विवेकहीनता का आइना है “दि ताशकंद फाइल्स”

सिनेमा , , शनिवार , 13-04-2019


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ऋचा साकल्ले

लेखक-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘दि ताशकंद फाइल्स’ रिलीज़ से पहले ही विवाद में आ गई थी जब कांग्रेस ने इसकी रिलीज़ का विरोध किया था। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोतों ने फिल्म की रिलीज के खिलाफ निर्माताओं को लीगल नोटिस भेजा था। शास्त्री जी के पोते कांग्रेस से जुड़े हैं। नोटिस में कहा गया कि फिल्म की रिलीज होने से शांति भंग होगी। लोकसभा चुनाव के समय फिल्म रिलीज होने पर गलत प्रभाव पड़ेगा। यह भी कहा गया कि फिल्म की रिलीज को लेकर शास्त्री परिवार के किसी भी सदस्य से किसी भी तरह से कोई अनुमति नहीं ली गई। निर्माताओं को फिल्म के लिए प्री-स्क्रीनिंग की व्यवस्था करनी थी। हालांकि निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का कहना था कि -शास्त्री परिवार ने 7अप्रैल को फिल्म देखी थी और मुझे सूत्रों से पता चला कि उन्होंने नोटिस गांधी परिवार के निर्देश पर दिया। 

विवेक के मुताबिक “वे (गांधी परिवार) फिल्म की रिलीज से क्यों डरे हुए हैं जो कि किसी नागरिक के #RightToTruth पर कुछ सवाल उठाती है? भारतीय सिनेमा के इतिहास में ये पहली फिल्म है जिसे देश के पत्रकारों को समर्पित किया गया है। मैं पत्रकारों से उम्मीद करता हूं कि वे हाईकमान से सवाल करें। क्यों वे ये मूवी रोकना चाहते हैं? क्यों इसकी रिलीज से वे डरे हुए हैं?'' बहरहाल उपरोक्त विवाद हुआ लेकिन फिल्म कल शुक्रवार को रिलीज़ हो गई। ‘दि ताशकंद फाइल्स’ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत के रहस्यों को सुलझाने के दावे के साथ आई है लेकिन मैं इस फिल्म को प्रो बीजेपी नैरेटिव गढ़ने वाली एक प्रोपेगेंडा फिल्म कह रहीं हूं।

जो एक वैकल्पिक इतिहास को रचने के उद्देश्य से बनाई गई है। वजह हैं इसके निर्देशक विवेक अग्निहोत्री। याद होगा आपको 2014 में अपनी फिल्म ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ से विवेक अग्निहोत्री ने यह जगज़ाहिर कर दिया था कि वो किस विचारधारा से प्रेरित हैं । वो एक विशुद्ध वाम विरोधी, कांग्रेस विरोधी सोच रखने वाले शख्स हैं जिसका गवाह पूरा सोशल मीडिया है। ‘दि ताशकंद फाइल्स’ देखकर यह बात और पुख़्ता हो जाती है जब फिल्म में केजीबी का नाम लेते हुए सीधे तौर पर इंदिरा गांधी को शास्त्री जी की मौत का ज़िम्मेवार ठहराने की कोशिश की गई है। हास्यास्पद यह है कि विवेक अपनी फिल्म में एक पत्रकार को मौत के राज खोलने का मोहरा बनाते हैं। 

अपनी फिल्म को पत्रकारों को समर्पित करते हैं और खुद सिनेमा के ज़रिए अपनी विशेष विचारधारा के एजेंडे को सेट भी कर देते हैं। यानि मान लिया जाय कि भारतीय सिनेमा भी अब सीधे सीधे अपनी राजनीतिक विचारधारा को सेट करने का हथियार बन चुका है। पहले जहां निर्देशक इस तरह की फ़िल्मों में सृजनात्मक तरीक़े से पॉलिटिकल थॉट कैरी करते थे जहां दर्शक अपने अर्थ ग्रहण करने की स्वतंत्रता रखता था वहीं अब विवेक अग्निहोत्री जैसे निर्देशक अपना निजी राजनीतिक विचार स्थापित करते हैं। दिमाग में घुसा देने की चेष्टा रखते हैं। इस फिल्म में वो सब सवाल उठाए गए हैं जो शास्त्री जी की मौत के बाद उठे थे। उन सभी थ्योरी का ज़िक्र है जो बताती हैं कि शास्त्री जी की मौत एक साज़िश थी।

