यहां हैसियत तय करती है दंड का पैमाना!

सम-सामयिक , , बृहस्पतिवार , 10-08-2017


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वीना

“ऐसा लगता है कि मैं एक आम आदमी की बेटी ना होने की वजह से खुशकिस्मत हूं नहीं तो इन वीआईपी लोगों के खिलाफ खड़ा होने की उनके पास क्या ताकत होती है।“

ये कहना है चंढीगढ़ के आईएएस अफसर वीरेंद्र कुंडु की बेटी वर्णिका कुंडु का। शनिवार की रात वर्णिका का अपने घर जाते वक्त बीजेपी के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला ने अपने साथी के साथ पीछा कर अपहरण करने की कोशिश की थी। 

प्रतीकात्मक चित्र।

हो सकता है कुछ समय बाद वर्णिका को अपने इस बयान में कुछ बदलाव करने पड़ें। यहां सत्ता और देश की धन संपदा की लूट-खसोट की आपा-धापी में सबके लिए उसके स्तर के हिसाब से सुरक्षा-सम्मान और अपमान सुरक्षित हैं। वर्णिका कितनी खुशकिस्मत हैं ये उनके पिता के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर के अनुसार और आकाओं के लिए सुभाष बराला कितने कीमती हैं इस आधार पर आने वाले दिनों में पता चलेगा।

किसी को भी उसके खिलाफ होने वाले अन्याय में न्याय मिलेगा कि नहीं, मिलेगा तो कितना मिलेगा? ये निर्भर करता है इस बात पर कि पीड़ित किस स्तर पर है। और आरोपी किस पायदान पर। अपने स्तर से ज़्यादा की मांग करना इस व्यवस्था को चुनौती देना होता है। ये वही व्यवस्था है जिसके पैरोकार वर्णिका के आईएएस अफसर पिता अब तक रहे हैं। जब तक व्यक्तिगत तौर पर इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को खाद देने वालों के साथ कुछ ऐसा घटित नहीं होता जो कि उनके साथ नहीं होना चाहिये तब तक उनकी नाक इसकी सड़ांध को नहीं पहचानती। या यूं कहें कि पहचानने की ज़रूरत नहीं समझती। 

हां,  आप खुशकिस्मत हैं वर्णिका कि आप छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के हक़-अधिकार के लिए लड़ने वाली सोनी सोरी नहीं हैं। जिनके गुप्तांगों को पत्थरों से पाट दिया गया था। चेहरे को एसिड से झुलसाया गया,  शारीरिक-मानसिक हिंसा के सब हथकंडे अपनाए गए। प्रशासन कहता है ये सारी यातनाएं सोनी सोरी खुद ही खुद को देती हैं। सरकार को बदनाम करने के लिए। 

प्रतीकात्मक चित्र।

वर्णिका उन बेबस आदिवासी नौजवान लड़कियों में से नहीं हैं सिपाही जिनके स्तन निचोड़कर उनकी वर्जिनिटी का माप-तोल करने की जुर्रत रखते हों। आप खुशकिस्मत हैं कि आपके पिता के आईएएस होने की वजह से आपकी एफआईआर लिख ली गई घटना के तुरंत बाद। हैसियत की चाल पहचान कर हमारे यहां कानून अपनी चाल चलता है। इसका नमूना इन दिनों जनचौक पर निठारी कांड की करतूत ‘कोठी न.5’  उपन्यास की शक्ल में सामने है। निठारी के पीड़ित जो गरीब प्रवासी मज़दूरों के बेटे-बेटियां थे। पुलिस ने उनके लापता होने की रिपोर्ट तक लिखना ज़रूरी नहीं समझा। जवान बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने और पता लगाने के आश्वासन की जगह मां-बाप बेटी के आवारा-बदचलन तमगे के साथ धक्के देकर थाने से निकाले जाते। अगर न्याय हर स्तर के लिए बराबर होता तो निठारी में बहुत से बच्चों की जिन्दगी बचाई जा सकती थी। वर्णिका आप खुशकिस्मत हैं कि निठारी के बलात्कार और मौत के लिए अभिशप्त बच्चों की तरह आप किसी भी स्तर के लायक न समझे जाने वाले मेहनतकश की बेटी नहीं हैं।

