हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए विवेकानंद को पचाना आसान नहीं

जयंती पर विशेष , , शुक्रवार , 12-01-2018


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अनिल जैन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत के जिन महापुरुषों और राष्ट्र नायकों का 'अपहरण’ कर उन्हें अपनी विचार-परंपरा का वाहक बताने का हास्यास्पद अभियान चला रखा है, उनमें सबसे पहला नाम आता है स्वामी विवेकानंद का। 1960-70 के दशक के दौरान गुरू गोलवलकर ने विवेकानंद को अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा का आइकॉन बनाने की कोशिश शुरू की थी। यह निर्लज्ज कोशिश आज भी जारी है। 

दरअसल विवेकानंद विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक व्यक्ति थे और भारतीयता के क्रांतिकारी अग्रदूत भी। यद्यपि वे समकालीन राजनीति से दूर रहते थे लेकिन उनका धर्म सामाजिक सत्ता के सवालों से लगातार टकराता था। यही कारण है कि राजनीति के प्रति विरक्ति का भाव रखने वाले विवेकानंद कई राजनीतिकर्मियों के लिए प्रेरणास्रोत बनते रहे। इसी वजह से धर्म की आड़ में शोषणकारी समाज-सत्ता को बनाए रखने की इच्छुक ताकतें बेशर्मी के साथ इस योध्दा-संन्यासी को अपनी परंपरा का पुरखा बताकर उसे हथियाने की फूहड़ कोशिशें करती रही हैं।

और अब भी कर रही हैं, ताकि उसकी प्रखर सामाजिक चेतना का छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में इस्तेमाल किया जा सके। चूंकि इस खतरे का अंदाजा विवेकानंद को भी था, लिहाजा उन्होंने कहा था- 'कुछ लोग देशभक्ति की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन मुख्य बात है-ह्रदय की भावना। यह देखकर आपके मन में क्या भाव आता है कि न जाने कितने समय से देवों और ऋषियों के वंशज पशुओं जैसा जीवन बिता रहे हैं? देश पर छाया अज्ञान का अंधकार क्या आपको सचमुच बेचैन करता है?...यह बेचैनी ही आपकी देशभक्ति का पहला प्रमाण है।’ 

विवेकानन्द कोई राजनेता नहीं थे। वे सन्यासी थे- समाज विज्ञानी संन्यासी। हिंदू समाज की खूबियों और खामियों से भलीभांति परिचित थे। वे योद्धा संन्यासी थे। हिंदू समाज में व्याप्त बुराइयों और जड़ता पर निर्ममता से प्रहार करते थे। हिंदू समाज में व्याप्त कट्टरता के खतरे को विवेकानन्द की दी हुई चेतावनी से भी समझा जा सकता है। उन्होंने अपने समय के हिंदू कट्टरपंथियों और पाखंडी धर्माचार्यों को ललकारते हुए अपने प्रसिध्द व्याख्यान 'कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज्म’ में कहा है- शूद्रों ने अपने हक मांगने के लिए जब भी मुंह खोला, उनकी जीभें काट दी गईं। उनको जानवरों की तरह चाबुक से पीटा गया। लेकिन अब आप उन्हें उनके अधिकार लौटा दो, वरना जब वे जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) के द्वारा किए गए शोषण को समझेंगे, तो अपनी फूंक से आप सब को उड़ा देंगे। यही (शूद्र) वे लोग हैं जिन्होंने आपको सभ्यता सिखाई है और ये ही आपको नीचे भी गिरा देंगे। सोचिए कि किस तरह शक्तिशाली रोमन सभ्यता गॉलों के हाथों मिट्टी में मिला दी गई।’

अपने इसी व्याख्यान में भारतीयजनों को आगाह करते हुए विवेकानंद ने कहा है- 'सैकड़ों वर्षों तक अपने सिर पर गहरे अंधविश्वास का बोझ रखकर, केवल इस बात पर चर्चा में अपनी ताकत लगाकर कि किस भोजन को छूना चाहिए और किसको नहीं, और युगों तक सामाजिक जुल्मों के तले सारी इंसानियत को कुचलकर आपने क्या हासिल किया और आज आप क्या हैं?...आओ पहले मनुष्य बनो और उन पंडे पुजारियों को निकाल बाहर करो जो हमेशा आपकी प्रगति के खिलाफ रहे हैं, जो कभी अपने को सुधार नहीं सकते और जिनका ह्रदय कभी भी विशाल नहीं बन सकता। वे सदियों के अंधविश्वास और जुल्मों की उपज हैं। इसलिए पहले पुजारी-प्रपंच का नाश करो, अपने संकीर्ण संस्कारों की कारा तोड़ो, मनुष्य बनो और बाहर की ओर झांको। देखो कि कैसे दूसरे राष्ट्र आगे बढ़ रहे हैं।’

धर्मांतरण के बारे में स्वामी विवेकानंद ने भी स्वीकारा है कि भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के बाद देश की आबादी का एक बड़े हिस्से ने इस्लाम कुबूल कर लिया लेकिन यह सब तलवार के जोर से नहीं हुआ। विवेकानंद कहते हैं- भारत में मुस्लिम विजय ने शोषित, दमित और गरीब लोगों को आजादी का स्वाद चखाया और इसीलिए देश की आबादी का पांचवां हिस्सा मुसलमान हो गया। यह सोचना पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है कि तलवार और जोर-जबर्दस्ती के जरिए हिंदुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआ। सच तो यह है कि जिन लोगों ने इस्लाम अपनाया वे जमींदारों और पुरोहितों के शिकंजे से आजाद होना चाहते थे। बंगाल के किसानों में हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों की तादाद इसलिए है क्योंकि बंगाल में बहुत ज्यादा जमींदार थे। संदर्भ: (Selected Works of Swami Vivekanand,Vol.3,12th edition,1979.p.294)

हिंदू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार मुसलमानों के प्रति अपनी नफरतभरी विचारधारा को वैधानिकता का जामा पहनाने के लिए स्वामी विवेकानंद के नाम का भी बेशर्मी के साथ इस्तेमाल लंबे समय से करते आ रहे हैं। लेकिन चूंकि ऐसे लोगों की क्षुद्र मानसिकता और मुसलमानों के प्रति उनकी द्वेषभावना से विवेकानंद भलीभांति परिचित थे, लिहाजा उन्होंने कहा था, 'इस अराजकता और कलह के बीच भी मेरे मस्तिष्क में संपूर्ण साबूत भारत की जो तस्वीर उभरती है, वह शानदार और अद्वितीय है, उसमें वैदिक दिमाग और इस्लामिक शरीर होगा।’ इस्लामिक शरीर से उनका तात्पर्य वर्ग और जातिविहीन समाज से था। 

कहा जा सकता है कि विवेकानंद अगर आज जिंदा होते तो उनकी नसीहतें सुनकर हिंदू कट्टरता के प्रचारक उन्हें भी सूडो सेकुलर या हिंदू विरोधी करार देकर पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे रहे होते। क्योंकि उनके लिए गांधी, आंबेडकर, सुभाष, सरदार पटेल की तरह ही विवेकानंद को भी पचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। 

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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