वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स: विकास के एजेंडे में कहां हैं खुशियां ?

देश-दुनिया , , रविवार , 18-03-2018


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राजू पाण्डेय

वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत का प्रदर्शन 2014 से गिरता ही जा रहा है। इस वर्ष भारत 156 देशों में 133 वें स्थान पर रहा। पिछले वर्ष वह 122 वीं पायदान पर था जबकि 2016 में उसका नंबर 118 वां था। भारत विकसित देशों से तो पीछे रहा ही, सार्क देशों में भी उसका स्थान अशांत अफगानिस्तान (145) से ही बेहतर रहा। इस सूची में पाकिस्तान(75), भूटान (97) नेपाल (101), बंगलादेश (115) और श्रीलंका (116) हमसे कहीं आगे रहे। चीन ने भी 86 वां स्थान प्राप्त किया। पाकिस्तान ने 5 स्थानों की छलांग लगाई है और पाकिस्तानी विशेषज्ञों का एक समूह इसके लिए आय वृद्धि और बेहतर सुरक्षा को उत्तरदायी मान रहा है।  

संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन्स नेटवर्क की इस रिपोर्ट की वैज्ञानिकता और विश्वसनीयता पर सवाल भी उठते रहे हैं। हालांकि यह रिपोर्ट विख्यात गैलप वर्ल्ड पोल के सर्वेक्षणों पर आधारित होती है। सर्वेक्षण के लिए दैव निदर्शन द्वारा चयनित 15 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों के साक्षात्कार लिया जाता है। विकसित देशों में 30 मिनट का दूरभाषिक साक्षात्कार लिया जाता है जबकि विकासशील देशों में 1 घण्टे का व्यक्तिगत भेंट आधारित साक्षात्कार लिया जाता है।

अपने आकलन के लिए यह रिपोर्ट जिन पैमानों का सहारा लेती है उसमें जीडीपी, सामाजिक सहयोग, उदारता, सामाजिक स्वातंत्र्य और स्वास्थ्य सम्मिलित हैं। दरअसल जीडीपी और आर्थिक बेहतरी के संकीर्ण पैमानों से लोगों की खुशी का आकलन कई बार गलत होने की सीमा तक अधूरा पाया गया। इस कारण से इसके विकल्प तलाशने की कवायद तेज हुई। 

भूटान नरेश जिग्मे सिंगये वांगचुक के पाश्चात्य भौतिकवादी विचारों के नकार से ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस इंडेक्स की अवधारणा ने जन्म लिया जिसमें सामाजिक -आर्थिक विकास के अतिरिक्त सांस्कृतिक उत्थान, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन का समावेश था। यह अवधारणा भूटान की सीमाओं से बाहर निकली और परिष्कृत तथा चर्चित हुई।

2007 में यूरोपियन कमीशन, यूरोपियन पार्लियामेंट, क्लब ऑफ रोम, आर्गेनाईजेशन फॉर इकॉनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट और वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर द्वारा आयोजित बियॉन्ड जीडीपी सम्मेलन भी एक ऐसा ही प्रयास था जो जीवन स्तर और व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास के आकलन में जीडीपी की सीमाओं को स्वीकार कर कुछ नई मापन विधियों की खोज से संबंधित था। वल्र्ड बैंक का ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स और ओईसीडी का बेटर लाइफ इंडेक्स आदि भी सम्पूर्ण विकास की संकल्पना पर आधारित हैं। 

वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स की आकलन विधियों में रोचकता और रचनात्मकता तो है किंतु इनका काल्पनिक और अमूर्त स्वरूप इन्हें अविश्वसनीय भी बनाता है। रिपोर्ट लेखक हमें एक सीढ़ी की कल्पना करने को कहते हैं जिसके सबसे निचले चरण को 0 और उच्चतम चरण को 10 अंक दिए गए हैं। सीढ़ी का सर्वोच्च चरण आपके सर्वोत्कृष्ट जीवन स्तर का प्रतिनिधित्व करता है जबकि निचला चरण निम्नतम जीवन स्तर को दर्शाता है। आपको यह आकलन करना है कि आप वर्तमान में सीढ़ी के किस चरण में हैं?

