"गाय" से डर गई योगी सरकार! नाटक का मंचन रोका

विवाद , , बुधवार , 14-03-2018


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जनचौक स्टाफ

लखनऊ/शाहजहांपुर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के इशारे पर शाहजहांपुर जिला प्रशासन द्वारा ‘गाय’ नाटक के मंचन पर जिस तरह रोक लगाई गई, इस पर इप्टा, जसम, प्रलेस, जलेस, साझी दुनिया, अर्थ, अमिट, कलम, राही मासूम रज़ा एकेडमी आदि प्रगतिशील व जनवादी सांस्कृतिक संगठनों तथा लेखकों व कलाकारों ने अपना तीखा विरोध प्रकट किया है। 

उनका कहना है कि यह न सिर्फ कला की स्वतंत्रता व अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है बल्कि यह सत्ता की फासिस्ट कार्रवाई है। इसका एकजुट प्रतिवाद जरूरी है, न मात्र कलाकारों के द्वारा बल्कि लोकतांत्रिक संगठनों व व्यक्तियों के द्वारा भी।

कार्टून। साभार

 

आपको बता दें कि 13 मार्च को शाहजहांपुर के गांधी प्रेक्षागृह में ‘गाय’ नाटक का मंचन होना था। इप्टा से सम्बद्ध कोरेनेशन आर्ट थियेटर की ओर से होने वाले इस नाटक का निर्देशन जाने-माने निर्देशक जरीफ मलिक ‘आनन्द’ ने किया था। नाटक के लेखक प्रसिद्ध नाटककार राजेश कुमार को भी संस्था द्वारा आमंत्रित किया गया था। वे भी इस मौके पर मौजूद थे। 

 

जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि कोरेनेशन आर्ट थियेटर द्वारा गांधी प्रेक्षागृह को मंचन के लिए न सिर्फ आरक्षित किया गया था बल्कि नाट्य मंचन की जो विधिक औपचारिकताएं होती हैं, उसे भी पूरा कर लिया गया था। लेकिन नाटक शुरू करने से कुछ घंटे पूर्व ही सत्ता के इशारे पर पुलिस-प्रशासन द्वारा मंचन की अनुमति को रद्द कर दिया गया। कलाकारों को हॉल से बाहर कर दिया गया और गांधी प्रेक्षागृह को पुलिस छावनी में बदल दिया गया।

पुलिस का नोटिस।

पुलिस-प्रशासन की नाटक रोक देने की कार्रवाई के बारे में कहना था कि इससे तोड़-फोड़ व अशान्ति फैलने की आशंका है। कलाकारों और नाटक देखने आये लोगों के गले प्रशासन का तर्क उतरने वाला नहीं था और नाटक पर रोक लगा देने की उनकी कार्रवाई के प्रतिवाद में शहीद भगत सिंह की मूर्ति के पास वे एकत्र हुए और इस घटना पर अपना विरोध जताया। 

 

नाटककार राजेश कुमार से जब इस संबंध में बात की गई तो उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति के माध्यम पर इस तरह अंकुश लगाना संस्कृति कर्म के लिए खतरनाक संकेत है। सत्ता के इशारे पर प्रशासन की यह कार्रवाई साबित करती है कि मुल्क में फासीवाद का आगमन हो चुका है। 

 

‘गाय’ नाटक गाय की वेदना, दुर्दशा व उपेक्षा को समाने लाता है। इसके साथ ही जिस तरह संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए गाय का इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को भड़काने और इसकी आड़ में दलितों, अल्पसंख्यकों व हाशिये के समाज के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, इसे भी सामने लाता है। 

सभी जनवादी प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठनों ने नाटक के मंचन को रोक दिये जाने की कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हुए सभी से इस विरोध को और तेज करने की अपील की है। 

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