जिन पर जाने कितने न्यूज़ चैनल समय-समय पर इन सवालों के साथ अपने शोज़ बनाकर टीआरपी ले चुके हैं लेकिन सवाल वहीं के वहीं हैं। मसलन शास्त्री जी की बॉडी का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया। मौत के बाद उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया। उनके शरीर में कट क्यों लगे हुए थे। उनकी डेली डायरी कहां गई। उनका थर्मस उनके परिवार को क्यों नहीं दिया गया। उनका रसोइया रामनाथ साथ गया था तो फिर उस दिन खाना जान मोहम्मद ने क्यों बनाया। फ़िल्म में कुलदीप नैय्यर जी का ज़िक्र है जिन्हें खुद ऐसा लगता था कि शास्त्री जी की मौत नेचुरल नहीं थी। श्वेता बसु प्रसाद फिल्म में पत्रकार बनी हैं तो विपक्षी पार्टी के नेता बने हैं मिथुन चक्रवर्ती । 

नसीरुद्दीन शाह सरकार के मंत्री हैं तो पंकज त्रिपाठी, मंदिरा बेदी पल्लव जोशी और विनय पाठक भी अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी एक महत्वाकांक्षी पत्रकार से शुरु होती है जिसे फ़ोन पर कोई यह स्कूप देता है और फिर रागिनी फुले नाम की यह पत्रकार खोजबीन शुरु कर देती है। हंगामा होने पर सरकार के मंत्री और विपक्षी पार्टी के नेता मिलकर एक कमेटी बनाते हैं जिसमें इस खोजी पत्रकार के साथ अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं। फिर शुरू होती है बंद कमरे में इस कमेटी की बहस। और बहस में वो सब नैरेटिव आते हैं जो राइट विंग के लोग उठाते रहे हैं। जैसे नेताजी और शास्त्री जी के ताशकंद मे मिलने की बात, शास्त्री जी की दो मेडिकल रिपोर्ट बनाई जाने की बात जो की पांडिचेरी के गवर्नर रहे के आर मलकानी की किताब के हवाले से बताया गया। जी वही मलकानी जो बीजेपी नेता थे।

फिल्म में बनी कमेटी के सदस्य सीआईए अफ़सर रॉबर्ट क्राउली के इंटरव्यू पर बेस्ड उस बात पर भी चर्चा करतें हैं जिसमें कहा गया कि होमी जहांगीर भाभा और शास्त्री जी की हत्या अमेरिकी जासूसी संस्था सीआईए ने कराई थी। और आख़िर में आती है मुद्दे की बात जब विवेक अग्निहोत्री यूएसएसआर की जासूसी एजेंसी केजीबी के एक जासूस की किताब ‘दि मित्रोखिन आर्काइव’ के बेस पर यह सिद्ध करते हैं कि केजीबी और इंदिराजी का गठबंधन था और शास्त्री जी की मौत का फ़ायदा इंदिराजी को मिलना था इसलिए यह हत्या कराई गई। 

हालांकि यह भी बताया गया कि इस रिपोर्ट की सत्यता भी प्रमाणित नहीं। लेकिन फिर भी कमेटी की मौन सहमति बहस के दौरान इसी किताब पर बनी।  कुल मिलाकर चुनाव के वक़्त यह फिल्म शास्त्री जी की मौत को हत्या बताने वाली अफ़वाहों पर बेस्ड है जिनका कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं है। इस फिल्म के ज़रिए राजनैतिक हित साधने की कोशिश की गई है यह फिल्म इसका प्रमाण अपने कंटेंट से साफ़ देती है। मेरी समझ से इसे खुले दिमाग से देखा इसलिए जाए ताकि यह समझा जा सके ही विवेकहीनता का स्तर कहां तक जाता है और इसके मंसूबों पर पानी फेरा जा सके। 

(ऋचा साकल्ले एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं। और आजकल दिल्ली में रहती हैं।)








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