तीन तलाक के तेरह पेंच! सरकार किसी भी कसौटी पर खरी नहीं

विवाद , , शुक्रवार , 04-01-2019


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नितिन

एक तरफा, बिना सोचे समझे दिया जाने वाला तलाक किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता,चाहे वह व्यक्ति किसी भी समुदाय से क्यों न हो, वह महिला हो या पुरूष हो। पर ज्यादातर इस तरह से दिए गए तलाक की पीड़ित महिलाएं ही दिखाई देती हैं।

आज भारतीय  राजनीति  तीन तलाक को लेकर बंटी हुई है और उससे भी ज्यादा बंटी हुई  उस बिल पर है जिसे भारतीय जनता पार्टी बिना किसी सोच विचार, बिना किसी बदलाव व संवाद के पास करवाना चाहती है। इस अध्यादेश को भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में तो पारित करा लिया लेकिन राज्यसभा में पारित कराने में वह सफल होगी या नहीं यह देखना है, हो सकता है कि वह सफल हो जाए। अगर ऐसा होता है तो यह मुस्लिम समुदाय के उत्पीड़न करने का एक हथियार भी बन सकता है। हमें इस बिल को समझने की जरूरत है क्योंकि यह बिल अपने आप में बहुत से सवाल खड़े करता है लेकिन इसे समझने से पहले हमें मुसलमानों मे होने वाले निकाह को समझना होगा और तलाक को समझना होगा।

इस्लाम में शादी को बहुत ही पवित्र माना जाता है और उसे एक कॉन्ट्रैक्ट के रूप मे मुकम्मल किया जाता है जिसे हम निकाहनामा भी कहते हैं । हर कॉन्ट्रैक्ट की तरह इसे भी तोड़ा जा सकता है जिसके तरीके होते हैं।

तलाक  अरबी शब्द है  जिसका अर्थ है  परित्याग, इस्लाम में तलाक देने के 3 तरीके हैं-

पहला - आपसी सहमति द्वारा खुला या मुबारत ।

दूसरा - पत्नी द्वारा तलाक-ए-तफवीज ।

तीसरा शौहर द्वारा  और उसमें

एक - तलाक-ए- सुन्नत जिसे रोका या पल्टा जा सकता है। 

एक (अ) - तलाक-ए- हसन इसमें पति एक बार तलाक बोल कर 90 दिन तक इन्तजार करता है इसके बाद निकाह खत्म किया जा सकता है।

एक (ब) -तलाक-ए-एहसन इसमें शौहर हर 90 दिन के भीतर एक अंतराल पर तलाक बोलता है वह  बीवी की हर माहवारी के चक्र के खत्म होने पर तलाक बोलता है  या तीन महीने तक हर महीने की शुरुआत में तलाक बोलता है और निकाह खत्म कर सकता है।

तलाक देने के इन दोनों तरीकों में तलाक को खत्म करने  या उसको रोकने के लिए दोनों को वक़्त दे देता है और यह तरीके निकाह को दुबारा ठीक करने की उम्मीद खुली रखता है।

दो -तलाक-ए-बिद्दत जिसे न रोका जा सकता है न  पलटा जा सकता।

इसमें शौहर एक बार में तलाक-तलाक-तलाक बोलकर निकाह को खत्म कर देता है। कहते हैं तलाक-ए-बिद्दत पहले कुरान में नहीं था और बाद में इसे मौलानाओं द्वारा जोड़ा गया ।

और इस तलाक के जरिए मुस्लिम महिलाओं का कई तरह से शोषण किया जाता रहा है। इसके खिलाफ कई बार याचिकाएं दायर की गईं परन्तु वे सब नहीं सुनी गईं। इस्लाम को मानने वाले बहुत से देशों ने पहले ही एक बार में दिए जाने वाले तीन तलाक को समाप्त कर दिया था, लेकिन भारत में इस मुद्दे ने एक चुनावी रूप अख़्तियार कर लिया। मुद्दा तब गरमाया जब शायरा बानो ने तीन तलाक़ के खिलाफ याचिका दायर की और इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी कि यह तलाक मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, मेरी गरिमा के खिलाफ है।

इसमें पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ गठित की गई जिसमें, सभी पुरुष थे कोई महिला नहीं थी, खैर सभी न्यायाधीश अलग-अलग धर्म से ताल्लुकात रखते थे। कुरियन जोसफ, अब्दुल नजीर, यूयू ललित, आरएफ नरीमन और मुख्य न्यायधीश जेएस खेहर ने अपने फैसले सुनाए। जस्टिस जेएस खेहर और अब्दुल नजीर ने अल्पमत के फैसले से संसद को इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश दिया क्योंकि उनके मतानुसार वे इसे अवैध नहीं कर सकते थे।

