निठारी की कहानी : कोठी नंबर डी-5 : किस्त 7

सत्यकथा , , सोमवार , 07-08-2017


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निठारी की कहानी

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

किस्त : 7 

पीड़ित मां-बाप असहाय बैठे हुए थे और उनके बच्चों का कातिल सुरेन्द्र बिना किसी अफसोस या खेद के उनके सामने कुर्सी पर बैठा हुआ था।

अब बेचारे मां-बाप पूछते भी तो क्या पूछते। ज्यादातर तो खामोश रहे। जब भी कुछ कहने के लिए मुंह खोलते तो अपने बच्चों का मुस्कुराता हुआ चेहरा अपनी नजरों के सामने पाते। फिर अचानक उन्हें ख्याल आता कि किस तरह सामने बैठे दरिंदे ने उनके नौनिहालों को बेदर्दी से दुष्कर्म करके, काट कर नाले में फेंक दिया था।

अशोक कुमार से यह मुलाकात बर्दाश्त ही न हुई। उनका छह बरस का बेटा सतेन्दर उर्फ मैक्स 27 अप्रैल 2006 को गायब हो गया था। अब तक उन्हें अपने बेटे के लौटने का इंतजार था। लेकिन सुरेन्द्र के इकबाले-जुर्म ने उम्मीदों के सब चिरागों को बुझा दिया।

अशोक कुमार की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब तक सुरेन्द्र ने अपने मालिक मोनिंदर के साथ मिलकर जिन लोगों को अपनी हवस का शिकार बनाया था, वे कम उम्र की लड़कियां और बालिग लड़कियां ही थीं, जबकि मैक्स तो लड़का था। आखिर उसने लड़के को क्यों उठाया? क्या लड़कों के साथ भी दोनों मालिक-नौकर दुष्कर्म करते थे?

निठारी कांड से जुड़ी तस्वीर। साभार : गूगल

कुछ ऐसे ही सवाल रामकिशन के भी थे। रामकिशन के तीन साल के बेटे हर्ष को सुरेन्द्र ने 23 फरवरी 2006 को उठाया था।

अशोक कुमार तो मैक्स के गम में इतना बदहवास हो चुका था कि उसकी हिम्मत सुरेन्द्र से कोई सवाल करने की न थी। लेकिन रामकिशन ने अपने दिल पर पत्थर रखकर मालूम कर ही लिया, ‘तूने मेरे बेटे हर्ष को क्यों उठाया?’

लड़कों में मालिक की या मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है,’ सुरेन्द्र अपने चेहरे के भाव बिना बदले बोला।

तो फिर, तूने मेरे बेटे को उठाया क्यों?’

गलतफहमी हो गयी। बिल्कुल लड़की सरीखा नज़र आ रहा था।

आगे हर्ष के बारे में सुरेन्द्र ने जो कुछ बताया, वह किसी भी इंसान का दिल दहलाने के लिए काफी था।

उधर हर्ष को उठाकर सुरेन्द्र डी-5 की दूसरी मंजिल के बाथरूम में पहुंचा। उसने बाथरूम का दरवाजा बंद करते ही हर्ष को फर्श पर पटक दिया और उसकी गर्दन अपने हाथों में भींचकर नन्ही जान की जान निकाल दी। तीन साल का हर्ष अब बिना होशोहवास के फर्श पर पड़ा था। सुरेन्द्र बाथरूम का दरवाजा खोलकर बाहर निकला और किचन में गया। उसने गैस ऑन करके चाय बनायी। चाय पीने के बाद उसने बर्तनों को धोया, उन्हें सलीके से अपने स्थान पर रखा और फिर वापस बाथरूम की ओर चल दिया जहां हर्ष पड़ा था।

हर्ष के बदन से गर्माहट अब पूरी तरह से जा चुकी थी। वह ठंडा पड़ा था। लाश अकड़नी शुरू हो गयी थी। सुरेन्द्र ने एक नई छुरी उठायी और हर्ष के बदन से कपड़े काटकर अलग करने लगा। कपड़ों के अलग होते ही सुरेन्द्र को धक्का लगा।

अरे....यह क्या? यह तो लड़का है। साला देखने में तो बिल्कुल लड़की लग रहा था। मिस्टेक हो गया। साले ने मूड ही खराब कर दिया,’ सुरेन्द्र बड़बड़ाया।

