‘निठारी से तो लड़कियां उठ रही हैं, हर्ष तो लड़का है, उसे कोई क्यों उठाएगा?’

सत्यकथा , दूसरी किस्त, बुधवार , 02-08-2017


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कोठी नंबर डी-5 : भाग दो

(लेखक: लोकमित्र गौतम और शाहिद ए. चौधरी)

हर्ष

निठारी की बस्ती में राम किशन धमुक पिछले बारह साल से रह रहे हैं। राम किशन नोएडा प्राधिकरण में ड्राइवर हैं। सुबह को काम पर जाना और शाम ढले लौटना। यही उनकी दिनचर्या रही है सिवाय छुट्टियों के जब उन्हें अपने परिवार के साथ कहीं पास में ही घूमने या फिल्म देखने का अवसर मिलता है।

23 फरवरी 2006 को भी वे अपनी ड्यूटी पर थे। उनका अधिकारी दफ्तर में व्यस्त था। और वे दफ्तर के बाहर धूप सेंक रहे थे। तभी चपरासी उनके पास दौड़ता हुआ आया और बोला, ‘राम किशन, साहब ने बुलाया है।

अच्छा,’ कहते हुए रामकिशन अंदर गये और अपने साहब के केबिन में प्रवेश करते ही बोले, ‘जी साहब! आपने बुलाया?’

हां रामकिशन, लो फोन सुन लो। तुम्हारे घर से आया है।

रिसीवर पकड़ते हुए रामकिशन ने हैलोकहा। दूसरी तरफ रोने की आवाज़ आ रही थी।

अरे बोलो भी, क्या हो गया?’

तुम जल्दी से घर आ जाओ,’ रामकिशन की पत्नी ने रोते हुए कहा।

क्यों, क्या बात हो गयी?’

बस तुम घर आ जाओ, जल्दी से।

कुछ तो बता, मैं साहब से क्या कहूंगा?’

तुम घर आ जाओ।

अजीब रट लगा रखी है, बात क्या हो गयी पता तो चले।

कहा न तुम घर आ जाओ, तभी बात करूंगी,’ यह कहते हुए उनकी पत्नी ने फोन रख दिया।

रामकिशन के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। उन्हें कुछ बात समझ में नहीं आ रही थी। रामकिशन को परेशान देख उनके साहब ने मालूम किया, ‘क्या बात हो गयी रामकिशन?’

पता नहीं साहब, पत्नी थी फोन पर। बस रोए जा रही थी और कह रही थी कि जल्दी से घर आ जाओ।

कुछ खास बात हो गयी होगी...मुझे कहीं जाना नहीं है, ऐसा करो तुम गाड़ी ले जाओ और जाकर मालूम कर आओ। हां, जल्दी आ जाना।

जी साहब,’ कहते हुए रामकिशन बाहर निकल आये। उन्होंने दफ्तर की गाड़ी स्टार्ट की और घर का रुख किया।

निठारी बस्ती की तंग गली में गाड़ी को ले जाना कठिन काम था। इसलिए रामकिशन ने वाटर टैंक के बराबर में ही गाड़ी खड़ी की और पैदल अपने कमरे की ओर बढ़ चले। घर में कोहराम मचा था। आस-पड़ोस के लोग भी वहां जमा हो गये थे। उनकी पत्नी की जोर-जोर से रोने की आवाजें दूर तक सुनाई दे रही थीं। घबराये हुए कदमों से रामकिशन आगे बढ़े और भीड़ को चीरते हुए अंदर दाखिल हुए।

रामकिशन को देखते ही उनकी पत्नी और जोर-जोर से दहाड़ें मारने लगी। रामकिशन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर भी पत्नी को बाहों में भरते हुए उन्होंने मालूम किया, ‘अरे कुछ बात भी हो गयी या यूं ही रोती रहेगी?’

हर्ष....

हां, क्या हुआ हर्ष को?’

उसका कहीं पता नहीं है।

क्या?’

हां, उसका सुबह से ही कहीं पता नहीं है।

सुबह से...?’

हां, जब तुम दफ्तर गये थे तो मैं घर का काम निपटाकर हर्ष को लेकर चबूतरे के पास गयी थी ताकि कुछ देर धूप में बैठ सकूं।

फिर क्या हुआ?’

हर्ष वहीं खेल रहा था। मैं राधा से बातें करने लगी। तभी उधर से एक बारात निकलने लगी और हम दोनों उसे देखने लगीं।

उसके बाद...?’

जब पीछे मुड़कर देखा तो वहां हर्ष नहीं था।

क्या?’

