स्वच्छ भारत अभियान : स्वच्छ दिखने और स्वच्छ होने में ज़मीन आसमान का अंतर

मत-मतांतर , , शुक्रवार , 13-10-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

निर्मल भारत अभियान का नाम बदल कर स्वच्छ भारत अभियान क्यों कर दिया गया, यदि इस पर बहस से देश स्वच्छ हो जाता तो निश्चित ही यह बहस औचित्यपूर्ण होती। किन्तु ऐसा है नहीं। वैसे भी नामकरण और नाम परिवर्तन की इस आँधी के औचित्य-अनौचित्य के संबंध में आने वाले अनेक वर्षों तक विमर्श और विवाद होता रहेगा।

साभार

 

 

  • बेहद सीमित है स्वच्छ भारत अभियान
  • अभियान में जल, वायु और औद्योगिक प्रदूषण शामिल नहीं
  • सिर्फ़ हाइजिन और सैनिटेशन सिखाने का एक प्रयास, लेकिन इसमें भी मुश्किलें 

स्वच्छ भारत अभियान का सीमित क्षेत्र

बहरहाल स्वच्छ भारत अभियान, निर्मल भारत अभियान की भाँति ही स्वच्छता के एक बहुत सीमित क्षेत्र को स्पर्श करता है। शहरी क्षेत्रों हेतु इसका उद्देश्य खुले में शौच की समाप्ति, गड्ढा खोद कर बनाए गए पारंपरिक शौचालयों के स्थान पर फ्लश शौचालयों का निर्माण, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन, नगरपालिक स्तर पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट तथा स्वास्थ्य आदतों का विकास करते हुए स्वास्थ्य जागरूकता विकसित करना है।

ग्रामीण इलाकों में यह अभियान कचरे को बायो फ़र्टिलाइज़र तथा एनर्जी में परिवर्तित करने पर भी केंद्रित होगा। सरकार शैक्षणिक संस्थाओं और शहरी तथा ग्रामीण प्रशासनिक निकायों की इस अभियान में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है।

लोगों को अनुशासित करने की आकांक्षा

स्वच्छ भारत अभियान अनेक कारणों से वर्तमान सरकार का चहेता है। लोगों को अनुशासित करने की सरकार की आकांक्षा इससे पूरी होती है। जो लोग समय पर विभिन्न प्रकार के टैक्स पटाते हैं, नोट बंदी के बाद बैंकों के सम्मुख कतारों में खड़े होकर सरकार की काले धन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में अपना योगदान देते हैं और धरने-प्रदर्शन-हड़ताल आदि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से दूर रहते हैं, उन लोगों से यह भी अपेक्षित नहीं है कि वे चारों तरफ़ गंदगी फैलाएं।

यह अभियान सरकार के इस विश्वास पर आधारित है कि देश के आम लोगों को अनुशासित कर देश को भ्रष्टाचार और काले धन से मुक्त तो किया ही जा सकता है, भौतिक गंदगी और सड़न से भी मुक्ति दिलाई जा सकती है।

सरकार ने जो मार्ग अपनाया है उस पर चलना आसान नहीं है क्योंकि इससे जरा सा भी विचलन यह संकेत दे सकता है कि केवल आम लोग ही देश की समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं या आम लोग ही देश की समस्या हैं।

  • क्रियान्वयन की बाधाओं से भी चिंताजनक हैं नीतिगत कमियां
  • अभियान के तहत बन रहे शौचालयों से भी जल प्रदूषण का ख़तरा 

विचारधारात्मक स्तर पर गाँधीवाद से अनेक असहमतियों की मौजूदगी के बाद भी अब स्वच्छता उस बिंदु के रूप में वर्तमान सरकार द्वारा चिह्नित की गई है जहाँ वह गाँधी जी को अपना सकती है।

गाँधी जी और गोलवलकर की आजकल बड़ी प्रबलता से रेखांकित की जाने वाली समानताओं में एक यह भी है कि दोनों वर्ण व्यवस्था के समर्थक और अस्पृश्यता के घोर विरोधी थे।