सुरेन्द्र को यह नाकामी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसका उन्माद गुस्से में तब्दील हो चुका था। उसने अपने हाथ की छुरी से हर्ष के सीने पर जबरदस्त वार किया और उसे जांघों तक बीच में से चीर डाला। चीरे हुए हिस्से में दोनों तरफ हाथ फंसाकर उसने पसलियों को पूरी तरह से खोल दिया और हर्ष का कलेजा काटकर बाहर निकाल लिया। वह कलेजे को लेकर वापस किचन में गया, गैस ऑन की, कड़ाही रखी, तेल डाला और कलेजे को तलने लगा। कलेजा जब तल गया तो उसने तेल में से बाहर निकालकर उस पर नमक-मिर्च छिड़के और ऐसे खाने लगा जैसे तली हुई मछली का कबाब।

नोएडा सेक्टर 31 स्थिति कोठी नंबर डी-5। फोटो साभार : गूगल

नंदा देवी

पीड़ित मां-बाप को सेक्टर-20 और सेक्टर-49 के थानों में रखे कपड़े, चप्पल, जूते, बैग आदि भी दिखाये गये। यह सब नाले से या डी-5 के अंदर से बरामद किए गये थे। कपड़ों के ढेर में दिल बहादुर शाही ने उन कपड़ों को भी पहचान लिया जो उस दिन उसकी पत्नी नंदा देवी ने पहन रखे थे। उसकी आंखें एकदम वह कल्पना करने लगीं जो उसकी पत्नी के साथ घटित हुई होगी।

31 अक्टूबर 2006 की सुबह 32 वर्षीय नंदा देवी ने चाय के बर्तन धोने के बाद उन्हें शेल्फ पर करीने से सजाया और अपनी साड़ी ठीक करके बाहर जाने लगी।

कहां जा रही है?’ पीछे से उसके पति दिल बहादुर शाही ने मालूम किया।

काम पर,’ नंदा देवी ने जवाब दिया।

अभी से क्यों जा रही है, अभी तो उदय दो महीने का भी नहीं हुआ है। तेरे पीछे बच्चों को इसे संभालना भारी पड़ जायेगा।

संभाल लेंगे।

लेकिन वह दूध मांगेगा।

अभी तो पिलाया है। जल्दी लौट आऊंगी तब और पिला दूंगी।

बच्चा जनने के बाद तू भी तो कमजोर है। कुछ दिन और काम की टालकर, फिर चली जाना।

तेरी अकेले की चैकीदारी में छह बच्चों का पेट कैसे भरेगा, मुझे काम पर तो जाना ही पड़ेगा। बहुत आराम हो गया।

अब जैसे चल रहा है, कुछ दिन और चल लेगा। क्या फर्क पड़ रहा है।

तुझे तो बस बातें बनाना आता है। यह तो होता नहीं चौकीदारी छोड़कर कुछ और ढंग का काम पकड़ ले और मुझे भी काम नहीं करने देता।

काम मिलना इस शहर में आसान है क्या। चौकीदारी भी बड़ी मुश्किल से मिली है।

फिर मुझे तो काम करने दे। किसी और को कपड़े धोने पर लगा लिया तो यह काम भी हाथ से निकल जायेगा।

तू अपनी ज़िद के आगे किसी की चलने कोई दे।

दिल बहादुर शाही बड़बड़ाता रहा और कपड़े धोने के लिए नंदा देवी ने डी-5 का रुख कर लिया।

शाम ढलने को हो गयी। दो माह का उदय भूख के मारे रोए जा रहा था। लेकिन नंदा देवी नहीं लौटी थी। अपने बच्चों को रोता छोड़कर दिल बहादुर शाही डी-5 की ओर चल दिया नंदा देवी को बुलाने के लिए।

उसने डी-5 के गेट पर पहुंचकर दस्तक दी। थोड़ी देर बाद गेट खुला, अंदर से सुरेन्द्र बाहर निकलकर आया, ‘हां, क्या है?’

मैं दिल बहादुर शाही चौकीदार हूं।

हमें चौकीदार की ज़रूरत नहीं है।

मैं इसलिए नहीं आया।

तो फिर?’

सुबह मेरी पत्नी यहां आयी थी।

कौन?’

