

लगभग दस मिनट बाद उसने बाथरूम में ही रखी एक नई छुरी को उठाया और रिम्पा की गर्दन को धड़ से अलग करने लगा। आधा घंटे बाद रिम्पा के बस टुकड़े-टुकड़े ही बचे थे। सुरेन्द्र ने प्लास्टिक की बोरी में लाश के टुकड़ों, कपड़ों और चप्पलों को डाला और कसकर बांध दिया। फिर उसने इस बोरी को डी-5 के पीछे बहने वाले नाले में फेंक दिया। 

जारी... 










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