मगरूखाल का सद्दा कोठी नंबर डी-5 में आकर बन गया सुरेन्द्र कोली

सत्यकथा , तीसरी किस्त, बृहस्पतिवार , 03-08-2017


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कोठी नंबर डी-5 : भाग 3

(रोंगटे खड़े कर देने वाला मर्मस्पर्शी सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए चौधरी)

सद्दा

मगरूखाल (अल्मोड़ा), 15 वर्ष पहले। गांव के एक छोटे से मकान में अधेड़ उम्र की कुंती देवी और उनका दामाद मोहन राम व छोटा बेटा आनंद बैठे हैं। तभी लम्बी खामोशी को तोड़ते हुए कुंती देवी ने मोहन राम से कहा, ‘बेटा, अब तुमसे तो घर के हालात छिपे हुए नहीं हैं। इस सद्दा ने पढ़ाई भी छोड़ दी है और कुछ काम भी नहीं करता। पन्द्रह साल का हो गया है फिर भी चार-चार पांच-पांच साल के बच्चों में ही घिरा रहता है। किसी काम को कहो तो करके नहीं देता। अब इसका क्या करूं, तुम्हीं अपने साथ इसे दिल्ली ले जाओ।

सरेंद्र कोली और उसकी मां। फोटो साभार : गूगल

अम्मा, ले तो जाऊं मगर यह है कहां?’ मोहन राम ने मालूम किया।

अरे बेटा आनंद, जा बाहर तेरा भैया सद्दा खेल रहा होगा उसे बुला ला,’ कुंती देवी ने अपने छोटे बेटे से कहा।

थोड़ी देर में आनंद सद्दा को लेकर घर आ गया। मोहन राम ने अपने बड़े साले से मालूम किया, ‘भई क्या कर रहे हो आजकल?’

जीजा, अब गांव में तो कोई काम है नहीं। जानवर काटने के अपने पुश्तैनी धंधे में कोई ज्यादा कमाई तो है नहीं। अब समझ में भी नहीं आ रहा कि क्या करूं? आप ही बताओ,’ सद्दा ने अपने जीजा के पैर छूते हुए कहा।

कै जमात पास कर लिये हो?’ मोहन राम ने मालूम किया।

चित्तौड़खाल के स्कूल में सातवीं कक्षा से आगे न जा सका,’ सद्दा ने जवाब दिया।

अरे भई, इतने से क्या होगा? दसवीं किए होते तो कहीं चपरासी तो लगवाये देते,’ मोहन राम ने कहा।

भैया जी कुछ तो करो इसका। यहां रहेगा तो और बिगड़ता जायेगा,’ कुंती देवी ने अपने दामाद से गुजारिश की।

देखते हैं किसी कोठी में सफाई व झाड़ू-बर्तन के काम पर लगाने की कोशिश करेंगे,’ मोहन राम ने आश्वासन दिया।

उस दिन शाम तक यह तय हो गया कि सद्दा अपने जीजा मोहन राम के साथ दिल्ली चला जायेगा और वहीं किसी कोठी में नौकरी करेगा।

मगरूखाल में सदाराम पुत्र शंकर राम को घर से बाहर तक हर व्यक्ति सद्दा के नाम से ही जानता और पुकारता है। चित्तौड़खाल के स्कूल के दस्तावेजों में भी उसका नाम सदाराम है। बहरहाल, 15 बरस की उम्र में दिल्ली आने के बाद सद्दा ने सदाराम के नाम से वसंत कुंज की एक कोठी में घरेलू नौकर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। यहीं पर उसने झाड़ू-बर्तन करने के अलावा खाना बनाना भी सीख लिया और जल्द ही वह एक कुशल कुक बन गया।