हां, उसे किसी ने उठा लिया।

तूने उसे ठीक से तो ढूंढ़ा..?’

हां, जब से मैं और मोहल्ले के बाकी लोग उसे ही ढूंढ़ रहे हैं। जब वह कहीं नहीं मिला तो थककर तुम्हें फोन किया।

लेकिन हर्ष को कोई क्यों उठायेगा? वह तो लड़का है।

बस जी, उसे किसी ने उठा ही लिया।

निठारी से तो लड़कियां उठ रही हैं, हर्ष तो लड़का है। उसे भला कोई क्यों उठायेगा?’

नहीं उठायेगा, तो तुम्हीं ढूंढ़ लो उसे। मैंने तो बहुत खोज लिया, मुझे तो कहीं नहीं मिला।

अच्छा, मैं ही देखता हूं।

रामकिशन और कुछ अन्य लोग हर्ष की खोज फिर से करने निकल पड़े। लेकिन इस तलाश का भी वही अंजाम हुआ....हर्ष का कहीं पता नहीं चला। हर्ष तीन साल का मासूम और खूबसूरत बच्चा था। आठ साल की हजारों मन्नतों के बाद रामकिशन और उनकी पत्नी पूनम के घर हर्ष पैदा हुआ था। वह घर का पहला चिराग था इसलिए हर कोई उसे बहुत प्यार करता था और उसकी देखभाल करता था। उसके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए रामकिशन ने जी-तोड़ मेहनत करनी शुरू कर दी थी। वे अपना पेट काटकर उसके भविष्य और गाढ़े वक्त के लिए पैसे जोड़ रहे थे। लेकिन जिंदगी भी अजीब पहेली है, एक मन्नत पूरी हुई, घर में बच्चे ने आंखें खोली और तीन साल बाद वही बच्चा लापता हो गया।

जब कई घंटे की खोजबीन के बाद भी हर्ष का कोई पता न चला तो रामकिशन अपने अधिकारी के पास पहुंचे और उन्हें अपने बेटे के खोने की खबर दी। अधिकारी ने उनसे हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘हिम्मत रखो, मिल जायेगा। लेकिन पहले इसकी रिपोर्ट थाने में लिखवा दो।

साहब, थाने में हमारी कौन सुनेगा?’

सुनेगा क्यों नहीं?’

निठारी से पहले भी बच्चे गायब हुए हैं, लेकिन जब भी हम लोग पुलिस के पास जाते हैं तो बेइज्जत होकर वापस आना पड़ता है और हम गरीबों की रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती है।

लिखेंगे...लिखेंगे...तुम्हारी रिपोर्ट लिखेंगे। मैं थाने में फोन किए देता हूं और तुम वहां जाकर अपनी रिपोर्ट लिखवा दो।

रामकिशन नोएडा प्राधिकरण में सरकारी मुलाजिम हैं, इसलिए पुलिस ने उनके बेटे हर्ष को गुमशुदा की फेहरिस्त में दाखिल कर लिया। लेकिन रामकिशन अपने बेटे की एफआईआर दर्ज कराना चाहते थे। पुलिस ने उनकी अर्जी ली और उसे स्वीकार करके वापस कर दिया। रामकिशन और उनके भाई रामसरन इस बात से खुश नहीं थे। उन्होंने मोहल्ले के और बहुत से लोगों को इकट्ठा किया, थाने पर हंगामा किया तभी जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।

एफआईआर तो दर्ज हो गयी लेकिन जब कई महीने तक हर्ष का कुछ पता न लगा और उसकी तस्वीरें देखकर घर में उदासी व मातम का माहौल हो जाता, तो रामकिशन ने अपने प्यारे बेटे की तस्वीरों और अन्य चीजों को अपने घर से हटा दिया।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

रिम्पा हलधर

8 फरवरी 2005 की दोपहर। अनिल हलधर ने निठारी गांव की मजदूर बस्ती में अपने एक कमरे के मकान के सामने अपना रिक्शा रोका और कपड़े से सिर का पसीना पोंछते हुए कमरे में घुसा। जाड़ों में भी मजदूरों को पसीना बहाना पड़ता है तब जाकर पेट की आग शांत होती है। अपने पति को बेवक्त देखकर डॉली असमंजस में पड़ गयी, ‘आज बड़ी जल्दी आ गये। क्या सवारी नहीं थी?’

