अपनी बेटी का जिक्र आते ही सुरेन्द्र टूट गया और सच उगल दिया

सत्यकथा , छठी किस्त, रविवार , 06-08-2017


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निठारी की कहानी

कोठी नंबर डी-5 : किस्त 6 

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

माया सरकार

पिछले दो साल से माया सरकार मोनिंदर के घर केवल बर्तन मांजने का काम करती थी। एक रोज़ जब वह डी-5 पहुंची तो सुरेन्द्र ने उसे लाल रंग में रंगी एक कमीज दी और कहा, ‘जा, इसे धो ला।

लेकिन कपड़े धोने का काम तो मेरा नहीं है,’ माया सरकार बोली।

आज से तू कपड़े भी धोएगी,’ सुरेन्द्र ने हुक्म दिया।

लेकिन यह काम तो नंदा देवी का है।

मैंने कहा न, आज से तुझे कपड़े भी धोने होंगे।

क्यों, नंदा देवी कहां गयी?’

इससे तुझे कोई मतलब नहीं है...जो कह दिया बस वह काम कर।

लेकिन यह कमीज लाल क्यों हो रही है?’

यह जानने की तुझे जरूरत नहीं।

मुझे तो ये खून में सनी लग रही है।

हां, खून ही है। तू किसी को कुछ बतायेगी नहीं।

खून है...?’

हां, खून ही है। मैंने तुझसे कहा तू किसी को कुछ बतायेगी नहीं। चुपचाप कपड़े धोने हैं और तुझसे जो कुछ कहा जाए उसे बिना किसी चूं-चपड़ किए करती रह। बदले में तुझे और पैसे मिलते रहेंगे।

यह कमीज तो शायद साहब की है।

मैंने तुझसे कहा न, कोई बात पूछने की जरूरत नहीं है। तुझसे जो कहा जाए बस उतना ही कर। जिसको बुलाने के लिए कहा जाए उसे लेकर आ और इस बारे में किसी से कुछ न बोल। बस अपने काम से काम रख और पैसे लेती रह, खूब पैसे मिलेंगे।

ठीक है,’ माया ने कहा और खून में सनी कमीज को धोने के लिए नीचे वाले बाथरूम में चली गयी। उस दिन के बाद माया सरकार अक्सर मोनिंदर व सुरेन्द्र के खून में सने कपड़े धोती और उनके काले कारनामों में मदद भी करती। बदले में चुप रहने के लिए उसे पैसा और महंगे-महंगे तोहफे मिलते।

माया और उसका पति कृशन निठारी गांव में ही कमरा लेकर रहते थे। उनके पड़ोस में पिंकी हलधर भी रहती थी। 20 वर्षीय पिंकी हलधर एक साल पहले मां बनी थी। वह सेक्टर-30 में बतौर नौकरानी काम करती थी। 5 अक्टूबर 2006 को उसने अपने बेटे अमित को अपनी मां वंदना की गोद में छोड़ा और काम पर चली गयी। उसके बाद उसे किसी ने नहीं देखा। पिंकी के पिता जेनू सरकार निठारी पुलिस चौकी पर रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए गया लेकिन चौकी इंचार्ज सिमरनजीत कौर ने उसे गालियां देकर भगा दिया।

दूध के लिए अमित जब भी रोता है तो जेनू सरकार को अपनी बेटी पिंकी हलधर याद आ जाती है। और फिर उनकी नज़र माया के दरवाजे पर पड़ती है जिस पर ताला पड़ा हुआ है। ताले को देखकर वे चिल्ला उठते हैं, ‘यही हरामज़ादी माया मेरी बेटी पिंकी को सुरेन्द्र के पास ले गयी थी।

अब चिल्लाने से क्या फायदा होगा, माया तो है ही इसी करज की वरना इतने महंगे-महंगे मोबाइल और इतने करारे-करारे नोट उस पर कहां से आते?’ वंदना अपने पति को दिलासा देती।

लेकिन इस अमित का क्या करें, इसका बाप भी तो पिंकी के बाद इसे हमारे पास छोड़कर भाग गया।

मुआवजे के जो पैसे मिले हैं उससे अमित को पढ़ाते हैं, किसी काबिल बनाते हैं।

हां, यही ठीक रहेगा। आखिर पिंकी का भी तो यही सपना था।

उधर माया सीबीआई के सामने बार-बार अपने बयान बदल रही है, ‘मालिक तो रात में ही आते थे, कभी कभी कोई साथ होता था।

कौन?’