नंदा देवी, वह यहां कपड़े धोने का काम करती है।

वह तो ढाई-तीन महीने से यहां नहीं आयी, उसके बच्चा होने वाला था।

नहीं, आज सुबह ही वह काम पर लौटी थी।

यहां तो नहीं आयी। मैंने तो उसे देखा नहीं।

घर में किसी और से मालूम कर लो।

मेरे अलावा यहां कोई है ही नहीं।

घर से तो यहीं के लिए कहकर आयी थी।

कहीं और चली गयी होगी। यहां तो आयी नहीं। मैंने तो उसे कई महीने से देखा नहीं।

अच्छा।

दिल बहादुर शाही ने और कई घरों में नंदा देवी के बारे में मालूम किया। उसे अपनी पत्नी के बारे में कहीं से कोई जानकारी न मिली।

जब अगली दोपहर तक भी नंदा देवी का कोई अता-पता न मिला, तो शाही ने पुलिस स्टेशन के चक्कर काटने शुरू किए-रिपोर्ट लिखवाने के लिए। उसने कितने चक्कर पुलिस स्टेशन के काटे होंगे उसे याद नहीं। उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गयी और हर बार उसे पुलिस से यही सुनने को मिलता, ‘किसी के साथ भाग गयी होगी।

पत्नी की तलाश में शाही की नौकरी चली गयी। रात भी अपने दुधमुंहे बच्चे को चुप कराना और दिन में बाकी बच्चों को रोटी खिलाना, शाही के लिए सिरदर्द हो गया। बच्चों का पेट भरने के लिए उसने गांव की अपनी जमीन बेच दी। उदय को उसने किसी को गोद दे दिया। लेकिन न उसे नंदा देवी मिली और न पुलिस ने उसकी रिपोर्ट लिखी।

आखिर जब निठारी के नाले से कंकाल निकलने लगे, तो नंदा देवी के लापता होने के दो महीने बाद यानी 31 दिसंबर 2006 को शाही की रिपोर्ट दर्ज हुई और एफआईआर की कॉपी मिली इसके चार दिन बाद।

दिलबहादुर शाही की यादें अब कल्पनाओं में तब्दील हो गयी थीं। उसने सोचा-

डी-5 का गेट खोलकर जैसे ही नंदा देवी ने अंदर प्रवेश किया सामने सुरेन्द्र खड़ा था। वह बोला, ‘आओ...आओ...बच्चा ठीकठाक हो गया...

हां, अब ठीक है,’ नंदा देवी ने जवाब दिया।

कुछ दिन और आराम कर लेती।

आराम से रोटी थोड़े न मिलेगी। अच्छा, कुछ कपड़े हैं क्या?’

हां हैं, जाकर बाथरूम में धो ले।

नंदा देवी ड्राइंग रूम का दरवाजा खोलकर अंदर चली गयी। वह बहुत दिनों बाद डी-5 में आयी थी इसलिए यह भूल गयी कि ऊपर के बाथरूम में जाना वर्जित है। वह ऊपर की तरफ ही बढ़ गयी। उसने जैसे ही ऊपर के बाथरूम का दरवाजा खोला, उसकी चीख निकल पड़ी। सामने एक बच्चे की टुकड़े-टुकड़े लाश पड़ी हुई थी। बाथरूम पूरी तरह से खून में सना हुआ था। दीवार तक छींटे थीं।

नंदा देवी की चीख सुनकर सुरेन्द्र ऊपर दौड़ा-दौड़ा पहुंचा। अपना राज़ खुलते देख उसे गुस्सा आ गया, ‘तुझसे मना किया था न कि ऊपर मत जाना।

मैं भूल गयी, मेरे बच्चे की कसम मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी। अब मुझे जाने दे,’ यह कहती हुई, घबराहट के मारे पसीने में सराबोर हो रही नंदा देवी दरवाजे की ओर कांपती टांगों से बढ़ने लगी।

लेकिन अब तक सुरेन्द्र के सिर पर खून सवार हो चुका था। उसने पास ही में पड़े एक तार को उठाया और झपट्टा मारकर नंदा देवी की गर्दन में तार लपेट दिया और जोर से खींचने लगा। कुछ ही सेकेंड में नंदा देवी की गर्दन एक तरफ को लुढ़क गयी। उसने लाश को अंदर बाथरूम में खींचा और उसके कपड़े हटाने लगा। अब नंदा देवी की लाश उसके सामने एकदम निर्वस्त्र पड़ी थी। उसने अपनी हवस पूरी की और फिर कुल्हाड़ी उठाकर नंदा देवी के टुकड़े करने शुरू कर दिये... दिल बहादुर शाही की आंखों के सामने अब नंदा देवी के टुकड़े आ रहे थे। वह भूल गया कि वह थाने में बैठा हुआ है। उसके मुंह से चीख निकली, तो उसे अपने इर्दगिर्द और लोगों और पुलिस का एहसास हुआ।

तीन सवाल

कपड़ों के ढेर में मुकेश कुमार को भी अपनी बच्ची पायल के कपड़े नज़र आ गये। उसे फौरन ही 4 जून 2005 का वह मनहूस दिन याद आ गया जब वह अपनी बच्ची की ज़िद पर उसे अपने साथ काम पर ले गया।

