अनूठी थी वी शांताराम की दृष्टि

सिनेमा , , शनिवार , 18-11-2017


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दिनेश श्रीनेत

बचपन में देखी गई तमाम अप्रतिम फिल्मों में से एक थी 'दो आंखें बारह हाथ'। मैंने होश संभालने के बाद थिएटर में जाकर पहली ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म देखी थी। उन दिनों इलाहाबाद के कुछ सिनेमाघरों में सन 40 और 60 के दशक की फिल्में दिखाने का चलन था। देव आनंद, राज कपूर की पुरानी फिल्में अक्सर झंकार सिनेमा में सुबह के शो में लगती थीं।

गांधी को समझने के लिए शायद शांताराम की 'दो आंखें बारह हाथ' सबसे बेहतर फिल्म है। ऐसी फिल्म आज तक नहीं बनी जो विचार की ताकत सिनेमा के पर्दे पर इतने सशक्त तरीके से रख सके। एक जेलर छह क्रूर हत्यारों को बेहतर इनसान बनाना चाहता है। एक ऐसा विचार जिसके सब खिलाफ हैं सिवाय आपके नायक को छोड़कर। यहां तक कि बतौर दर्शक आप भी। क्योंकि हमने अपने व्यावहारिक जीवन में ऐसा होते हुए कभी नहीं देखा है। वह विचार है किसी इनसान के बदल जाने का, ह्रदय परिवर्तन का, इनसान की बुनियादी अच्छाई पर यकीन का। मगर जैसै-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है आप बतौर दर्शक अपने नायक की जिद का सम्मान करने लगते हैं। उनकी हताशा पर दुखी होते हैं। उस विचार पर यकीन करने लगते हैं जिसके लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

तकनीकी रूप से वह एक शानदार फिल्म थी। कैमरा, अद्भुत फ्रेम, मूविंग शॉट्स, एडिटिंग, ध्वनि का प्रभाव सब कुछ शानदार- आज के निर्देशकों के काम पर भारी पड़ने वाला। वी शांताराम को थिएटर और संगीत की गहरी समझ थी। इस फिल्म में कैदियों की हाथों की छाप का जबरदस्त प्रतीकात्मक इस्तेमाल किया गया है। इस फिल्म की एक खूबसूरत लोरी में हवा में हिलते खिड़की के पल्ले से संगीत पैदा करने का अद्भुत प्रयोग है। हर दृश्य अपने में सिनेमा की टेक्स्टबुक के चैप्टर जैसा है।

वी शांताराम मेरे लिए एक अद्भुत निर्देशक बन गए। उनकी बाद की ज्यादातर फिल्में मैंने दूरदर्शन पर देखीं। एक और अद्भुत प्रेम कहानी थी 'सेहरा'। दो कबीलों की नफरत के बीच प्रेम की इस जानी पहचानी कहानी में उनकी पत्नी संध्या नायिका थीं। इसके गीतों का फिल्मांकन आज भी विस्मित कर देता है। 'पंख होते तो उड़ आती रे...' में मिलने के उत्कट आवेग को जिस तरह से ऊंचे स्वर के आलाप और परिंदे के हावभाव को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है वह भारतीय सिनेमा में अनूठा है। इसके अलावा 'तुम तो प्यार हो..' और 'जा जा जा रे, तुझे हम जान गए' का फिल्मांकन भी देखने लायक है।

शांताराम की फिल्मों में बहुत ही स्पष्ट सामाजिक सरोकार और संदेश होते थे। मगर थोपे हुए नहीं कहानी और फिल्म में आंतरिक रूप से गुंथे हुए। 'पड़ोसी' फिल्म इसका बेहतर उदाहरण है। इसमें पंडित का रोल मजहर खान नाम के अभिनेता ने किया था और मिर्जा का रोल गजानन जागीरदार ने किया। सिनेमा एस्थेटिक्स के लिहाज से भी शांताराम की फिल्में अनूठी होती थीं। उनकी नायिकाएं सिर्फ सुंदर नहीं थीं, वे अपना अलग अस्तित्व और व्यक्तित्व लेकर आती थीं। 'सेहरा' की नायिका एक टॉम ब्वाय थी। 'दुनिया न माने की' नायिका अपनी संवेदनशीलता के बावजूद विद्रोही थी। 'आदमी' की नायिका भी फिल्म में निर्णायक भूमिका निभाती है। 'स्त्री' शकुंतला के जीवन को अलग तरीके से प्रस्तुत करती है, उसे एक इंतजार करने वाली प्रेमिका की जगह सशक्त स्त्री के रूप में लेकर आती है।

'डाक्टर कोटनिस की अमर कहानी' में वी शांताराम ने एक अनूठा प्रयोग किया है। फ्लैशबैक के दिखाने के लिए साउंड का इस्तेमाल करना। यह प्रयोग रंगमंच से प्रभावित है मगर वे सिनेमा की समझ के साथ ही ये सारे प्रयोग करते थे। बहुत कम लोगों को पता होगा कि 1936 में आई 'अमर ज्योति' वेनिस फिल्म महोत्सव में दिखाई जाने वाली पहली फिल्म थी। 'दो आंखे बारह हाथ' को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बीयर मिला था।

पिछले कुछ समय से गूगल डूडल एक बड़ा काम कर रहा है, जो शायद हम अपने इतिहास और संस्कृति को विकृत करने की प्रक्रिया में करने के काबिल भी नहीं रहे। पिछले कुछ समय से गूगल ने अपने डूडल के जरिए उन लोगों को याद किया है जिन्होंने कला, संस्कृति अथवा सामाजिक परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाई मगर हमने उन्हें लगभग विस्मृत कर दिया है। चाहे वो अब्दुल कवि देसनवी हों, अनुसुइया साराभाई हों या कारनेलिया सोराबजी। इसी कड़ी में एक अहम नाम वी शांताराम का है। अब शायद ही कोई भारतीय सिनेमा के इस महान निर्देशक की चर्चा करता है। शायद इसलिए भी कि बतौर निर्देशक, बतौर कलाकार उनका विशाल कद बहुत से बौद्धिक और सांस्कृतिक संस्थानों के वैचारिक खांचे में फिट नहीं बैठता - न वाम खेमे के और न दक्षिण के।

(दिनेश श्रीनेत इकोनामिक टाइम्स डॉट कॉम में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 










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