स्वच्छता अभियान के सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसडर प्रधानमंत्री जी स्वयं हैं और अब उन्हें भी यह महसूस होने लगा है कि यह कार्य इतना सरल नहीं है, जैसा उन्होंने खुद को गाँधी जी की लीग में रखते हुए स्वीकारा भी कि चाहे एक हजार गाँधी और एक लाख मोदी आ जाएं देश तब तक स्वच्छ नहीं हो सकता जब तक आम जनता में जागृति न आ जाए।

अभियान के मार्ग में कई बाधाएं

निश्चित रूप से स्वच्छता अभियान की सफलता के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। किन्तु इनका स्वरूप प्रधानमंत्री द्वारा इंगित की गई बाधाओं से नितांत भिन्न है।

क्रियान्वयन के स्तर पर आने वाली एक बाधा तो सर्वव्यापी और सर्वग्रासी भ्रष्टाचार है।

निर्मल भारत अभियान की तुलना में संकुचित बजट से प्रारंभ हुए स्वच्छ भारत अभियान में जैसे जैसे तेजी आई है और बजट में इजाफा हुआ है वैसे वैसे इस राशि का दुरुपयोग भी बढ़ा है।

गुणवत्ताहीन और अनुपयोगी शौचालयों के निर्माण की शिकायतें आम हो गई हैं। निर्मित शौचालयों के मेंटेनेन्स का अभाव है। ओडीएफ ग्रामों का सच जानने के लिए खोजी पत्रकारिता की आवश्यकता नहीं है।

शहरी इलाकों में स्वच्छता के नाम पर जितनी विपुल धनराशि खर्च हो रही है उसकी तुलना में उपलब्धि नगण्य है। समस्या यह भी है कि न क्रियान्वयन करने वालों को और न ही लाभान्वित होने वालों को यह विश्वास है कि हम स्वच्छ हो सकते हैं। जमीनी कार्य के बजाए लीपा पोती और उसके भ्रामक प्रचार पर जोर दिया जा रहा है।

चिंताजनक नीतिगत कमियां

किन्तु समस्या केवल इतनी नहीं है। क्रियान्वयन के स्तर पर आने वाली बाधाओं से भी चिंताजनक हैं नीतिगत कमियां।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पूरी दुनिया के सम्मुख एक चुनौती बन चुका है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रपट बताती है कि हमारे देश के शहरों द्वारा जो 1.7 लाख टन कचरा उत्पन्न किया जाता है उसका लगभग 75 प्रतिशत बिना उपचारित किए लैंडफिल साइट्स या डंपिंग यार्डस में डाल दिया जाता है।

नगरीय निकाय 81000 म्युनिसिपल वार्डों में से केवल 44650 वार्डों में डोर टू डोर कलेक्शन कर पाते हैं।

देश की राज्य सरकारों और नगरपालिक निकायों के द्वारा जैविक कचरे से कंपोस्ट बनाने वाले 145 प्लांट बनाए गए हैं जिनसे 15 लाख टन कम्पोस्ट का वार्षिक उत्पादन हो सकता है किन्तु ये प्लांट महज 14 प्रतिशत कार्यक्षमता पर कार्य कर रहे हैं।

पूरे देश के महानगरों के बाहरी क्षेत्रों में कचरे के पहाड़ बने हुए हैं। इन महानगरों के साथ ही हमारे शहरों के भी बाहरी इलाकों में स्थित कचरे के ये पर्वत जल-मृदा और वायु तीनों को सांघातिक रूप से प्रदूषित करते हैं।

पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि उसके द्वारा देश भर में 1285 लैंडफिल साइट्स की पहचान की गई है किंतु दुर्भाग्य यह है कि देश के अधिकांश महानगर अपने द्वारा उत्पादित कचरे के आधे भाग का भी निपटान नहीं कर पाते।

