संसद नहीं सड़क ही बदलाव का असली रास्ताः वरवर राव

बदलाव , पंजाब, मंगलवार , 29-05-2018


varvarrao-cpimoist-parliamentrydemocracy-narendramodi-indiragandhi-fasim

विशद कुमार

(वरवर राव तेलुगु के प्रसिद्ध कवि और रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष हैं। राव द्वारा अभी हाल ही में पंजाब में दिए गए भाषण का पेश है अंतिम कड़ी :)

हमारा मानना है कि वास्तविक लोकतंत्र क्रांति के बाद आता है। वह कोर्ट और संसद से आने वाला बुर्जुआ लोकतंत्र नहीं होता। बुर्जुआ लोकतंत्र का भी आप इतिहास पढ़ सकते हैं बहुत शोध हुआ है। औद्योगिक क्रांति और फ्रांस की क्रांति के बाद बुर्जुआ लोकतंत्र भी आना मुमकिन नहीं है। इंग्लैंड और फ्रांस दो ही देश हैं जहां सामंतवाद को ध्वस्त करके पूंजीवाद आया है। रूल ऑफ लॉ की बात इंग्लैंड में हो सकती है। समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की बात फ्रांस में हो सकती है। पूंजी आगे जाकर एक एकाधिकार बनाती है। एक साम्राज्यवाद बनता है। तो कहीं भी साम्राज्यवाद बुर्जुआ लोकतंत्र को नहीं आने देता है। 1857 में हमें यही अनुभव हुआ। हमारे यहां तो इसको ब्राह्मणीय सामंतवाद से समर्थन मिला है। कुछ लोग ब्राह्मणवाद कहते हैं। कुछ लोग सामंतवाद कहते हैं। मगर भारत में जो है वह ब्राह्मणीय सामंतवाद है।

राम के समय से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक इस देश में जो चला है वह ब्राह्मणीय सामंतवाद है। उसकी रक्षा करने के लिए ऋषि व क्षत्रियों के बीच में  तालमेल रहा। क्षत्रिय राज को निभाने के लिए ब्राह्मण यज्ञ करते हैं। क्षत्रिय लोग ऋषियों को सैकड़ों एकड़ जमीन देकर उनको संरक्षण देते हैं। जो भी पौराणिक ग्रंथ पढ़िए एक-एक ऋषि के पास सैकड़ों एकड़ जमीन रहता है। एक तरफ तो वह संन्यासी है और दूसरी तरफ इतनी सुविध-संपन्नता। सामंतवाद जो दमन चक्र चलाता है उसके समर्थन में एक बौद्धिक वर्ग तैयार रहता है। आज हम जिसे नौकरशाही कहते हैं वह सरकारी दमनचक्र के समर्थन में खड़ा है।

आज भी सरकार  विशेष आर्थिक क्षेत्र बना रही है,भूमि अधिग्रहण कानून के माध्यम से उसी समय की तरह जमीन देने की बात कर रही है। पुराणों के राम ने भी तो जंगल में जाकर आदिवासियों को मार डाला है राक्षस के नाम पर। बस फर्क इतना है कि उस समय वे दंडकारण्य से होकर श्रीलंका गए थे। आज भी सरकार श्रीलंका से होते हुए दंडकारण्य में आयी है। 

यानी यह ब्राह्मणीय सामंतवाद ईस्ट इंडिया कंपनी के आने और 1857 होने के बाद साम्राज्यवाद का दलाल बन गया है। अंग्रेज लोग भी यह सीख लिए कि इंग्लैंड में जो प्रयोग किए हैं या फ्रांस में जो प्रयोग किए हैं कि सामंतवाद को ध्वस्त करके पूंजीवाद ला सकते हैं। यह भारत में नहीं चलेगा। अंग्रेजों ने 1857 में यह तय कर लिया कि हम रियासतों से युद्ध नहीं मित्रता करेंगे।  

राजा-महाराजाओं को दोस्त बनाएंगे, यह हमारे दलाल बनेंगे और बना लिया है। वे लोग भी सोचे कि हमें अंग्रेजों से टक्कर नहीं लेना है दोस्ती करना है। राजाओं ने यह समझ लिया था कि हमारा जो ब्राह्मणीय सामंतवाद है उसको यह खत्म करने वाला नहीं है बल्कि उसको नए ढंग से निभाने वाला है। तब तक तो भारत की पूरी जनता, जो लड़ी हैं वर्दी पहनकर वह सब किसान के बेटे थे। मार्क्स पहला आदमी है जो कहता है 1857 का युद्ध पहला स्वतंत्रता संग्राम है। बाद में अंग्रेजों ने किसानों को हिंदू-मुस्लिम में बांट दिया है। भारत की जनता कभी भी अपने आपको हिंदू मुस्लिम नहीं समझी। अपने आपको किसान समझी या अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाली समझी है। 