सदाराम किसी एक कोठी पर ज़्यादा समय नहीं टिकता था। लेकिन नोएडा की कोठी नंबर 646 में उसने चार-पांच साल लगकर काम किया, मगर सदाराम के नाम से नहीं सतीश के नाम से। इसके बाद कुछ समय तक उसने नोएडा की ही कोठी नंबर 225 में भी काम किया। हर बार काम के लिए घर बदलने के साथ-साथ वह अपना नाम भी बदल लेता था। गर्ज यह कि नोएडा और दिल्ली में काम करते हुए उसे 11 वर्ष बीत गये और वह 26 साल का हो गया।

सदाराम उर्फ सद्दा के जवान होने पर कुंती देवी ने उसे वापस मगरूखाल बुलाया और शांति नामक एक लड़की से उसकी शादी करा दी। कुछ समय दोनों ठीकठाक रहे और शादी के तकरीबन एक साल बाद शांति ने बेटी सिमरन को जन्म दिया। बेटी के जन्म के बाद सदाराम को एक अजीब किस्म की बेचैनी रहने लगी। वह जब भी अपनी पत्नी के पास जाता तो असंतुष्ट ही रह जाता। इससे उसके मन में चिंता व कुंठा के बादल छाने लगे।

एक दिन मगरूखाल में ही उसने अपनी इस नई परेशानी का जिक्र बचपन के अपने एक दोस्त से किया। दोस्त उसे उपचार हेतु एक तांत्रिक के पास ले गया। तांत्रिक ने उससे मालूम किया, ‘क्या कष्ट है बच्चा?’

महाराज, जब से सिमरन का जन्म हुआ है तब से जब भी मैं अपनी पत्नी के पास जाता हूं तो वैसा मजा नहीं आता जैसा पहले आया करता था। मैं न अपनी पत्नी को शारीरिक संतुष्टि दे पाता हूं न अपने आप ही संतुष्ट हो पाता हूं। मेरी कुंठा निरंतर बढ़ती जा रही है। अब आपके चरणों में आया हूं कृपया कोई उपाय बतायें,’ सदाराम ने हाथ जोड़ते हुए विनती की।

उपाय तो है लेकिन क्या तू कर पायेगा?’ तांत्रिक ने गहरी नजरों से उसे देखा।

महाराज, अपने खोये हुए मजे़ को पाने के लिए मैं कुछ भी कर लूंगा,’ सदाराम ने वायदा किया।

काम तो कठिन है। बहुत हिम्मत और पक्का दिल चाहिए इसे करने के लिए। सोचता हूं तू कर पायेगा या नहीं,’ तांत्रिक ने फिर उसे चुनौती दी।

महाराज मैं कुछ भी करूंगा, कुछ भी। बस मेरे पहले जैसे दिन लौटा दीजिए,’ सदाराम ने तांत्रिक के पैर पड़ते हुए कहा।

अच्छा, सोच लूं। तू एक सप्ताह बाद मेरे पास आना,’ तांत्रिक ने उससे कहा।

सात दिन बहुत कश्मकश में बीते। लेकिन जैसे ही तांत्रिक से मिलने का समय आया सदाराम वक्त से पहले वहां पहुंच गया। तांत्रिक अब भी खोए हुए आनंद को वापस हासिल करने का राज़ सदाराम को बताने का इच्छुक न था। शायद वह सदाराम को पकाना चाह रहा था और यह भी सुनिश्चित करना चाह रहा था कि वह उसके बताये उपाय को कर पायेगा या नहीं? और अगर कर पायेगा तो राज़ को राज़ रख पायेगा या नहीं? इसलिए जब भी सदाराम तांत्रिक के पास जाता वह उसे अगले कुछ दिनों का समय देकर टाल देता।

सदाराम के अनगिनत चक्कर लगवाने के बाद तांत्रिक को यकीन हो गया कि वह जिस्मानी आनंद पाने के लिए कुछ भी कर गुजरेगा। तांत्रिक को यह भी विश्वास हो गया कि सदाराम उसके उपाय को राज़ रखेगा और किसी भी कीमत पर राज़ नहीं खोलेगा।