नहीं, सवारी तो बहुत थी लेकिन पता नहीं क्यों घर लौटने का मन किया, फिर भूख भी लग रही थी,’ अनिल ने हाथ का कपड़ा एक तरफ रखकर पास रखी बाल्टी में से पानी लेकर हाथ धोने शुरू कर दिये।

मैंने तो कुछ बनाया ही नहीं है।

कुछ तो होगा, बहुत भूख लगी है ला कुछ खाने को दे दे।

थोड़ा सा इंतज़ार कर लो, चावल उबाल देती हूं।

अरे चटनी-वटनी नहीं है।

वो भी बनानी पड़ेगी।

चल बना ले, उससे ही एक रोटी खा के और थोड़ा आराम करके काम पर चला जाऊंगा। और हां, ये रिम्पा कहां है?’

अभी तो यहीं खेल रही थी। फिर बोली वाटर टैंक के चबूतरे तक हो आऊं। अब तक तो आ जाना चाहिए था। न जाने कहां रह गयी?’

तू चटनी बना, मैं बुलाकर लाता हूं।

इतना कहकर अनिल हलधर अपनी 14 वर्षीय बेटी रिम्पा को बुलाने बाहर चला गया। रिम्पा की उम्र हालांकि अभी 14 बरस ही थी लेकिन उसका उठान अच्छा था। कद तो कोई ज्यादा लंबा न था लेकिन चेहरा गोल, पतली नाक, बड़ी-बड़ी आंखें और पतले होठों ने उसके सांवले रंग में भी गजब का आकर्षण भर दिया था। अपनी सुंदरता से वह भीड़ में बिल्कुल अलग नज़र आती थी। बाल उसके लम्बे थे जिन्हें वह बीच में मांग काढ़कर पीछे चोटी में बांध लेती थी।

वाटर टैंक अनिल के कमरे से लगभग सौ गज के फासले पर है। कमरे से निकलने के बाद अनिल ने गली में इधर-उधर देखा। सब कुछ सामान्य था। बस्ती के लोग जाड़े की दोपहर में धूप सेंक रहे थे। बच्चे खेल रहे थे। सामने से उसे झब्बू लाल की बेटी ज्योति लाल आती नज़र आयी। अनिल जानता था कि ज्योति और रिम्पा अक्सर साथ खेलती हैं इसलिए उसने मालूम किया, ‘ज्योति, ओ ज्योति, तूने रिम्पा को कहीं देखा है?’

चाचा, अभी थोड़ी देर पहले ही मैंने उसे चबूतरे पर देखा था। वहीं होगी।

अच्छा, तो वहीं देख लेता हूं।

अनिल चबूतरे के पास पहुंचा तो वहां अनेक बच्चे खेल रहे थे, लेकिन उनमें रिम्पा नहीं थी। अनिल ने बच्चों से मालूम किया कि रिम्पा कहां है?

चाचा, अभी तो यहीं थी। घर चली गयी होगी,’ एक बच्चे ने बताया।

अनिल लौटकर अपने घर पहुंचा तो रिम्पा वहां भी नहीं थी। उसे चिंता होने लगी। भूख गायब हो गयी थी। कहां गयी होगी, उसने सोचा। उसकी चिंता को भांपते हुए डॉली बोली, ‘अरे यहीं कहीं बच्चों में खेल रही होगी। आ जायेगी। तुम रोटी खाओ।

मेरी तो भूख ही गायब हो गयी है। बहुत फिक्र हो रही है। न जाने कहां चली गयी? तू उसकी सहेलियों में मालूम करके आ।

तुम्हें भी एक बात की रट लग जाती है।

रट लगने की बात नहीं है। सयानी बच्ची है, जमाना खराब है और फिर यह भी तो देख हमारी बस्ती से जितने बच्चे गायब हुए हैं उनमें से किसी का सुराग मिला है?’

शुभ शुभ बोलो। चिंता में न जाने क्या-क्या बोलने लगते हो।

बहस मत कर, जा उसे देख कर आ। मैं भी उसे सड़क तक देख कर आता हूं।

डॉली बस्ती में निकल गयी और अनिल गली में इधर-उधर देखता हुआ सेक्टर-31 की सड़क तक जा पहुंचा। रिम्पा की सहेलियों से बस यही जानकारी मिली कि उसे वाटर टैंक के पास कुछ देर पहले देखा था। कई घंटे तलाशने के बाद थके-हारे डॉली और अनिल वापस अपने घर पहुंचे, लेकिन रिम्पा का कहीं कोई अता-पता नहीं था। अब किसी अनहोनी की सोचकर दोनों बहुत उदास हो गये थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? रिम्पा की खैर-खबर नहीं थी। बस्ती के बाकी लोग भी रिम्पा को ढूंढ़ने में लग गये थे लेकिन उन्हें भी नाकामयाबी हासिल हुई। आखिर यह तय हुआ कि अनिल के साथ कुछ लोग जाकर थाने में रपट दर्ज करा आएं।

सेक्टर-20 के थाने में आला अफसर मौजूद नहीं थे। रिपोर्ट दर्ज करने के लिए एक मुंशी बैठा हुआ था। बस्ती के लोगों को देखते ही उसने मालूम किया, ‘हां भई, क्यों घुसे आ रहे हो?’