आप चंडीगढ़ से हैं पर खुशकिस्मत हैं कि रुचिका गिरहोत्रा नहीं हैं। शायद आप जानती हों चंडीगढ़ की नाबालिग,  मासूम,  खूबसूरत 1993 में खुदकुशी कर जान देने वाली रुचिका गिरहोत्रा के बारे में। रुचिका से 1990 में उस समय के आईजी एसपीएस राठौर ने अपने ऑफिस में ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी। रुचिका की सहेली आराधना इसकी गवाह थी। पहली बार दोनों लड़कियों ने इसे भूल जाना बेहतर समझा। लेकिन जब दूसरी बार राठौर ने अपनी करतूत दोहरानी चाही तो लड़कियों ने घर में बताया। और राठौर के   खि़लाफ शिकायत दर्ज करवायी।  

अपने से ऊपर के स्तर के पुरुष की मनमानी का विरोध करने का नतीजा खुदकुशी होता है। और नहीं करने का बलात्कार। यहीं समझाया देश-समाज को रुचिका गिरहोत्रा के केस के अंजाम ने। रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा एक सीधे-साधे मामूली बैंक मैनेजर थे। जिनका सत्ता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। और शंभू प्रताप सिंह (एसपीएस) राठौर सत्ताधारियों के हितों को पालने-पोसने वाले अहम कारिंदे। सो सत्ता संरक्षण मिला एसपीएस राठौर को। यहां तक कि रुचिका को डराने-धमकाने के लिए उसके घर के बाहर एक एमएलए जगजीत सिंह टिक्का के जरिये भीड़ इकट्ठा करके नारे लगवाए गए।  

रुचिका को स्कूल से निकलवा दिया गया। चरित्रहीन बताया गया। जब भी घर से बाहर निकलती सादी वर्दी में पुलिस वाले उसका पीछा करते,  उसे छेड़ते। रुचिका के 10 साल के भाई आशू और पिता पर कार चोरी,  मर्डर तक के केस लादे गए। गै़रकानूनी तरीके से आशू को जेल में रखकर यातना दी गई। थाने से टूटे-फूटे 13 साल के आशू को रुचिका के घर में उसके सामने, राठौर ने बेरहमी से पीटा। धमकी दी कि अगर उसने केस वापस नहीं लिया तो उसका और पिता का भी भाई जैसा हाल होगा। फिर एक दिन आशू के हाथ में हथकड़ी पहनाकर कॉलोनी में उसका जुलूस निकाला गया। वो रात रुचिका की आखि़री रात थी। उसने जहर खाकर खुदकुशी कर ली। जो अपराध राठौर चंडीगढ़ की सड़कों पर, सबके सामने कर रहा था वो अदालत में साबित नहीं होने दिया। 

प्रतीकात्मक चित्र।

क्योंकि रुचिका की दोस्त और गवाह आराधना आखि़र तक डटी रही इसलिए 19 साल की लंबी लड़ाई के बाद राठौर पर सिर्फ रुचिका से छेड़छाड़ का मामला साबित हुआ। जिसके लिए महज़ 18 महीने की सज़ा और 1000 रुपये जुर्माना लगाया गया। राठौर की उम्र का लिहाज कर सज़ा का मामला सुप्रीमकोर्ट ने 6 महीने में ही सलटा दिया। सुप्रीम कोर्ट को 14 साल की एक लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाने और खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले दरिंदे पर, जिसने 10 साल के एक छोटे बच्चे को असहनीय यातनाएं दीं। कानून का जमकर मजा़क बनाया, उस पर तरस आ गया। अगर मॉलेस्टेशन का गुनाह साबित हुआ है तो क्यों न रुचिका की आत्महत्या और तुम्हारे बाक़ी कुकर्मों का हिसाब भी किया जाए? किसी कोर्ट ने ये सवाल नहीं किया।

आज भी राठौर मूंछों को ताव देता हुआ 30 लाख की मरसडीज़ के लिए 9 लाख का वीआईपी नम्बर खरीद कर ऐश कर रहा है। पूरी जवानी सत्ता के मजे लिए और बुढ़ापे की ऐश सुप्रीम कोर्ट ने तोहफे में दे दी। रुचिका और उसके परिवार के लिए किसी के पास कुछ नहीं था। क्योंकि उनका अपराधी उनसे ऊपर के पायदान पर खड़ा था। 

राठौर का हाल रुचिका और उसके परिवार की तरह तब होता जब राठौर किसी अपने से ऊंचे पायदान के अधिकारी की बेटी वर्णिका कुंडू या भजनलाल, चौटाला की बहू-बेटियों पर हाथ डालता। पर राठौर जैसे धूर्त ऐसी हिमाकत नहीं करते। ठीक वैसे ही वर्णिका कुंडु को अगवा करने की कोशिश करने वाले बीजेपी हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला को तब यकीनन सज़ा मिलती जब वो, अरूण जेटली, अमित शाह, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी आदि-आदि में से किसी की बेटी पर हाथ डालता। 

