कितनी बदली शिक्षा और शिक्षक

जन्मदिन पर विशेष , रायगढ़ , मंगलवार , 05-09-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

रायगढ़। सरकार और समाज ने समय के साथ मिलकर शिक्षक की भूमिका को बहुत सीमित दायरे में धकेल दिया है। सूचना क्रांति के इस दौर में जब ज्ञान प्राप्ति के अनंत द्वार खुले हुए हैं, शिक्षक का ज्ञान प्रदाता के तौर पर पुराना विशेषाधिकार छिन चुका है। शिक्षक की भूमिका अब इन सूचनाओं का विवेकपूर्ण उपयोग करने हेतु विद्यार्थियों को परामर्श देने तक सीमित रह गई है। हमारे देश में अभिजन वर्ग की शिक्षा अमेरिका के फ्लिपड क्लास रूम मॉडल की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है, जो वर्तमान प्रचलित शिक्षा के स्वरूप से बिल्कुल उलटा है। इस मॉडल में विद्यार्थी अपने घर पर अपने मोबाइल या लैपटॉप पर शिक्षकों के द्वारा रिकॉर्ड किए गए लेक्चर सुनते देखते हैं और क्लास रूम में विभिन्न प्रकार के प्रोजेक्ट और ग्रुप टास्क पर कार्य करते हैं। अर्थात पढ़ाई घर पर और होमवर्क स्कूल में। उच्च शिक्षा में भी ऑनलाइन शिक्षक रहित कक्षाओं और दूरवर्ती शिक्षा को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकताएं हैं। जिन पर जोर-शोर से काम चल रहा है। शिक्षा को शिक्षक केंद्रित के स्थान पर छात्र केंद्रित और अधिगम केंद्रित करने के प्रयास तो लंबे समय से चल रहा है।   

 

सरकारी स्कूल और शिक्षकों की दशा

सरकारी स्कूल और शिक्षकों की दशा

देश के छोटे शहरों और गांवों के सरकारी स्कूलों का शिक्षक अभावग्रस्त एवं दुर्गम क्षेत्रों के जर्जर स्कूलों में कार्य करता नजर आता है। जहां पर उपलब्ध शिक्षा सुविधाएं आधी सदी पूर्व के मानकों पर भी खरी नहीं उतरतीं। शिक्षा के अतिरिक्त शिक्षकों से विभिन्न सर्वेक्षणों और जनगणना आदि की सेवाएं ली जाती हैं। शिक्षकों को संविदा पर रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  

शिक्षक शिकायत करते हैं कि शाला में पढ़ाने के अतिरिक्त हर प्रकार के कार्य सरकार द्वारा उनसे लिए जाते हैं। सरकार का रवैया यह दर्शाता है कि शाला में पढ़ाने के अलावा हर कार्य करने वाले शिक्षकों के बजाए संविदा पर रखे जाने वाले शिक्षक पैसे का ज्यादा मोल देते हैं और स्थायी शिक्षकों से लिया जाने वाला कार्य उनके वेतन की तुलना में बहुत कम है। शिक्षकों के सम्मान और शिक्षा पद्धति में उनके महत्व में गिरावट आई है। इसके लिए शिक्षकों का रवैया जिम्मेदार है या शासकीय नीतियां, यह विमर्श का विषय हो सकता है।

शिक्षा का उद्देश्य जब आजीविका के अर्जन पर एकपक्षीय रूप से केंद्रित हो जाता है तो शिक्षक की भूमिका भी अपने विद्यार्थी को आर्थिक जीवन में सफलता दिलाने तक सीमित हो जाती है। इस प्रकार शिक्षक, विद्यार्थी के जीवन को समग्रता से प्रभावित करने वाले पथप्रदर्शक के स्थान पर एक ऐसे प्रशिक्षक का रूप ले लेता है जो विद्यार्थी को किसी ऐसी प्रतियोगिता में सफलता हेतु सक्षम बनाता है जिससे उसकी आजीविका चल सके। जब शिक्षा का उद्देश्य डॉक्टर, इंजीनियर, कंपनी का सीईओ या कलेक्टर बनाना हो जाए तो विद्यार्थी के जीवन को समग्र रूप से प्रभावित करने वाले स्कूल-कालेज के व्यापक पाठ्यक्रम को पढ़ाने वाले हरफनमौला शिक्षक के स्थान पर विषय विशेषज्ञ का महत्व बढ़ जाता है। यही कारण है कि स्कूल, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महज एक गेट पास बन गए हैं और कोचिंग संस्थानों का ग्लैमर सर चढ़कर बोल रहा है। जब डॉक्टरों की निर्दयता, इंजीनियरों के भ्रष्टाचार और कलेक्टरों की असंवेदनशीलता की घटनाएं हमारे सामने आती हैं तो इन पर आक्रोशित होने के पूर्व हमें यह भी सोचना चाहिए कि इन्हें बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा से वंचित करने वाले भी हम ही हैं।