अब मुझे क्या पता? मालिक के बाद सुरेन्द्र ही घर का मालिक था और घर में उसे हर काम करने की आजादी थी।

घर में और कौन कौन आता?’

मुझे नहीं पता। हां, तीन महीने पहले एक पार्टी हुई थी जिसमें कई बड़े अधिकारी घर पर आये थे और रात में शराब भी पी थी।

घर में तेरा क्या काम था?’

बर्तन धोने का फिर अक्सर लाल रंग में सने मालिक और सुरेन्द्र के कपड़ों को भी धोना।

किसके कहने पर तू बच्चों और औरतों को बुलाकर लायी?’

मैं तो किसी को नहीं लायी।

झूठ बोलती है...

नहीं, किसी को बुलाने भेजा तो बुला लायी। आगे मुझे नहीं मालूम क्या हुआ, क्या नहीं।

निठारी कांड का एक गुनाहगार सुरेंद्र कोली। फोटो साभार : गूगल

तफ़्तीश

3 जनवरी 2007, एक अज्ञात स्थान। कोठी नंबर डी-5 में मासूम बच्चों व महिलाओं के साथ दुष्कर्म व बाद में उनकी हत्या का मामला प्रकाश में आ चुका था और नोएडा के डीएसपी दिनेश चन्द्र यादव अपने साथियों, थाना सेक्टर-20 के एसएचओ वी.पी. सिंह, सब इंस्पेक्टर एस.पी. सिंह और सब इंस्पेक्टर विनोद पांडेय के साथ सुरेन्द्र से पूछताछ कर रहे थे। लेकिन वह कुछ उगलने के लिए तैयार नहीं था। पुलिस ने उस पर हर हथकंडा आजमाया लेकिन उसकी चुप्पी तोड़ना कठिन होता जा रहा था।

आखिर दिनेश चन्द्र यादव ने झल्लाकर उससे कहा, ‘अबे तेरी अपनी कोई औलाद है?’

हां साहब, एक बेटी है।

कितनी बड़ी है?’

जी, तीन साल की है, सिमरन।

अबे, अगर तेरी बेटी को कोई इस तरह मारकर उससे दुष्कर्म करेगा जैसा कि तूने निठारी के बच्चों के साथ किया है, तो तू क्या करेगा?’

अपनी बेटी का जिक्र आते ही सुरेन्द्र टूट गया और उसने सच उगल दिया, कड़वा सच, ‘जी, नाले में पड़े कंकाल उन्हीं बच्चों और महिलाओं के हैं जिन्हें मैंने मारा था।

तू बच्चों को क्यों मारता था?’ डीसीपी यादव ने पूछा।

जी, सिमरन के पैदा होने के बाद मुझे लगता था कि मैं अपनी औरत को पूरा मज़ा नहीं दे पा रहा हूं। एक तांत्रिक ने मुझे शव साधना की सलाह दी। मैं अपना पहला सा मज़ा वापस पाने के लिए ऐसा करता था।

डी-5 में बच्चों के साथ क्या होता था?’

साहब उनके साथ सेक्स करते थे।

कोई और भी करता था?’

कभी-कभी कुछ बड़े लोग भी आते थे।

बच्चों का शोर बाहर क्यों नहीं आता था?’

उन्हें कोल्ड ड्रिंक में नशीली दवा मिलाकर दी जाती थी, वह जब तक कोठी में रहते नशे में ही रहते।

कोठी में उन्हें कब तक रखा जाता था?’

तीन-चार दिन तक।

उसके बाद?’

साहब बच्चे को मुझे सौंप देते थे।

किसलिए?’

उन्हें मारने के लिए।

तूने बच्चों को सेक्स करने के पहले मारा या सेक्स करने के बाद?’

कुछ को सेक्स के पहले और कुछ को सेक्स के बाद।

क्या तूने उन बच्चों का मांस भी खाया?’

एक बार चखा था, उल्टी हो गयी, मुझे यह पसंद नहीं आया इसलिए मैंने इसे नहीं खाया।

तूने बच्चों को क्यों मारा?’