अंबानी-अडानी,  टाटा-बिड़लाओं की बेटियों के साथ ये हिमाकत करने की कोशिश पर तो सीधा गोली मार दी जा सकती है। एफआईआर, अदालत, जेल का टंटा ही नहीं। बराला तो किस खेत की मूली है राजनीति की ऐश काटने वाला कोई भी फन्नेखां पूंजी आकाओं के घर-परिवार से हिमाकत की सोच भी नहीं सकता।

वर्णिका और विकास बराला।

चूंकि नौकरशाही नेताशाही से नीचे के पायदान पर है इसलिए वर्णिका के चरित्र पर छींटाकशी करके उनके स्तर की हद उन्हें बताने की कोशिश की शुरुआत हो चुकी है। अन्तोन चेखव की कहानी गिरगिट खूब समझाती है इस बात को। एक कुत्ता जब तक वो पुलिस वाले को लगता है कि किसी आम आदमी का है तो खुजलीवाला,  बदसूरत,  बदज़ात है। और जैसे ही दूसरे पल पता चला कि कुत्ता सत्ताधारी जनरल साहब का है तो कुत्ता किसी महान नस्ल के मासूम माई बाप में बदल जाता है। सत्ताधारी जनरल साहब का तो कुत्ता भी पूजा करने लायक होता है। विकास बराला तो फिर बेटा है। इसलिए इंसाफ जैसी किसी चीज़ की मांग करते वक़्त ज़रूरी है ये ध्यान रखना कि आप किस स्तर पर हैं। 

धनबाद झारखंड के रहने वाले 27 वर्षीय आईटी अफसर शिव सरोज कुमार ने चंद दिनों पहले रांची सेवासदन अस्पताल के सामने खुदकुशी कर ली। क्योंकि थाने में उनके और उनके पिता के साथ बदसलूकी की गई थी। जब उन्होंने खुद पर हमला करने वाले लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवानी चाही। अपने पिता के अपमान को वो बर्दाश्त नहीं कर पाए तब उन्होंने एक सुसाइड नोट लिखकर आत्महत्या कर ली। 

शिव सरोज ने भी किसी सत्ता के पायदान पर मूंछ मरोड़ने वाले के वंशज से पंगा ले लिया था। अपने स्तर को समझे बगै़र मोदी जुमलों की सच्चाई जाने बिना भिड़ पड़े उनसे। अब उनकी हैसियत के मुताबिक उन्हें वो मिला जिसके वो हक़दार थे। शिव सरोज को ग़लत साबित करने के लिए उनकी बहन से ही उनका चक्कर चला दिया गया। वर्णिका तो फिर लड़की है। इसलिए ये समझने वाली बात है कि मामला ताकत के स्तर का है। लड़का हो या लड़की जो अपने से ऊंची हैसियत के रास्ते में आएगा नंगा-बर्बाद किया जाएगा।

करोड़ों के हीरे जड़ी ड्रेस पहन कर हीरों की नुमाईश के चक्कर में शरीर की नुमाईश करती मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी के लिए कोई एक शब्द बोल कर दिखाए। आईटी अफसर शिव सरोज उस पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग से तअल्लुक रखते थे जो वर्ग आजकल मोदी भक्त बना हुआ है। ये वो लोग हैं जिन्हें इस व्यवस्था की नंगी-बेशर्म,  क्रूर सच्चाई से अक्सर वास्ता नहीं पड़ता। और जो लोग इस नाकाबिले-बर्दाश्त हक़ीकत को इनके सामने रखते हैं उन्हें वो झूठे, विकास विरोधी,  देशद्रोही लगते हैं। जब गाहे-बगाहे रगड़े जाते हैं तो टूट जाते हैं। उन्हें अपने आप को ख़त्म करना आसान लगता है बजाय मुखालफत कर डंटे रहने के। 

दूसरी तरफ वो गरीब,  बेसहारा,  आदिवासी,  दलित,  माइनॉरिटी वाले हैं जिनके लिए हर दिन नई मुसीबत इस व्यवस्था के चेले-चपाटे ले कर तैयार रहते हैं। बावजूद इसके वो सब झेलते हुए लड़ते हैं, बेहतर जिन्दगी के लिए। 