इसके बाद तांत्रिक ने सदाराम को ऐसा उपाय बताया जिसे सुनकर बड़े-बड़े पत्थरदिल भी अपने होश खो सकते हैं। तांत्रिक ने कहा, ‘बेटा, शव साधना से ही तुझे फिर सेक्स में मज़ा आ सकेगा।

शव साधना? मैं कुछ समझा नहीं,’ सदाराम ने चेहरे पर सवालिया भाव लाते हुए मालूम किया।

शव साधना का अर्थ होता है मृत व्यक्ति यानी लाश के साथ संभोग करना,’ तांत्रिक ने समझाया।

लाश के साथ संभोग!सदाराम ने चौंकते हुए कहा।

हां, लाश के साथ...।

लेकिन मैं लाश लाऊंगा कहां से?’

कब्रिस्तान से, श्मशान से, मुर्दाघर से....जहां से भी तुझे मिल जाए।

महाराज इसके अलावा कोई और उपाय नहीं है?’

नहीं। तेरे मामले में नहीं।

बस ऐसा करने से मुझे फिर पहले जैसा जिस्मानी सुख मिल सकेगा?’

नहीं, तुझे और कुछ भी करना होगा।

वह क्या?’

सबसे ज्यादा हीट होती है मानव जिगर, गुर्दे और अंडकोशों में। तुझे अपनी हीट बढ़ाने के लिए वह भी खाने होंगे।

आदमी का मांस...?’

हां।

आदमी का मांस मुझे कहां मिलेगा?’

जहां तुझे लाश मिलेगी।

महाराज, बहुत कठिन है। कुछ और बताओ।

मैं तो कह ही रहा था तुझसे नहीं हो पायेगा।

महाराज, कोई और तो उपाय होगा ही।

नहीं है। वरना तुझे यही क्यों सुझाता।

महाराज, इस पर तो मुझे विचार करना पड़ेगा।

तभी तो मैं तुझसे कह रहा था। तुझसे नहीं हो पायेगा। और हां, सुन, अगर तूने ये बात किसी और को बता दी तो न सिर्फ तेरा नाश होगा बल्कि तेरी बच्ची, पत्नी, मां, भाई सभी काल को प्राप्त हो जाएंगे। अच्छी तरह से सोच ले,’ तांत्रिक ने सदाराम को धमकाते हुए कहा।

महाराज, मुझे अपनी बेटी की कसम मैं ये बात किसी को नहीं बताऊंगा। लेकिन महाराज मैं नहीं समझता कि मैं यह कर पाऊंगा,’ इतना कहते हुए सदाराम ने तांत्रिक से विदा ली।

जब सदाराम लौटकर अपने घर आ रहा था, तो उसके कानों में तांत्रिक के ये शब्द बार-बार गूंज रहे थे, ‘शव साधना....शव साधना....इंसान का जिगर, गुर्दे, अंडकोश....अगर किसी को कुछ बताया तो तेरा नाश हो जायेगा...तेरा परिवार नष्ट हो जायेगा....।

कुछ दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गये। अब सदाराम के पास न नौकरी थी और न ही संभोग का पहले जैसा मज़ा। हर ओर से कुंठा बढ़ती जा रही थी। इसी बीच उसे खबर मिली कि हल्द्वानी में जेसीबी क्लासीफाइड एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स लिमिटेड कंपनी के निदेशक को एक घरेलू नौकर की तलाश है। यह सन 2004 के शुरुआती दिनों की बात है।

हल्द्वानी में निदेशक का पता मालूम करते हुए सदाराम उनके पास पहुंचा। कंपनी के निदेशक थे मोनिंदर सिंह पंधेर। सदाराम को देखते ही पंधेर को ऐसा लगा जैसे वही व्यक्ति मिल गया हो जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। सदाराम को भी कुछ ऐसा ही लगा। लेकिन नौकरी देने से पूर्व साक्षात्कार की औपचारिकता तो पूरी करनी ही थी।