इस काल्पनिक स्थिति में भी भौतिक समृद्धि के आधार पर जनता की प्रसन्नता का आकलन करने की उस पुरानी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं जिससे विद्रोह कर वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स जैसी संकल्पनाएं अस्तित्व में आई हैं। भौतिक समृद्धि में खुशियां तलाशने वालों की सीढ़ी कभी ग्यारह चरणों मे खत्म नहीं होती उनके लिए तो अनंत चरण भी अपर्याप्त हैं। यहां वह दार्शनिक प्रश्न भी सामने आता है कि प्रसन्नता व्यक्ति सापेक्ष होती है और देश या समाज की प्रसन्नता के आकलन का कोई वस्तुनिष्ठ तरीका ढूंढना संभव नहीं है। 

विश्व के सर्वाधिक प्रसन्न देशों की सूची के पहले 20 नाम सम्पन्न देशों के ही हैं। इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत है कि सम्पन्नता और प्रसन्नता समानुपाती होती हैं बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि रिपोर्ट प्रसन्नता का आकलन करते करते सम्पन्नता में उलझ जाती है। 

रिपोर्ट में वर्णित काल्पनिक देश डिसटोपिया (यूटोपिया का विलोम) सर्वाधिक कम प्रसन्न लोगों का देश है। माना गया है कि विश्व के हर देश के निवासी इस काल्पनिक डिसटोपिया से उन छह मानकों के आधार पर ज्यादा प्रसन्न ही होंगे जिनका रिपोर्ट सहारा लेती है। किन्तु दार्शनिक प्रश्न यह भी है कि डिसटोपिया व्यक्ति के अंदर है या उसके बाहर? कुछ विद्वान यह ध्यानाकर्षण करते हैं कि

इस इंडेक्स में प्रथम 20 स्थान पाने वाले कई देशों में आत्महत्या की दर सर्वाधिक है। यदि यह माना जाए कि आत्महत्या वे ही लोग कर रहे हैं जो इन देशों में अपने जीवन से अप्रसन्न हैं तो यह देश सूची में बहुत पीछे खिसक जाएंगे।

भारत में अप्रसन्नता के बढ़ते स्तर में सरकार और समाज दोनों के लिए चेतावनी छिपी हुई है। पिछले 3-4 सालों में भारत का प्रदर्शन समग्र जीवन स्तर का आकलन करने वाले प्रायः सभी सर्वेक्षणों में निराशाजनक रहा है। सरकार का अर्थ शास्त्र विश्व बैंक,अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने को ही अपना लक्ष्य बना बैठा है। इन संस्थाओं को प्रसन्न करने के लिए उठाए गए नोटबंदी जैसे कदमों से अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा है उसके असर को चैपट उद्योग धंधों और बढ़ती बेरोजगारी के रूप में देखा जा सकता है। 

देश की जिस आर्थिक प्रगति का ढिंढोरा पीटा जा रहा है उसका लाभ समाज के मुट्ठी भर लोगों को मिल रहा है। धनी-निर्धन के बीच की खाई तेजी से बढ़ रही है। आर्थिक विकास के केंद्र में मुनाफा है, मनुष्य नहीं। इस प्रक्रिया में पर्यावरण दूषित और विनष्ट हुआ है। प्राकृतिक आपदाओं ने भयानक रूप धर लिया है। अपराध और हिंसा बढ़ी है। आर्थिक समृद्धि के लिए यह दीवानापन कुछ ऐसा है कि मनुष्य अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति की अनदेखी कर रहा है। रोटी, कपड़ा, मकान, तालीम, इलाज, रोजगार, अमन-चैन और सुकून जैसी बुनियादी जरूरतों को दरकिनार कर और जात-पात-मजहब की लड़ाई में जनता को उलझाकर उसे खुश नहीं रखा जा सकता। रिपोर्ट में शीर्ष स्थानों पर सम्पन्न देशों का काबिज होना अगर उनके बेहतर जीवन स्तर को दर्शाता है तो यह सवाल भी खड़ा करता है कि यह सम्पन्नता और सुविधाएं उन्होंने कहीं गरीब मुल्कों के शोषण से तो हासिल नहीं की हैं। रिपोर्ट इस संबंध में मौन है।                 

                                                                   (राजू पाण्डेय छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 










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