आधार : पहचान का संकट बना जिंदगी और मौत का सवाल

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 11-01-2018


aadhaar-hundred-questions

डॉ. राजू पाण्डेय

आधार से जुड़ी दो खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं। एक खबर है कि आधार लिंकिंग के कारण देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में मौजूद 80 हजार फर्जी शिक्षकों का पता चला है। दूसरी खबर एक अंग्रेजी समाचार पत्र के हवाले से आई है जिसके अनुसार ऐसे हैकर्स मौजूद हैं जो नाम मात्र की रकम लेकर किसी को भी आधार के संवेदनशील डाटा तक पहुंच बनाने का अवसर प्रदान कर सकते हैं। यह विवेचन का विषय है कि क्या यह दोनों समाचार बिल्कुल विपरीत प्रकृति के हैं? क्या इनमें से एक समाचार आधार की उपयोगिता को प्रमाणित करता है और दूसरा आधार के प्रति संदेह उत्पन्न कर जन असंतोष को बढ़ावा देता है? या फिर पहला समाचार जहाँ आधार के महत्व को दर्शाता है वहीं दूसरा समाचार इस महत्वपूर्ण और उपयोगी आधार को सुरक्षित और निर्विवाद  बनाने के प्रयासों का एक भाग है।

आधार को भ्रष्टाचार उन्मूलन के सशक्त माध्यम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। सरकार यह दावा कर रही है कि भ्रष्टाचार के बड़े बड़े प्रकरण आधार लिंकिंग के माध्यम से उजागर हो रहे हैं और इससे न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग रुका है बल्कि जरूरतमंद तक सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के लाभ भी अब बेहतर ढंग से पहुंच रहे हैं।

अप्रैल 2017 में आधार लिंकिंग के द्वारा झारखंड, आंध्रप्रदेश और मणिपुर में मिड डे मील योजना का लाभ उठा रहे 4.4 लाख फर्जी विद्यार्थियों का पता चला। केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने मई 2017 में बताया कि राशन कार्ड को आधार से जोड़ने के बाद भारी संख्या में फर्जी राशन कार्ड निरस्त हुए हैं और इसके फलस्वरूप सरकार को 14000 करोड़ रुपए की बचत हुई है। नवंबर 2017 में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया जिसके अनुसार आधार के कारण 5 करोड़ फर्जी खातों, 3.5 करोड़ बोगस एलपीजी कनेक्शनों और 1.6 करोड़ जाली राशन कार्डों का पता चला। 

हिंदुस्तान टाइम्स की 9 अप्रैल 2017 की एक खबर अधिकारियों के हवाले से यह बताती है कि मनरेगा के 93 लाख फर्जी जॉब कार्ड आधार लिंकिंग के बाद निरस्त किए गए हैं, निरस्त जॉब कार्डों में सबसे बड़ी संख्या मध्य प्रदेश (21.67 लाख) और उत्तर प्रदेश (19.4 लाख) की है जहाँ भाजपा शासन में है। 

सरकार के इन आंकड़ों को कल्याणी मेनन सेन जैसे जानकार चुनौती भी देते रहे हैं और अपने आंकड़े भी पेश करते रहे हैं जिनके अनुसार भ्रष्टाचार उन्मूलन में आधार की भूमिका नगण्य रही है।

सरकार का यह दावा पूर्णतः निराधार नहीं है। भारत समेत अन्य विकासशील देशों को मदद देने वाले वैश्विक आर्थिक संगठनों द्वारा इन देशों में व्याप्त भ्रष्टाचार से परेशान होकर बायोमेट्रिक मापन को अपनाने का सुझाव दिया गया था ताकि इनके द्वारा दी गई सहायता का सही उपयोग हो सके और नकद सब्सिडी एवं अन्य भौतिक लाभ लक्षित समूह तक पहुंच सकें। भारत में आधार की सफलता से इस विचार की पुष्टि होती है कि यह भ्रष्टाचार नियंत्रण में कारगर है।