हमें डर था कि अगर वे बाहर चले गये तो हमारा राज़ खुल जायेगा।

कोई और भी बच्चों का मांस खाता था?’

हां, जब कोठी में पार्टी होती थी, तो साहब और उनके दोस्त।

तब तक मांस कहां रखा जाता था?’

तीन पॉलीथिनों में लपेटकर फ्रीजर में रख दिया जाता था।

किसी और को भी इस बात का पता था?’

फ्रीजर में रखे मांस को किसी को छूने की इजाज़त नहीं थी, कोई पूछता तो कह दिया जाता कि तीतर का गोश्त है।

तूने नंदलाल की 26 वर्षीय बेटी पायल को क्यों मारा?’

वह साहब (मोनिंदर) को परेशान कर रही थी। उन्होंने कहा इंतजाम करो इसलिए मैंने उसे मार डाला।

लाशों के साथ तू क्या करता था?’

मैं उन्हें हमेशा रात में काट देता था और अलग-अलग फेंक देता था। कभी भी एक बार में और एक जगह पर नहीं।

रात में लाश को काटता था, तो दिन में लाश कहां पड़ी रहती थी?’

ऊपर मेरे कमरे में या बाथरूम में, वहां पर किसी को जाने की आज्ञा नहीं थी। घर में सिर्फ मैं रहता था। बाकी नौकर या ड्राइवर अगर रहते थे, तो सिर्फ गैराज में।

क्या बच्चों के अंग निकालकर बेचे जाते थे?’

इसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं।

कोठी में कौन-कौन आता था?’

बड़े बड़े नेता, पुलिसवाले और कॉलगर्ल आती थीं।

क्या करने के लिए?’

रंगरेलियां मनाने के लिए।

निठारी के पीड़ित परिवार। फोटो साभार : गूगल

उसी जगह पुलिस ने निठारी के कुछ उन परिवारों को भी बुला रखा था जिनके बच्चों को कोठी नंबर डी-5 में काट कर मार दिया गया था। दुखी माता-पिताओं के हाथ में अपने बच्चों की तस्वीरें भी थीं। सुरेन्द्र से इनकी मुलाकात इस उद्देश्य से करायी गयी थी ताकि उन्हें तसल्ली मिल जाए और सुरेन्द्र टूट जाए। आधे घंटे की इस मुलाकात में दिल दहलाने वाले सच सामने आये। पुलिस ने सुरेन्द्र को एक कुर्सी पर बिठाकर जंजीरों से बांध रखा था।

पप्पू लाल के हाथ में अपनी 11 वर्षीय बेटी की तस्वीर थी जिसे देखते ही सुरेन्द्र ने कहा, ‘यह रचना है। इसे मैं वाटर टैंक के पास से चॉकलेट देने का बहाना करके कोठी में लाया था।

फिर तूने क्या किया?’ पप्पू लाल ने मालूम किया।

मार दिया। मेरी नजर तो तेरी छोटी बेटी अर्चना पर भी थी। बस मौका ही नहीं मिला।

स्साले, तेरा खून पी जाऊंगा,’ पप्पू लाल ने उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा, लेकिन बीच में ही पुलिस वालों ने उसे रोक लिया।

पप्पू लाल सोचने लगा कि सुरेन्द्र ने उसकी बेटी रचना को अपने झांसे में कैसे फंसाया होगा....

रचना ने उस दिन सलवार-कमीज पहन रखी थी और मैच करता हुआ दुपट्टा उसके कंधों पर पड़ा था। घर से तो वह तेजी से निकली लेकिन रास्ते में कुछ सोचती हुई आहिस्ता-आहिस्ता चलने लगी। वह निठारी गांव के वाटर टैंक के पास पहुंची ही थी कि उसे वहां सुरेन्द्र खड़ा दिखायी दिया। सुरेन्द्र ने उसे देखते ही पुकारा, ‘रचना...रचना, यहां आओ।

सुरेन्द्र उससे पहले भी कई बार बात करने की कोशिश कर चुका था लेकिन हर बार वह कहती, ‘अंकल मैं जल्दी में हूं। मां घर पर इंतजार कर रही है और निकल जाती।आज न जाने क्यों वह सुरेन्द्र की बात सुनने के लिए रुक गयी।

अच्छा, तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है?’ सुरेन्द्र ने आत्मीयता दिखाते हुए पूछा।

ठीक है अंकल,’ रचना ने जवाब दिया।

आजकल तू किस स्कूल में जा रही है?’

