सरदार पटेल की मूर्ति के साथ यह कैसा मज़ाक?

विशेष , विचार, रविवार , 29-10-2017


what-a-joke-with-Sardar-Patel-statue

रमा शंकर सिंह

अब जब यह विराटमूर्ति सरदार सरोवर के मानवनिर्मित टापू पर लग जायेगी तो मानना पड़ेगा कि सरदार ऐसे ही थे, ऐसे ही दिखते थे और इसी मुखमुद्रा से उनके बारे में लोग सोचेंगे। इतने ही झुँझलाहट भरे, नथुने फुलाये,  बीमार से,  कुछ कुछ कनफ्यूज जैसे होंगे,  पर लौहपुरुष का भाव किसे दिख रहा है?  यहां तो लोहे को भी गंदा पीला सुनहरा जैसा दिखा रहे हैं। 

क्या राजनेता और नौकरशाह ही महापुरुषों की मुखमुद्रा तय करेंगे?

मान लिया कि राजनेताओं और नौकरशाहों को मूर्तिशिल्प की जानकारी होना आवश्यक नहीं है पर उनकी मर्ज़ी से या उनकी निजी अवधारणा से ही सब महापुरुषों की मुखमुद्रा तय होगी तो फिर तो एक न एक दिन भविष्य में इन सबको नष्ट कर पुनर्निर्माण करने का फ़ैसला ही लेगा। 

यह क्या ज़रूरी है कि मूर्तियों को इतना यथार्थपरक रियलिस्टिक बनाना चाहिये?  उनमें व्यक्तित्व का तत्व प्रकट होना चाहिये या फिर विराट के निर्माण की बदसूरती को अनदेखा करना। 

अभी तो शिवाजी महाराज और श्रीराम की विराट मूर्ति का खेल होना शेष है, उनकी बात बाद में जब वे बनेंगी। 

शिल्पी रामसुतार द्वारा बनाई संसद परिसर में स्थापित ध्यानमग्न गांधी की एक श्रेष्ठ रियलिस्टिक मूर्ति है,  और भी बहुतेरी होंगी पर हाल के कुछ दशकों में बदसूरत मूर्तियों को सार्वजनिक स्थानों पर कौवों द्वारा बीटसज्जा कराने का धंधा बहुत चल निकला है। 

मूर्तियों की विद्रूपता!

पूरा भारत पहले छोटी या मानव आकार की बदसूरत मूर्तियों से भरा हुआ था अब बड़ी विराट कुरूपता लिये महाकाय कथित मूर्तियों की विद्रूपता से डरावना दिखेगा! इसका श्रेय मुख्यतः जाति के वोट बैंकों,  जाति के अहं की खुजली सहलाने वाले नेताओं व नगर निगमों के अफसरों को जाता है जो एक निश्चित कमीशन लेकर चौराहों पर कुछ भी स्थापित कर देते हैं और नेताजी मंत्री जी को सिर्फ अनावरण की नाम पट्टिका में अपने नाम को निहारने का ही समय मिलता है। 

साभार : गूगल

मूर्तिकारों की फैक्ट्रियां

कुछ बेहद घटिया पर व्यवसायिक रूप से सफल मूर्तिकारों की फैक्ट्रियां हैं जहां पगड़ियां,  पांव, जूते,  टांगें,  हाथ,  घोड़े,  अस्त्र शस्त्र,  आभूषण, छतरी एवं सैनिक सब बने बनाये छिपा कर रखे होते हैं और फ़िक्स की गई क़ीमत के अनुसार जड़ दिये जाते हैं। तभी महाराणा प्रताप का चेतक खच्चर जैसा दिखता है और महाराजा XYZ की पगड़ी बगैर समयकाल अंचल परंपरा का अध्ययन किये सब पर फ़िट कर दी जाती है। नेताजी खुश,  नगर निगम का अफसर और मूर्तिकार मालामाल पर नगर की उसकी भावी युवा पीढ़ी के सौंदर्यबोध की ऐसी-तैसी। 

हू केयर्स?  