किन्तु जिस भ्रष्टाचार का मुकाबला आधार कर रहा है वह इतना सर्वव्यापी और विकराल है कि इस बात की पूरी पूरी आशंका है कि इस लड़ाई में आधार को शहीद होना पड़ सकता है। 


बायोमेट्रिक डाटा की सुरक्षा विश्वव्यापी चिंता का विषय रही है। पासवर्ड इत्यादि तो लीक हो जाने पर बदले जा सकते हैं किंतु बायोमेट्रिक डाटा कभी परिवर्तित नहीं होता। बायोमेट्रिक डाटा हैकर्स के आक्रमण के लिए और भी संवेदनशील हो जाता है जब यह किसी केंद्रीय डाटा बेस में संरक्षित किया जाता है जैसा आधार के साथ है। 


जब बॉयोमेट्रिक्स का उपयोग हम अपनी पहचान स्थापित करने के लिए करते हैं तब यह डाटा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यदि कोई इस तक पहुंच बना लेता है तो वह हमारी नकली पहचान बनाकर न केवल हमारे बैंक खातों से छेड़छाड़ कर सकता है, सिम कार्ड हासिल कर सकता है बल्कि उन सभी सुविधाओं और छूटों का लाभ उठा सकता है जो आधार से लिंक हैं। वह हमें झूठे अपराध में भी फंसा सकता है। 


जहां तक ऐसे बायोमेट्रिक डाटा की सुरक्षा का प्रश्न है, पूरी दुनिया के साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि हर ऐसा दावा कि हमारी सुरक्षा अभेद्य है, अतिशयोक्ति पूर्ण है। ऐसे डाटा की सुरक्षा एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें हैकर्स के द्वारा सेंध लगाए जाने के सफल असफल प्रयासों के बाद सुरक्षा तंत्र को अपडेट किया जाता रहेगा। कुल मिलाकर बायोमेट्रिक डाटा की सुरक्षा के सवाल को सरकार या यूआईडीएआई की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर आक्रोशित हो जाना उचित नहीं है।


साइबर सुरक्षा में गंभीर लापरवाही और चूक के मामले हमारे देश के लिए नई बात नहीं हैं। अक्टूबर 2016 में अनेक बैंकों के लगभग 32 लाख डेबिट कार्ड्स के डिटेल्स और पिन नंबर चोरी होने का मामला प्रकाश में आया था। मई 2017 में 10 करोड़ लोगों के आधार नंबर और बैंक डिटेल्स सरकारी पोर्टल्स द्वारा लीक किए जाने का समाचार भी सुर्खियां बना। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की एक सहायक एजेंसी द्वारा महेंद्र सिंह धोनी के आधार डिटेल्स 27 मार्च 2017 को ट्वीट करने के बाद इस पर 10 वर्षों का प्रतिबंध लगाया गया। अप्रैल 2017 में आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद में यह स्वीकार किया कि आधार कार्यक्रम चालू होने के बाद से अब तक 34000 आधार ऑपरेटर्स को या तो ब्लैकलिस्ट किया गया है या उनके लाइसेंस निरस्त किए गए हैं। आईटी मंत्रालय एक प्रश्न के उत्तर में उन 210 सरकारी वेबसाइट्स की सूची पेश कर चुका है जिन्होंने आधार डाटा, लाभ प्राप्तकर्ताओं के नाम और निजी विवरणों के साथ उजागर किया। आधार कार्यक्रम की सुरक्षा हेतु सरकार पर गंभीर न होने के आरोप तब भी लगे थे जब इस विषय में अगस्त 2017 में गठित की गई रजत मूना समिति ने मात्र 17 दिन में खानापूर्ति कर अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी।


ट्रिब्यून के वर्तमान खुलासे के बाद यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने हेतु अधिकृत किए गए उन कॉमन सर्विस सेंटर ऑपरेटर्स को हैकर्स द्वारा डेमोग्राफिक डाटा एक्सेस और आधार कार्ड प्रिंटिंग सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराया जा रहा था जिन पर पहले आधार कार्ड बनाने की जिम्मेदारी थी। 