पंजाब से अमेरिका, कनाडा गए लोगों ने साम्राज्यवाद के विरोध में गदर पार्टी का गठन किया। सबसे पहले जो क्रांति की कोशिश हुई है वह पंजाब में हुआ है। गदर पार्टी आयी और एक सतत संघर्ष चलाया है। लोग या जनता चाहे तो संघर्ष के स्वरूप के बारे में कोई हिचकिचाहट नहीं हो सकती है। तलवार लेकर भी लड़ भी सकते हैं। ऐसा नहीं है कि पार्लियामेंट्री फ्रेमवर्क में ही संघर्ष बना रहेगा। 

आज भी हिंदू समाज के लिए पहला संविधान मनुस्मृति है। अम्बेडकर का संविधान तो सिर्फ पढ़ने व देखने के लिए है। आज आरएसएस वाले मनुस्मृति को मान रहे हैं। आरएसएस बीजेपी कहती है कि हिंदुस्तान में रहने वाला हिन्दू ही हो सकता है। जितने भी हिंदुस्तान में लोग है वे सब हिन्दू है। मुस्लिम हो, सिख हो, ईसाई हो वे सब धर्मांतरित हैं। और फिर वे कहते है कि ‘‘घर वापसी’’ कराओ। 

आइये अपने घर आइये, आप हिन्दू हैं हिंदुस्तान में आइये। ये सिर्फ धर्म की बात नहीं करते ये हिन्दू राष्ट्र की बात करते है। हिंदुस्तान एक देश है हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दू है। ऐसा सिर्फ बीजेपी नहीं कह रही है,इसके पहले इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही कहा था। एक देश, एक पार्टी, एक नेता की बात होती रही है। जिस आदिवासी का कोई धर्म ही नहीं है उसे कहते हैं कि तुम हिन्दू हो। ये भावना फिर से उभरकर आ रही है। 

बीजेपी लोग भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाना चाहते हैं। पहली बार नहीं हो सका है दूसरी बार कोशिश कर रहे हैं। इंदिरा गांधी ने भी वही किया था 1975 में। मैं इसलिए कह रहा हूं कि ये सिर्फ मोदी की बात नहीं है। यह बात जो साम्राज्यवाद सामंतवाद की सोच विचार के शासक हैं उसकी समस्या है। 

दंडकारण्य में जो जनताना सरकार चल रही है। 2007 में दो पार्टियों की एकता हुई। ऐलान किया गया कि आम जनता के सामने दो मुद्दा है। एक साम्राज्यवाद दूसरा, ब्राह्मणीय हिंदुत्व का शासन। इसके खिलाफ  हथियारबंद संघर्ष खड़ा किया जाए। ब्राह्मणीय हिंदुत्व का जोर देश में पहली बार नहीं है। 1947 में हिंदुत्व की अभिव्यक्ति बहुत जोर से दिखा। देश विभाजन के समय बहुत दंगे फसाद हुए। मैंने कल ही सुना था कि पंजाब में 12,00,000 लोग मारे गए थे। हजारों महिलाओं के ऊपर अत्याचार हुआ है। परिवार बांटा गया है पाकिस्तान और भारत में। 1947 के बाद 1984 में बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ।

इंदिरा गांधी ने अमृतसर स्वर्ण मंदिर के ऊपर सेना का हमला करवाया है। अब यह बात जब तक आप राज्य के विरोध में नहीं सोचते हैं तो इस खतरे में हम फंस जाएंगे। हमारे साथ तेलंगाना में ये हुआ है। तेलंगाना में जब कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसान मजदूर लोग सशस्त्र संघर्ष में थे। 3,000 गांव में 10 लाख एकड़ जमीन को मुक्ति करके एक तरह के राज्य बनाए थे। उस समय 1947 में जब दिल्ली में राज्य बना तो नेहरू-पटेल निजाम-नवाब का बहाना लेकर तेलंगाना में सेना को भेजा था।

आज संसदीय इतिहास को देखा जाए तो एक बार फिर इतिहास का दोहराव हो रहा है। 1984 में स्वर्ण मंदिर के ऊपर हमला हुआ था। दिल्ली और आसपास में 31 अक्टूबर से लेकर 3 नवंबर तक हजारों सिख मारे गए थे। वही 1984 के 7 दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी हुआ। जिसमें 3,000 लोग मर गए। उसी समय राजीव गांधी के शासनकाल में बाबरी मस्जिद का दरवाजा खोल दिया गया हैं। क्योंकि वहां रामलला की मूर्ति मिली है। 1885 में ही ह्यूम के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी बनी है। उस कांग्रेस पार्टी में अगर कोई राष्ट्रीय पूंजीपति था तो वो एक ही दादाभाई नौरोैजी थे, जो बाद में कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1985 में राजीव गांधी मुंबई में जाकर कहते हैं कि मैं इस देश को 21वीं सदी में ले जाऊंगा। ये है हमारी 21 वीं सदी। यानी मेरा कहना है कि जो मोदी राज में आया है वो राजीव गांधी का एक और अवतार है। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने सभी संगठन को बैन कर दिया। देश में 1,50,000 लोग इमरजेंसी के समय जेल में थे।  