यूयू ललित व आरएफ नरीमन ने यह माना कि तीन तलाक असंवैधानिक है क्योंकि वह अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन करता है और अनुच्छेद 13 के अनुसार कोई कानून अगर वह मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है तो उस कानून को भी असंवैधानिक करार दिया जाएगा।

इन सब के बरक्स न्यायाधीश कुरियन जोसफ कहते हैं कि तीन तलाक़ इस्लाम के खिलाफ है और यह कुरान में उल्लिखित नहीं है।

दो जजों ने कहा कि वो तीन तलाक को निषिद्ध नहीं कर सकते। दो कहते हैं कि तीन तलाक असंवैधानिक है। एक कहते हैं जो धर्मशास्त्रों मे नहीं है वह कानून में कैसे हो सकता है और इसे जारी रहने नहीं दिया जा सकता। इस प्रकार 3:2 के बहुमत से सर्वोच्च न्यायालय ने इसे  सेट-असाइड कर दिया ।

दूसरे शब्दों में एक बार में तीन तलाक़ अमान्य कर दिया गया । अतः एक बार में तीन तलाक़ के कहने से निकाह जैसे था वैसे ही रहेगा वह संबंध या अनुबंध टूटेगा नहीं । तीन तलाक पर फैसला सुनाते वक़्त किसी ने लैंगिक न्याय के बारे में न सोचा न उसका ख्याल रखा ।

सरकार का कहना है इस पर  सर्वोच्च न्यायालय  के इस फैसले के बाद भी कई लोगों ने एक बार में तीन तलाक बोल कर अपनी बीवी-बच्चों को छोड़ दिया, इसलिए हमें एक कानून की जरुरत है । परन्तु सरकार कानून बनाने में नाकामयाब हुई और सरकार ने "तीन तलाक बिल" या  मुस्लिम महिला (विवाह के अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम को अध्यादेश के रूप मे पेश किया।

परन्तु  हमें इस बिल को ध्यान से देखने की जरुरत है,  यह मुस्लिम महिलाओं  की सुरक्षा कम,  अपितु उनके जीवन के साथ उनके शौहर को और अधिक असुरक्षा में डाल देता है। 

इस बिल का कहना है कि अगर कोई शौहर एक बार में तीन तलाक देता है तो उसे तीन साल के लिए जेल में डाल दिया जाएगा । इस प्रकार यह इस मामले को अपराध की श्रेणी में ला देता है।

दूसरा, शौहर को अपनी बीबी को मुआवजा देना होगा । पहले यह मामला गैर जमानती था अब जमानती कर दिया गया है पर तब जब मजिस्ट्रेट महिला के पक्ष को सुने और जमानत दे। जब शादी एक सिविल/दीवानी मामला है तो तलाक़ कैसे एक आपराधिक मामला हो सकता है और उसे अपराध की श्रेणी में ला कर पति को जेल में डाल देना कहां तक उचित है?

जब तीन तलाक बोलने के बाद भी निकाह नहीं खत्म होता तो उस पर कोई विधेयक क्यों ? जब किसी कानून की जरूरत नहीं होती फिर भी सरकार कोई कानून ला देती है तो वह सबसे बड़े  अत्याचार  का उदाहरण होता है। जब तलाक हुआ ही नहीं तो फिर मुआवजे की बात क्यों? जब शौहर 3 साल जेल मे रहेगा तो उसको वह किस प्रकार से मुआवज़े को अदा करेगा? जेल भेजने का प्रावधान निकाह के दुबारा ठीक होने की बची हुई संभावनाओं के सभी रास्तों को बन्द कर देता है, क्योंकि एक जेल गया हुआ शौहर उस बीवी को क्यों अपनाएगा जिसने उसे तलाक के लिए जेल में डाला? इस तरह से यह बिल मुस्लिम महिलाओं  के पक्ष में कम उनके खिलाफ अधिक है!

तब तीन तलाक के मसले को कैसे सुलझाया जाए? इसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बारे मे जागरुकता फैलाई जाए। अगर शौहर फिर भी तीन तलाक़ के जरिए अपनी बीवी को परेशान कर रहा है तो उसे दीवानी मसलों के तहत सुलझाने की जरूरत है - जैसे कि एक बार में दिए गए तीन तलाक को मानसिक शोषण के रूप में चिन्हित करना और इसे घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत ला कर उसका निवारण करना आदि ।

या फिर उस अनुबंध/निकाहनामा को और मजबूत करने की कोशिश करना- जैसे तलाक देने के तरीकों को मेहर की रकम की तरह पहले से तय कर देना। एक बिल ला कर उसे जबर्दस्ती थोप देना इस सवाल का हल नहीं बल्कि उसे और जटिल बना देता है जो कि नहीं होना चाहिए।

(लेखक नितिन लखनऊ विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रहे हैं और छात्र संगठन आइसा से जुड़े हुए हैं।) 








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