वीर अब्दुल हमीद:जब दसियों पैटन टैंक पर भारी पड़ा एक सैनिक का जज्बा

स्मृति , , सोमवार , 10-09-2018


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गौतम राणे सागर

वीर अब्दुल हमीद के शौर्य और अदम्य साहस के समक्ष राष्ट्र आज भी  कृतज्ञ और श्रद्धा से नतमस्तक है। देश-भक्ति का ज़ज़्बा, मातृभूमि की रक्षा का संकल्प, वीर अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र विजेताओं में ध्रुव तारा बनाता है। वैसे आकाश में तारे बहुत होते हैं परंतु ध्रुव तारा एक ही होता है और अपना अस्तित्व अलग रखता है। वीर अब्दुल हमीद की शहादत सबसे अलग है। देश की हठी दुश्मन सेना पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने का करतब 1965 के युद्ध में यदि वीर अब्दुल हमीद ने नहीं दिखाया होता तो शायद देश को भारी नुकसान के साथ-साथ शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ती। वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तानियों को बता दिया कि हम भारत में इत्तेफ़ाक़ से नहीं अपनी पसंद से हैं। देश की तरफ उठने वाली हर कुदृष्टि को दृष्टिहीन बनाने के लिए भारत का मुसलमान ही पर्याप्त है।

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर अपना क़ब्ज़ा चाहता था विभाजन के तुरंत बाद 1947-48 में भारत पर आक्रमण कर दिया। दावों को पुष्ट माना जाए तब ब्रिटिश सरकार भी उनके साथ थी। इसके बावजूद पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। जिसकी टीस पाकिस्तान को मीठा-मीठा दर्द देती रहती थी। 

1962 में भारत ने चीन से युद्ध लड़ा और पराजय के साथ अपनी सीमा की 82000 वर्ग किलोमीटर भूमि गंवा बैठा। यह जवाहरलाल नेहरू के अकुशल रणनीति और कूटनीति का परिणाम था। 1964 में नेहरू की मृत्यु हो चुकी थी। पाकिस्तान तुच्छ प्रेरणा और अमेरिका से मिले पैंटन टैंक, सुपर सोनिक फाइटर और सैबर जेट ने पाकिस्तान को दंभी और उदण्ड बनने पूरी मदद की। चीन से मिल रही मदद ने जनरल अयूब खान को एक बार फिर भारत से कश्मीर हथियाने को प्रेरित किया।

9 अप्रैल 1965 को पाकिस्तान ने कच्छ के रण में सीमा पुलिस की एक चौकी सरदार पोस्ट पर एक ब्रिगेड लेकर हमला किया और उसे तहस-नहस कर डाला। प्रतिरोध में स्थिति का जायजा लिए बगैर भारत ने एक छोटी टुकड़ी भेजी। जिसे मेजर जनरल टिक्का खान ने अमेरिका से मिले पैंटन टैंको के सहारे आसानी से पराजित कर दिया।

5 से 10 अगस्त 1965 के दरम्यान भारतीय सैनिकों ने कश्मीर में घुसपैठियों का एक भारी जमावड़ा देखा। इन जत्थों ने कुछ भारतीय चौकियों को नष्ट कर दिया और कुछ को खाली करा लिया। पाकिस्तान "ऑपरेशन जिब्राल्टर" के नाम से अपना अभियान जारी रखे था। 3 सितंबर 1965 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव ऊ थांट को पाकिस्तान घुसपैठियों से प्राप्त दस्तावेज़ बतौर सबूत पेश किया, और हाजी पीर तथा पीर साहिबा ठिकानों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया। इस घटना ने दोनों सेनाओं को युद्ध की मानसिकता के लिए तैयार कर लिया।