हां, तो तुम्हारा नाम क्या है?’ पंधेर ने मालूम किया।

जी, सुरेन्द्र कोली,’ सदाराम ने अपना नया नामकरण करते हुए जवाब दिया।

हमें हल्द्वानी में नहीं अपने नोएडा के नये मकान में घरेलू नौकर की जरूरत है।

साहब, मैं पिछले 10-12 सालों से दिल्ली और नोएडा में ही काम करता रहा हूं।

क्या क्या काम कर लेते हो?’

घर का सारा काम।

खाना बनाना जानते हो?’

जी साहब।

नॉन वेज भी?’

जी साहब जी, सब बना लेता हूं।

देखो नोएडा के सेक्टर-31 में डी-5 हमारी कोठी है। हमारे घर के बाकी सदस्य तो चंडीगढ़ में रहते हैं। मैं ही नोएडा में रहता हूं। लेकिन काम की वजह से मुझे भी ज्यादातर बाहर रहना पड़ता है। क्या तुम 24 घंटे कोठी पर रहकर देखभाल कर सकोगे?’

जी साहब। कर लूंगा।

तुम्हारा रहना व खाना-पीना हमारी तरफ से रहेगा। इसके अलावा तुम्हें साढ़े तीन हजार रुपये महीना दिये जाएंगे।

ठीक है साहब जी।

काम अच्छा करोगे, दिल लगाकर करोगे, तो पैसे और बढ़ा देंगे। वैसे काम तो कुछ ज्यादा नहीं है क्योंकि मैं भी बहुत कम ही नोएडा रुकता हूं।

इस तरह मगरूखाल का साधारण और सबसे दोस्ताना ताल्लुक रखने वाला सदाराम नोएडा के सेक्टर-31 की कोठी नंबर डी-5 में आकर सुरेन्द्र उर्फ सतीश कोली बन गया।

 इलेस्ट्रेशन सहीम।

पायल उर्फ दीपिका

6 मई 2006 की शाम सुरेन्द्र नोएडा के एक पब्लिक बूथ पर गया और उसने नंबर मिलाया-9891115404. यह पायल के मोबाइल का नंबर था।

उधर से एंगेज की टोन आयी। उसने फिर नंबर मिलाया- 9891115404.

अब भी फोन एंगेज था। उसने फोन रख दिया और इंतजार करने लगा। लगभग तीन मिनट रुकने के बाद उसने फिर नंबर मिलाया- 9891115404.

इस बार दूसरी तरफ घंटी बजी। तीन-चार रिंग के बाद फोन ऑन हुआ और उधर से आवाज़ आयी, ‘हैलो!यह पायल थी।

हैलो!

हैलो, मैं सुरेन्द्र बोल रहा हूं।

हां, क्या काम है?’

साहब ने तुम्हें बुलाया है।

इस वक्त मैं किसी काम में बिज़ी हूं।

तो कल आ जाना।

किस टाइम?’

शाम चार बजे।

ठीक है, आ जाऊंगी,’ पायल ने मोबाइल स्विच ऑफ करते हुए कहा।

गोरे रंग और इकहरे बदन की पायल की मुलाकात मोनिंदर सिंह पंधेर से नोएडा की मशहूर कॉलगर्ल सप्लायर नीलम उर्फ रितिका ठाकुर ने करायी थी। 26 वर्षीय पायल का नीलम से संपर्क उसके गांव पिपलिया के रिश्ते में भाई लगने वाले युवक गोविंद ने कराया था। नीलम ने मोनिंदर की फरमाइश पर पहली बार पायल को जनवरी 2006 में भेजा था। इस सेवा के एवज में मोनिंदर ने नीलम को तीन हजार रुपये दिये थे। उसके बाद तीन-चार बार मोनिंदर ने नीलम के जरिये पायल को अपनी नोएडा स्थित कोठी में बुलवाया। फिर धीरे-धीरे पायल और मोनिंदर के सम्बंध गहरे होते चले गये।