हुजूर, रिपोर्ट दर्ज करानी है,’ अनिल ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

किसकी? क्या हो गया?’

जी मेरी बेटी रिम्पा आज दोपहर से लापता है।

तो सब जगह ठीक से तलाशो....

जी, एक एक जगह देख लिया, उसका कहीं पता नहीं है।

कितनी बड़ी थी?’

13-14 साल की होगी।

अबे, तो किसी के साथ चली गयी होगी।

नहीं साहब, मेरी बच्ची ऐसी नहीं थी।

तुझे क्या पता...क्या करता है?’

साहब, रिक्शा चलाता हूं।

तू तो दिन भर रिक्शा चलाता होगा, पीछे तुझे क्या पता वो क्या गुल खिलाती होगी।

नहीं साहब, बस्ती के सभी लोग गवाह हैं मेरी रिम्पा ऐसी नहीं थी।

तो फिर कहां चली गयी?’

जी उसे किसी ने अगवा कर लिया है।

क्यों क्या तू बहुत बड़ा धन्ना सेठ है?’

नहीं साहब, बस्ती में पिछले कई महीनों से बच्चे गायब हो रहे हैं। वे अपने आप कहीं नहीं जा रहे उन्हें कोई उठा रहा है।

तेरे पास कोई गवाह है...?’

गवाह तो कोई नहीं है।

फिर तू कैसे कह सकता है कि उसे किसी ने अगवा कर लिया है?’

जी, यही अनुमान है।

अबे अनुमान पर रिपोर्ट लिखी जाती है? जा पहले कोई गवाह लेकर आ फिर रिपोर्ट लिखी जायेगी। चल यहां से...

साहब, गरीबों की भी तो कुछ सुनो।

अबे जा रहे हो या डंडा उठाऊं? चलो।

अनिल और बस्ती के बाकी लोग मुंह लटकाये हुए थाने से वापस आ गये।

पप्पू लाल

पप्पू लाल ने लंच बॉक्स उठाया और काम पर जाने लगा। वह नोएडा की एक स्थानीय फैक्ट्री में मजदूर है। तभी पीछे से उसकी छोटी बेटी रचना ने कहा, ‘पापा, आज मेरे स्कूल की छुट्टी है। क्या मैं दादा-दादी के पास हो आऊं?’

चली जाना लेकिन जब तुम्हारी मां काम से लौट आए। और देखो ध्यान से जाना बीच में किसी से बात मत करना,’ पप्पू लाल ने उसे समझाते हुए कहा और काम पर चला गया।

दोपहर के करीब रचना की मां नोएडा की कोठियों में झाड़ू-पोंछा और बर्तन साफ करने के बाद लौटी। आते ही वह अपने बच्चों के लिए खाना बनाने लगी। रचना ने उससे कहा, ‘मां, मैं दादा-दादी के पास जाना चाहती हूं, पापा से मैंने पूछ लिया है।

तुझे तो बस दादा-दादी के पास जाने का मौका मिलना चाहिए। छुट्टी है तो क्या हुआ, घर में बैठ, पढ़। तुझे पता है कितनी मुश्किलों से तो हम तेरी फीस भर पाते हैं। डीपीएस में पढ़ाना हम गरीबों के वश में कहां है,’ मां ने कहा।

मां थोड़ी ही देर की तो बात है। मैं जल्द लौट आऊंगी,’ रचना ने जिद की।

आठ बरस की बच्ची की जिद भी मामूली जिद नहीं होती है। मां आखिरकार बच्ची का रुआंसा चेहरा न देख सकी और उसे जाने की इजाज़त देते हुए कहा, ‘अच्छा, चली जाना लेकिन पहले कुछ खा ले। और हां, जल्दी लौट आना।

मां मैं दादी के पास ही कुछ खा लूंगी और शाम होने से पहले लौट आऊंगी,’ यह कहते हुए रचना बाहर की तरह भागी और पीछे उसकी मां व उससे दो साल बड़ी बहन अर्चना उसे आवाज देती रह गयीं।

उधर शाम को जब पप्पू लाल ड्यूटी से घर लौटा तो उसने अपनी पत्नी से रचना के बारे में मालूम किया। उसे आप ही ने तो अपने मां-बाप के पास जाने की इजाज़त दी थी,’ पत्नी ने जवाब दिया।

ठीक है, लेकिन वह अभी तक लौटी क्यों नहीं?’

