वैलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर एलजीबीटी समुदाय के लोगों ने सुनायी अपनी दास्तानें, कहा-समाज में बढ़ रही है हमारी स्वीकारोक्ति

हमारा समाज , , बृहस्पतिवार , 14-02-2019


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डॉ. मुकेश कुमार

वर्धा। वैलेंटाइन दिवस की पूर्व संध्या पर महाराष्ट्र के वर्धा में 'लैंगिक हिरासत और संघर्षशील प्रेम' पर केन्द्रित भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए LGBTQ समुदाय के प्रतिनिधियों ने अपने प्रेम अनुभवों से संबंधित अनसुने किस्से और उनका मौखिक इतिहास साझा किया। कार्यक्रम का आयोजन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र के कस्तूरबा सभागार में किया गया था। कार्यक्रम की प्रस्तावना शिवानी अग्रवाल ने रखी। लेस्बियन सबरी रैना ने उक्त मौके पर कहा कि, हम पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं और यहाँ हमें अपनी पहचान को स्वीकारने और बताने में दिक्कत होती है। LGBTQ समूह अपनी अस्मिता की लड़ाई हमेशा लड़ता हुआ दिखता है और फिर अगर वे इस समाज में तीसरे लिंग के साथ पैदा हुई हैं तब उनकी स्थिति और भी दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में सामने आती है।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि 'मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे परिवार ने इसे स्वीकारने में कोई दिक्कत महसूस नहीं की। उन्होंने मेरी निजी अस्मिता को स्वीकारने और उसके साथ जीने की पूरी आजादी दी। मेंरे पड़ोस में ही एक लड़की ने आत्महत्या की थी क्योंकि वह लेस्बियन थी और उसके साथ यौन हिंसा की घटना हुई थी। मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि अगर आपको कोई बात अच्छी नहीं लगती तो उसका मजाक न बनाएँ बल्कि उनको स्वीकार्यता दें। वह भी आपके समाज में पैदा हुए हैं। वे भी अपनी माँ के गर्भ में 9 महीने तक रहे हैं। हम (थर्ड जेंडर) लोग कैसे जियें, आज यह एक बड़ी चुनौती है।'

ट्रांसवुमेन ऋतु बी. उमड़े ने अपने कॉलेज के दिनों के बारे में अपने संघर्षों को साझा करते हुए बताया कि 'स्कूल के प्रिंसिपल, शिक्षक उनके चलने को लेकर बेहद भद्दी टिप्पणियां करते थे। ठीक ऐसा ही व्यवहार मेंरे साथ पढ़ने वाले बच्चों का भी होता था। इस कारण मुझे कक्षा दस के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। ऐसे कठिन वक्त में मेंरी माँ ने उनका इसमें सहयोग किया और मेरे स्कूल के शिक्षक और प्रिंसिपल से कहा कि बेटी हमारी है और पैसा भी हम दे रहे हैं तो आपको पढ़ाने में क्या दिक्कत है! इसके बाद से मैंने पढ़ाई फिर से शुरू किया। वे बताती हैं कि वर्धा में थर्ड जेंडर के लोगों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है, उनके साथ यौन हिंसा आम बात हो गयी है। मेरे पड़ोसी पूर्व में मुझसे समाज को खतरा मानते थे। वे हमारे अस्तित्व को अस्वीकार करते थे। वे कहते हैं कि आपका लिंग हमारे समाज का नहीं है। कुछ दिन पूर्व एक लड़के ने आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पिता उसे एक लड़की से शादी करने का दबाव डाल रहे थे। आज हम एक एनजीओ चलाते हैं जो शैक्षिक, लैंगिक स्वीकार्यता और संवेदनशीलता के लिए कार्य करता है।

अगले वक्ता के तौर पर महाराष्ट्र के चंद्रपुर से आए तुषार ने उपस्थित जनसमूह से शिकायती लहजे में पूछा कि "क्या एक लड़का या लड़की ही प्रेम कर सकते हैं? भीड़ ने ना में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि एक लड़का और एक लड़का जो एक दूसरे के प्रति यौन झुकाव रखते हैं वे प्रेम क्यों नहीं कर सकते हैं? अगर वे प्रेम करना और साथ रहना भी चाहें तो उनके साथ हिंसा क्यों की जाती है? मैं अपने दोस्त के साथ यौन झुकाव रखता हूँ इसलिए मुझे अपना कमरा खाली करना पड़ा क्योंकि हम समाज के खांचों में नहीं बैठते हैं। अभी तक मैंने अपनी पहचान परिवार के सामने जाहिर नहीं की है क्योंकि मुझे परिवार से निकाले जाने का डर है। मेंरे घर वाले मुझसे शादी कर लेने को कहते हैं लेकिन मैं नहीं करता हूँ। अब तक तो चल गया लेकिन आगे क्या होगा!"

