पढ़ी-लिखी मूर्खता पर मैं और गधा दोनों हंसते हैं

आड़ा-तिरछा , , सोमवार , 18-06-2018


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वीना

रोड के एक तरफ साईकिल पर 

एक तरफ गाड़ियों में लोग चलते हैं

दोनों के पेट उनके वाहनों से मिलते हैं

ये पूंजीवाद के योगासन हैं

फूले हुए और फूल जाते हैं

पिचके हुए और पिचक जाते हैं

ये पंक्तियां उस पल ज़हन में आई थीं, जब एक बार कई साल पहले दिल्ली-मथुरा रोड से सुबह के छः बजे गुज़रना हुआ।

आस-पास कई किलोमीटर के दायरे में यहां उस वक़्त बहुत सी फैक्ट्रियां हुआ करती थीं। जिनमें से अधिकतर आज  बंद हो चुकी हैं। यहां से मज़दूर उजाड़े जा चुके हैं पर उन्हें रोज़गार देने के नाम पर सरकार से सस्ते में वसूली ज़मीनों पर फैक्ट्री मालिकों की तशरीफ़ अभी तक ज़मी हुई हैं। 

खै़र, उस सुबह मैंने रोड के एक तरफ़ बहुत से जवान, बीच की उम्र के और बुर्जुग मज़दूरों की आती-जाती कतारें देखीं। जो साईकिल पर सवार होकर या तो अपनी सुबह की ड्यूटी बजाने आ रहे थे या रात की पूरी कर घर वापस जा रहे थे। देखने में बिल्कुल यूं लग रहा था जैसे ढेरों मेहनती चीटियां कतार बनाए हुए बिलों से निकलती जा रही हैं...एक सीध में। न इधर से वास्ता न उधर की कोई ख़बर। मैंने पहली बार ऐसा नज़ारा देखा था। कुछ देर एक अजीब सा रोमांच तारी रहा मुझ पर।

एक टक मैं उन सब फैक्ट्री मज़दूरों को आते-जाते देखती रही। सबके चेहरे एक जैसे...बिना भाव के। गाल पिचके हुए, पेट कमर से चिपका हुआ। पेट जैसे कमर का सहारा लेकर साईकिल पर बैठा था। साईकिल के पतले डंडों से होड़ लगाते हाथ पैर जैसे कह रहे हों - ‘‘ देखें भला, तुम पतले कि हम!’’ 

ये सब देखते हुए अचानक मेरी नज़र मेन रोड पर चल रही गाड़ियों में जाते लोगों पर गई। क्या देखती हूं कि अधिकतर लोगों के जो कि हाव-भाव, पहनावे से गाड़ी के मालिक ही लग रहे थे, ड्राइवर नहीं। उन सबके पेट और गाल बाहर निकले हुए हैं! अधिकतर सबके!! कईयों के तो ज़रूरत से ज़्यादा तंदरुस्त हाथ-पैर। मैंने एक बार उन्हें देखा एक बार उनकी गाड़ी को। दोनों एक जैसे! ज़्यादा जगह घेरे हुए, तंदरुस्त, चमकते हुए।

चर्बी की अधिकता से बहुतों के हाथ-पैर, चेहरे यूं लटके थे जैसे गाड़ी से निकलकर जब कुछ कदम चलने की नौबत आती होगी तो सब अलग-अलग से मुंह बनाकर  कार कंपनियों को कोसते होंगे कि देखो, कम्बख़त कैसी कंपनियां हैं! ऐसी घटिया कार बनाती हैं कि ऑफिस की कुर्सी पर बैठाना तक नहीं जानती! और यक़ीनन पैरों को जब तक कुर्सी नसीब न होती होगी तब तक अपने मालिकों पर बड़बड़ाते जाते होंगे कि इस हाल में हमसे इतनी मेहनत नहीं होती, कभी जिम-विम का रुख़ भी कर लिया करो!

