वैष्णो देवी यात्रा के बहाने आस्थाओं की गणित को समझने की एक कोशिश

धर्म-समाज , जम्मू/कटरा, शुक्रवार , 30-03-2018


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मदन कोथुनियां

पिछले दिनों जम्मू में एक कार्यक्रम में गया था। कार्यक्रम 25 मार्च शाम 4 बजे समाप्त हो गया था। फिर हमने "वैष्णोदेवी" मंदिर देखने का कार्यक्रम बनाया।

 मैं व सुरेंद्र चौधरी कटरा के लिये रवाना हो गये। कटरा पहुंचकर हमने यात्रा पर्ची बनाई और ऑटो लेकर जहां से यात्रा शुरू होती है वहां पहुंच गये। वहां हमारी चेकिंग हुई। आगे बढ़े तो खच्चर वालों ने पूछा कि चलना है क्या? हमने कहा कितने रुपये। उन लोगों ने कहा 700। हमने सोचा 12 किलोमीटर है चल लेंगे। हम वहां से शाम 7 बजे रवाना हुये।

यात्रा शुरू होने से 4 किलोमीटर तक मार्ग के दोनों तरफ दुकानें थीं जो लोगों को जमकर लूट रही थीं। पानी की बोतल की बेहताशा कीमत। बीड़ी, सिगरेट व गुटका पर तो पाबन्दी थी लेकिन खाने-पीने की चीजें लगभग अशुद्ध थीं।

चलते-चलते हम थकने लगे और हमें लगा कि आधी यात्रा पूरी कर चुके हैं। तभी एक दुकान पर मसाज वाली मशीन देखी। हमने उससे पूछा मसाज के क्या लेते हो तो उसने बताया कि 15 मिनट के 50 रुपये। हमने 15 मिनट की मसाज करवाई तो एकबारगी तो थकान दूर हो गई। फिर हमने दुकानदार से पूछा कि अब मंदिर कितना दूर है उसने बताया 9 किलोमीटर। ऐसा सुनते ही हम फिर थक गये क्योंकि हमारे मन में था कि हमने आधी यात्रा पूरी कर ली है।

हम थोड़ी-थोड़ी दूर चलने के बाद विश्राम करते, कभी गन्ने का रस पीते तो कभी चाय। 7 किलोमीटर पर सराय आती है। एक बार तो मन बना लिया कि यहीं सो जाएं। सुबह चलेंगे लेकिन फिर सोचा चलना तो पड़ेगा ही। बीच-बीच में कभी घोड़े की टक्कर लग जाए तो कभी पालकी वालों की। जगह-जगह घोड़े की लीद की बदबू भी आ रही थी। अब हम 7 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके थे। ऊपर से कटरा शहर का रात का नजारा देखने लायक था।

जिस रास्ते से हम यात्रा कर रहे थे उस पूरे रास्ते में लोहे की जाली लगी थी। नीचे गिरने का कोई खतरा नहीं था। सफाई कर्मचारी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर घोड़े की लीद साफ करते नजर आ रहे थे। यानी सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। शुरू से लेकर अंत तक लाइट की माकूल व्यवस्था। 100-100 मीटर पर टॉयलेट व पानी की व्यवस्था और 500-500 मीटर पर चिकित्सा व्यवस्था। जगह-जगह सुरक्षा बल के जवान। 9  किलोमीटर पर एक मिडल स्कूल भी थी। लोगों का व्यवहार बहुत ही खुशमिजाज था। पूरी यात्रा में जिससे भी बात की उसने हंसकर जवाब दिया। चिड़चिड़ा या गुस्से में किसी व्यक्ति को नहीं देखा।

10 किलोमीटर पर रास्ते में एक घोड़ा मरा पड़ा था। मालिक से पूछा तो उसने बताया कि थककर गिर गया और गिरते ही मर गया। अब इतने थक गये थे कि एक-एक कदम चलना मुश्किल हो रहा था। हर 500 मीटर पर पूछते भाई साहब अब मंदिर कितना दूर है तो जो वो बताते वो हम सोचते थे कि उससे डबल अभी जाना है। हम विश्राम करते फिर उसके आगे बढ़ते। अब हमें मंदिर दिखने लगा। दिखने में तो नजदीक ही लगता था लेकिन था 2 किलोमीटर दूर। अब पहुंच तो गये लेकिन चिंता यह सता रही थी कि वापस कैसे चलेंगे।

वैष्णो देवी के पास का रात का नजारा।

सुरेंद्र ने कहा घोड़े पर चल देंगे। यही सोच रहे थे कि सुरेंद्र की नजर एक काउंटर पर पड़ी जिस पर लिखा था ग्लोबल हेलीकॉप्टर बुकिंग। हमारे मन में यह था कि हेलीकॉप्टर की बुकिंग तो पहले होती होगी फिर भी पूछ लेते हैं। काउंटर पर जाकर पूछा तो बताया गया कि 8 व 9 बजे के लिये बुकिंग हो रही है। हमने पूछा किराया कितना है तो उसने बताया कि एक व्यक्ति के 1005 रुपये हैं। हमने सोचा घोड़े वाला 700 रुपये लेगा और 3 घण्टे में नीचे पहुंचायेगा इससे तो यह ठीक है। हमने खिड़की से 2 टिकट बुक करवा लिए और इसी के साथ नीचे उतरने का टेंशन खत्म।