छत्तीसग्ढ़ के दुर्ग से आई ट्रांसवुमेन सोनाली ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मैं स्कूल के अलावा कहीं नहीं गयी हूँ क्योंकि मुझे बचपन से कहीं नहीं लेकर जाया जाता था जिसकी वजह से मेरा सामाजिक बहिष्करण बहुत आसानी से किया जा सका। मेंरे पिता और मेरे भाई मेरी लैंगिक पहचान को लेकर बहुत शर्मिंदगी महसूस करते थे। मेरे चलने के तरीके को वे ‘हक लेडी’ बुलाते थे क्योंकि मैं महिलाओं से थोड़ी भिन्न चाल चलती थी। मैं स्कूल में पढ़ने में बहुत अच्छी थी लेकिन मेरे दोस्तों का व्यवहार बहुत अभद्र था वो मेरी लैंगिक पहचान से मेल खाती हुई पितृसत्तात्मक गालियों का उपयोग कर उपहास उड़ाते थे जिसकी वजह से मैंने पढ़ाई छोड़ी और फिर घर भी छोड़ दिया। घर छोड़ते वक्त मेंरे पास कुछ भी नहीं था।

मैंने ट्रेन में भीख मांगी। होटलों में काम करके रुकती थी तो पुलिस का डर लगता था कि कहीं वह मुझे सेक्स वर्कर न समझ कर जेल में डाल दे। आगे उन्होंने कहा कि मैंने वहाँ से हिजड़ों के साथ जाना उचित समझा। मैं उनके साथ काम करती थी, खाना बनाती थी, गुरु की सेवा करती थी, उनके पैर दबाती थी। लेकिन एक दिन साथ के सदस्य ने मुझसे बुरा व्यवहार किया, फिर मैं छत्तीसगढ़ आ गई, वहाँ मेंरी मुलाक़ात अजय से हुई जिनसे बाद में मैंने शादी भी की। मेरे सास-ससुर ने हमारी लैंगिक पहचान के पीछे वंश वृद्धि के क्रम के रुकने के प्रति चिंता जताई जिसे मैंने सामान्य व्यक्तियों के निसंतान रह जाने के सवाल से तुलना कर किसी और बच्चे को गोद लेने का विकल्प दिया। तब वह स्वीकारने को तैयार हुए।

सोनाली के पति अजय ने कार्यक्रम में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्यार रंग, लिंग, वर्ण, धर्म नहीं देखता। अगर हम ट्रांसजेंडर समुदाय को प्यार नहीं करेंगे तो वह भी समाज से प्रेम नहीं करेंगे। उन्होंने बताया कि सोनाली पूर्व में अपने ग्रुप के साथ रहती थीं। सोनाली से अपने प्यार के बारे में विस्तारपूर्वक बताया और फिर उनके परिवार द्वारा उनको स्वीकारने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा, उसकी भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि शादी के बाद मेरे पिता ने मुझे रात में आने और लौटने का समय तय किया था जिसका विरोध कर मैंने एक दिन में लौट कर अपने परिवार व पड़ोसियों को मेरी अस्मिता को स्वीकार करने की पहल की।

'गे' समीर ने कहा कि मैं आयोजकों का शुक्रिया अदा करता हूँ। मैं चंद्रपुर में LGBTQ समुदाय से आता हूँ और परिवार के सामने स्वीकार नहीं कर पाया हूँ। मुझे 12-13 वर्ष की उम्र में ही पता चल गया था कि मैं एक ‘गे’ हूँ। और खुशनशीब हूँ कि मैं ‘गे’ पैदा हुआ हूँ। मुझे कोई दिक्कत नहीं है कि मैं गे पैदा हुआ हूँ। उन्होंने एक कविता भी सुनाई, ''मैं एक लड़का हूँ और एक लड़के से प्यार करता हूँ।" आगे उन्होंने कहा कि मैं बचपन में जब एक कॉलोनी के लड़के के साथ खेलता था तब मेरा पहली बार उसके साथ शारीरिक संबंध बना था जिसके बाद मुझे उसके पास जाने की जरूरत महसूस हुई लेकिन सामान्य लोगों के अलावा भी कोई शारीरिक सम्बन्धों की कोई गुंजाइश हो सकती है। इस बात से मेरा साथी डरता था जिसकी वजह से उसने कभी पास आने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। उन्होंने अपनी गजल मुस्कान आती है औऱ तेरा ख़याल आते ही चली जाती है को भी पढ़कर अपने प्रेम को अभिव्यक्त किया।

कार्यक्रम में मंच पर मौजूद लोग।

देश की मिस ट्रांस क्वीन-2018 वीणा सेन्द्रे ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपने मर्मस्पर्शी अनुभव साझा किए। उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान के पूरे संघर्ष से लेकर मिस ट्रांसक्वीन बनने के सफर को विस्तारपूर्वक बताया। बताते चलें कि वर्ष 2019 में थाईलैंड में आयोजित विश्व ट्रांसक्वीन प्रतियोगिता में वीणा भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उन्होंने अपने संबोधन के अंत में सभी दर्शकों से प्रतियोगिता में मजबूत दावेदारी पेश करने हेतु प्रतियोगिता हेतु जारी अपने यूट्यूब वीडियो लिंक को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करने की अपील की।