बड़े बड़े पर्वतों को काटकर कई स्थानों पर विदेशों में श्रेष्ठ व अतिसुंदर व्यक्ति-चित्र उकेरे हैं। स्किल,  कलाबोध,  अनुभव,  अनुपात की गहरी समझ के साथ उस व्यक्तित्व का भी गहरा अध्ययन होगा तब कोई बढ़िया मूर्ति गढ़ी जा सकती है और उसकी समय सीमा को भी कलाकार ही तय करता है,  राजनेता नहीं कोई आगामी चुनाव की तारीख़ नहीं। 

कैसे होगी राम की मूर्ति?

मैं सिहर उठता हूं यह सोचकर कि 110 मीटर के श्रीराम सरयू किनारे अगले यूपी चुनाव के पहले स्थापित करने का फ़ैसला हो जाये और कोई रिलायंस एलएंडटी के माध्यम से चीनी फैक्ट्री ठेका ले ले! 

110 मीटर के राम को देखने के लिये कम से कम एक डेढ़ किमी का खुला सुंदर स्थान हो जहाँ एंटी-रोमियो स्क्वाड, यूपी पुलिस के ‘बदतमीज़’ सिपाही,  चौकीदार,  गुटका थूकू,  गंदी गाली बकू लोग,  बताशे फैंक कर प्रसाद चढ़ाने वाले न हों। 

यह कैसे संभव है कि यदि देसी पर्यटक वहां आने लग जायें तो सारे महामंडलेश्वर, अखाड़े,  पतंजलि मेगा स्टोर्स वहां के आसपास की ज़मीन की लीज़ मुख्यमंत्री से न लेकर आश्रम के नाम पर कुरूप होटल न खड़े कर लें? 

और असली बात यह कि वहां खड़े राम कैसे होंगे? कैसे दिखेंगे?  युद्धरत या विरह में या राजा रूप में?  अयोध्या की सरयू ने सब रूपों में राम को देखा सिवाय युद्धरत,  और अयोध्या का तो अर्थ ही इतना सुंदर कि युद्ध की वहां चर्चा भी बेकार! लेकिन पिछले कुछ बरसों से तो प्रत्यंचा चढ़ाये क्रोधित युद्धरत राम के ही चित्र समाज में घूम रहे हैं। जब इन बातों पर विचार होगा तो कोई संस्था के स्वयंभू राम विशेषज्ञ अपनी राय मूर्ति निर्माता को दे देंगे और तुलसी बेचारे मुँह बाये जीवन 110 मीटर के श्रीराम को देखकर अपने मानस का पुनर्पाठ कर ग़लतियों को खोज रहे होंगे! 

गांधी-अंबेडकर के साथ अत्याचार!

इस देश में मूर्ति बनाकर बहुतों के साथ दुराचार अन्याय हुआ पर जितना गांधी और अंबेडकर के साथ हुआ उतना किसी और के साथ नहीं। हर शहर गांव में जहां अंबेडकर या गांधी की मूर्ति लगाई गयीं उसे देखकर प्रहसन का एक महाग्रंथ या टीवी सीरियल बन सकता है। 

हंगरी में रूस के खिलाफ विद्रोह होने के बाद सारे कम्युनिस्ट नेताओं की मूर्तियों जनता ने तोड़ी तो उनके टुकड़ों को प्रदर्शित कर बुडापेस्ट शहर से दूर एक बग़ीचा बना दिया गया है, कौन वहां जाता है? फ़िलहाल तो जिन मूर्तियों पर कौवे बीट कर रहे हैं उनके ऊपर एक ही आकार की छतरियां लग रहीं हैं जिससे वे और ज़्यादा हास्यास्पद दिखें।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक समाजवादी आंदोलन से जुड़े होकर आईटीएम यूनिवर्सिटी (ग्वालियर) के कुलाधिपति हैं। मध्य प्रदेश सरकार में दो बार मंत्री भी रहे हैं।)










Leave your comment