कितनी कारगर हैं सोशल मीडिया की मुहिम क्रांतियां?

आधी आबादी , सिलीगुड़ी, शनिवार , 19-08-2017


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सरोजिनी बिष्ट

पिछले दिनों सोशल मीडिया में एक घटना बड़ी तेजी से वायरल हुई लव जिहाद के ख़िलाफ नृत्यांगना अवनि सेठी का अहमदाबाद की खुली सड़कों पर नृत्य कर विरोध जताना। शहर के प्रमुख जगहों की दीवारों पर एक हिंदूवादी संगठन द्वारा लिखा गया था "हिन्दू लड़कियों लव ज़िहाद से सावधान" इसी बंदिश और डराने वाली प्रवृति का विरोध करते हुए अवनि ने शहर के उन ख़ास जगहों पर "जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने पर नाच करते हुए उस हिंदूवादी संगठन को खुली चुनौती दी। अवनि सेठी के इस कदम का नौजवानों द्वारा खुले दिल से स्वागत भी किया गया।  विरोध का यह तरीका अनोखा सही पर ऐसी कट्टरपंथी सोच पर प्रहार करने के हर तरीके स्वागत योग्य हैं। इसमें दो मत नहीं कि आज सोशल मीडिया जहाँ विवादास्पद चीजों के लिए आसान माध्यम बन चुका है वहीं सामाजिक दायित्व निर्वहन का सशक्त और कारगर माध्यम भी बन रहा है।

मेरी रात मेरी सड़क अभियान पर महिालाएं।

नये पड़ाव पर पहुंच गया है स्त्री-विमर्श
पिछले काफी समय से सोशल मीडिया ऐसी मुहिम क्रांतियों का गवाह भी बनता जा रहा है जहाँ महिलायें न केवल अपने ख़िलाफ़ पीढ़ियों से बने टैबू तोड़ने की बात करती हैं बल्कि बिना सेलेक्टिव हुए स्त्री-विमर्श के हर पहलू को परिभाषित कर रही हैं। वे मान रही हैं कि अब समय न सेलेक्टिव होने का है न चूजी बने रहने का। अपने इसी मुहिम के तहत जहाँ वे खुलकर जेंडर बेस्ड धारणाओं पर बिंदास बात कर रही हैं वहीँ "आई एम् अ ह्यूमन" स्लोगन के तहत उन बहसों तक पहुँचने की कोशिश कर रही हैं जिनको टैबू की श्रेणी में रखा जाता रहा है।

"फ्री टू ब्लीड"  "सेल्फी विदआउट मेकअप" टैक्स फ्री सेनेटरी नेपकिन" आई एम अ ह्यूमन नॉट ऑब्जेक्ट" "यस मिन्स यस नो मिन्स नो" " फीमेल ब्लैकआऊट" जैसे मुद्दों पर, वर्चुअल दुनिया में ही सही, यदि बातें हो रही हैं, बहसें चल रही हैं सहमति असहमति बन रही है तो हमें यह कहने पर कतई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि हम पुरानी और जरूरी बहसों को कितनी खूबसूरती से नए प्लेटफार्म पर लाने में कामयाब हो रहे हैं बाकी स्वीकार्य-अस्वीकार्य तो अपनी जगहें हैं। हम जानते हैं माहवारी का छोटा सा दाग भी हमारे कपड़ों की शोभा तो हरगिज नहीं बढ़ाएगा लेकिन उस दाग के भय से हम उन दिनों में डरे सहमे रहें बार-बार अपने कपड़े का कोना कोना चेक करें इस मानसिक अशांति से तो मुक्त होना ही होगा।

अपने वजूद और उसकी पहचान की दावेदारी

"यस मीन्स यस, नो मीन्स नो" या "आई एम् अ ह्यूमन" आवाज है उस आज़ादी की जो एक स्त्री को उसके जीवन जीने की बुनियादी जरूरतों के बतौर मिलनी ही चाहिए। दैहिक स्वतंत्रता का इससे परे कोई मत नहीं कि एक इंसान (महिला) अपनी मर्जी और आज़ादी से अपने शरीर पर सिर्फ अपना अधिकार कायम कर सके। क्या यह उसका दैहिक अधिकार हनन नहीं कि जब उसकी देह किसी के लिए फ्री सेक्स नहीं केवल फॉर सेक्स बन जाती है। रेप, यौन शोषण या मेरिटल रेप इसी ओर इशारा है तो वहीं "सेल्फी विदाऊट मेकअप" सौन्दर्य प्रसाधनों की अनदेखी मात्र से अधिक उस सिस्टम पर चोट कह सकते हैं जो एक स्त्री को उसके स्वाभाविक शारीरिक पहचान से जुदा कर उसके अंदर अपनी ही बनावट को लेकर इस कदर बैचेनी पैदा कर देती है कि वह ख़ुद को ख़ुद की नज़र से न देखकर औरों की नजर से स्वयं को परखने लगती है और इसी का फ़ायदा तेजी से फैल रहा सौन्दर्य बाजार उठाता है।

मेरी रात मेरी सड़क अभियान पर महिलाएं।

हर कदम मंजिल की ओर

"फीमेल ब्लैकआउट" हर रोज महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के विरुद्ध एक प्रतिरोध की आवाज़ बनकर उभरा। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब "मेरी रात मेरी सड़क" का आह्वान फेसबुक की सुर्खियाँ बना। यह आह्वान महिलाओं के विरूद्ध पनप रहे कुंठित मानसिकता को चुनौती भर देना नहीं था बल्कि उस रात उस सड़क पर अपनी मजबूत दावेदारी भी पेश करना था जहां एक वक्त के बाद उसे उसके लिए वर्जित मान लिया जाता है। यदि एक लड़की रात के समय सड़क पर निकले तो क्या वह बलात्कार की हक़दार हो जाती है क्या खुली हवा में सांस लेना उसका इतना बड़ा गुनाह हो जाता है कि एक भीड़ आती है और उस पर टूट पड़ती है।

बस इन्हीं सवालों के साथ इस मुहिम का हिस्सा बनी महिलायें मुंबई, दिल्ली और लखनऊ जैसे महानगरों में सड़क पर निकल पड़ीं।
सोशल मीडिया की ये मुहिम क्रांतियाँ कहाँ जाकर अपना ठौर लेंगी कहना मुश्किल है लेकिन इनके अस्तित्व को अस्वीकार करने का भी कोई कारण नजर नहीं आता। सामाजिक बदलाव की चिंगारी कहीं से भी निकले मायने उससे ज्यादा इस बात के हैं कि परम्परागत रवायतों को खारिज़ करने की आवाजें जोर पकड़ती जा रही हैं और कहते हैं न आवाज़ निकली है तो दूर तलक जायेगी।

(सरोजिनी बिष्ट लेखिका होने के साथ ही सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। और महिला सवालों पर बेहद मुखर रहती हैं। आजकल सिलीगुड़ी में रह रही हैं।)










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