फिर आगे बढ़े तो सुरक्षा गार्डों ने मोबाइल व समान को आगे ले जाने के लिये मना किया और कहा रूम नम्बर 3-4 में जमा करा कर आओ। रूम की तरफ गये तो लंबी लाईन थी। सुरेंद्र ने कहा कि हम बारी-बारी से मंदिर देख आते हैं।

 पहले मैं रुका। एक घण्टे में सुरेंद्र वापस आए। फिर मैं गया। दोनों ने ही प्रसाद नहीं खरीदी। मंदिर में पुजारी तिलक लगा रहा था हमने मना कर दिया। हम वहां किसी के दर्शन करने नहीं गये थे हम यह जानने के लिये गए थे कि आखिर वहां क्या है? तो पता चला कि आस्था के अलावा कुछ नहीं है।

आस्था को जिंदा रखने के लिये करोड़ों रुपये रोज के खर्च हो रहे हैं। लाइट, पानी, सुरक्षा पर करोड़ों रूपये खर्च हो रहे हैं और इंसानियत को जिंदा रखने के लिए सरकार के पास धन नहीं है।

उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की आस्था को सरकार भी अलग-अलग नजरिये से देखती है। जहां वीर तेजाजी, देवनारायण भगवान, जंभेश्वर भगवान, रामसा पीर व गोविंद गुरु के प्रति निम्न वर्ग के लोगों की आस्था ज्यादा है इसलिये इन देवी-देवताओं के मेलों में बिजली,पानी, चिकित्सा, टॉयलेट, सड़क व सुरक्षा जैसी सुविधाओं की तरफ सरकार कभी ध्यान नहीं देती है। वहीं जहां उच्च वर्ग की आस्था जुड़ी होती है वहां सरकार पानी की तरह धन बहाती है। जैसे तिरुपति, वैष्णोदेवी और सिद्धि विनायक आदि, आदि।

मदन कोथुनियां के दोस्त सुरेंद्र।

उच्च वर्ग की आस्था के केंद्रों पर पशु क्रूरता व मानवीय अत्याचार पर कोई नहीं बोलता जबकि निम्न वर्ग की आस्था पर जोर से बोलने पर भी हाईकोर्ट संज्ञान ले लेता है।

 खरनाल मेले में तांगा दौड़ सिर्फ 12 किलोमीटर होती है उसमें कोर्ट को पशु क्रूरता नजर आई और उस पर रोक लगा दी। जबकि वैष्णोदेवी की 12 किलोमीटर की चढ़ाई पर 100 किलो के भारी व्यक्ति को लेकर चढ़ते समय घोड़ों की जीभ बाहर आ जाती है लेकिन कोर्ट चुप है। क्योंकि इससे उच्च वर्ग की आस्था को ठेस पहुंचती है।

पालकी में 100 किलो के व्यक्ति को बिठाकर चार व्यक्ति कंधों पर 12 किलोमीटर चढ़ते हैं। क्या यह अमानवीय अत्याचार नहीं है लेकिन पालकी में बैठा व्यक्ति उच्च कुल का है और पालकी ढोने वाले निम्न कुल के हैं। उच्च वर्ग की आस्था के आगे निम्न वर्ग की महेनत की कोई कीमत नहीं है और न ही निम्न वर्ग का व्यक्ति मानवता की श्रेणी में आता है।

जहां एक व्यक्ति को मंदिर तक पहुंचने में 5 घण्टे लगते हों वहां पर बड़े-बड़े मंदिर, धर्मशालाएं, होटल, सड़कें, रेलिंगें, पानी, लाईट इन व्यवस्थाओं में काम आने वाले मैटिरियल को ऊपर ले जाने में कितना खर्चा लगा होगा। जबकि देश के 25% लोगों के पास रहने को घर नहीं, बिजली नहीं, शुद्ध पानी नहीं, सड़कें नहीं हैं लेकिन आस्था के सामने इन गरीबों की कोई कीमत नहीं है।

मुझे वहां का नजारा देखकर लगा कि जिस तरह यहां पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है ऐसे सभी धर्मों के सैंकड़ों धर्म स्थल हैं। वहां पर भी अगर ऐसा ही हाल है तो अगले 20 वर्षों में देश बर्बाद हो जाएगा।

पूरे देश की 85% गरीब जनता पर जितना पैसा एक दिन में सरकार खर्च करती है उससे कहीं ज्यादा धन देश के 100 धर्म स्थलों पर सरकार खर्च कर रही है।

मंदिर देखकर हम वहां से 4 किलोमीटर वापस आये जहां से हेलीपैड नजदीक था। वहां कंबल लेकर सो गये लेकिन ठंड लग रही थी इसलिये नींद नहीं आई।

सुबह 8 बजे हेलीपैड चले गये। दो हेलीकॉप्टर सवारियां ले जा रहे थे एक के जाने के बाद दूसरा आता। एक हेलीकॉप्टर 6 मिनट 30 सेकेंड में सवारी उतार कर वापस आ जाता। सवारियों को उतारकर उड़ान भरने में महज 44 सेकेंड लगते। उड़ने के बाद मात्र 2 मिनट 30 सेकेंड में लैंड हो जाता था। यानी हमने लगभग ढाई मिनट की यात्रा की। फिर वहां से जम्मू आ गए।

यह यात्रा का विवरण है इस विवरण में किसी की आस्था को ठेस नहीं पहुंचे इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है। लेकिन वस्तुस्थिति से अवगत करवाना मेरा फर्ज था।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)










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