उस दिन 24 वर्षीय मुकेश कुमार ने नाश्ता करने के बाद अपने एक कमरे के दड़बानुमा मकान के कोने से झाड़ू उठायी और काम पर जाने लगा। उसकी बेटी पायल ने बाप को जाते देखा तो चिल्लायी, ‘पापा...पापा...मैं भी आपके साथ चलूंगी।

बेटी, तू क्या करेगी मेरे साथ चलकर। मुझे तो सफाई करनी है। धूल-धक्कड़ में तू परेशान हो जायेगी, तू यहीं बैठ मैं बस अभी आया काम करके और फिर तुझे टॉफी दिलाने बाजार ले चलूंगा,’ मुकेश ने अपनी पांच वर्षीय बेटी पायल को समझाया।

नहीं पापा...मैं तो आप के ही साथ चलूंगी। मुझे गोद ले लो,’ पायल ने जिद की।

बेटी मान जाओ, ऐसा नहीं करते,’ मुकेश ने फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन बच्ची की जिद और फिर उसके आंसू, बाप का मन पसीज गया। उसने रोती-बिलखती अपनी बेटी को गोद में उठाया और एक हाथ में झाड़ू लेकर काम पर चल दिया।

बाप की गोद में आते ही नन्हीं पायल के आंसू सूख गये और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।

निठारी की तंग गली को पार करते हुए दोनों बाप-बेटी एक दूसरे से बतियाते जा रहे थे। बिटिया की मासूम बातों में मुकेश को मजा आ रहा था। पानी की टंकी का चबूतरा पार करते हुए वे दोनों सड़क पर आ गये। नोएडा के सेक्टर-31 से होती हुई यह सड़क नोएडा की मुख्य सड़क से मिल जाती है। कुछ कदम चलने पर ही मोनिंदर सिंह पंधेर की कोठी डी-5 है। कुछ सप्ताह से इस कोठी और आसपास के सामने की जगह सफाई करने का काम मुकेश को मिला हुआ था। पायल को उसने डी-5 के आगे वाले पेवमेंट पर बिठा दिया और झाड़ू लगाने का काम शुरू कर दिया।

डी-5 के आगे से सफाई करता हुआ मुकेश आगे की कोठियों के सामने चला गया। धीरे-धीरे उड़ती गर्द और बढ़ते फासले के कारण वह पायल की आंखों से ओझल हो गया। नन्ही पायल अब अपने पापा को देख नहीं पा रही थी और उसका चेहरा अकेलेपन में उतरता जा रहा था। तभी डी-5 का मुख्यद्वार खुला और सुरेन्द्र उर्फ सतीश कोली बाहर निकला।

औसत कद-काठी व सांवले रंग के सुरेन्द्र ने कोठी का दरवाजा थोड़ा सा खुला रखकर अपनी हल्की-हल्की मूंछों पर हाथ फेरते हुए पायल को देखा। फिर उसने अपने बालों को ऊपर संवारते हुए इधर-उधर देखा-दूर तक न आदमी था न आदमज़ात।

उसने पायल को देखकर सोचा- क्या मैं इससे सेक्स कर सकता हूं? उसे अपने इस प्रश्न का उत्तर हां में मिला।

उसने फिर अपने आपसे दूसरा सवाल किया- क्या मैं इसकी हत्या कर सकता हूं? उसे इस सवाल का जवाब भी हां में मिला।

उसने फिर अपने आप से तीसरा सवाल किया- क्या मैं इसकी हत्या करके बच सकता हूं? जवाब फिर वही हां का मिला।

सुरेन्द्र ने बिल्ली की सी खामोश चाल से कदम बढ़ाते हुए पायल पर ऐसा झपट्टा मारा जैसे बिल्ली चूहे पर मारती है। उसका हाथ सीधे ही पायल के मुंह और नाक पर पड़ा। बच्ची उफ् भी न कर सकी और सुरेन्द्र ने उसे दोनों हाथों में भरकर तेजी से कोठी के अंदर कदम रखे। वह पायल को दूसरी मंजिल के गुसलखाने में ले गया। उसने जल्दी से वहां रखी बेहोशी की दवा पायल को सुंघाई। पायल बेहोश हो गयी। सुरेन्द्र ने गुसलखाने का दरवाजा बंद किया और तेजी से नीचे उतरकर डी-5 के मुख्यद्वार पर आकर खड़ा हो गया।

अपना काम खत्म करके मुकेश जब डी-5 के पास पहुंचा तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गयी। उसे दूर-दूर तक अपनी प्यारी बेटी पायल दिखायी नहीं दे रही थी। उसने सुरेन्द्र से कहा, ‘मैं यहां अपनी बेटी पायल को बिठा गया था, क्या तुमने उसे देखा है?’

