विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष: न्याय की जगह मिल रही है आदिवासियों को मौत

मुद्दा , बस्तर, बृहस्पतिवार , 09-08-2018


adivasi-justice-encounter-police-naxal-atrocity-vishwa-diwas

तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। आज 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस है। पूरे भारत के आदिवासी बाहुल्य राज्यों में मूलनिवासी समुदाय के लोग विश्व आदिवासी दिवस मना रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों के साथ आज भी न्याय लंबित है। बस्तर में जारी नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत हो रहे मुठभेड़ों और आत्मसमर्पणों के बाद नई बात उभर कर अक्सर आती है कि मुठभेड़ में मारा गया शख्स नक्सली नहीं बल्कि गांव का आम आदिवासी था? आत्मसमर्पण में भी वही बात सामने आती है कि उसे घर से उठा कर महीनों रखने के बाद आत्मसमर्पण दिखा दिया गया। ये आरोप और कोई नहीं बस्तर के आदिवासी ग्रामीण खुद सुरक्षा बलों और पुलिस पर लगाते हुए इन्साफ की मांग करते हैं। 

हाल ही में सुकमा में हुए मुठभेड़ में भी वही हुआ। पुलिस द्वारा जिसे बड़ी मुठभेड़ और कामयाबी बतायी जा रही थी वह फर्जी निकली, मरने वाले आम आदिवासी ग्रामीण किसान थे। 

बीते पांच सालों की बात करें तो 30 से भी ज्यादा नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारने, जेल भेजने, बलात्कार, सामूहिक हत्या के ऐसे मामले हैं जिनमें बाकायदा राज्यपाल, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग से लेकर मुख्यमंत्री तक को लिखित में शिकायत की गयी। इनमें से आधे मामलों में साल दर साल जांच के नाम पर खानापूर्ति चली आ रही है। आधे मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं लेकिन आज तक इन आदिवासियों को न्याय नहीं मिल पाया है। 

आप को बता दें कि 30 ऐसे मामले हैं जिनमें बाकायदा आदिवासी समाज ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग तक न्याय के लिए गुहार लगाई है, लेकिन इसके बावजूद आदिवासियों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार के सैकड़ों मामले बस्तर में घटित होकर वहीं दफ्न हो जा रहे हैं। एक जानकरी के अनुसार नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों की प्रताड़ना के बस्तर के नारायणपुर जिले में ही दो साल के अंदर 300 से भी ज्यादा मामले हैं जिनकी लिखित शिकायत की गयी है। इनमें अब तक किसी भी मामले में कार्रवाई नहीं हुई है, और ये मामले लगातार समाने आ रहे हैं। 

 “ नारायणपुर सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष बिसल नाग बताते हैं कि नारायणपुर के अबूझमाड़ से ही लगभग 200 मामले हैं जो उनके सामने आए हैं। इन मामलों को लेकर हमने अनुसूचित जनजाति आयोग से लेकर कलेक्टर, एसपी सबसे शिकायत की है, लेकिन किसी प्रकार का जवाब नहीं आता है। कई मामले तो मौखिक रूप से बोल कर उनका निवारण करने की कोशिश की जाती है। बिसल बताते हैं कि बस्तर में हर आदिवासी सरकार को नक्सली नजर आता है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर हो रही मुठभेड़ों के बाद अक्सर उनके फर्जी होने की खबरें आती हैं। ग्रामीण स्वयं गांवों से निकलकर जिला मुख्यालय आकर न्याय के लिए गुहार लगाते हैं। लेकिन उनके साथ भी आमानवीय व्यवहार किया जाता है। वही ग्रामीण फिर हमारे पास आकर मदद मांगते हैं। 

“पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता अरविन्द नेताम कहते हैं कि गोली से नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। नेताम ने पत्रकार वार्ता में कहा कि यह पहली बार होगा कि मुख्यमंत्री के बयान के बाद जवानों द्वारा तत्काल इतने बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया गया और तत्काल सीएम द्वारा दिल्ली जाकर केंद्रीय गृहमंत्री को इसकी जानकारी दी गयी। इससे यह प्रतीत होता है कि इसकी तैयारियां पहले ही की जा चुकी थीं। जिस तरह से अखबारों में खबर आई है और पुलिस के बयान आये हैं उससे यह पूरा मामला संदिग्ध लग रहा है। नेताम ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि नक्सल समस्या बस्तर की सबसे बड़ी समस्या है। इसका राजनीतिक हल ढूंढना चाहिए, गोली के बदले गोली समाधान नहीं है।”

बीते पांच वर्षों के मामलों पर नजर डालें तो जुलाई 2015 में बीजापुर जिले के चिन्नागेलुर,पेद्दागेलुर में यौन शोषण, मार-पीट लूटपाट, आगजनी, स्तन दबाकर महिलाओं का मातृत्व परीक्षण देने के लिए विवश करने जैसी घटनाएं शामिल हैं।

जून 2016 में बीजापुर के पालनार में पुलिस द्वारा खेत में हल चला रहे किसान को रास्ता दिखाने के बहाने ले जाकर हत्या कर मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया गया।

जून 2016 में ही सुकमा जिले के गोमपाड़ में पुलिस अथवा सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी युवती मडकम हिडमे को घर से उठाकर जबरन जंगल में ले जा कर सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गयी।

जनवरी 2016 में सुकमा जिले के कुन्ना पेद्दापारा में नाबालिग आदिवासी युवती के साथ बालात्कार की घटना।

2016 में ही नारायणपुर जिले के तहत कुतल में 11 वीं पढ़ने वाले बच्चे की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गयी।

कांकेर जिले के अंतर्गत आने वाले मुरगाँव में पुलिस द्वारा सरपंच की हत्या कर दी गयी।