डीपीएस नोएडा में।

अच्छा, बहुत अच्छा। पता है कल मेरे साहब के चंडीगढ़ से बच्चे आये थे। वे बहुत सारे खिलौने और चॉकलेट अपने साथ लाये थे। मेरे साथ चल कुछ चॉकलेट तू भी खा ले।

नहीं, मुझे देर हो रही है फिर किसी दिन।

अरे तब तक चॉकलेट रखी थोड़ी रहेंगी। मैं तो खाता नहीं। चल जरा सी देरी लगेगी और तू भी तो उसी रास्ते से निकलेगी।

नहीं, मुझे दादी के पास जल्दी जाना है और फिर लौटकर भी जल्दी आना है,’ इतना कहकर रचना आगे बढ़ गयी। सुरेन्द्र भी उसके साथ हो लिया और बोला, ‘बिल्कुल तेरे ही नाक-नक्शे की मेरी बेटी हो जायेगी। चॉकलेट मैं उसे ही खिला देता लेकिन वह अपनी दादी के पास अल्मोड़ा गयी हुई है।

अंकल अपनी बेटी के लिए ही रख लो न चॉकलेट।

तब तक तो खराब हो जायेगी और घर में कोई और बच्चा भी नहीं है। चल अब तू यहां तक तो आ ही गयी है चॉकलेट लेकर ही चली जाना।

इतनी बात कहते हुए वे दोनों नोएडा के सेक्टर-31 की कोठी डी-5 के दरवाजे तक पहुंच गये थे। रुकते हुए सुरेन्द्र ने उससे कहा, ‘अच्छा अंदर नहीं चलती तो एक मिनट को यहीं ठहर जा मैं अंदर से चॉकलेट लेकर आता हूं। रुक जा, जाना नहीं बस मैं अभी लाया। मैं तुझसे इसलिए कह रहा हूं कि तुझे देखकर मुझे अपनी बेटी याद आ जाती है।

सुरेन्द्र ने कोठी का गेट खोला और अंदर जाकर गेट के पीछे खड़ा हो गया। उसने गेट की झिर्रियों में से बाहर झांका। सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था। फिर उसने सामने की बिल्डिंगों व कोठियों पर नजर डाली वहां भी उसे कोई नजर नहीं आया। उसने मौका सही समझा और खुले गेट से तेजी से बाहर निकला और रचना का मुंह दबोच कर उसे कोठी के अंदर खींच लिया। उसके बाद रचना को फिर कभी किसी ने नहीं देखा। यह 10 अप्रैल 2006 की बात है।

इसके बाद झब्बूलाल धोबी ने सुरेन्द्र से अपनी दस वर्षीय बेटी ज्योति के बारे में मालूम किया।

मैंने उसे मार दिया। टुकड़े-टुकड़े करके उसे नाले में फेंक दिया।

मेरी बेटी ने तेरा क्या बिगाड़ा था?’

मैंने उसे मार दिया। उसके कपड़े और चप्पलों के साथ उसके टुकड़े नाले में फेंक दिया।

जी तो ऐसा कर रहा है साले कि तेरे भी ऐसे ही टुकड़े-टुकड़े कर दूं,’ यह कहते हुए गुस्से में आगबबूला झब्बूलाल सुरेन्द्र की तरफ लपका। लेकिन उसे भी पुलिस ने रोक लिया।

कलेजा

पीड़ित मां-बाप असहाय बैठे हुए थे और उनके बच्चों का कातिल सुरेन्द्र बिना किसी अफसोस या खेद के उनके सामने कुर्सी पर बैठा हुआ था।

अब बेचारे मां-बाप पूछते भी तो क्या पूछते। ज्यादातर तो खामोश रहे। जब भी कुछ कहने के लिए मुंह खोलते तो अपने बच्चों का मुस्कुराता हुआ चेहरा अपनी नजरों के सामने पाते। फिर अचानक उन्हें ख्याल आता कि किस तरह सामने बैठे दरिंदे ने उनके नौनिहालों को बेदर्दी से दुष्कर्म करके, काट कर नाले में फेंक दिया था।