वो जो यहां बैठी थी तुम्हारी बेटी थी? वह तो अभी रिक्शे में बैठकर इस तरफ को चली गयी,’ सुरेन्द्र ने मुख्य सड़क की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया।

मुकेश की समझ में कुछ नहीं आया। वह तेज़ कदमों से उस तरफ को बढ़ लिया जिधर के लिए 30 वर्षीय सुरेन्द्र ने इशारा किया था।

जिगर

मुकेश कुमार को पुख्ता यकीन हो चुका था कि सुरेन्द्र ने ही उसकी बेटी पायल को उठाकर उसकी हत्या कर दी थी। दिमाग में हत्याशब्द आते ही मुकेश कुमार के रोंगटे खड़े हो गये। एक-एक करके उसकी आंखों के सामने वह खूनी मंज़र आने लगे जो उसकी बेटी के साथ गुजरे थे-

4 जून 2005 की दोपहर कोठी नंबर डी-5 की पहली मंजिल। सुरेन्द्र ने अपने बाथरूम का दरवाजा खोला। पांच वर्षीय पायल को होश आ चुका था। वह जोर-जोर से रो रही थी और पापा...पापा...चिल्ला रही थी। लेकिन उसके आंसू देखने वाला और उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। उसके आंसू फर्श पर टपककर खुश्क हो जाते और आवाजें दीवारों से टकराकर वहीं बाथरूम तक ही सिमटकर रह जातीं।

अंकल..अंकल.. मुझे जाने दो। मुझे अपने पापा के पास जाना है...,’ पायल ने रोते हुए कहा।

अभी, जल्द ही तुझे तेरे पापा के पास पहुंचा दूंगा,’ सुरेन्द्र ने अपनी आवाज में बिना किसी उतार-चढ़ाव के पूरे संयम के साथ कहा और पायल की ओर बढ़ा।

सुरेन्द्र ने बिना किसी झिझक व खौफ के पायल का गला अपने दोनों हाथों से दबोचा और दबाव बढ़ाने लगा। नन्हीं जान की आंखें फट गयीं और पाऽऽऽपाऽऽऽकहते हुए दुनिया से रुखसत हो गयी।

सुरेन्द्र ने पायल की लाश को बाथरूम के फर्श पर ही छोड़कर दरवाजा बंद किया और बाहर निकल आया।

उसी दिन शाम के चार बजे वह फिर उसी बाथरूम में गया। गर्मियों की दुपहरी में भी पायल का जिस्म बर्फ की तरह ठंडा हो चुका था। सुरेन्द्र ने उसके कपड़े फाड़े और लाश को एकदम नंगा कर दिया। फिर उसने शव साधना आरंभ की।

मासूम लाश से अपनी हवस मिटाने के बाद सुरेन्द्र ने आरी उठायी और आहिस्ता-आहिस्ता रेतकर पायल का सिर धड़ से अलग कर दिया। उसके चेहरे पर न मलाल था न हाथों में कंपन। वह गर्दन को एक कुशल कारीगर की तरह अलग कर रहा था। सिर के अलग होने के बाद उसने धड़ से टांगों को अलग किया। फिर उसने एक नई छुरी उठायी और धड़ को बीच में से फाड़कर जिगर बाहर निकाला।

पायल का जिगर लेकर वह किचन में गया और पहले से ही धधक रहे तंदूर में उसने जिगर को पकाया। जिगर पकने के बाद उसने उसे खाना शुरू किया, लेकिन उसे जबरदस्त उल्टी हो गयी।

इसके कुछ देर बाद वह फिर बाथरूम में लौटा और पायल की लाश के छोटे-छोटे टुकड़े करने लगा। छोटे-छोटे टुकड़ों को उसने बाथरूम में फ्लश कर दिया और सिर, कपड़े व चप्पलों को एक पॉलीथिन में बांध दिया। दूसरे पॉलीथिन में उसने टांगों की बड़ी हड्डियों को बांधा। फिर बाथरूम को धोकर वह बाहर निकल आया।

रात का जब दूसरा पहर शुरू हुआ तो उसने पहले सिर, कपड़े व चप्पलों के पॉलीथिन को उठाया और डी-5 के आगे बहने वाले नाले में फेंक दिया। इसके बाद उसने दूसरा पॉलीथिन उठाया और डी-5 के पिछवाड़े बहने वाले नाले में फेंक दिया। यह सब करने के बाद सुरेन्द्र ने कमरे का एसी खोला और ऐसे सो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। 

जारी...










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