विश्व भर में सरकारों के विरोध में खड़ी है जनता: वरवर राव

बदलाव , पंजाब, सोमवार , 28-05-2018


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विशद कुमार

(वरवर राव तेलुगु के प्रसिद्ध कवि और रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष हैं। राव द्वारा अभी हाल ही में पंजाब में दिए गए भाषण का पेश है हिंदी अनुवाद: )

हम बेमकसद मर जाने के लिए नहीं एक मकसद को पूरा करने के लिए जिंदा हैं। आज बीजेपी के सत्ता में आने के बाद देश में क्या हो रहा है? क्या बीजेपी के आने से ही देश में हिंदुत्व की मानसिकता आई है या पहले से ही हिंदुत्व की मानसिकता यहां पर थी। आज बीजेपी के रूप में खास कर मोदी के रूप में या मोदीत्व के रूप में या और आगे जाकर भी कहा जाता है कि मोबामा के रूप में। यह जो अभिव्यक्ति हो रही है इसकी जड़ कहां है? क्योंकि ऐसा नहीं है कि बीजेपी या मोदी के आने से पहले यह देश बहुत धर्मनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक और जनतंत्रवादी था। ऐसा नहीं है कि बीजेपी के आने से ही यह देश बदल गया है। मध्य वर्ग और बुद्धिजीवियों के बीच जो निराशा और उदासी है वह नासमझाी की वजह से है। इसके कारणों को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा। इतिहास में गए बगैर हम बीजेपी और इसके हिंदुत्व को नहीं समझ सकते हैं। जब तक हिंदुत्व को समझेंगे नहीं तब तक इसके विरोध में संघर्ष भी नहीं खड़ा कर सकते हैं।

हिटलर का फासीवाद 1930 के साम्राज्यवादी संकट से गुजर कर आया था। जर्मनी में हिटलर, इटली में मुसोलिनी और जापान में तोजो फासीवाद के नियंता थे। ये तीनों साम्राज्यवादी संकट के आगे रखे हुए प्रतिनिधि थे। 1930 की स्थिति आज फिर से एक बार आई है। जैसा मार्क्स ने कहा था कि इतिहास दोबारा प्रतिबिंबित होता है, यह ट्रेजडिक रूप में आता है। आज उसी ट्रेजडी का दौर आ रहा है।

1930 में साम्राज्यवाद भयानक मंदी में गया था। उससे उबरने के लिए जितने भी रास्ते रूजवेल्ट के नेतृत्व में ढूंढे थे, वह चार बार चुना गया फिर भी हल नहीं कर पाया। तो उससे निकलकर स्पेनिश युद्ध आया था। उससे निकलकर दूसरा विश्वयुद्ध आया था। तब तक अपने संकट से उबरकर बाहर आने के लिए एक हिटलर के रूप में फासीवाद को आगे लाए थे। उस समय में उससे टक्कर लेने के लिए एक समाजवादी सोवियत संघ था। उसके नेतृत्व में पूरी दुनिया के जितने भी फासिस्ट विरोधी लोग थे वह खड़े हुए थे। सोवियत संघ के नेतृत्व में हुए जनयुद्ध में फासीवादी ताकतें हार गई थीं। और लोकतांत्रिक ताकतें उभरकर सामने आई थीं। स्थिति तो वही है पर हमको नेतृत्व देने वाला एक सोशलिस्ट शिविर नहीं है। पर हम सबको यह मालूम है कि उस समय से अगर आज की तुलना किया जाए तो दुनिया भर में लोकतंत्र व समाजवाद जानने वाले 1940 से बहुत आगे बढ़ गए हैं।

इराक युद्ध के समय में ‘‘द हिंदू’’ में एक कार्टून आया था- ‘‘बच्चा अपने पिता से पूछ रहा है कि पूरी दुनिया में जितनी भी सरकारें हैं सब अमेरिका के समर्थन में खड़ी हैं। पर जितनी भी जनता है वह अमेरिका के विरोध में खड़ी है।’’ इसको एकजुट करना है। ऐसा शिविर जहां-जहां है उसको ढूंढना है। हमने 1976 तक चीन में ढूंढ़ा था, 2006 तक नेपाल में भी ढूंढ रहे थे और अभी भी फिलीपींस, टर्की जैसे देशों में साम्राज्यवाद से टक्कर लेने वाले एक जनयुद्ध की तरफ देख रहे हैं।