मोनिंदर से सीधा संपर्क होने का पायल को यह फायदा हुआ कि उसे अब नीलम को कमीशन नहीं देना पड़ता था। धीरे-धीरे मोनिंदर पायल का सारा खर्चा उठाने लगा। वह कई बार उसे अपने पैतृक गांव लोहत बड्डी में अपने 120 बीघे के फार्महाउस पर भी लेकर गया था। लेकिन सम्बंध गहरे होने के साथ-साथ पायल की फरमाइशें भी बढ़ती गयीं। शायद उसे डी-5 में हो रहे काले कारनामों की भनक लग गयी हो, तभी मोनिंदर ने कहा कि पायल उसे ब्लैकमेल कर रही थी।

बहरहाल, पायल जब भी डी-5 में आती तो उसे मोनिंदर के साथ अंतरंग अवस्था में सुरेन्द्र भी देखता। मन ही मन सुरेन्द्र भी चाहता था कि पायल जो सुखउसके मालिक को प्रदान कर रही है उसे भी करे। लेकिन मालिक के मालपर बिना उनकी इजाज़त के हाथ डालने की जुर्रत उसमें न थी। वह मन मसोसकर रह जाता।

उधर पायल की फरमाइशें बढ़ती जा रही थीं। फरमाइशों को पूरा करने में तो मोनिंदर को कोई दिक्कत न थी, लेकिन बार-बार की उसकी धमकियों से वह तंग आ चुका था। आखिर एक दिन थक-हारकर मोनिंदर ने अपने विश्वासपात्र नौकर सुरेन्द्र को कहा, ‘पायल बहुत तंग करने लगी है, इसका इंतजाम करो। ठिकाने लगा दो।

जी साहब,’ सुरेन्द्र ने आज्ञा का पालन करने का आश्वासन दिया।

मोनिंदर यह हुक्म देकर पंजाब में अपने गांव चला गया और सुरेन्द्र पायल को ठिकाने लगाने की तरकीब सोचने लगा।

7 मई 2006, दोपहर तीन बजे पायल ने अपने पिता नंदलाल को फोन किया, ‘हैलो पापा, जेसीबी कंपनी के डायरेक्टर मोनिंदर सिंह पंधेर से चार बजे का अप्वाइंटमेंट है, मैं वहां जा रही हूं।

क्यों?’ नंदलाल ने मालूम किया।

मैं पहले भी दो-तीन बार उनसे मिल चुकी हूं अपनी नौकरी के सिलसिले में। उनकी कंपनी में एक जगह खाली है उसी सिलसिले में इंटरव्यू है,’ पायल ने जवाब दिया।

अच्छा, जल्दी लौट आना,’ कहते हुए नंदलाल ने जाने की इजाज़त दे दी।

ठीक साढ़े चार बजे पायल का रिक्शा डी-5 के सामने रुका। उसने अपने परिचित अमर हलधर रिक्शेवाले को पांच रुपये दिये और कोठी का गेट खोलकर अंदर चली गयी। इसके बाद उसे किसी ने नहीं देखा।

साभार : गूगल 

मधु

सुबह को नाश्ता करने के बाद मोनिंदर सिंह पंधेर ने आवाज़ लगायी, ‘सुरेन्दर...सुरेन्दर....

जी साहब, आया।

ये प्लेट उठाओ। और हां, शाम को कुछ दोस्त आएंगे उनके लिए खाना बना लेना।

जी साहब, ठीक है। फ्रीजर वाला गोश्त पकाना है?’