अशोक कुमार से यह मुलाकात बर्दाश्त ही न हुई। उनका छह बरस का बेटा सतेन्दर उर्फ मैक्स 27 अप्रैल 2006 को गायब हो गया था। अब तक उन्हें अपने बेटे के लौटने का इंतजार था। लेकिन सुरेन्द्र के इकबाले-जुर्म ने उम्मीदों के सब चिरागों को बुझा दिया।

अशोक कुमार की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब तक सुरेन्द्र ने अपने मालिक मोनिंदर के साथ मिलकर जिन लोगों को अपनी हवस का शिकार बनाया था, वे कम उम्र की लड़कियां और बालिग लड़कियां ही थीं, जबकि मैक्स तो लड़का था। आखिर उसने लड़के को क्यों उठाया? क्या लड़कों के साथ भी दोनों मालिक-नौकर दुष्कर्म करते थे?

कुछ ऐसे ही सवाल रामकिशन के भी थे। रामकिशन के तीन साल के बेटे हर्ष को सुरेन्द्र ने 23 फरवरी 2006 को उठाया था।

अशोक कुमार तो मैक्स के गम में इतना बदहवास हो चुका था कि उसकी हिम्मत सुरेन्द्र से कोई सवाल करने की न थी। लेकिन रामकिशन ने अपने दिल पर पत्थर रखकर मालूम कर ही लिया, ‘तूने मेरे बेटे हर्ष को क्यों उठाया?’

लड़कों में मालिक की या मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है,’ सुरेन्द्र अपने चेहरे के भाव बिना बदले बोला।

तो फिर, तूने मेरे बेटे को उठाया क्यों?’

गलतफहमी हो गयी। बिल्कुल लड़की सरीखा नज़र आ रहा था।

आगे हर्ष के बारे में सुरेन्द्र ने जो कुछ बताया, वह किसी भी इंसान का दिल दहलाने के लिए काफी था।

उधर हर्ष को उठाकर सुरेन्द्र डी-5 की दूसरी मंजिल के बाथरूम में पहुंचा। उसने बाथरूम का दरवाजा बंद करते ही हर्ष को फर्श पर पटक दिया और उसकी गर्दन अपने हाथों में भींचकर नन्ही जान की जान निकाल दी। तीन साल का हर्ष अब बिना होशोहवास के फर्श पर पड़ा था। सुरेन्द्र बाथरूम का दरवाजा खोलकर बाहर निकला और किचन में गया। उसने गैस ऑन करके चाय बनायी। चाय पीने के बाद उसने बर्तनों को धोया, उन्हें सलीके से अपने स्थान पर रखा और फिर वापस बाथरूम की ओर चल दिया जहां हर्ष पड़ा था।

हर्ष के बदन से गर्माहट अब पूरी तरह से जा चुकी थी। वह ठंडा पड़ा था। लाश अकड़नी शुरू हो गयी थी। सुरेन्द्र ने एक नई छुरी उठायी और हर्ष के बदन से कपड़े काटकर अलग करने लगा। कपड़ों के अलग होते ही सुरेन्द्र को धक्का लगा।

अरे....यह क्या? यह तो लड़का है। साला देखने में तो बिल्कुल लड़की लग रहा था। मिस्टेक हो गया। साले ने मूड ही खराब कर दिया,’ सुरेन्द्र बड़बड़ाया।

सुरेन्द्र को यह नाकामी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसका उन्माद गुस्से में तब्दील हो चुका था। उसने अपने हाथ की छुरी से हर्ष के सीने पर जबरदस्त वार किया और उसे जांघों तक बीच में से चीर डाला। चीरे हुए हिस्से में दोनों तरफ हाथ फंसाकर उसने पसलियों को पूरी तरह से खोल दिया और हर्ष का कलेजा काटकर बाहर निकाल लिया। वह कलेजे को लेकर वापस किचन में गया, गैस ऑन की, कड़ाही रखी, तेल डाला और कलेजे को तलने लगा। कलेजा जब तल गया तो उसने तेल में से बाहर निकालकर उस पर नमक-मिर्च छिड़के और ऐसे खाने लगा जैसे तली हुई मछली का कबाब 

जारी...










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