व्यापार का परम आनंद काल

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 03-11-2017


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विष्णु राजगढ़िया

उस देश में अचानक खुशी की लहर थी। कई बरसों से कोई सुखद समाचार नहीं मिला था। लोग परेशान रहते थे। व्यापारी भयभीत। लेकिन भला हो उस विश्व संस्था का, जिसने कहा- ‘फूलिस्तान में व्यापार करना हुआ आसान।’

फूलिस्तान के नागरिकों ने घी के दिये जलाए, मिठाइयां बांटी। खुश हुए कि अब तो अच्छे दिन आ ही गए समझो। नए नए टैक्स की मार से परेशान व्यापारी सारा दुख भूल गए। हर सप्ताह तीन बार सरकारी बाबुओं के सामने पूरा हिसाब देने की लाचारी को हवा में उड़ा दिया। उन्हें भी लगा मानो फूलिस्तान में ही साक्षात स्विट्जरलैंड का आनंद आ गया हो। टैक्स बाबुओं की मुट्ठी गर्म करना उन्हें सुखद अनुभूति देने लगा था। एक बार फिर सबने पृथ्वी के भगवान का जैकारा लगाना शुरू कर दिया।

फूलिस्तान की यह खासियत है। हर विषय की तरह इस देश के नाम की उत्पत्ति को लेकर भी विद्वानों में सदा संशय रहता है। कोई इसे हिंदी का फूल समझता है तो कोई अंग्रेजी का। कारण शायद यह कि दोनों ही किस्म के फूल उस देश में पर्याप्त उपलब्ध थे। बहरहाल, अपार खुशी के बीच यह जानना पाठकों के लिए दिलचस्प होगा कि विश्व संस्था ने किस रिपोर्ट के आधार पर फूलिस्तान को व्यापार के लिए  बेहतर रैंक दिया।

विश्व संस्था की टीम ने रिपोर्ट बनाने के पहले विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देशी बड़ी कंपनियों के मालिकों से पूरी जानकारी ली थी। उस आधार पर यह नतीजा निकाला गया था।

विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनुसार उनके लिए फूलिस्तान एक बेहतरीन निवेश स्थल है। वहां किसी श्रमिक कानून का पालन जरूरी नहीं। मजदूरी की दर, काम के घंटे, कार्यस्थल पर सुविधाएं और सुरक्षा वगैरह का कोई लोचा नहीं। जिसे जब चाहा, निकाल दो। दुर्घटना में मर जाए तो लिस्ट से नाम हटाकर अपना कर्मी होने से साफ इंकार कर दो। पर्यावरण कानूनों की भी चिंता नहीं। फैक्ट्री की जहरीली गैस से लोग मरें या गन्दे पानी से खेत तबाह हों, कोई टेंशन नहीं।

रिपोर्ट बताती है कि देशी बड़े उद्यमी भी कई वजहों से खुश थे। कोई फैक्ट्री लगानी हो, तो सरकारी बैंक से चाहे जितना कर्ज ले लो। ब्याज तो क्या, मूलधन चुकाने की भी जरूरत नहीं। बैंक तगादा करे, तो दिवालिया दिखा दो। बैंक के इस घाटे की भरपाई सरकार खुद ही कर देगी। डीजल पेट्रोल या रसोई गैस की कीमत बढ़ाने से लेकर नए टैक्स लगाने के कई उपाय जानती है सरकार।

विश्व संस्था को यह जानकर और हैरानी थी कि फूलिस्तान में सरकारी बैंकों को चूना लगाने वालों को काफी श्रद्धा की नजर से देखा जाता है। ऐसे लोगों की संपत्ति जब्त करके जेल भेजने जैसा अन्याय हरगिज नहीं होता। उल्टे, ऐसे उद्यमियों के नाम पूरी तरह गोपनीय रखे जाते हैं। पब्लिक को इनके नाम का पता चलने से प्रतिष्ठा धूमिल होगी। दूसरे बैंकों से नया ऋण लेना मुश्किल होगा। हालांकि यह सुविधा तभी मिलती है, जब राशि खरबों में हो। लाख पचास हजार रुपये न चुकाने वालों के नाम अखबारों के विज्ञापन में आ जाते और उनके घरों की नीलामी तय थी। आखिर कितने लोगों को छूट देगी सरकार। कोई तो अनुशासन हो।

फूलिस्तान की एक और विशेषता को विश्व बैंक की रिपोर्ट में सराहा गया। सरकारी बैंकों को लूटने वाले उद्यमियों को सांसद और मंत्री बनाकर यह अवसर दिए जाते हैं कि लुटेरों के अनुकूल कानून बना सकें।

व्यापार सुगमता की इन विशेषताओं पर उस देश के लोग फूले नहीं समा रहे थे। गरीबों की भूख, बुजुर्गों की लाचारी और नौजवानों की बेरोजगारी को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। संभवतः ऐसी ही स्थितियों को धर्मग्रंथों में परम आनंद की चरम अवस्था के तौर पर वर्णित किया गया है। ऐसी अवस्था, जिसमें मनुष्य इहलोक की वास्तविकता भुलाकर उहलोक की दिव्य परिकल्पना में विचरण करता है। इति।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार और आटीआई कार्यकर्ता हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)

 

 

 










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