मुझे क्या पता, लेकिन बहुत देर हो गयी है उसने तो कहा था कि शाम ढलने से पहले ही लौट आयेगी।

अच्छा, मैं जाकर देखता हूं।

ड्यूटी से थके-हारे आये हो कुछ चाय-पानी ले लो फिर चले जाना।

नहीं, लड़की जात है इतनी देर तक घर के बाहर रहना उसका ठीक नहीं है। फिर अंधेरा होता आ रहा है, मैं पहले उसे ले आता हूं।

थोड़ी देर बाद जब पप्पू लाल लौटा तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। रचना अपने दादा-दादी के पास पहुंची ही नहीं थी। घर के सब सदस्य रचना को ढूंढ़ने में लग गये। उनकी परेशानी की एक वजह यह भी थी कि पिछले एक-डेढ़ साल के दौरान निठारी गांव से अनेक बच्चे लापता हो चुके थे। उनका कहीं कोई सुराग नहीं मिल सका था।

नोएडा के सेक्टर-31 से सटा हुआ निठारी एक छोटा सा गांव है। गांव की आबादी मुश्किल से 9500 होगी जिसमें आधे से भी ज्यादा बाहर के लोग हैं। नोएडा का जब विकास होना शुरू हुआ तो बड़े पैमाने पर पर मजदूरों की जरूरत पड़ी। देश के दूरदराज इलाकों से मेहनत मजदूरी करने के लिए आने वाले लोग नोएडा के आसपास के गांवों में आकर बस गये। इनमें मुख्य रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश और नेपाल के लोग हैं। यह लोग घरेलू नौकर, रिक्शा चालक, फैक्ट्री वर्कर और ऐसे ही छोटे-मोटे कामों में लगे हुए हैं। मजदूरी इतनी कम मिलती है कि घर के बड़ों को चाहे वे औरत हों या मर्द, सभी को काम करना पड़ता है। इसलिए दिन में अक्सर बच्चे ही निठारी की संकरी गलियों में दिखते हैं। इसी आबादी के पास एक वाटर टैंक है जिसके पास में एक चबूतरा बना हुआ है। बच्चों के लिए यही एकमात्र खेलने की जगह है। लेकिन पिछले कुछ माह से इसी चबूतरे के पास से बच्चे गायब होने की शिकायतें आने लगीं और इन शिकायतों में निरंतर इजाफा होता रहा।

इस पृष्ठभूमि ने पप्पू लाल और उसके परिवार की चिंता और बढ़ा दी थी। रचना की तलाश आसपास के सभी क्षेत्रों में की गयी लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला, सिवाय इस बात के कि कुछ बच्चों ने उसे दोपहर में सुरेन्द्र से बात करते हुए देखा था।

आखिर थक-हारकर पप्पू लाल बस्ती के कुछ अन्य लोगों को लेकर नोएडा पुलिस स्टेशन सेक्टर-20 में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचा। उस वक्त एसओ आर.एन. यादव ड्यूटी पर मौजूद थे।

हां, कैसे आये?’ आर.एन. यादव ने सिगरेट का धुआं एक तरफ उड़ाते हुए मालूम किया।

जी थानेदार साहब, इस पप्पू लाल की बेटी रचना दोपहर से गुम हो गयी है।

इसके मुंह में जुबान नहीं है, यह नहीं बोल सकता।

जी हुजूर, दोपहर में घर से अपने दादा-दादी के यहां के लिए गयी थी। वहां पहुंची नहीं, तब से गायब है,’ पप्पू ने रुक-रुककर अपनी दास्तान सुनाई।

अबे तो ढूंढ़ो, यहीं कहीं चली गयी होगी। चले आते हैं साले पुलिस को परेशान करने,’ यादव ने हिकारत भरे लहजे से कहा।

हुजूर, सब जगह देख लिया। कहीं कुछ पता नहीं चला। तभी आपके पास आया हूं।

और ढूंढ़ो।

जी आप रिपोर्ट दर्ज कर लीजिए।

अबे पहले ढूंढ़ तो ले।

हुजूर, पहले भी कई बच्चे हमारी बस्ती के गायब हो चुके हैं और उनका कहीं कुछ पता नहीं चल पाया है,’ पप्पू लाल के साथ आये एक व्यक्ति ने कहा।