इस समय पूरी दुनिया भारत की तरफ देख रही है। दंडकारण्य फासीवाद -साम्राज्यवाद -ब्राह्मणीय सामंतवाद से टक्कर लेने वाली एक नई दुनिया बन रही है। जहां एक करोड़ लोग रहते हैं। आदिवासी लोग रहते हैं। क्रांतिकारियों के नेतृत्व में एक जनताना सरकार को बना रहे हैं। सरकार उसे कुचलने के लिए 2006 से ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रही है। पहले तो सलवा जुडूम ने ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह आदिवासियों का दमन किया। महिलाओं के ऊपर अत्याचार, गांव जलाना यह सब होता था। ऐसा सलवा जुडूम के लोग करते थे। बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंट के तहत वहां 3,00,000 पैरामिलिट्री फोर्सेज को भेजा गया है। चाहे बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स, नागा बटालियन, सीआरपीएफ जो भी नाम लीजिए जितने भी पैरामिलिट्री फोर्स हैं उन सबको भेजा गया है। और उनको पूरा मिलिट्री का इंफ्रास्ट्रक्चर दे दिया गया है। इजराइल से लाए हुए मिसाइल का प्रयोग कर रहे हैं। ग्रेनेड प्रयोग कर रहे हैं। सैकड़ों लोगों को मार डाल रहे हैं। फिर भी वहां के आदिवासी लोग उत्पादन में भाग लेते हुए अपनी एक सरकार जहां एक करोड़ जनता रहती है वहां बना लिए हैं। आपके लिए खास बात है कि भारत के इतने बड़े इलाके में लाखों किसान खुदकुशी कर चुके हैं। लेकिन दंडकारण्य में एक भी किसान खुदकुशी नहीं किया है। आप मीडिया और सरकार के भी आंकड़े देख सकते हैं। क्योकि वे एक वैकल्पिक लोकतंत्र बना लिए हैं।

आज बीजेपी के आने से लोकतंत्र पर खतरा है। बीजेपी-आरएसएस हमारी मन:स्थिति को बदलना चाहते हैं। प्रसिद्ध शिक्षाविद पाउलो फ्रेरे बोलकर कहा करते थे कि अब तक हम जो सीखे हैं वह भूल जाना है। अब तक हमें जो सिखाया गया है उसके मुताबिक इस देश को राम से लेकर जितने अवतार हैं उन्होंने बनाया है। या इस देश को नेहरू से लेकर प्रकाश सिंह बादल जैसे शासकों-राजनेताओं ने बनाया है। हमें कोई यह नहीं बताता कि इस देश को इस देश की जनता ने बनाया है।

वैसे ही इस देश को अगर शासन देना है तो एक संसद बनाना है। उस संसद में बैठे हुए लोग ही देश को चलाते हैं, शासन करते हैं। 121 करोड़ जनता का काम सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देना है। बस लोकतंत्र बन गया और इसको लेकर बहुत चर्चा चलती है। लेकिन लोगों के जीवन में जो लोकतंत्र होता है, जो संस्कृति में लोकतंत्र होता है, आपस में जो लोकतंत्र होता है, गांव में रहने वाले लोगों में जो इंसानियत के संबंध होते हैं। इसको हम नहीं समझते हैं। यानी इस दिए हुए पार्लियामेंट्री फ्रेमवर्क से बाहर हम नहीं सोचते हैं। 

हम खुद अपने ऊपर एक सरकार को लाकर रख लिए हैं। और यह मनःस्थिति बन गई है कि ये सरकार हमें चलाएगी। इससे बाहर आ करके अपना राज हम ही चला सकते हैं। अपनी चीजें हम खुद ही तय कर सकते हैं। जमीनी स्तर से, गांव के स्तर से हमको जो चाहिए वह हम तय कर सकते हैं। जितने भी आदिवासी इलाके की जमीन है। वे बांट लिये हैं। कोई भी आदिवासी परिवार नहीं है दंडकारण्य में जिसके पास जमीन नहीं है।

सौ साल पहले ब्रिटिश काल में 10 फरवरी को गुंडाधूर के नेतृत्व में भूमकाल क्रांति आई। वैसे तो बहुत आदिवासी इतिहास सुनते हैं आप सिद्धू, कान्हू, बिरसा मुंडा आदि। उन्होंने कहा अपना गांव में अपना राज। वे राजाओं के खिलाफ भी लड़े हैं, ब्रिटिश के खिलाफ भी लड़े हैं। और फांसी पर चढ़े हैं। लंबे समय से आदिवासी पूंजी के विरोध में संघर्ष कर रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। 500 सालों से लड़ रहे हैं। कोलंबस के समय से, भारत में वास्कोडिगामा के समय से वे साहस से लड़े हैं मगर हार गए थे। लेकिन पहली बार भारत में ही ऐसे संघर्ष को नक्सलबाड़ी में आदिवासी के संघर्ष को एक विश्व दर्शन और सिद्धांत का नेतृत्व मिला। तब से लेकर वह आदिवासी संघर्ष चला रहा है। इसलिए तो साम्राज्यवाद सामंतवाद इस संघर्ष को मिटा नहीं पा रहा है।

                                                                                               (जारी... )








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Deepak Rishi :: - 05-29-2018