कार्यक्रम के अंत में छत्तीसगढ़ ट्रांसजेंडर बोर्ड की सदस्य एवं 'मितवा समिति' की रवीना बारीहा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि एक सर्वे के अनुसार 6 राज्यों में 8 लाख ट्रांसजेंडर रहते हैं। जिन्हें 8 बिन्दुओं के आधार पर चिन्हित किया गया। जिसमें केवल 12 ट्रांसजेंडर हैं जो शादीशुदा जीवनयापन करते हैं बाकी किसी भी ट्रांसजेंडर का कोई पार्टनर नहीं है। आगे उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि वे समाज में सामने नहीं आ पाते हैं। यह एक माइंड सेट होता है जो समाज की मान्यताओं से तैयार होता है, जिसमें स्त्री- पुरूष ही जीवनसाथी के रूप में हो सकते हैं। मनोविज्ञान के मुताबिक अनुभव पहली कड़ी होती है जो मनुष्य के व्यवहार को बनाती है। समाज द्वारा हमारे व्यवहार को तैयार किया जाता है जिसमें फिल्म, सीरियल व अन्य माध्यमों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए अपने आयु समूह के व्यक्तियों में ही संबंधों को स्वीकार किया जाता है।

इसी प्रकार एक सिंगल व्यक्ति किसी विधवा से संबंध रखता है तो इसे समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता। इसी का परिणाम है कि समाज द्वारा ट्रांसजेंडर को स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि यह पहले ही समाज द्वारा निर्धारित है। तृतीय लिंग समुदाय का शरीर मन से भिन्न होता है किन्तु उनमें भी भावनाएं होती हैं। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने ट्रांसजेंडर के संबंधों व उनके सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं को बताया। समान लिंग में प्यार संबंध बनने के बाद परिवार वालों के दबाव के कारण तथा स्वयं के जरूरतों के कारण उन्हें अपने संबंधों को छोड़ना पड़ता है। इसी के फलस्वरूप करीमा नाम की ट्रांस महिला ने अपने आप को जला दिया। इसी प्रकार रानी नाम की ट्रांस महिला की उन्होंने कहानी बताया कि उसके साथी द्वारा छोड़े जाने पर वह डिप्रेशन में चली गयी थी।

इसके लिए उन्होंने पुलिस का दरवाजा खटखटाया लेकिन पुलिस वालों ने यह कहकर उन्हें वापस भेज दिया कि उनकी शादी को कानून द्वारा मान्यता नहीं मिली है। वर्तमान समय में जरूरत है कि इन समस्याओं के कारणों की खोज करते हुए इन संबंधों को समाज, परिवार के दबाव से इन संबंधों को स्वीकार न कर पाने का डर आज भी है। वर्तमान समय में जब अंतरजातीय विवाह को समाज द्वारा पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है तो समलैंगिक व ट्रांस संबंधों को स्वीकारना काफी कठिन है। उन्होंने लोगों से अपील की कि जब दिव्यांगजनों को सक्षम बनाने तथा मुख्य धारा से जोड़ने के लिए योजनाएं व कार्यक्रम चलाए जाते हैं तथा उन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाता है तो उसी प्रकार ट्रांसजेंडर समूह के लिए भी ऐसे कार्य किये जाने की आवश्यकता है। हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वे से पता चला कि 27 ट्रांसजेंडर जोड़े हैं जो शादी के संबंध में बन्धे हुए हैं। समाज की मानसिकता इसके विरोध में क्यों खड़े हो रहे हैं इन्हें सोचने की आवश्यकता है तथा समाज द्वारा तैयार किये जा रहे माइंड सेट को तोड़ने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि संघर्षशील प्रेम के विभिन्न आयाम हैं जो धर्म, जाति, रंग, लिंग इत्यादि के आधार पर हमारे सामने हैं। यह कार्यक्रम इसके विरोध में शंखनाद है वो दिन दूर नहीं जब हम प्रेमी स्वतंत्र होकर अपने संबंधों को स्वीकार कर पाएंगे। यह संघर्षशील प्रेम नया नहीं है यह पुराने समय से ही हमारे सामने विद्यमान है। पुराने समय में मंदिरों पर बनी मुर्तिया इसी बात का परिमाण है कि यह संघर्षशील प्रेम पहले से ही चली आ रही है। अंत में उन्होंने कहा कि यही आशा है कि ऐसे बिन्दुओं पर कोई प्रोग्राम करने की आवश्यकता न पड़े। कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों व शिक्षकों से पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ था। कार्यक्रम का संचालन स्त्री अध्ययन विभाग की शोधार्थी प्रीति ने किया। कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने दिया। कार्यक्रम का समापन ट्रांसजेंडर मुद्दे पर शोध कर रहे डिसेन्ट कुमार साहू के वक्तव्य और डॉ. मुकेश कुमार के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

(वर्धा से डॉ. मुकेश कुमार की रिपोर्ट।)








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