कार में पसरे इन ढोल जैसे पेटों और टमाटर जैसे गालों को एक इंच काबू में करवाने के लिए तरह-तरह के मंहगे जिम मौजूद हैं। और फिर दो इंच बाहर निकालने के लिए मंहगे होटल। जो लाजवाब खाना उड़ेलने को हरदम तैयार।  पर साईकिल पर सावधान मुद्रा में चले जा रहे पिचके गालों और चिपके पेटों को इस औक़ात से बढ़ाने, बाहर निकालने के नाम पर सिर्फ़ ठेंगे मौजूद हैं।

इन करोड़ों साईकिल सवारों के लिए उन कुल जमा एक प्रतिशत मोटरों, प्राइवेट जेट वालों के ठेंगे। और हां, मोदी साहब जैसे चायवालों के ठेंगे सबसे अगली कतार में हैं।

आजकल लोग बेकार की बहस कर रहे हैं प्रधान सेवक के फिटनेस चैलेंज को लेकर। बगै़र सोचे समझे टांग खींचने की इस मुल्क़ को आदत सी हो गई है। अरे! कुछ बोलने से पहले सोचना भी तो चाहिये कि नहीं? जब गाल चिप्पुओं को ठेंगा दे दिया तो फिटनेस मंत्र उन्हें क्यों देने लगे भई? 

आखि़र प्रधानमंत्री हैं सबको मौक़ा देना है। जब साईकिल वाले को ठेंगा मिल गया तो  मोटर गाड़ी-जैट वाले का फिटनेस मंत्र पर हक़ बनता है कि नहीं? बोलो...बनता है कि नहीं...तब...अब आई बात समझ में मूर्ख बुद्धिजीवियों..? सबको सब देने लगे तो ये साईकिल वाले लपक कर गाड़ी में सवार न हो जाएंगे! और वो क्या कहते हैं ये नामुराद कम्युनिस्ट उसे... हां, समाजवाद, वो न आ जाएगा!! और फिर लंदन की महारानी हमे खाने पर नहीं बुलाएंगी, लात मार कर भगाएंगी...पूंजीवाद के योगासन हरेक के लिए एक से नहीं होते। इतना भी पता नहीं! और अनपढ़ होने का इल्ज़ाम मुझ पर लगाते हो!

वैसे एक बात और बताऊं...तुम्हारी पढ़ी-लिखी मूर्खता पर गधा और मैं दोनों मिलकर ख़ूब हंसते हैं। तुम्हारे जैसे अक़लदारों को मैंने बिना मेहनताने के काम पर लगा रखा है। क्या तुम्हें नहीं पता कि मुझे पता है कि नेहरू भगत सिंह से मिलने जेल में गया था? पर मैंने कहा कि नेहरू नहीं गया था। और तुम मेरे बिन पैसे के चाकर, जी जान से खोजबीन कर लग गए बताने जनता को कि मैंने झूठ बोला है। और वो भी किस जनता को..! जो अपनी गाय को सुबह लात मारकर घर से बाहर करके कहते हैं कि जा पन्नी-कचरे से पेट भर आ। और शाम को उसका दूध निकाल कर डकार जाते हैं।

तुम्हें क्या लगता है? उस भक्त को तुम मेरे खि़लाफ भड़का लोगे जो सुबह मंदिर में जाकर कहता है भगवान आज कुछ ऐसा चक्कर चला जिससे मेरा 9 का माल 1000 का मुनाफा झपट लाए। आजकल मज़दूरों के भाव बहुत बढ़ गए हैं, कोई ऐसा मज़दूर भिड़ा जो 500 की मजूरी के लिए 100 में मान जाए। शाम को तेरे नाम का 10 का सिक्का पक्का। सिक्का पसंद न हो तो 10 के  करारे नोट का जुगाड़ कर लाऊंगा। भले ही 10 का 15 में मिले पर तेरे लिए लाऊंगा ज़रूर भगवान।

(वीना फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)

 








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