अबे तो क्या मैं जिम्मेदार हूं। जब तुमसे अपनी औलादें संभलती नहीं हैं तो साले पैदा ही क्यों करते हो? चलो, जाकर ढूंढ़ो। साले मुंह उठाकर चले आते हैं जैसे हमें और कोई काम ही न हो,’ यादव ने झिड़का।

हुजूर, रिपोर्ट तो दर्ज कर लो,’ पप्पू लाल ने एक बार फिर गुजारिश की।

अबे चल पहले ठीक से ढूंढ़। चलो दफा होओ।

पप्पू लाल और बस्ती के अन्य लोग अपना सा मुंह लटकाये थाने से बाहर आ गये और रचना की तलाश में एक फिर जुट गये। 

आंसुओं की बरसात

अनिल और डॉली हलधर के मकान पर शोक और आंसुओं की बरसात थी। रिम्पा को गायब हुए तीन दिन गुजर चुके थे। उसका कहीं अता-पता नहीं था। इन तीन दिनों में डॉली न जाने कितनी मौत मरी होगी। उसके पास कोई गिनती नहीं थी। दरवाजे़ पर ज़रा आहट होती तो लगता कि बच्ची वापस आ गयी है। मुंह उसका खुलता तो सिर्फ भगवान से प्रार्थना के लिए कि उसकी बच्ची जल्द वापस आ जाए।

अनिल भी बेहाल था। बच्ची के गायब होने से बड़ा दुख यह था कि पुलिस ने अब तक न एफआईआर दर्ज की थी न ही रिम्पा की गुमशुदगी की जानकारी को दाखिल किया था। इन तीन दिनों में वह कई बार थाने के चक्कर काट चुका था, लेकिन हर बार एक टका सा जवाब मिलता, ‘गवाह लायेगा तभी तो अगवा की रिपोर्ट दर्ज करेंगे।

अब वह बेचारा गवाह कहां से लाता? बस्ती में किसी को नहीं पता था कि रिम्पा कहां चली गयी या कौन उसे उठाकर ले गया। इसी कशमकश में अनिल को उषा ठाकुर की याद आयी। नोएडा की समाजसेविका उषा ठाकुर को वह कई बार अपने रिक्शे में बतौर सवारी के इधर-उधर ले जा चुका था। उषा ठाकुर उसे पहचानती थीं और अक्सर उससे निठारी के गायब बच्चों के बारे में मालूम किया करती थीं। इस अंधेरे में उसे उषा ठाकुर ही एकमात्र उम्मीद की किरण नज़र आ रही थीं। वह जल्दी से उठा और अपना रिक्शा लेकर सीधा उषा ठाकुर के घर जा पहुंचा।

कॉलबेल दबाने पर अंदर से आवाज आयी, ‘कौन?’

बहन जी, मैं हूं। अनिल हलधर रिक्शा वाला।

आ जाओ।

दरवाजा खुला अनिल अंदर चला गया। सामने बहन जी बैठी थीं।

हां, कहो क्या बात है?’

इलेस्ट्रेशन सहीम।

बहन जी, मेरी बेटी रिम्पा तीन दिन से लापता है। उसे किसी ने उठा लिया है। मैं थाने गया था लेकिन वहां रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया। अब आप ही कुछ करिए न,’ अनिल ने हाथ जोड़ते हुए गुजारिश की।

यह तो हद कर दी। गरीब लोगों की कोई सुनता ही नहीं। मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। और हां, तुम्हारे गांव से तो पहले भी कई बच्चे गायब हुए थे,’ उषा ठाकुर ने उसे तसल्ली देते हुए मालूम किया।

बहन जी, मैंने आपको बतलाया था लेकिन अब तक उनकी भी न कोई रिपोर्ट लिखी गयी है और न ही कोई सुनवाई हुई है।

अब होगी...मैं मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सभी को चिट्ठियां लिखूंगी। अखबार वालों से भी कहूंगी कि वे इस मुद्दे को उठायें।

लेकिन बहनजी, मेरी बिटिया की रिपोर्ट का क्या होगा?’