जुलाई 2016 में बस्तर जिले के बुरगुम में आदिवासी सुखराम को घर से उठाकर जंगल की ओर ले जाकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया।

सितम्बर 2016 में बस्तर जिले के बुरगुम क्षेत्र के ही ग्राम सांगवेल में नाबालिग आदिवासी सोनकू जो आठवीं में पढ़ता था की फर्जी मुठभेड़ कर हत्या कर दी गयी। वहीं एक अन्य मामले में बिजलू जो गाय चराता था उसके साथ भी यही वाकया दोहराया गया।

जनवरी 2015 में दंतेवाड़ा जिले के देवाली ताड़पारा में नुपो बीमा नाम के आदिवासी की फर्जी मुठभेड़ में गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

अक्तूबर 2015 में ही दंतेवाड़ा जिले के हंदा ग्राम का भीमा मंडावी अपनी बहन के साथ पास के गांव में जा रहा था उसे उठाकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया।

अक्तूबर 2016 में कोंडागांव जिले के किलाभ गांव में आदिवासी रतिराम कोर्राम को बाजार जाने के दौरान रास्ते में फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। 

जून 2016 में सुकमा जिले के अंतर्गत ग्राम विरापुरम में आदिवासी सोढ़ी गंगा को घर से जबरन उठाने के बाद जंगल की ओर ले जाकर हत्या कर दी गयी।

सितम्बर 2015 में कांकेर जिले के मरकानार में पुलिस द्वारा आदिवासियों की बेहरमी से पिटाई की गयी जिसमें कई आदिवासी बुरी तरह से घायल हो गए।

सितम्बर 2015 में ही कांकेर के ही बदनगिन गांव में आदिवासियों को जानवरों की तरह पीटा गया।

अक्तूबर 2016 में सुकमा जिले के आमिरगड में नकाबपोश नक्सलियों द्वारा जनपद सदस्य गंगाराम कोडोपी की कथित हत्या को अंजाम दिया गया, नक्सली नकाबपोश थे इसीलिए इस हत्या के पीछे अन्य लोगों की मौजूदगी की शंका जाहिर किया गया।

इन मामलों के अलावा और भी घटनाक्रमों को आदिवासी समाज अथवा पीड़ित ग्रामीण, परिजनों ने लगातार सरकारी हुक्मरानों से न्याय की गुहार लगाते रहे लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। 

आप को यह भी बताते चलें कि इन घटनाक्रमों के बाद बस्तर में लगातार सलवा जुडूम की तर्ज पर तैयार हो रहे पुलिस पोषित अग्नि, सामाजिक एकता मंच जैसे संघ-संगठनों का भी बस्तर के आदिवासी विरोध करते आए हैं। जानकारी हो कि ये संगठन नक्सल उन्मूलन के नाम पर लगातार आदिवासियों की हत्याओं का समर्थन करते आते रहे हैं। 

सर्व आदिवासी समाज के बस्तर संभाग अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर बताते हैं कि “हमने नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों के नरसंहार के 30 से भी ज्यादा मामलों की राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक के पास शिकायत की लेकिन एक भी मामले में न्याय तो दूर की बात है उचित जवाब तक नहीं मिल पाया। हम इन मामलों को फिर से उठाएंगे और न्याय की गुहार लागाई जायेगी।”

इन घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए आदिवासी समाज कहता है कि सरकार का मकसद न नक्सलियों को पकड़ना है और न ही बस्तर से नक्सली समस्या का समाधान करना है, बल्कि समाज का यह मत है कि पुलिस प्रशासन प्रायोजित नक्सलवाद को बढ़ावा दे रही है। बस्तर से युवा सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि 9 अगस्त को प्रत्येक वर्ष आदिवासी दिवस आते ही मन में यह प्रश्न उठता है कि हम आदिवासियों को अपने देश (आजाद भारत) में अब तक क्या मिला? न्याय व हक के लिए आज भी आदिवासी तरस रहे हैं।

बस्तर में नक्सल उन्मूलन के नाम पर बढ़ते आत्याचार ने आदिवासियों का जीना मुहाल कर रखा है। बीते पांच साल तक बस्तर में आदिवासियों को मारो, काटो, उजाड़ो के मुद्दे चुनावी सीजन आते ही गायब हो जा रहे हैं? विपक्षी पार्टियां भी बस्तर के ज्वलंत मुद्दों से पीछा छुड़ा रही हैं ? यहां तक कि सामाजिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व कर रहे सामाजिक नेता भी मौन साधे हुए हैं? बस्तर में बीते साल एक भी आदिवासी को न्याय नहीं मिल पाया है । चाहे वो सारकेगुड़ा में निरीह आदिवासियों को गोलियों से भून डालने का मामला हो या बीजापुर जिले के पेद्दागेलूर में महिलाओं के स्तन निचोड़ कर बलात्कार का मामला हो! अगर कुछ जगहों पर कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं तो महज खानापूर्ति के लिए और बाद में आरोपी जमानत पर छूट कर बेखौफ घूम रहे हैं।

इन सब घटनाओं से यह प्रतीत होता है कि बस्तर में आदिवासियों के साथ आज भी न्याय लंबित है। आज भी न्याय के आस में आदिवासी अपनी जिंदगी जी रहे हैं । उल्टा बस्तर में लगातार नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासी सरकारी हिंसा का शिकार हो रहे हैं, बेगुनाह, निरीह आदिवासी जनसंहार का शिकार हो रहे हैं।

(तामेश्वर सिन्हा अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं और आजकल बस्तर में रहते हैं।)




Tagadivasi justice encounter naxal atrocity

Leave your comment