कानून की नाक उन अपराधियों को सज़ा देकर बचाई जाती है जिनका कोई स्तर नहीं है। मसलन अभी हाल ही में राजस्थान के कोटा की पोस्को अदालत ने एक ऑटो ड्राइवर को महज 32 दिन में उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी। उसने एक नाबालिग लड़की का बलात्कार किया था। उसके खि़लाफ गवाही देने वाले किसी गवाह को न मरने का मौका दिया गया न गायब होने का। 

आदिवासी महिलाएं।

वहीं सरकारी मामलों में स्तर की धौंस अपराधी की नहीं सरकार की चलती है। छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के जवानों को आदिवासी लड़कियों से राखी बंधवाने के लिए बुलाया गया था। सरकार-प्रशासन द्वारा ये दिखाने के लिए कि आदिवासी औरतें-बच्चियां सिपाहियों पर भाई की तरह विश्वास करती हैं और वो उनकी रक्षा के लिए आए हैं। 

रक्षा करने आए वर्दीधारी भाईयों ने बहनों के जिस्मों को मसल कर अपनी कामेच्छा की कुंठा को तुष्ट किया। शिकायत करने पर लड़कियों को धमकाया-डराया गया। ताकि वो किसी के सामने मुंह न खोलें। आदिवासी,  नक्सली इलाकों के लिए चाहे वो किसी भी राज्य के हों जिनकी ज़मीन,  खनिजों-कारखानों के लिए पूंजीपतियों को चाहिये, उनके यहां और कश्मीर व असम जैसे राज्यों में जहां आफ्स्पा लागू है उनके यहां पुलिस,  फौजी सिपाहियों,  सीमा सुरक्षा बल के जवानों आदि को उन इलाकों में बनाए रखने के लिए विशेष सरकारी अनुदान स्तर प्राप्त है। इन राज्यों के लोकल नागरिकों का कोई स्तर नहीं है। 

यहां कोई भी कानूनी वर्दीधारी किसी भी औरत-लड़की को जकड़-पकड़ कर बलात्कार कर,  मार-काटकर फेंक सकता है। यहां कोई भी आम इंसान नक्सली,  माओवादी, आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। और इनके साथ किया गया किसी भी तरह का दुर्वयव्हार कानूनी कार्यवाही कहलाता है। जिसे पूरे देश को राष्ट्रभक्त बन कर चुपचाप नज़रअंदाज़ करना होता है। 

प्रतीकात्मक चित्र।

आत्महत्या करने वाले शिव सरोज कुमार सरीखे मध्यम वर्गीय तबके और गुंडागर्दी के खिलाफ खड़ी वर्णिका कुंडु और उनके पिता जो टॉप अफसरशाही का सुख भोगते हैं आखि़र इन जैसों को समझने में कितना वक़्त लगेगा कि पैसा-पैसा-पैसा की इस लूट खसोट में सिर्फ दो ही वर्ग हैं। मालिक और मज़दूर। क्यों नहीं इस सच को स्वीकार कर लेते कि आखि़र आप भी मज़दूर हैं। सफे़द कॉलर वाले। जो एक दिन अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर या मालिकों के खिलाफ़ सोचने भर से अकेले असुरक्षा के घेरे में खड़े कर दिए जाएंगे।  

और फिर आप देखने को मजबूर होंगे उनकी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से जिनके खि़लाफ देश सेवा के नाम पर साजिश रचते हुए आपने उम्र गुज़ार दी। पर फिर भी आपके बुलाने पर वो ज़रूर आएंगे। मशीनों की कालिख़ लगे फटे बनियान पहने। मुंह से टपकता मेहनती पसीना पोंछते। वो आदिवासी औरत जो अपने बेटे का पेट भरने के लिए घास की रोटी बनाती है,  तुम्हारी आवाज़ में आवाज़ मिलाने ज़रूर आएगी वर्णिका। जब सायना एनसी सरीखी तथाकथित सभ्य, सत्ता की गुलाम औरतें तुम पर लांछन लगा रही होंगी। माइनॉरिटी और दलित-शूद्र होने के कारण अपमान झेलने वाली तुम्हारे साथ मिलकर मुंहतोड़ जवाब देंगी। क्योंकि तुम भी उन्हीं की तरह एक मज़दूर की बेटी हो। तुम्हें पता होगा ज़रूर सफेद कॉलरों पर लगे,  नज़र न आने वाले दाग़ धोने से नहीं जाते। 

(वीना स्वतंत्र पत्रकार और फिल्मकार हैं और आजकल दिल्ली में रहती हैं।)










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shiv :: - 08-10-2017
System hi cange kerna hoga