आश्चर्यजनक बात तो यह है कि ये स्थिति स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 के आधार पर अग्रणी स्थान पाने वाले नगरों सूरत, भोपाल और इंदौर आदि की भी है।

  • कई महत्वपूर्ण अविष्कार, लेकिन दैनिक उपयोग में शामिल नहीं
  • आत्ममुग्ध राजनेता : स्वच्छता से ज़्यादा प्रचार पर ध्यान 

स्वच्छता रैंकिंग अवैज्ञानिक

स्वच्छता रैंकिंग अवैज्ञानिक है क्योंकि यह अनुभूति आधारित है जबकि स्वच्छ दिखने और वैज्ञानिक रूप से स्वच्छ होने में जमीन आसमान का अंतर है।

हानिकारक और खतरनाक कचरे का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। स्टेट ऑफ द एनवायरनमेंट रिपोर्ट के अनुसार 2009 में लगभग 36165 उद्योग 6.2 मिलियन टन हानिकारक और खतरनाक  कचरा उत्पादित करते थे। सन 2015 में  इनकी संख्या बढ़कर 42429 हो गई और उत्पादित कचरा भी 7.8 मिलियन टन तक पहुंच गया (रागिनी,06 जून 2017,लाइवमिंट.कॉम द्वारा उद्धृत)।

स्वच्छ भारत अभियान औद्योगिक प्रदूषण को अपने कार्य क्षेत्र में समाहित नहीं करता जबकि पर्यावरण मानकों की सतत और आपराधिक अनदेखी छोटे बड़े उद्योगों द्वारा निरंतर निर्लज्जता पूर्वक की जा रही है।

गुजरात ( देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में सम्मिलित हैं वापी और अंकलेश्वर) तथा महाराष्ट्र घातक औद्योगिक प्रदूषण से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं।

इन शौचालयों से जल प्रदूषण का ख़तरा

स्वच्छ भारत अभियान में जो शौचालय बन रहे हैं वे भी जल प्रदूषण का कारण बन सकते हैं। यह देखा गया है कि समुद्र तटीय प्रदेशों में जहाँ जल स्तर ऊपर है तथा कुएँ आदि एक दूसरे के सन्निकट हैं वहाँ सेप्टिक टैंक जल प्रदूषण का कारण बनते हैं। ये केवल उन इलाकों के लिए सुरक्षित हैं जहाँ जल स्तर काफी नीचे है। इस गलती का खामियाजा सबसे ज्यादा केरल को भुगतना पड़ रहा है।

जल उपचार के क्षेत्र में भारी भरकम बजट के साथ बेहतरीन तकनीकी का उपयोग करने वाले महानगरीय प्लांट तो फिर भी अच्छा कार्य कर रहे हैं किंतु देखरेख और जानकारी के अभाव में छोटे शहरों के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट दयनीय स्थिति में हैं।

फण्ड की कमी और विद्युत की अनुपलब्धता भी इन प्लांट्स के बंद पड़े होने हेतु उत्तरदायी हैं। नमामि गंगे के प्रधानमंत्री की प्रिय परियोजना होने के कारण गंगा नदी में उद्योगों द्वारा डाले जा रहे हानिकारक केमिकल्स और सॉलिडस तथा गंगा तटीय नगरों के अनुपचारित कचरे व गंदे पानी की राष्ट्रव्यापी चर्चा हुई किन्तु देश में ऐसी सैकड़ों नदियाँ और जल स्रोत हैं जो गंदगी और प्रदूषण की मार झेल रहे हैं।

जल, वायु और औद्योगिक प्रदूषण शामिल नहीं

स्वच्छ भारत अभियान के कार्य क्षेत्र में न तो जल प्रदूषण आता है न औद्योगिक प्रदूषण। इनके लिए सरकार के अन्य कार्यक्रमों को पर्याप्त माना गया है।

