संघर्षों से मिली प्यारेलाल को छत्तीसगढ़ के गांधी की पहचान

हमारे नायक , , रविवार , 22-10-2017


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मसऊद अख्तर

                                                                       ठाकुर प्यारेलाल सिंह

                                                                         (1891-1954)

गांधीवादी नेता, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, छत्तीसगढ़ में श्रमिक आन्दोलन के प्रणेता व सहकारिता आन्दोलन के पितामह ठाकुर प्यारेलाल आज ही के दिन यानी 22 अक्टूबर, 1954 को हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गए. ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ राज्य की अवधारणा के जन्मदाताओं में से एक हैं. प्यारे लाल सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान राजनांदगांव में कपड़ा मिल के हजारों मजदूरों को संगठित कर उस वक़्त तक सबसे लम्बा मजदूर आन्दोलन जो 37 दिन तक चला, का नेतृत्व किया और सारी मांगों के मान लिए जाने के बाद ही आन्दोलन समाप्त हुआ. उन्होंने छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की स्थापना की और असम के चाय बागानों में काम करने वाले छत्तीसगढ़ के मजदूरों के आंदोलन का भी नेतृत्व किया. यही नहीं उन्होंने देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ स्थानीय रजवाड़ों के विलय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. देश की आजादी की लड़ाई और सामाजिक आंदोलनों में उनका योगदान अविस्मरणीय और प्रेरणादायक है. इनके बारे में छत्तीसगढ़ में एक कहावत प्रचलित है -

गरीबों का सहारा है,

वही ठाकुर हमारा है।

उनका जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव जिले के दैहान ग्राम में हुआ। पिता का नाम दीनदयाल सिंह और माता का नाम नर्मदा देवी था. आपकी शिक्षा राजनांदगांव तथा रायपुर में हुई. हाई स्कूल में पढ़ाई के लिए रायपुर आ गए. 1913 में नागपुर से बी.ए. पास किया और 1916 में वकालत की परीक्षा पास कर वकील बन गए.   

आप में बचपन से ही देशप्रेम की भावना कूट कूटकर भरी थी. 16 बरस की आयु में ही खादी पहनना शुरू कर दिया. इसी वक़्त बंगाल के कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में आये और यह निश्चित किया कि उनके जीवन का मकसद ही देशसेवा होगा. जब वे मात्र 19 साल के थे उसी वक़्त उन्होंने राजनांदगांव में एक लाइब्रेरी सरस्वती वाचनालय की स्थापना की जहाँ लोगों को अखबार पढ़कर देश के हालात के बारे में अवगत कराया जाता था. प्यारेलाल जी हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत के अच्छे जानकार थे. इसके साथ ही वे अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी पर भी अच्छी पकड़ रखते थे. इस प्रकार वो एक बहुभाषी व उत्कृष्ट भाषाविद थे. शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रारंभ से ही प्यारेलाल जी की गहरी रुचि थी. आप 'गीता' के प्रकांड विद्वान् थे. यही कारण था कि जब गाँधी जी ने वर्धा में नई योजना शुरू करने के लिए विचार विमर्श हेतु बैठक आहुति की तो उसमें प्यारेलाल जी को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया. 

प्यारेलाल जी कुल 4 बरस ही वकालत किये. 1916 में दुर्ग में उन्होंने वकालत शुरू की और 1920 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन शुरू करने पर उन्होंने वकालत करना छोड़ दिया. प्यारेलाल जी पहली बार गांधी जी के संपर्क में 1920 में ही आये और असहयोग आन्दोलन व उनके सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया. घूम घूमकर असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने लगे साथ ही खादी और चरखे का भी प्रचार करते. इस पूरे दौरान वे मात्र एक धोती ही पहनते. स्नान के आधी धोती लपेटकर आधी सुखा लेते फिर वो सूखी धोती का हिस्सा लपेट शेष धोती भी सुखाते.

असहयोग आन्दोलन के चलते तमाम विद्यार्थी भी स्कूल छोड़ दिए थे. उनकी आगे की पढ़ाई को लेकर प्यारेलाल जी चिंतित थे. बाद में चलकर इन विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना कि गयी इसी क्रम में प्यारेलाल जी ने राजनांदगांव में एक माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की.

दुर्ग में जब वकालत प्रारम्भ की तभी प्यारेलाल वहाँ के सूती मिल मजदूरों के संपर्क में आये. उनकी दशा बहुत खराब थी और 12-12 घंटे काम करना पड़ता था. वेतन भी बहुत कम था. यही नहीं अधिकारियों का व्यवहार भी मजदूरों के साथ बहुत बुरा था. प्यारेलाल जी ने तभी उन्हें संगठित करने का निर्णय लिया. 1920 में मिल मजदूरों ने हड़ताल किया जिसका नेतृत्व ठाकुर प्यारेलाल जी ने किया. यह उस समय की सबसे लम्बी हड़ताल सिद्ध हुई. यह हड़ताल लगातार 37 दिनों तक चली. अंत में मिल मालिकों ने मजदूरों की मांग मान ली और हड़ताल खतम हुई. इस सफल आन्दोलन से मजदूरों को आर्थिक लाभ के साथ उनके काम के घंटों में भी कमी आई.