सरकार द्वारा इस दायित्व को नवंबर 17 में डाकघर और चयनित बैंकों को दे दिए जाने के बाद अब इनके पास कोई काम नहीं रह गया था। ऐसी आशंका है कि हैकर्स द्वारा प्रदान की गई गैरकानूनी एक्सेस का उपयोग कर ऐसे लगभग एक लाख विलेज लेवल इंटरप्राइज ऑपरेटर ग्रामीण जनों से शुल्क लेकर उन्हें आधार संबंधी सेवा प्रदान कर रहे थे। यद्यपि इस संबंध में कोई तथ्य किसी के द्वारा उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण का कहना है कि यह सुरक्षा चूक का नहीं बल्कि शिकायतों के निपटान के लिए प्रयोग की जाने वाली एक सर्च फैसिलिटी के दुरुपयोग का मामला है। किन्तु प्रश्न तो फिर भी बने हुए हैं – इस सर्च फैसिलिटी तक पहुंच यदि यूआईडीएआई और राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों को ही उपलब्ध थी तो क्या उनके द्वारा इसका दुरुपयोग किया गया या इसकी सुरक्षा में लापरवाही बरती गई? क्या एनरोलमेंट पार्टनर्स को भी ऐसी एक्सेस उपलब्ध थी? क्या इस एक्सेस को बिना यूआईडीएआई की जानकारी को अन्य व्यक्तियों को प्रदान किया जा सकता था? आदि आदि। इस बात की उम्मीद कम ही है कि इन सवालों के जवाब सार्वजनिक विमर्श में आएंगे।


सरकार की अनियमितता उजागर करने वालों को ही संदिग्ध मानने की प्रवृत्ति यह प्रदर्शित करती है वह  इन्हें आम जनता को भड़काने और दिग्भ्रमित करने वाला नकारात्मक सोच से युक्त शरारती तत्व मान रही है। किंतु वह भूल रही है कि पत्रकार और लेखक अंततः जनता में व्याप्त आशंकाओं, असंतोष और आक्रोश की मर्यादित अभिव्यक्ति करते हैं और इन्हें व्यवस्था विरोधी मानकर हतोत्साहित और प्रताड़ित करने के स्थान पर इनके विचारों पर ध्यान देना सरकार को कार्यक्षम और लोकप्रिय ही बनाएगा। 


आधार डाटा को लेकर ट्रिब्यून के खुलासे के बाद चल रहा विवाद केवल इसकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को स्पर्श करता है। किंतु एक बड़ी समस्या अधिकृत रूप से प्राप्त आधार आंकड़ों के दुरुपयोग की है। दिसंबर 17 में एयरटेल मोबाइल रिटेलर्स द्वारा अपने सिम कार्ड का आधार सत्यापित कराने आए ग्राहकों के एयरटेल पेमेंट बैंक एकाउंट बिना इनकी जानकारी के खोलने का मामला प्रकाश में आया। इन खातों को एलपीजी सब्सिडी से भी लिंक किया जा रहा था। इसके बाद एयरटेल मोबाइल और एयरटेल बैंक की ई केवायसी कुंजी को तत्काल निलंबित किया गया। मीडिया और सरकार के कॉर्पोरेट प्रेम के कारण यह मामला अल्पचर्चित रहा और इसकी रिपोर्टिंग और सरकारी कार्रवाई में चालाक वस्तुनिष्ठता बरती गई। 

नियमों का पालन न करने वाले आम लोग कॉर्पोरेट घरानों की तरह भाग्यशाली नहीं हैं। आधार कार्ड के अभाव में राशन बन्द कर दिए जाने के कारण अक्टूबर 2017 में भूख से झारखंड के सिमडेगा में बच्ची की मौत हुई। इसी प्रकार का प्रकरण नवम्बर 2017 में उत्तर प्रदेश में देखने में आया जब फतेहगंज में एक महिला की खाने के अभाव में मौत हुई। इसी वर्ष 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने रैन बसेरों में रात बिताने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने के उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका क्या होगा जिनके पास आधार नहीं है? क्या उनका अस्तित्व नहीं है? यह घटनाएं उस अफरातफरी और तकलीफ को बयान करती हैं जो आम अशिक्षित, असक्षम आदमी हर बुनियादी जरूरत के लिए आधार को अनिवार्य बनाने की सरकार की जिद के कारण महसूस कर रहा है। 

