मां के साथ राइस बियर बेचने वाली बच्ची ने तय किया फुटबॉल वर्ल्ड कप तक का सफर

शख़्सियत , , रविवार , 02-09-2018


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मो. असगर खान

रांची। “सुदूरवर्ती गांव की एक सात वर्षीय बच्ची अपनी मां के साथ ग्राहकों के गिलास में हड़िया (राइस बियर) भरती, पिता नशे में धुत मां को पीटता, सुबह-शाम घर में गाली-गलौज के शोर-शराबे होते। जब इसी बच्ची को खिलाड़ी बनने का शौक पनपा तो घर की उलझनें आड़े आने लगीं। लेकिन शौक जुनून में बदला तो सफर शुरू हो गया और रास्ते आसान। अब यह बच्ची सफलता की मंजिल के काफी करीब है।”

शीतल शोहरत की बुलंदियों पर है। रांची से 20 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड के बरतोली गांव की उन्नीस साल की एक आदिवासी लड़की शीतल को इस काम तक पहुंचने में बहुत संघर्ष करना पड़ा। बरतोली गांव में लगभग सभी आदिवासी घरों में झारखंड की पारंपारिक शराब यानी हड़िया परोसी जाती है। लेकिन शीतल की मां गांधी देवी ने घर में ये रिवाज 2014 के बाद से ही बंद कर दिया था।  

एक सांस में कोच आनंद प्रसाद गोप, शीतल टोप्पो के बारे में ये सब बताकर चुप के हो गए। बीस सेकेंड बाद उन्होंने शीतल की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आगे वह खुद अपने संघर्ष के सफर को बताएगी। दरअसल, शीतल टोप्पो झारखंड में तेजी से उभरती हुई एक ऐसी महिला फुटबॉलर है जिसे उसके खेल के बूते फीफा ने रूस में आयोजित फुटबॉल वर्ल्ड कप में मैच देखने के लिए बतौर मेहमान बुलाया। यहां शीतल ने एक जुलाई को रूस और स्पेन के बीच खेले गए बेहद रोमांचक मैच का बतौर मेहमान लुत्फ उठाया।

मां-पिता के साथ शीतल

राइस बियर से रूस तक

शीतल अपने राइस बियर से रूस तक पहुंचने के सफर के बारे में बताती हैं-

“मुझे अभी भी यकीन नहीं होता है कि एक शराब चुआने वाली लड़की रूस में फुटबॉल विश्व कप का मैच देखने गई थी, वो भी फीफा की मेहमान बनकर। जिस हवाई जहाज को देखने घर से बाहर निकलते थे, उस पर बैठना सपने जैसे था।”

झारखंड ने जब अंडमान निकोबार में अंडर-17 नेशनल फुटबॉल कप (2015-16) का खिताब अपने नाम किया, तो जीत का सेहरा शीतल के सिर बंधा। उन्होंने इस टूर्नामेंट में कुल 13 गोल दागे और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बनीं।

राइस बियर से रूस तक

शीतल याद करती हैं-

“बचपन में जब अपने गांव में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखती थी, तब मन में एक इच्छा थी कि मैं भी फुटबॉल खेलूं। लेकिन ये सब मुमकिन नहीं था। मां को जब कहती कि मैं भी फुटबॉल खेलूंगी तो पिता की फटकार लगती। घर हड़िया बेचकर ही चलता था और मुझे मां के काम में हाथ बटाना था। थोड़ी बड़ी हुई तो फुटबॉलर बनने की इच्छा और बढ़ गई। इस बार मां का तो साथ मिला, लेकिन गली, मुहल्ले में फुटबॉल खेलने पर लड़के और बुजुर्ग ताना मारते। पर आज वही लोग घर पर आकर मां-पिता को बधाई देते हैं।”

शीतल के पिता बारगी उरांव पुराने दिन का जिक्र करना नहीं चाहते हैं। तब के अपने आचरण पर उन्हें बहुत अफसोस है। बारगी शीतल के सिर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं-

“अब हमारी बेटी हमारी शान है। इसने पूरे परिवार को बदल  डाला है। हमने इसी की वजह से पीना छोड़ दिया और इसकी मां ने हड़िया बेचना बंद कर दिया है। परिवार में मां-बाप के अलावा भाई विजय और बहन शीला, शीशल को भी उम्मीद है कि जल्द ही शीतल देश के लिए फुटबॉल खेलेगी।"

फुटबॉल संघ ईमानदारी दिखाए

वरिष्ठ खेल पत्रकार सुभाष डे शीतल की उपलब्धि पर कहते हैं,“विपरीत परिस्थितियों में शीतल का यहां तक पहुंच पाना बोल्ड और बहुत बड़ी बात है। इतनी बधाओं के बावजूद भी खेल के प्रति जो प्रतिबद्धता इस लड़की ने दिखाई, मुझे लगता है कि ऐसी ही ईमानदारी झारखंड फुटबॉल एसोसिएशन दिखाए तो कई और खिलाड़ी सामने आएंगे।

