वीएस नायपॉल: एक विद्रोही का जाना

माहेश्वरी का मत , , मंगलवार , 14-08-2018


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अरुण माहेश्वरी

नायपॉल नहीं रहे, विद्वेषी चुप हो गया। नायपॉल- विद्याधर सूरजप्रसाद ‘विदिया’नायपॉल- एक विद्रोही, विद्वेषी लेखक वी एस नायपॉल नहीं रहे। नोबेल पुरस्कार, बुकर पुरस्कार और अन्य कई पुरस्कारों के जयी नायपॉल का पचासी साल की उम्र में लंदन के अपने निवास पर देहांत हो गया।

उपनिवेशों की आजादी ने इन देशों की जनता को भले ही राजनीतिक तौर पर मुक्त किया, लेकिन यह मुक्ति इन क्षेत्रों के लोगों को धार्मिक कुसंस्कारों और जात-पात की तरह के पिछड़ेपन से मुक्ति का सबब नहीं बन पाई, बल्कि आज इनकी जकड़बंदी को और मजबूत करने का कारण बनती दिखाई देती है,—नायपॉल ने इस सच को बिना किसी लाग-लपेट के, असभ्यता और पिछड़ेपन के छोटे से छोटे संकेत को गहरे तंज के साथ अपने लेखन में उघाड़ा था। यही वजह है कि उन्हें विकासशील देशों में उत्तर-औपनिवेशिक युग के तीखे आलोचक के रूप में देखा जाता रहा, अपने ही लोगों के प्रति नफरत और विद्वेष के लेखक के रूप में।

जब कोई चीज पूरी तरह उलंग रूप में सामने आती है, वह स्वत: एक विद्रोह का, एक प्रकार की अशिष्टता, मुंहफटपन का रूप लेती दिखने लगती है, बहुत सारे शिष्टाचारी संस्कृतिवानों की धड़कनों को तेज कर देती है।लेकिन वहीं से तो सत्य की दिशा में बढ़ने के लिये जरूरी स्वातंत्र्य शक्ति से आदमी का परिचय होता है। नायपॉल का लेखन इसी स्वतंत्र चेतना-शक्ति की सृजनात्मकता का एक अनूठा उदाहरण कहलायेगा।

नायपॉल के लेखन की विशेषता थी उनकी किस्सागोई की शैली। वे चरित्रों और परिस्थितियों के विस्तृत ब्यौरों के लेखक थे। उन्होंने कहा भी है कि “कथानक उनके पास होता है, जिन्होंने दुनिया को जान लिया है। जिन्हें दुनिया को जानना हैं, उनके पास आख्यान होता है।”नायपॉल का कहना था,आप अपनी आत्म-जीवनी में झूठ बोल सकते हैं, लेकिन उपन्यास में नहीं। वहां झूठ की जगह नहीं होती। वह लेखक को पूरी तरह से खोल देता है। 

भारत के गिरमिटिया मजदूरों की ही एक संतान नॉयपाल कैरेबियन के त्रिनिदाद के चौगुआनास में 1932 में जन्मे थे। जीवन में उन्होंने एक दर्जन से ज्यादा उपन्यास लिखें और उतना ही गैर-कथात्मक लेखन भी किया। उनका गैर-कथात्मक लेखन,खास तौर पर उनके विस्तृत यात्रा वृत्तांत,उनके उपन्यासों की तरह ही आख्यानमूलक होने के कारण उतने ही दिलचस्प और औपन्यासिक अन्तरदृष्टि का परिचय देते है। इसीलिये नायपॉल के यात्रा संस्मरणों को अक्सर उनके उपन्यासों की पीठिका के रूप में लिया जाता है।

1957 में उनका पहला उपन्यास आया था -‘द मिस्टीक मैशियर’। 1962 में उनके आत्मकथामूलक उपन्यास  ‘अ हाउस फॉर मिस्टर विश्वास’ने उन्हें प्रसिद्धी के शिखर पर पहुंचा दिया। 2001 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उनके यात्रा वृत्तांत  ‘अमंग द बिलीवर्स’, ‘बियॉन्ड बिलीफ’, ‘एन एरिया आफ डार्कनेस’ हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। ये हमारे जैसे समाजों को और उनमें धार्मिक तत्ववादियों के मानसिक गठन को समझने की एक गहरी अन्तरदृष्टि प्रदान करके हैं ।

नायपॉल की मृत्यु पर सारी दुनिया के साहित्य जगत ने गहरा शोक जाहिर किया है।यहां तक कि उन लेखकों ने भी उनके जाने को साहित्य जगत की एक बड़ी क्षति माना हैं जिन्होंने हमेशा नायपॉल के लेखन के पीछे के नजरिये का विरोध किया।

नायपॉल कहते थे,‘दुनिया जैसी है, वैसी है।’ उनकी यह यथार्थ-निष्ठा ही उनके लेखन की सबसे बड़ी ताकत साबित हुई है ।

उनके विस्तृत आख्यानों में इसी दुनिया के गतिशील रूप को देखा जा सकता है।अतीत के बारे में वे कहते थे कि आम तौर पर लोग अतीत को सिर्फ अतीत, अर्थात व्यतीत मानते हैं। इसीलिये वे खुद भी जीवन की ऐसी तमाम किल्लतों से मुक्त थे जो अतीत के बोझ की तरह आप पर लद कर आपकी भविष्य-दृष्टि के रास्ते में बाधक बनती हैं। नायपॉल ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद ही पाकिस्तान की पत्रकार नादिरा अल्वी से शादी की थी। पिछले बाईस सालों से नादिरा ही उनकी जीवन संगिनी रही हैं।वीएस नायपॉल के निधन पर हम उन्हें आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी पत्नी के प्रति हार्दिक संवेदना प्रेषित करते हैं।

                              (अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक एवं टिप्पणीकार हैं।)








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