आधार के माध्यम से जो राशन कार्ड, एलपीजी कनेक्शन, बैंक खातों, मनरेगा जॉब कार्ड और मध्यान्ह भोजन के घोटाले सामने आ रहे हैं वह इस अनपढ़, रोज कमाने खाने वाले मजदूर ने नहीं किए हैं। वह तो इन घोटालों का शिकार है। ये घोटाले भ्रष्ट अधिकारियों, स्थानीय राजनेताओं, कालाबाजारियों और मुनाफ़ाखोरों के घातक गठजोड़ का नतीजा हैं। किंतु दंडित इस लाचार आदमी को किया जा रहा है। पहचान का संकट इसके लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन गया है।


विभिन्न देशों की सरकारों पर अपने देश के नागरिकों के विभिन्न प्रकार के डाटा के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं और इस बात की आशंका हमेशा रहेगी कि सरकारें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और आलोचकों को परास्त और शांत करने के लिए आधार डाटा का गलत इस्तेमाल कर सकती हैं। सेकंड जनरेशन बॉयोमेट्रिक्स से जनता पर बिना उसकी जानकारी के नजर रखी जा सकती है और इसका सोशल सॉर्टिंग जैसे कार्यों हेतु घातक उपयोग भी किया जा सकता है। 


जब देश की जनता का बायोमेट्रिक डाटा तैयार हो गया है तो विकसित देशों की नजर भी इस पर है। हाल ही में डब्लूटीओ की 11 वीं मिनिस्टीरियल कॉन्फ्रेंस में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा देश के नागरिकों के डाटाबेस तक फ्री एक्सेस की मांग की गई थी जिसे हमारी सरकार ने ठुकरा दिया था।

आधार कार्यक्रम 28 जनवरी 2009 को यूपीए सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया था और अब वर्तमान भाजपा सरकार का चहेता है। अर्थात सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों आधार की उपयोगिता के संबंध में एकमत हैं। अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। आधार की अनिवार्यता के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी हो सरकार के पास राष्ट्रीय सुरक्षा, जनकल्याणकारी योजनाओं के निर्माण, भ्रष्टाचार उन्मूलन और लक्षित तथा जरूरतमंद व्यक्तियों तक लाभों के वितरण आदि के लिए आधार की उपयोगिता जैसे तर्क हमेशा मौजूद रहेंगे और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसकी आवश्यकता बनी रहेगी। वैसे भी अब यह कार्यक्रम इतना आगे बढ़ चुका है कि पीछे लौटना मुमकिन नहीं है।

बॉयोमेट्रिक मापन का उद्गम अपराध शास्त्र की आवश्यकताओं से हुआ है और इससे संबंधित शोध में विश्व के विभिन्न देशों के गुप्तचर विभागों की अहम भूमिका रही है। हाल के वर्षों में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने एशियाई देशों पर अपने नागरिकों का बायोमेट्रिक डाटा तैयार करने का दबाव बनाया ताकि फर्जी पहचान वाले आतंकवादियों पर रोक लग सके। अपराधियों को पकड़ने के मूल उद्देश्य से विकसित बायोमेट्रिक मापन की तकनीक पर आधारित आधार कार्यक्रम का जनकल्याणकारी स्वरूप तभी सामने आएगा जब आम लोगों को अपराधी की भांति देखने की शासन तंत्र की मनोवृत्ति को बिल्कुल समाप्त कर दिया जाए। आधार कार्यक्रम सामूहिक निगरानी और दमन का औजार भी बन सकता है और सामूहिक कल्याण का माध्यम भी। सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका, मीडिया और जनता सभी पर यह जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शिता, चर्चा और विमर्श को बढ़ावा देकर इसके सकारात्मक उपयोग को सुनिश्चित करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और रायगढ़, छत्तीसगढ़ में रहते हैं।)










Leave your comment