वहीं शीतल कहना है कि उनका अगला लक्ष्य है झारखंड अंडर-19 के लिए जमकर प्रैक्टिस करना है, और भविष्य में भारत महिला फुटबॉलर टीम के लिए खेलना। उन्हें उम्मीद है कि जब वो देश लिए खेलना शुरू करेंगी तब भारत फुटबॉल वर्ल्ड कप में क्वालीफाई कर चुका होगा।  

शीतल फुटबॉलर बनने का श्रेय अपनी मां के साथ-साथ ऑस्कर फाउंडेशन को भी देती हैं। उनके मुताबिक मां का साथ और ऑस्कर की मदद उन्हें नहीं मिल पाती तो शायद वो यहां तक नहीं पहुंच पाती। वो कहती हैं कि जब वो ऑस्कर फाउंडेशन के आनंद प्रसाद गोप और हीरालाल के संपर्क में आईं तब उन्होंने उनसे फुटबॉल खिलाड़ी बनने की इच्छा बताई। इसके बाद संस्था से जुड़कर पढ़ाई के साथ फुटबॉल की ट्रेनिंग लेनी शुरु की। ऑस्कर फॉउंडेशन रांची के आठ पंचायतों से लगभग 600 लड़के-लड़कियों को पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रहा है। फिलहाल मैट्रिक, इंटर फर्स्ट डिवीजन पास करने के बाद शीतल रांची के मारवाड़ी कॉलेज के बीकॉम में फर्स्ट इयर की छात्रा है।

रूस में खिलाड़िओं के साथ

हर टूर्नामेंट का चेहरा बनी  

डिस्ट्रिक्ट लेवल फुटबॉल खेल चुके और शीतल के कोच आनंद कहते हैं कि शीतल में फुटबॉल के प्रति गजब का जुनून है। वो प्रैक्टिस के दौरान मैदान पर नये-नये शॉट का एक्सपेरिमेंट किया करती है। 2013 में संस्था के संपर्क में आई और पांच साल के अंतराल में राष्ट्रीय स्तर के कई टूर्नामेंट खेला। जिन टूर्नामेंट में झारखंड विजेता, उपविजेता और तीसरे स्थान पर रहा उसमें शीतल ही चेहरा रहीं।

झारखंड नेशनल वीमेंस फुटबॉल फेडरेशन कप (2014-15) में उपविजेता रहा, जिसमें शीतल ने कुल 07 गोल दागे। स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया कप (2015) का झारखंड ने खिताब जीता, तो पांच गोल शीतल के नाम रहा। इसी तरह ऑल इंडिया फेडरेशन जूनियर नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप (2017-18) में 07 गोल और नेशनल इंक्लूजन कप (2017) में टीम विनर रही तो शीतल टूर्नामेंट में 12 गोल के साथ टॉप पर। उनके कोच बताते हैं कि ऐसे तो शीतल इन साइड और आउट साइड फॉरवर्ड से भी अच्छा खेलती है। लेकिन इन टूर्नामेंट में सेंटर फॉरवर्ड से खेलते हुए ही इतने गोल किए हैं।

फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप का मैच देखने के लिए भारत से 13 खिलाड़ी रूस गए थे। झारखंड में जब ऑस्कर फाउंडेशन को ये मौका प्राप्त हुआ, तब संस्था ने 30 खिलाड़ियों का ट्रायल करवाया। सबको पछाड़ते हुए शीतल टोप्पो और सोनी मुंडा ने इसके लिए क्वालीफाई किया।

संघ और विभाग को नहीं है जानकारी

झारखंड फुटबॉल संघ को शीतल टोप्पो की प्रतिभा का संज्ञान तो है, लेकिन संघ के सचिव गुलाम रब्बानी कहते हैं कि इसमें संघ कोई हस्तक्षेप नहीं करता है। उनका कहना है कि संघ सिर्फ ओपन नेशनल टूर्नामेंट देखता है। जबकि शीतल टोप्पो स्कूल नेशनल टूर्नामेंट खेलती हैं जिसे खेल विभाग देखता है। इसलिए संघ के पास इसकी ज्यादा जानकारी नहीं होती है। इधर राज्य के खेल निदेशक कहते हैं कि उन्हें इस तरह के किसी खिलाड़ी के बारे में मालूम नहीं है।

                 (लेखक मो.असगर खान (संवाद मंथन) स्वतंत्र पत्रकार हैं और रांची में रहते हैं। )

 










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