बिल्कुल यही स्थिति वायु प्रदूषण के विषय में है जो भारतीयों में मृत्यु का पाँचवां सबसे बड़ा कारण है। विश्व के बीस सर्वाधिक वायु प्रदूषित नगरों में 50 प्रतिशत भारत में हैं जिनमें देश की राजधानी दिल्ली भी शामिल है।

डब्लू एच ओ द्वारा जिन 67 देशों के 795 शहरों (2008-2013) को इस अध्ययन में शामिल किया गया है वे बड़े शहर हैं। किंतु भारत में कोल आधारित पावर और स्टील उद्योगों का जाल छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड के जिन अविकसित क्षेत्रों में फैला है वहाँ तो प्रदूषण की स्थिति और भयावह है किंतु इन क्षेत्रों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।

उद्योगपति स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर पर्यावरण कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने हेतु स्वतंत्र छोड़ दिए गए हैं। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण के लिए भारत स्टेज सिक्स  जैसे एमिशन नॉर्म्स ही काफी नहीं हैं, ट्रैफिक के प्रवाह को सुचारू बनाना होगा जिसके लिए प्रयास नहीं होते दिखते। स्वच्छता अभियान इस संबंध में मौन है और प्रदूषण निवारण की पारम्परिक योजनाओं पर ही लोगों को निर्भर रहना होगा।

कई महत्वपूर्ण अविष्कार, लेकिन...

देश के वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्त्ताओं ने स्वच्छता और प्रदूषण नियंत्रण के लिए अनेक महत्वपूर्ण अविष्कार किए हैं। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर द्वारा शुद्ध पेयजल दिलाने हेतु प्रेशर ड्रिवन मेम्ब्रेन प्रोसेस की खोज की गई है जो घरों,गांवों और शहरों सबके लिए उपयोगी है।

इसी संस्थान द्वारा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की प्लाज्मा टेक्नॉलॉजी आविष्कृत की गई है जो खतरनाक और जटिल यौगिकों को उनके मूल तत्वों में तोड़ देती है।

अकार्बनिक तत्व विट्रीफाइड मॉस में परिवर्तित कर लिए जाते हैं और कार्बनिक पदार्थ गैसों में बदल दिए जाते हैं।

यहीं मल्टी स्टेज बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट सॉल्यूशन का भी अविष्कार किया गया है जो एक कंटेनर के रूप में नदियों में गिरने वाले गंदे नालों के मुहाने पर लगाया जा सकता है। इसे छोटी हाउसिंग यूनिट्स भी सीवेज ट्रीटमेंट के लिए लगा सकती हैं। यह ऊर्जा की भारी बचत कराता है।

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर द्वारा खोजी गई आइसोटोप तकनीकी के द्वारा स्टेबल आइसोटोप और रेडियो एक्टिव आइसोटोप का प्रयोग कर सरफेस वाटर और ग्राउंड वाटर के प्रदूषण का पता लगाया जा सकता है। यह संस्थान रेफ्यूज डिराइवड फ्यूल -जो म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट से ऊर्जा बनाने में सहायक है और कोल् एनर्जी का विकल्प हो सकता है- पर भी कार्य कर रहा है।

आई आई टी कानपुर के द्वारा जीरो डिस्चार्ज टॉयलेट का निर्माण किया गया है जो सीवेज में से जलीय भाग को अलग कर पुनः फ्लशिंग के लिए इस्तेमाल करने योग्य बनाता है।

आईआईटी मद्रास द्वारा लगभग इसी कांसेप्ट पर स्माल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया गया है जिसके उपयोग से गंदे पानी के सीपेज से जल प्रदूषण नहीं होता।

भारतीय वैज्ञानिकों के स्वच्छता विषयक अविष्कार सस्ते और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं। किंतु इन अविष्कारों को दैनिक उपयोग के स्तर पर आते कम ही देखा जाता है। इसका कारण सरकार में बैठे नेताओं और नौकरशाहों का असंवेदनशील और असहयोग पूर्ण रवैया है।

