तुग़लक़ी फ़रमान का नया संदर्भ

खरी-खरी , , बृहस्पतिवार , 08-11-2018


A NEW CONTEXT OF DEMONITIZATION

उपेन्द्र चौधरी

मुहम्मद बिन तुग़लक़ अपने अनाप-शनाप तरीक़े से जारी किये जाने वाले फ़रमान की वजह से भारत के इतिहास में एक पागल सुल्तान के तौर पर दर्ज है। उसके ऐसे ही फ़ैसलों में अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित किया जाना,फ़सल उगलते दोआब क्षेत्र में कृषि कर को बढ़ाकर दोगुना कर देना, सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन भी शामिल था। मगर, उसकी ये तीनों महत्वपूर्ण योजनायें अपने मक़सद में औंधे मुंह गिर गयी थीं। मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ अपनी कामयाबी से कहीं ज़्यादा चर्चित अपनी नाकामी से रहा।

उसने अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद ले जाने का हुक़्म 1327 में दिया था। उसकी सोच थी कि महाराष्ट्र स्थित दौलताबाद दिल्ली से कहीं ज़्यादा हिन्दुस्तान के बीचोबीच है और वहां से पूरे देश के शासन पर नज़र रखना उसके लिए बहुत आसान होगा। इसके पीछे की सोच यह भी थी कि दक्षिण की तरफ़ बढ़ते उसके साम्राज्य के लिए उपजाऊ दक्कन पठार से हासिल होने वाला संसाधन भविष्य के उसके बाक़ी अभियानों में सहायक होगा। मंगोलों से सुरक्षा भी एक कारण था। चूंकि एक राजकुमार के तौर पर मुहम्मद बिन तुग़लक़ ख़ुद ही दक्षिण में कई साल गुज़ार चुका था। इसलिए उसने सोचा था कि राजधानी का यह स्थानांतरण,दक्षिण में उसके अनुभवों के साथ मिलकर उसके शासन की तक़दीर बदल देगा।

मगर यह स्थानांतरण आसान नहीं था। ऐसा माना जाता है कि दिल्ली की जनता दौलताबाद हरगिज नहीं जाना चाहती थी,लेकिन मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ ने लोगों के सामने अपना फ़रमान रख दिया और साथ ही इस बात की घोषणा कर दी कि दौलताबाद जाने वाले हर दिल्लीवासी को बेशुमार सुविधायें मुहैया करायी जायेंगी।इसके बावजूद जब दिल्ली वाले ऐसा करने से कसमसाने लगे,तो उस समय सुल्तान के दरबार में रहने वाले मोरक्को के यात्री इब्नबतूता के शब्दों में, ‘सुल्तान ने पूरी क्रूरता के साथ हर मुमकिन ताक़त का इस्तेमाल किया।लोग अपने माल-ओ-असबाब के साथ दौलताबाद के लिए कूच करने के लिए मजबूर कर दिये गये’।

इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है, ‘दिल्ली ने लगभग डेढ़ सौ साल में तरक़्क़ी का ऐसा-ऐसा मंज़र देखा था,जिसकी तुलना सिर्फ़ समृद्धि से जगमगाते शहर बग़दाद और काहिरा से की जा सकती थी, मगर बग़दाद और काहिरा से होड़ लेती दिल्ली देखते-देखते वीरान हो गयी, गांव-शहर सबके सब निर्जन हो गये,यहां तक कि  वहां कुत्ते और बिल्ली तक नहीं बचे’।

1329 में उसके ख़ुद की मां भी दौलताबाद पहुंचा दी गयी।ग़ुलाम,नौकर-चाकर,उलेमा,सूफ़ी सबके सब नयी राजधानी में सजा दिये गये। मगर दिल्ली से दौलताबाद तक की यात्रा के दौरान आम नागरिकों में से अनेक ने भूख और थकावट के कारण रास्ते में ही दम तोड़ दिये। इस क़ीमत पर राजधानी दौलताबाद स्थानांतरित हो गयी। साल 1333 में जारी सिक्कों पर दौलताबाद के लिए ‘दूसरी राजधानी’भी खुद गयी।

लेकिन अगले ही साल मालाबार में विद्रोह हो गया, विद्रोह को दबाने के लिए बीदर गुज़रता हुआ वह सुल्तान ख़ुद माहामारी की चपेट में आ गया। इस महामारी में उसके बेशुमार सिपाही मारे गये।लिहाजा सुल्तान को दौलताबाद लौटना पड़ा। लेकिन तब तक दौलताबाद और द्वार समुद्र में भी विद्रोह हो गया।सुल्तान को कमज़ोर होते हुए देखकर बंगाल भी विद्रोही हो उठा।

आख़िरकार एक थके-हारे-निराश-हताश और बेहद पढ़े-लिखे मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ को 1335 में दिल्ली लौट आने का निर्णय लेना पड़ा। नागरिकों को भी कहा गया कि अब वो दिल्ली लौट चलें। तब तक दिल्ली व्यापार और रुतबे दोनों ही लिहाज से एक वीरान शहर में तब्दील हो चुकी थी। माना जाता है कि सुल्तान के उस पागलपन भरे फ़रमान से दिल्ली तबाह हो गयी थी, इस तबाही से उबरने में दिल्ली को सालों का इंतज़ार करना पड़ा था। 

मुहम्मद बिन तुग़लक़ के उस फ़रमान में सोच-समझ और दूर दृष्टि के अभाव के साथ-साथ जनता को होने वाले दुख-दर्द की चिंता बिल्कुल नहीं थी। जिस मक़सद को लेकर वह फ़रमान जारी किया गया था, वह भी हासिल नहीं हो पाया था। इतिहास ख़ुद से गुज़रने की इसीलिए भी मांग करता है ताकि आने वाले दिन, अपने इतिहास बोध से सबक लेकर आगे का सही रास्ता अख़्तियार कर सके। 

मुहम्मद बिन तुग़लक़ का वह फ़रमान इतना क्रूर, देशहित के विरुद्ध और जनहित के ख़िलाफ़ था कि इतिहास में फ़रमान,तुग़लक़ी फ़रमान के नाम से दर्ज हो गया। भारतीय उपमहाद्वीप में वह ‘तुग़लक़ी फ़रमान’ आने वाले दिनों के क्रूर शासन के लिए उपमा देने वाला एक मुहावरा बना गया। इस मुहावरे के मायने समझने में किसी तरह का कोई इतिहास बोध आड़े आ रहा हो,तो दो साल पहले जारी हुए ‘नोटबंदी के फ़रमान’ में उस तुग़लक़ी फ़रमान के मुहावरे का संदर्भ बख़ूबी देखा-समझा जा सकता है। 








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