वह भी लिखवाऊंगी, लिखेंगे कैसे नहीं। ऐसा करना तुम मेरे पास कल आ जाना। मैं साथ ही थाने चलूंगी तभी रिपोर्ट दर्ज की जायेगी।

अगले दिन उषा ठाकुर अनिल को लेकर सेक्टर-20 के थाने पहुंचीं और ज़ोर-जबरदस्ती करके रिम्पा हलधर की गुमशुदगी की जानकारी दर्ज कराने में सफल हो गयीं। रिपोर्ट तो दर्ज हो गयी लेकिन रिम्पा को तलाशने के लिए कोई प्रयास नहीं किये गये।

रिम्पा की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद निठारी से और भी मां-बाप उषा ठाकुर के पास पहुंचे ताकि उनके गुमशुदा बच्चों की भी रिपोर्ट दर्ज करायी जा सके। उनमें से कुछ की रिपोर्ट दर्ज कराने में तो उषा ठाकुर कामयाब रहीं लेकिन अधिकतर अभिभावकों को बैरंग ही लौटना पड़ा। इससे भी ज्यादा कष्टदायक बात यह थी कि बच्चे विशेषकर कम उम्र की लड़कियां निरंतर गायब होती जा रही थीं और पुलिस व प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी।

बहरहाल, थाने में उषा ठाकुर को जितनी नाकामी हाथ लगती उतना ही दृढ़ उनका इरादा हो जाता खोए हुए बच्चों को तलाशने का। उन्होंने स्थानीय पुलिस से लेकर राष्ट्रपति तक सभी को पत्र लिखे। एक पत्र राष्ट्रीय महिला आयोग को भी लिखा गया जिसके तहत निर्मला वेंकटेश ने आयोग की तरफ से निठारी में खोजबीन शुरू की।

शक

निठारी की बस्ती में खौफ का साया हर घर का हिस्सा बन गया था। बच्चे लगातार गायब हो रहे थे। पुलिस कुछ करने की बजाए रिपोर्ट तक नहीं लिख रही थी। हद तो यह है कि बीस बच्चे गायब होने के बाद भी सिर्फ 7 बच्चों की ही गुमशुदगी दर्ज की गयी। गुमशुदगी सिर्फ जानकारी होती है रिपोर्ट नहीं।

बच्चे की गुमशुदगी मौत से भी भयंकर होती है। मौत पर कुछ दिनों के बाद सब्र आ जाता है लेकिन बच्चे के गायब होने पर तो उसके मां-बाप व भाई-बहन तिल-तिल मरते रहते हैं, इसी उम्मीद में कि बच्चा अब लौट आयेगा...तब लौट आयेगा। साथ ही यह खौफ भी रहता है कि बच्चा कहां होगा, कैसे होगा, उसने कुछ खाया-पीया होगा या नहीं।

शेफाली हलधर के गायब होने के बाद निठारी में इतनी ऐहतियात बरती जाने लगी कि मांएं बच्चों को स्कूल खुद ले जातीं और लातीं। कुछ ने अपना काम बंद कर दिया और बच्चों को भी घर से बाहर खेलने के लिए नहीं जाने दिया जाता था। लेकिन बच्चे फिर भी गायब हो रहे थे मगर पुलिस कुछ कर नहीं रही थी।

आखिर निठारी के गरीब मजदूरों ने 60 वर्षीय सुभाष पाल के नेतृत्व में एक बैठक की और बच्चों को तलाशने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करने शुरू कर दिये। इस सिलसिले में उन्होंने 54 वर्षीय समाजसेविका उषा ठाकुर से भी संपर्क किया।

इलेस्ट्रेशन सहीम।

बहन जी, बस्ती से बच्चे बराबर गायब हो रहे हैं। हर दो हफ्ते में एक बच्चा गायब हो जाता है,’ सुभाष पाल ने कहा।

यह बात तो है। मैंने राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिखा है,’ उषा ठाकुर बोलीं।

इससे कुछ पुलिस पर असर पड़ेगा। वैसे तो पुलिस हमारी सुनती नहीं,’ पप्पू लाल बोला।

पुलिस पर कुछ न कुछ दबाव तो पड़ेगा लेकिन हमें अपने स्तर पर भी कुछ न कुछ करना चाहिए,’ उषा ठाकुर ने सुझाव दिया।

लेकिन हम लोग क्या कर सकते हैं?’ झब्बू लाल ने मालूम किया।

बहुत कुछ।

वह क्या?’ झब्बू लाल ने फिर पूछा।

उस दिन वह कटा हुआ हाथ कहां मिला था?’ उषा ठाकुर ने मालूम किया।

कोठी डी-5 के पीछे वाले नाले में,’ रामशरण बोला।

तो उस इलाके के आसपास तुम लोग अपने तौर पर नज़र रखो। मुझे लगता है वहीं से कोई सुराग निकलेगा और हां, वहां डॉ. नवीन चैधरी की भी तो कोठी है,’ उषा ठाकुर बोलीं।

जी, बहन जी, वो डी-6 में रहते हैं,’ सुभाष पाल ने बताया।

लेकिन डॉ. नवीन चैधरी कौन हैं?’ रामशरण ने पूछा।

अरे कुछ समय पहले गुर्दे बेचने में उनका नाम उछला था,’ सुभाष पाल ने जानकारी दी।

तो क्या गुर्दे बेचने के लिए हमारे बच्चों को मार दिया गया है,’ पप्पू लाल लगभग रोते हुए बोला।