वर्तमान सरकार तो बढ़ चढ़कर भारत में शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देने का वादा कर रही है किंतु इन वादों को यथार्थ में बदलते देखना हमेशा की तरह अभी बाकी है।

विश्व स्तर पर भी जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्लास्टिक को विघटित करने वाले बैक्टीरिया की खोज 2016 में ही कर चुके हैं जिसे उन्होंने आईडियोनेल्ला सकैन्सिस का नाम दिया है।

सिंथेटिक बायोलॉजिस्ट भी ऐसे ऑर्गेनिज्म के निर्माण का प्रयास कर रहे हैं जो प्लास्टिक को उसके संघटकों में तोड़ सके। पर अभी तो रीसाइक्लिंग और इंसिनेरेशन (थर्मल ट्रीटमेंट) ही दो विकल्प इस विषय में हमारे पास हैं।

ज़्यादा आशा मत लगाइए

यदि स्वच्छ भारत अभियान से आप क्लीन एयर, क्लीन वाटर या क्लीन एनवायरनमेंट की आशा कर रहे हैं तो आपने स्वच्छ भारत अभियान को बिना समझे उससे ज्यादा ही आशाएं लगा ली हैं।

स्वच्छ भारत अभियान आपको हाइजिन और सैनिटेशन सिखाने का एक प्रयास भर है। किंतु इस सीमा के बावजूद भी इसे एक जन आंदोलन बनाना आवश्यक है।

यह पहली बार हुआ है कि किसी सरकार ने शौचालयों के अभाव के कारण नारियों को होने वाली शारीरिक और मानसिक वेदना को विमर्श में लाया है। सरकार का यह अभियान नारियों को एक बड़ी राहत और अच्छा स्वास्थ्य देगा।

इसी तरह मैला ढोने की प्रथा तो समाज पर एक कलंक है और इसके उन्मूलन की सरकार की कोशिश भी प्रशंसनीय है। किंतु विशाल अंडरग्राउंड सीवरेज लाइन्स और गंदे नालों की सफाई में बिना सुरक्षा उपायों के सफाई कर्मियों को मरने के लिए उतार देना तो और बड़ी नृशंसता है और इसका उन्मूलन भी स्वच्छ भारत मिशन की प्राथमिकताओं में होना चाहिए।

सरकार का यह मानना कि अस्वच्छता एक बुरी आदत है और इसके लिए जागरूकता की कमी जिम्मेदार है, अंशतः सही है।

जहाँ रहने को छत नहीं, पीने के लिए तक पानी नहीं वहाँ शौचालयों का दूसरा उपयोग तो होगा ही, असल समस्या पीढ़ियों से चले आ रहे अभाव और गरीबी की है।

आत्ममुग्ध हैं राजनेता

बड़े बड़े अभियानों को असफल कर चुकी भ्रष्ट सरकारी मशीनरी और कुटिल अफसरों द्वारा दी जाने वाली झूठी रिपोर्टों से आनंदित होने वाले आत्ममुग्ध राजनेताओं की उपस्थिति स्वच्छ भारत अभियान की सफलता के मार्ग में बड़ी बाधा है।

यह भी लगता है कि सरकार का ध्यान अपने प्रचार पर अधिक और स्वच्छता पर कम है।

स्वच्छ भारत अभियान अवश्य सफल होगा बशर्ते जनता स्वच्छता को अपना अधिकार मान ले और सरकार से यह कहे कि स्वच्छता कोई स्वतंत्र या निरपेक्ष स्थिति नहीं है। 

स्वच्छता समग्र उन्नत जीवन स्तर का एक लक्षण मात्र है। जब समानता होगी, जब सम्पन्नता होगी,  जब स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएँ होंगी, जब सहकार और सहयोग होगा तो स्वच्छता की प्राप्ति में भी देर नहीं लगेगी- तब ही गाँधी जी के स्वच्छ भारत का सपना सच्चे अर्थों में साकार होगा।










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