वीर नारायण की शहादत: छत्तीसगढ़ का एक राजा जिसे बीच चौराहे पर तोप से उड़ाया गया था

पुण्यतिथि पर विशेष , रायपुर, सोमवार , 10-12-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजों ने शहीद वीरनारायण सिंह को रायपुर में और राजा शंकरशाह व कुंवर रघुनाथ शाह को जबलपुर में तोप से उड़ाकर उनकी जान ली थी। और यह भी सत्य है कि ऐसी शहादत और किसी की नहीं ली गई है ये गोंडवाना के शेर, गोंडवाना के सपूत और आदिवासी समाज के गौरव पहले भी थे और आज भी हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि आजादी के दौरान आदिवासियों की शहादत को इतिहासकारों और कलमकारों ने कलमबद्ध किया। और न ही कभी उन्हें शहीदों की सूची में स्थान दिया। औऱ न ही उन्हें कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया गया। 

इसीलिये आजादी के आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष करते हुए शहादत का वरण करने वाले आदिवासियों को इतिहास में न तो सम्मान मिला और न ही आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें वो दर्जा दिया। इसके पीछे क्या कारण रहे ये भी अलग से शोध का विषय है। लेकिन इससे पिछली सरकारें अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती हैं। 

शहीद वीरनारायण सिंह को सबके सामने रायपुर स्थित जय स्तम्भ के भरे चौराहे पर 10 दिसम्बर 1856 को तोप से उड़ा दिया गया था। उसके बाद उनके अंग-भंग शरीर को चौक में लटका दिया था। और फिर नौ दिनों तक लटकाए रखे जाने के बाद 19 दिसम्बर को उतारकर उनके परिजनों को सौंपा गया था। रायपुर के भरे चौराहे पर 10 दिनों तक उसे सिर्फ इसलिये लटकाकर रखा गया ताकि कोई और शख्स इस तरह अंग्रेजों के खिलाफ सर ऊंचा करने की हिम्मत न कर सके। लेकिन अंग्रेजों का मंसूबा नाकाम हो गया।

उसका नतीजा ये हुआ कि इसे देखकर देश की जनता अंग्रेजों के प्रति रोष से भर गयी और लोग उग्र हो गये। भारतीयों में आजादी की ललक और अधिक बलवती हो गयी। इसके साथ ही पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की शुरूआत हो गयी। और फिर उसी चिंगारी का नतीजा था कि तब से अंग्रेजों के खिलाफ शुरू हुआ अभियान 100  साल बाद 1947 में आजादी के तौर पर सामने आया। ये सब कुछ इन्हीं देशभक्तों के बलिदान की बदौलत संभव सका। 

छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद बलौदा बाजार जिला में स्थित सोनाखान रियासत के जमींदार शहीद वीरनारायण सिंह ने सन 1856 में ही अंग्रेजों के खिलाफ जन, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा के लिए क्रांन्ति का बिगुल फुक दिये थे। आज से 162 साल पहले सोनाखान रियासत में घोर अकाल पड़ गया था। वहां की प्रजा दाने-दाने को मोहताज हो गई थी। शहीद वीरनारायण सिंह ने अपनी रियासत की गोदामों से जमा सभी अनाज को निकलवाकर आम जनता में बांट दिया था। इसके बावजूद अनाज की कमी के चलते लोग भूखों मरने के लिए मजबूर थे। माताओं के स्तन से दूध सूखने लगे। जिसके चलते छोटे-छोटे बच्चे भूख के कारण तड़प-तड़प कर मरने लगे । शहीद वीरनारायण सिंह से जनता की यह दुर्दशा देखी नहीं जा सकी।

उन्होंने आदेश दिया कि जिन लोगों ने भी अनाज जमा कर रखा है वो लोग जरूरतमंद जनता को उसे उधार के तौर पर दे दें। और नई फसल आने पर ब्याज समेत उसे वापस कर दिया जायेगा। सभी लोगों ने वीरनारायण सिंह के आदेशों का पालन करते हुये अपनी क्षमता के मुताबिक जनता की मदद की। लेकिन इतने अनाज से भी कुछ नहीं हुआ। उस समय कसडोल में अंग्रेजों का पिट्ठू एक बड़ा व्यापारी था जो मुनाफा कमाने की लालच में सबसे ज्यादा अनाज जमा कर रखा था। उसने अनाज देने से साफ इंकार कर दिया।

वीरनारायण सिंह को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने प्रजा की भूख को मिटाने के लिये उससे निवेदन करने गए। और जनता को अनाज देने पर ब्याज समेत वापस लौटाने की पेशकश की। लेकिन व्यापारी ने अनाज देने से स्पष्ट इंकार कर दिया। बार-बार निवेदन का भी उस पर कोई असर नही पड़ा और इधर भूख से जनता में त्राहि-त्राहि मची थी। फिर वीर नारायण सिंह ने उससे जबरन अनाज छीनकर जनता में उसे बांट दिया।

व्यापारी ने इसकी शिकायत रायपुर में अंग्रेजों को भेज दी। अंग्रेज पहले से ही वीरनारायण से नाराज थे क्योंकि लगातार अंग्रेजों के खिलाफ वीरनारायण सिंह छापेमार शैली में स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंकते रहते थे। इस घटना के बाद दोनों पक्षों में आर-पार की लड़ाई शुरू हो गई। लगातार सोनाखान क्षेत्र में अंग्रेजों ने कई आक्रमण किये लेकिन प्रत्येक आाक्रमण का वीरनारायण सिंह मुंहतोड़ जवाब देते रहे। वीरनारायण सिंह को हराना असंभव था क्योंकि उनके साथ उनकी जनता और खुद उनके अपने प्रशिक्षित सैनिक थे। जो अपनी जान पर खेलकर उनका साथ दे रहे थे।

अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ से अपनी जमीन खिसकती दिख रही थी और जनता में स्वतंत्रता की आस लगातार बलवती होती जा रही थी। अंग्रजों ने बाजी हाथ से निकलती देख फिर कूटनीतिका सहारा लिया और वीरनारायण सिंह के चचेरे भाई को प्रलोभन देकर अपने जाल में फंसा लिया। अंग्रेजों द्वारा सोनाखान क्षेत्र की जनता को भयंकर प्रताड़ना दी जाने लगी। वहां लोगों के घरों में आग लगायी जाने लगी।

परिणाम यह हुआ की सोनाखान के पहाड़ में चोरी-छिपे जाकर अंग्रेजों ने भीषण संघर्ष के बाद वीरनारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें सेन्ट्रल जेल रायपुर में लाकर बन्द कर दिया। अंग्रेजों के लिये यह बहुत बड़ी कामयाबी थी। वीरनारायण सिंह को सबके सामने भरे चौराहे पर सरेआम जय स्तम्भ चौक रायपुर में 10 दिसम्बर 1856 को तोप से उड़ाकर उनके अंग-भंग शरीर को चौक में लटका दिया था और 19 दिसम्बर 1856 को उसे उतारकर उनके परिजनों को सौंपा गया था।

 








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