शिक्षा बजट का लगातार कम होना

शिक्षा, हमारी सरकारों के प्राथमिक एजेंडे में कभी नहीं रही। कुल बजट व्यय का बहुत कम भाग शिक्षा पर खर्च किया जाता है। सरकारों द्वारा शिक्षा पर कम से कम व्यय करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यूपीए सरकार के 2013-14 के अंतिम बजट में शिक्षा   बजट 4.57 प्रतिशत था जो वर्तमान मोदी सरकार के 2016-17 के बजट में घटकर 3.65 प्रतिशत रह गया। देश में वर्तमान में लगभग 86 लाख शिक्षक प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा से तथा करीबन 15 लाख शिक्षक उच्च शिक्षा से जुड़े हुए हैं। किंतु इनके प्रशिक्षण पर किया जाने वाला व्यय नगण्य है। शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं का पाठ्यक्रम आज की आवश्यकताओं को देखते हुए काफी पुराना है। इनकी डिग्रियों का महत्व नौकरी और प्रमोशन पाने तक सीमित है। इनमें खुले भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों की भी कमी है। देश में केवल 10 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जो विद्यार्थी- शिक्षक अनुपात की कसौटी पर खरे उतरते हैं।

बदलाव के दौर से गुजरती शिक्षा

शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर उदारीकरण का प्रभाव

1991 में शुरू हुए अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पश्चात से ही शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी हाथों में सौंपने की कोशिशें होती रही हैं। शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के रूप में निजीकरण को पेश किया जाता रहा है। उदारीकरण के पश्चात जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति शिक्षा के क्षेत्र में भी सुविधा सम्पन्न निजी शिक्षण संस्थाओं और अभावग्रस्त सरकारी शैक्षिक संस्थानों का विभाजन उत्पन्न हुआ है जो बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा नहीं हैं कि निजी संस्थानों के शिक्षक पूंजीपतियों और कॉरपोरेट मालिकों के शोषण से मुक्त हैं। किन्तु इनमें एक अभिजात्यता देखी जाती है । कॉरपोरेटीकरण और वैश्वीकरण ने जिस मानव मूल्यों से रहित, पैसे को सर्वोपरि मानने वाली चमकीली किन्तु खोखली दुनिया का सृजन किया है उस दुनिया में प्रवेश पाना हमारे मध्यम वर्ग की प्राथमिकता बना दी गई है। मध्यम वर्गीय पालकों का यह विश्वास कि निजी स्कूल और उनके शिक्षक ही इस दुनिया में प्रवेश दिलाने हेतु अधिकृत हैं ।  

शिक्षकों के लिए हमारी तलाश केवल शिक्षण संस्थाओं तक सीमित होकर रह गई है। जबकि हमारे दैनंदिन जीवन में ही ऐसे कितने ही अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने आचार, व्यवहार, व्यक्तित्व और कृतित्व से समाज तथा देश को उन बुनियादी जीवन मूल्यों की शिक्षा दी है जिनकी कमी हमारे अस्तित्व को ही संकट में डालने वाली बन गई है। 

वर्तमान में शिक्षकों के समक्ष चुनौतियां

आज शिक्षकों के सम्मुख वास्तविक चुनौती शिक्षा से जुड़े गहरे दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने की है। माइकल फूको 18 वीं सदी में विकसित की गई उस चिंतन प्रणाली की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जो द्विध्रुवीय शब्द युग्मों पर आधारित थी यथा स्त्री-पुरुष, काला-गोरा, पूर्व-पश्चिम आदि । जिस द्विध्रुवीय शब्द युग्म पर आधारित चिंतन प्रणाली के हम अभ्यस्त बना दिए गए हैं वह किसी निर्णय तक हमें पहुंचाने में सहायता करती प्रतीत होती है। लेकिन ऐसा करते हुए वह बहुत सी संभावनाओं का गला घोंट कर अन्य विकल्पों को खत्म कर देती है। इसी प्रकार हमारे पाठ्यक्रम में, हमारी भाषा में अनेक ऐसे विषय और शब्द समाविष्ट हैं जो पुरुषवाद, रंगभेद, जातिवाद और धार्मिक श्रेष्ठता को पुष्ट करने वाले विमर्श की उपज हैं और बहुलताओं के सहअस्तित्व के लिए घातक हैं। लेकिन इनकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता और वे हमारे अवचेतन में प्रवेश कर जाते हैं। एक सजग शिक्षक ही पाठ्यक्रम के ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें हटा सकता है।

1948 में गठित राधाकृष्णन कमीशन की रिपोर्ट की मूल आत्मा थी -शिक्षा को मानवीय गुणों से परिपूर्ण उदार, सहिष्णु एवं सेवाभावी विश्व नागरिक के सृजन हेतु सक्षम बनाना। आज भी ऐसे ही शिक्षकों की आवश्यकता है जो मनुष्य को मानव संसाधन न समझ कर उसकी पूरी गरिमा के साथ केवल मनुष्य समझें और उसकी विलक्षणता की रक्षा करें।

 

 










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