नहीं। बाज़ार से मटन या मुर्ग ले आना। और हां, नीलम को भी फोन कर देना, किसी लड़की को भेज देगी।

साहब, कल शाम उसे फोन किया था। उसका कहना है अगले तीन दिन तक कोई लड़की खाली नहीं है।

अबे, तो मैं क्या करूं?’

साहब, किसी और को फोन करूं?’

कुछ भी कर, शाम को लड़की का इंतजाम होना चाहिए। मेरे कुछ जरूरी दोस्त आ रहे हैं, मैं उनसे क्या कहूंगा?’

जी, मैं कोशिश करूंगा।

कोशिश नहीं, इंतजाम होना चाहिए। हर हालत में।

अच्छा साहब, हो जायेगा।

अब वो नया ड्राइवर है न, क्या नाम है उसका...

जी, पान सिंह।

हां, उससे कहो गाड़ी निकाले मुझे दफ्तर जाना है।

जी,’ कहते हुए सुरेन्द्र ने प्लेट व कप उठाया और ड्राइंग रूम से बाहर निकल गया।

थोड़ी देर बाद पंधेर भी अपने घर से बाहर निकला। गेट पर पान सिंह टोयोटा कोरोला लेकर खड़ा था। उसने अपने साहब को देखते ही गाड़ी का पिछला दरवाजा खोला। पंधेर गाड़ी में बैठ गया, पान सिंह ने दरवाजा बंद किया और ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गया। कुछ ही सेकेंड में टोयोटा कोरोला नोएडा की सड़कों पर धूल उड़ाती हुई आंखों से ओझल हो गयी।

तकरीबन डेढ़ घंटे बाद घर का काम निपटाकर सुरेन्द्र डी-5 से बाहर निकला। वह टहलता हुआ निठारी गांव की तरफ जा रहा था, तभी सामने से उसे मधु आती दिखायी दी।

20 साल की मधु का रंग तो सांवला था, लेकिन नाक-नक्श देखने-दिखाने लायक थे। उसका इकहरा बदन और उभरे वक्ष व गोल नितम्ब किसी भी व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफी थे। हल्के नीले रंग की साड़ी में उस दिन उसका बदन और निखरा हुआ था। इस पर नागिन की तरह बलखाती उसकी चाल ने और कयामत ढा रखी थी। हालांकि मधु नोएडा के सेक्टर-31 में कई घरों में पांच-पांच सौ रुपये पर झाड़ू-बर्तन का काम करती थी, लेकिन उसे देखकर कोई भी कह सकता था कि गुदड़ी में ये लाल कहां से आ गया।

मधु को देखकर सुरेन्द्र ने उसकी ओर अपने कदमों की रफ्तार तेज कर दी। मधु ने शायद उसे देखा नहीं था, वह अपनी ही धुन में काम पर जा रही थी। एक घर का काम वह निपटा चुकी थी और दूसरे घर की तरफ जा रही थी।

मधु।

अपना नाम सुनकर मधु रुक गयी और पीछे मुड़कर देखा। सुरेन्द्र उसे आवाज़ दे रहा था।

मधु, तूने जवाब नहीं दिया,’ सुरेन्द्र ने पास आते हुए पूछा।

बापू से बात की थी, लेकिन उनकी मर्जी नहीं है,’ मधु ने मासूमियत से जवाब दिया।

तू जरा सोच तो, दिन भर तीन मकानों में जानवरों की तरह काम करके तुझे महीने में मिलता ही क्या है? सिर्फ 1500 रुपल्ली।

वो तो ठीक है, लेकिन बापू तुम्हारे यहां के लिए तैयार नहीं है।

आखिर क्यों?’

