रमता जोगी, बहता पानी...भारत का कौन सानी!

विशेष , धर्म-समाज, मंगलवार , 03-10-2017


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त्रिभुवन

भारत एक प्रवाहमान राष्ट्र है। ठहरता नहीं। जलधारा की तरह बहता है। रुकता नहीं। पीछे चलने का तो प्रश्न ही नहीं। वह मछली की तरह है। धारा के खिलाफ़ तैरता है। कभी धारा की तरफ नहीं। जो भारत को धारा की तरफ बहाना चाहते हैं, वे भारत की एड़ियों को उसकी नाक की तरफ करना चाहते हैं।

चाणक्य को जानिए

भारत को पीछे ले जाने वाली मानसिकता के लोग आजकल चाणक्य का बहुत जिक्र करते हैं। लेकिन चाणक्य को जानिए। मैं गुरुवार रात को एक ख़बर के सिलसिले में दसवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान की एक पुस्तक पढ़ रहा था तो मेरे दिमाग में कई प्रश्न जन्मे

यह पुस्तक सहज जिज्ञासा को जन्म देती है, लेकिन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। हमारे शिक्षक पाठ्य पुस्तकें तो लिखना चाहते हैं, लेकिन सहज जानकारियां नहीं दे पाते, क्योंकि वे इतिहास के सच से डरते हैं। कायरता सिर्फ शारीरिक ही नहीं होती। वह मानसिक और आत्मिक भी होती है। कायरता आध्यात्मिक भी होती है।

पुस्तक में मौर्यकाल के बारे में एक अध्याय है। उसमें चंद्रगुप्त के बारे में बताया गया है। यह जानकारी भी है कि चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के आखिरी समय में जैन धर्म अपना लिया था। लेकिन यह नहीं बताया गया कि उनके गुरु का धर्म क्या था और स्वयं चंद्रगुप्त का धर्म उस समय क्या था जब उन्होंने साम्राज्य पर अधिकार किया। यह प्रश्न बच्चों के मन में सहज ही उठते होंगे, लेकिन पुस्तक लिखने वाले विद्वान ही न बताएं तो शिक्षक कहां से जवाब लाएंगे?

मैंने अर्थशास्त्र के पन्ने टटोले तो पहले ही श्लोक में कौटिल्य यानी चाणक्य यानी विष्णु गुप्त सबसे पहले वृहस्पति को स्मरण करते हैं। स्पष्ट है, वे वृहस्पतिवादी थे। आप उन्हें वैदिक कह सकते हैं। उन्होंने गणेश या शिव की स्तुति नहीं की। चाणक्य संकीर्ण भी नहीं थे। उन्होंने अर्थशास्त्र पूर्ण पृथ्वी के संसाधनों की सुरक्षा और मानव सहित सभी प्राणियों की सुरक्षा और संरक्षा के लिए रचा। न कि सड़कें बनाने और सत्ता हासिल करने के ओछे हथकंडों के लिए।

साभार

चाणक्य ने जिस समय चंद्रगुप्त को सम्राट बनाया, उसका धर्म वही था, जो गुरु का था। वह भी वैदिक और वृहस्पतिवादी था। लेकिन उन दिनों वैदिक धर्म पतन की अवस्था में था। वैदिक धर्म के नाम पर हर जगह धूर्त लोगों ने अपने शिकंजे कस लिए थे। समाज भारी परेशानी में था और जगह-जगह विद्रोह के स्वर उठ रहे थे।

चंद्रगुप्त ने जिस समय घननंद को हराया, घननंद का धर्म भी समान ही था। घननंद ने कभी धर्म नहीं बदला, लेकिन चंद्रगुप्त का अपने जीवन के आखिरी समय में वैदिक धर्म से मोहभंग हो गया और उसने जैन धर्म अपना लिया। अहिंसा का धर्म। वैदिक धर्म ने उसे हिंसा सिखाई थी और आखिरी समय में जैन धर्म ने उसे सिखाया कि हिंसा का त्याग करो और हर जीव की रक्षा करो। वह पहले एक अतिवाद पर था और अब दूसरे अतिवाद पर आ गया।