1924 में ठाकुर प्यारेलाल के नेतृत्व में राजनादगांव में मिल मजदूरों की पुनः हड़ताल हुई. यह संघर्ष काफी तीखा रहा और गोली चलने से एक मजदूर की मृत्यु हो गई. अनेक मजदूर घायल हुए. प्यारेलाल को राजनादगांव से निर्वासन का आदेश दिया गया. उनपर राजनादगांव छोड़ने का दबाव बनाया गया. परन्तु प्रशासन को उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत न हुई. वो कुछ दिन राजनादगांव में बने रहे और मजदूरों की मांगें मान लेने के बाद हड़ताल खत्म होने पर ही राजनांदगांव छोड़ा. 

  • मजदूरों के साथ किसानों को भी किया संगठित
  • कई बार की जेल की यात्रा

सन 1930 में उन्होंने किसानों को संगठित करना शुरू किया और ‘पट्टा न लो, लगान मत दो’ आन्दोलन चलाया और हजारों किसानों को संगठित किया. इस आन्दोलन ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी और इसके लिए प्यारेलाल को एक साल के लिए करावास की सजा हुई. छूटने के बद जब पुन: सन् 1932 में उन्होंने यह आन्दोलन चालू कर दिया और जब रायपुर में गाँधी चौक के सामने वे भाषण दे रहे थे तो उन्हें फिर से गिरफ्तार कर दो साल के लिये जेल में डाल दिया गया। यही नहीं सरकार ने उनसे उनकी वकालत की सैंड भी छीन ली ताकि वो आगे से वकालत न कर सकें. उनपर जुर्माना भी लगाया गया और जब उन्होंने जुर्माना देने से इंकार किया तो उनके घर का सामान कुर्क कर दिया गया.

1934 में जेल से छूटने के बाद वे महाकौशल कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए. सन 1936 में जब राजनादगांव में मिल मजदूरों की पुनः हड़ताल हुई तो राजनादगांव स्टेट में ठाकुर प्यारेलाल का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया. इसकी काट प्यारेलाल ने यह निकाला कि राजनादगांव रेलवे स्टेशन पर सभा करते और वहीं रहते. चूँकि रेलवे स्टेशन राजनादगांव स्टेट के अंतर्गत नहीं आता था इसलिए प्रतिबंध वहाँ लागू न होता. 

ठाकुर प्यरेलाल रायपुर नगर पालिका के लगातार तीन बार सन 1937 में, 1940 और 1944 में अध्यक्ष चुने गये। अध्यक्ष रहते हुए प्यारेलाल जी ने कई प्राइमरी स्कूल खोले, लड़कियों के लिये स्कूल खोले, दो नये अस्पताल खोले, सड़कों पर तारकोल बिछवाई, बहुत से कुंए खुदवाये.

वे 'छत्तीसगढ़ एजूकेशनल सोसाइटी' के संस्थापक अध्यक्ष थे. सन 1945 में उन्होंने 'छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ' की स्थापना की थी, जिसके प्रारंभिक काल में 3000 सदस्य थे. और छत्तीसगढ़ के सभी जिले में बुनकरों की सहकारी संस्थाओं का निर्माण किया. इसके कारण अनगिनत बुनकर परिवार गरीबी से ऊपर उठे. आज भी यह छत्तीसगढ़ की एक मजबूत सहकारी संस्था है. इसी वर्ष उन्होंने 'छत्तीसगढ़ शोषण विरोधी संघ' की स्थापना की थी.

भूदान आंदोलन में भी निभाई अहम भूमिका

सन 1950 में उन्होंने "राष्ट्र-बन्धु" का प्रकाशन आरंभ किया। सन 1951 में ठाकुर प्यारेलाल ने कांग्रेस से अपना त्याग पत्र दे दिया आचार्य कृपलानी के अखिल भारतीय किसान मज़दूर पार्टी से जुड़ गए.1952 के विधानसभा के चुनाव में रायपुर से फिर से विधान सभा (मध्य प्रदेश) के सदस्य चुने गये और विधानसभा में विपक्ष के नेता बने.

आचार्य विनोबा के भूदान आन्दोलन में ठाकुर प्यारेलाल ने गाँव गाँव की पैदल यात्रा की. ऐसा कहा जाता है कि मध्य प्रदेश का कोई हिस्सा नहीं छूटा.  छत्तीसगढ़ के लोग उन्हें छत्तीसगढ़ का गाँधी कहने लगे थे. भूदान आन्दोलन में उन्होंने हजारों एकड़ भूमि एकत्र की और उसका वितरण किया.

1954 में यात्रा के दौरान अस्वस्थ हो जाने के कारण 22 अक्टूबर को उनका देहांत हो गया. इसके पहले उन्होंने डेढ़ घंटा लंबा भाषण दिया था जो उनका अन्तिम भाषण सिद्ध हुआ.22 अक्टूबर 1954 को खारून नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार हुआ. उनकी मृत्यु पर छत्तीसगढ़ के लोगों ने कहा कि अब छत्तीसगढ़ का गांधी चला गया. छत्तीसगढ़ शासन ने  इनकी स्मृति में सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान स्थापित किया है.










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