8 सितंबर 1965 से युद्ध का माहौल गरमाने लगा था। असल उत्तार पर 4 ग्रेनेडियर रेजिमेंट के हवलदार अब्दुल हमीद को वहां तैनात किया गया था। आदेश था कि यह आरसीएल गन्स की बटालियन के साथ वहां पहुंचे। याद रहे कि अब्दुल हमीद ने अपनी ट्रेनिंग के दौरान महु में आरसीएल के इस्तेमाल के कोर्स में अपनी दक्षता से सिद्ध की थी। 

बटालियन अपने ठिकाने इद्दुगिल केनाल पर 8 सितंबर 1965 को आधी रात को पहुंची थी और उसने जवानों के लिए खाइयां खोदने शुरू कर दी थी। खाइयां पर 3 फुट गहरी खुद पाई थी उन्हें ऊपर ढकने की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी । वैसे गन्ने के खेतों के बीच में होने की वजह से उन्हें छुपाने की आवश्यकता नहीं थी।

सुबह 9 बजे तक पाकिस्तान के पैटन टैंकों का दस्ता सड़क पर फैल गया। इस पर ग्रेनेडियर एकदम तैयार हो गए। आगे वाला टैंक सिर्फ 30 गज के फासले पर रह गया था कि अब्दुल हमीद ने उस पर हमला करके उस टैंक को नष्ट कर दिया। अचानक हुए हमले से घबराकर दो टैंको के सैनिक अपने-अपने  टैंक छोड़कर भाग गए। दुश्मन दूसरे हमले के लिए सशस्त्र सेना का दस्ता लेकर पहुंचा और ज़बरदस्त बमबारी शुरू कर दी।

पुनरावृत्ति करते हुए अब्दुल हमीद ने एक और टैंक को अपना निशाना बनाकर बर्बाद कर दिया। इस बार भी दो टैंकों के सैनिक टैंक छोड़कर फ़रार हो गए। अभी तक अब्दुल हमीद छः टैंकों को नष्ट कर चुके थे। दुश्मन के पास सैनिकों का ज़बरदस्त जमावड़ा था। उसकी सेना कहीं से भी कमतर नहीं थी। सैनिकों का मनोबल बेहद बुलंद था। दुश्मन आर सी एल गन से लड़ रहा था। जिसके अब्दुल हमीद पुरोधा थे।

10 सितंबर 1965 को सुबह 7:30 बजे एक टैंक सड़क के बीच में खड़ा था और दो सड़क के दोनों किनारे पर एक दूसरे से 200 गज के का फासले पर खड़े थे। सतर्कता बरतते हुए अब्दुल हमीद ने एक और टैंक तबाह कर डाला। करीब आधे घंटे बाद दुश्मन ने हमला करने की कोशिश की परंतु यह भी हमीद का निशाना बन गया। हमीद की आरसीएल गन एक खुली जीप पर थी।

मुस्तैदी और सतर्कता की वजह से वह अब तक बचे हुए थे इसी बीच हमीद की निगाह में दुश्मन का एक और टैंक आया परंतु हमीद भी दुश्मन की निगाहों में आ चुके थे। यह सब इतना अचानक हुआ कि हमीद के पास घूम कर बच निकलने का समय ही नहीं था। इसलिए इन्होंने अपनी आरसीएल गन निकाली और निशाना दाग दिया। निशाना दुश्मन ने भी धागा और कंपनी क्वार्टर मास्टर अब्दुल हमीद PVC अपने जौहर दिखाते हुए शहीद हो गए। इस तरह 1 जुलाई 1933 को गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में जन्म लेने वाले अब्दुल हमीद 27 सितंबर 1954 में 4 ग्रेनेडियर में भर्ती हुए। देशभक्ति के जज्बे का नायाब मिसाल कायम करते हुए 10 सितंबर 1965 को वीरगति को प्राप्त हो गए । अश्रुपूरित नयनों से राष्ट्र का अतुलनीय शौर्य को नमन !  

                            (गौतम राणे सागर संविधान संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं। ) 

 








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