मैं फिर कभी बताऊंगी। अब मुझे देर हो रही है। मालकिन राह देख रही होंगी।

थोड़ी देर में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

नहीं, उसके बाद भी तो मुझे दूसरी जगह काम पर जाना है।

यही तो मैं तुझे समझा रहा हूं। तू कई घरों में जाने से बच जायेगी। फिर मेरे साहब तुझे तीन हजार रुपया महीना देंगे। जरा सोच, एक घर का काम और तीन हजार रुपया महीना। हमारे घर में काम भी तो कुछ नहीं है। बस साहब और मैं ही तो रहते हैं। साहब की बीवी-बच्चे तो बाहर रहते हैं और कभी-कभार ही यहां आते हैं।

ये तो ठीक है, लेकिन बापू तैयार नहीं हैं।

उन्हें तू फिर से समझा या मेरे पास ले आना मैं उनसे बात कर लूंगा।

ठीक है, मैं कह दूंगी।

अच्छा, तू एक बार कोठी पर चलकर काम तो देख ले। काम समझकर बापू को समझाना आसान हो जायेगा।

नहीं, इस टाइम तो मेरे पे फुर्सत नहीं है।

इसमें टाइम ही कितना लगेगा। मुश्किल से दो मिनट।

नहीं, मुझे जल्दी है अब मैं चल रही हूं,’ इतना कहकर मधु आगे बढ़ने लगी।

सुरेन्द्र भी उसके साथ ही चलने लगा और बोला, ‘देख, ये रही हमारे साहब की कोठी। तू दो मिनट बस काम समझ ले फिर चली जाना।

जिद क्यों कर रहा है, किसी और दिन आ जाऊंगी, बापू को लेकर।

तुझे भी पता नहीं क्या जल्दी लग रही है। दो मिनट में कोई फर्क ना पड़ने वाला। फिर पैसे भी तो साहब तीन हजार देंगे, यह भी तो सोच।

तू भी किसी की सुनता ही नहीं है। बस पीछे पड़ जाता है।

अरे तेरी ही भलाई के लिए कह रहा हूं, वरना यहां काम के लिए क्या बाइयों का टोटा है।

वो तो ठीक है, अच्छा मैं बापू से एक बार और बात कर लूंगी।

वही तो मैं तुझे समझा रहा हूं। एक बार काम समझ लेगी तो बापू को समझाना आसान हो जायेगा। आज तू काम देख ले फिर कल-परसों को बापू को लेकर आ जाना, अगर बात ठीक लगेगी तो काम पर लग जाना नहीं तो कोई बात नहीं। और हमारे यहां है ही कितनी देर का काम। दोपहर तक तुझे छुट्टी मिल जायेगी और महीने के मिलेंगे तीन हजार रुपये। इतने तो दफ्तर में भी लड़कियों को नहीं मिलते।

अच्छा मैं सामने वाली मालकिन का काम कर आऊं फिर आ जाऊंगी।

वहां जायेगी फिर आयेगी, अब यहीं कोठी के गेट पर तो खड़ी है, यहां का काम देख ले और चली जा,’ यह कहते हुए सुरेन्द्र ने डी-5 का गेट खोल दिया।

अपनी इच्छा के विपरीत मधु ने डी-5 के अंदर कदम रखे। उसके अंदर आते ही सुरेन्द्र ने गेट ठीक से बंद करने से पहले सड़क पर इधर-उधर नजर दौड़ाई, वहां कोई नहीं था। कोठी के सामने वाली खिड़कियों व दरवाजों पर भी उसे कोई नजर नहीं आया। निश्चिंत होकर सुरेन्द्र ने गेट बंद कर दिया। वह आगे-आगे चलने लगा और पीछे मरी हुई चाल से मधु थी। ड्राइंग रूम के दरवाजे का ताला खोलकर उसने मधु को अंदर बढ़ने का संकेत दिया। मधु के अंदर होते ही सुरेन्द्र ने ड्राइंग रूम का दरवाजा पीछे से बंद कर दिया, और उसके बाद मधु को फिर डी-5 के बाहर किसी ने नहीं देखा 

पंधेर व उसके दोस्तों के लिए आज रात का इंतजाम हो गया था।

जारी ... 










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