आज आप गढ़चिरौली या दंडकारण्य में जाकर देखिए यही बात माओवादियों के साथ भी हो रहा हैं। यही बात वहां के आदिवासियों के साथ भी हो रहा है। आदिवासियों के गांव जला रहे हैं,आदिवासी  महिलाअों के ऊपर पैरामिलिट्री फोर्स अत्याचार कर रही है।   

इमरजेंसी ने पहली बार मूलभूत अधिकार का उल्लंघन किया। उस समय संजय गांधी ने फैमिली प्लानिंग लागू किया। दूसरा, नगरों के सुंदरीकरण के नाम पर मजदूरों के झोपड़पट्टी पर ट्रक चलाकर पूरी की पूरी बस्ती को खत्म कर दिया गया। सुंदरीकरण के नाम से पहली बार 1975 में जो हुआ वह आज पूरे देश में चल रहा है। आज तो इतना विस्थापन हो रहा है कि कहो ही मत। झोपड़पट्टी का, मजदूर लोगों का, बस्तियों का, आदिवासियों का, दलितों का विस्थापन हो रहा है। सरकार मतलब कंपनी को जमीन चाहिए।

सभी पार्टी कंपनी की दलाल बन के रह गई हैं। यह कंपनी  अडानी, अंबानी, टाटा और वेदांता का हो सकता है। पहले मनमोहन सिंह और अब नरेंद्र मोदी पूरी दुनिया में घूमकर भारत प्राकृतिक संसाधनों का सौदा कर रहे हैं। बाहर के जितने भी मल्टीनेशनल कंपनी हैं, इनको बेचने के लिए आमंत्रण दे रहा है। सेना में निजीकरण की बात चल रही है। रेलवे के निजीकरण की बात हो रही है। पूरे जमीन को बेचने लिए भूमि अधिग्रहण कानून ला रहा है। देश को बेचने वाले आदिवासी लोग है या देश को बेचने वाले आज जो शासन में बैठे हैं वे लोग है? ये सोचना होगा। आज फासीवाद के विरोध में जैसे 1930 में सभी लोकतांत्रिक ताकतें इकट्ठा हुई थी, वैसे ही आजएक अवसर है।   देशभक्त, लोकतांत्रिक, हिंन्दुत्व विरोधी, क्रांतिकारी, धर्मनिरपेक्ष इन सबको इकट्ठा होकर इसके विरोध में लड़ना है।   

मनमोहन सिंह सरकार ने कहा था कि 12 राज्यों में माओवादी हैं। इसलिए तो 3,00,000 सेना को छत्तीसगढ़ में भेजा गया। पूर्व और मध्य भारत के आदिवासी और जंगल में पैरा मिलिट्री फोर्सेज का शासन चल रहा है। कहां है डेमोक्रेसी? कहां रूल ऑफ लॉ है?

हम 2006 में जो रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाये है। हमारा कार्यक्रम ये है कि आप जो डेमोक्रेसी समझते हैं, जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी समझते हैं, वो डेमोक्रेसी नहीं है। वो साम्राज्यवाद और सामंतवाद की एक तानाशाही होती है। उसके विरोध में जनता का क्रांति से एक जनतंत्र बन रहा है, नीचे से बन रहा है, जमीनी स्तर से बन रहा है। आदिवासी, दलित लोग बना रहे है। किसान मजदूर लोग बना रहे हैं। महिलाएं बना रही हैं। अल्पसंख्यक बना रहा है। ये क्रांति से ही जनतंत्र बनेगा। ये प्रचार करने के लिए हम रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाए हैं। इसलिए आज जो पार्लियामेंट में बैठे हैं, शासन में बैठे हैं। तो मोदी को देखकर डरने की कोई बात नहीं है। मोदी तो एक विशेष अभिव्यक्ति है। .. क्योंकि वैसे तो मुट्ठी भर का शासन है हम तो एक सौ बीस करोड़  मेहनतकश जनता हैं। काम करने और हथियार लेने के लिए यह हाथ भी है। तो ऐसे संसदीय फ्रेमवर्क से जो बाहर चल रहा है इसके बारे में सोचिए। दंडकारण्य में जो हो रहा है वहां आकर खुद देखिए!  

                                   (समाप्त)  

 








Tagvarvararao narendramodi indiragandhi dandakaranya pwgmoist-revolution

Leave your comment