मैं ऐसा कुछ नहीं कहती। लेकिन जिस तरह से नाले में से कटा हुआ हाथ निकला है उससे शक तो बहुत चीजों पर जाता है,’ उषा ठाकुर बोलीं।

मेरी बच्ची, ज्योति,’ झब्बू लाल रो पड़ा।

धीरज रखो। ईश्वर करे तुम्हारी बच्ची बल्कि सभी बच्चे सही-सलामत हों। लेकिन हमें किसी बात को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए और हिम्मत से काम लेना चाहिए,’ उषा ठाकुर ने समझाया।

लेकिन हम लोग कर क्या सकते हैं?’ इस बार सुभाष पाल ने मालूम किया।

डी-5 और उसके आसपास के मकानों पर नज़र रखो। देखो वहां कौन आता है, कौन जाता है,’ उषा ठाकुर ने कहा।

डी-5 ही क्यों?’ रामशरण ने पूछा।

दरअसल बाकी सब में तो परिवार रहते हैं। डी-5 में मेरी जानकारी के अनुसार सिर्फ एक मालिक और नौकर ही रहता है। मुझे लगता है कि अगर गड़बड़ उस क्षेत्र में ही है तो डी-5 का कोई हाथ हो सकता है,’ उषा ठाकुर बोलीं।

बहन जी, सही कहती हैं। यह डी-5 में जो नौकर है, हां क्या नाम है उसका...सुरेन्द्र कोली उसे जब भी गांव की तरफ देखा गया है तभी कोई न कोई गायब हो गया है,’ पप्पू लाल बोला।

अब तक सुनील बिस्वास और उसकी पत्नी रूपा खामोश बैठे हुए थे। उनकी दस साल की बेटी पुष्पा पिछले सात महीने से गायब है। सुनील रिक्शा चलाता है और रूपा सेक्टर-29 में घरेलू नौकरानी है। सुरेन्द्र और डी-5 का नाम सुनते ही सुनील रुआंसी आवाज़ में बोला, ‘जब मैं एक बजे के करीब खाने के लिए घर लौटा तो पुष्पा घर पर नहीं थी। पड़ोसियों ने बताया कि उसे डी-5 कोठी के पास देखा था। मैंने उसकी बहुत तलाश की लेकिन वह कहीं नहीं मिली और जब मैं पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने गया तो उसे गुमशुदा में दाखिल किया गया। मैं कुछ दिनों बाद फिर मालूम करने गया तो मुझे बताया गया कि जो पुलिसकर्मी जांच कर रहा है उसका ट्रांसफर हो गया है। एक दिन हिम्मत करके मैंने डी-5 का दरवाजा खटखटा दिया। सुरेन्द्र से अपनी बेटी के बारे में मालूम किया तो वह बोला कि उसे परेशान न किया जाए उसके साहब के बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों से सम्बंध हैं। मुझे लगा वह मुझे धमका क्यों रहा है, मुझे दाल में कुछ काला लगा। मुझे सुरेन्द्र पर शक भी हुआ लेकिन मेरे पास कोई सबूत न था।

उस पर शक तो मुझे भी है,’ झब्बू लाल बोला।

शक करने से कोई फायदा नहीं, तह तक पहुंचो, जानकारी जुटाओ,’ उषा ठाकुर बोलीं।

अच्छा तो ऐसा करते हैं कि मैं और पप्पू लाल डी-5 के नौकर सुरेन्द्र पर नज़र रखेंगे और बाकी लोग आसपास के एरिया की चैकीदारी करेंगे, देखेंगे कि कौन और किस किस्म के लोग आते हैं,’ झब्बू लाल बोला।

यह तो ठीक है, लेकिन अपने बच्चों पर भी निगाह रखो, उन्हें कहो कि अजनबियों से न बात करें और न ही उनसे कोई चीज़ लें,’ उषा ठाकुर ने समझाया।

ऐसा तो बहुत टाइम से कर रहे हैं लेकिन कोई न कोई चूक हो ही जाती है,’ सुभाष बोला।

मैंने तो अपनी दूसरी बेटी का स्कूल जाना भी बंद कर दिया है। मैं एक और बच्चे को खोने की हिम्मत नहीं कर सकती,’ रूपा बोली।

फिर भी और सावधानी बरतो,’ उषा ठाकुर बोलीं। 

जारी.....

 

 










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