चंद्रगुप्त भले जैन हो गया हो, लेकिन उसके पुत्र बिंदुसार का धर्म वही पिता का पुराना धर्म ही रहा। वह बाद में जैन हुआ। लेकिन हो गया। बिंदुसार जैन हो गया, लेकिन उसका पुत्र अशोक वैदिक या वृहस्पतिवादी ही रहा। बाद में वह शैव हो गया। लेकिन कलिंग के युद्ध के बाद वह अपनी पत्नी के प्रभाव से बौद्ध हो गया। अशोक का एक पुत्र महेंद्र बौद्ध हो गया और दूसरा कुणाल शैव ही रहा।

आपकी बायोप्सी में कैंसर पॉजिटिव आ रहा है!

जिन लोगों ने कभी शैव होना ठीक समझा तो कभी बौद्ध या जैन हो जाना, उन लोगों के लिए इस्लामिक हो जाना भी बुरा नहीं रहा। पूरा का पूरा कश्मीर और अफगानिस्तान वाला इलाका इस प्रवाह में बहता गया। लेकिन क्यों? यह खोज और अनुसंधान का विषय है। बाबर-वाबर तो सौ दो सौ लोग आए थे। बाकी तो यहीं से लश्कर बना। क्यों बना? इस प्रश्न का उत्तर तब मिलेगा जब आप इतिहास की पैथोलॉजिक लेबोरेटरी में निडर होकर प्रवेश करेंगे। लेकिन मानसिक कायरता हुई तो आप घबरा जाएंगे और यह नहीं मानेंगे कि आपकी बायोप्सी में कैंसर पॉजिटिव आ रहा है। और अगर आपने स्वीकार कर लिया तो आप अपने साहस और उपचार से नीरोग भी हो जाएंगे।

लेकिन अगर आप ऐसे टेस्ट से जी चुराएंगे तो आपके साथ वही होगा, जो धीरेंद्र अस्थाना की एक कहानी में उसके नायक के साथ होता है। वह एक लड़की के प्रति आकर्षित होता है और वह उसे सेक्स के लिए तैयार कर लेती है। सेक्स करने के बाद लड़की उसे बताती है कि उसे एड़्स है। उस समय उस नायक की हालत बहुत खराब हो जाती है। वह जैसे पागल सा होने लगता है। अगर हम एड़्सग्रस्त किसी इतिहास से प्रेम करेंगे तो हमारे साथ यही होगा। साहस की जरूरत है कि ऐसे इतिहास से प्रेम करना छोड़ें,  ताकि हम स्वर्णिम और स्वस्थ भविष्य का निर्माण कर सकें।

चाणक्य ने सड़े हुए भूत को छोड़ा और उसके शिष्य चंद्रगुप्त ने कैंसरग्रस्त वर्तमान के धर्म को। इसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था। लेकिन वे आगे बढ़े। पीछे नहीं। किसी के पिछलग्गू भी नहीं हुए और जहां भी संभव हुआ, निर्माण किया, ध्वंस नहीं।

मौर्य कला। फोटो साभार : गूगल

यहां परिवर्तन ही धर्म है

यह भारत है। यहां परिवर्तन ही धर्म है। परिवर्तन भविष्य की ओर, न कि अतीत की ओर।

यह वही भारत है। यहां धर्म परिवर्तन ही धर्म है। यहां हर समय का एक धर्म है और उसे अपनाया जाता रहा है। लेकिन पीछे ले जाने वाला नहीं, आगे ले जाने वाला। यहां धर्म का मतलब प्रवाह है। जड़ता नहीं है। यहां धर्म का अर्थ प्रेम है। पीड़ा नहीं। घृणा नहीं। यहां धर्म अफीम है, लेकिन उसी मात्रा में जिस मात्रा में वह अमृतमय रहता है। जीवन दे सकता है।

धर्म धर्म है, आपकी राजनीति के उपयोग के लिए नहीं है। अगर राजनीति के लिए आप उपयोग लाएंगे तो यह पक्का अफीम ही नहीं, हशीश-चरस और ब्राउन शुगर भी है। लेकिन आप इसे अपने आत्मसुधार के लिए काम में लेते हैं तो यह आपको आध्यात्मिक उन्नति भी दे सकता है।

(लेखक दैनिक भास्कर, उदयपुर के संपादक हैं।)










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